जी.डी. अग्रवाल की मृत्यु मोदी के नमामि गंगे प्रहसन का पर्दाफाश

11 अक्टूबर को हरिद्वार में गंगा की अविरलता के लिए अनशनरत प्रो. जी.डी. अग्रवाल का 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वे 111 दिन से अनशनरत थे और एक दिन पहले पानी पीना भी छोड़ चुके थे. 2011 में सन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाने गए जी.डी.अग्रवाल गंगा की अविरलता के लिए अनशन कर रहे थे.

एक सरकार जो गंगा के नाम पर  नमामी गंगे जैसी योजना चलाती है, उसी के राज में एक पूर्व प्रोफेसर जो सन्यासी हो चुका है, गंगा की स्वच्छता के लिए मांग करते हुए उसकी जान चली जाती है, यह बेहद विचित्र है. आश्चर्यजनक यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने तीन पत्र लिखे, जिनमें से एक का भी जवाब नहीं आया. ट्विटर पर एक क्रिकेटर से मिली सेहत की चुनौती को कबूल करने के लिए लंबा विडियो शूट करने वाले प्रधानमंत्री के पास अनशन पर बैठे एक 86 साल के बुजुर्ग प्रोफेसर के तीन पत्रों में से एक का भी जवाब देने की फुर्सत ही नहीं हुई ! शुरू में मोदी पर अग्रवाल को काफी भरोसा था, इसलिए इस वर्ष 24 फरवरी और 13 जून को लिखे पत्रों में वे मोदी को अपने छोटे भाई के तौर पर संबोधित करते हैं. लेकिन जिसे अग्रवाल अपना छोटा भाई समझ रहे थे, उस भाई ने न तो उनके एक पत्र का जवाब दिया, न ही उनका जीवन बचाने का कोई प्रयास किया.

और वे मांग क्या रहे थे, यह 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अंतिम पत्रा में उन्होंने दोहराया - 1. गंगा संरक्षण एवं प्रबंधन अधिनियम पारित किया जाये ऋ 2. गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बनने वाली सभी जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगे ऋ 3. हरिद्वार और कुम्भ क्षेत्र में खनन पर रोक लगे ऋ 4. गंगा भक्त परिषद का गठन हो, जो गंगा के हित में काम करे.

इसी पत्र में वे मोदी से जगी उम्मीद और उनके कार्यों के प्रति निराशा को भी प्रकट करते हैं. वे लिखते हैं कि 2014 के चुनावों में जब मोदी ने कहा कि गंगा ने उन्हें बुलाया है तो उन्हें (अग्रवाल को) आस जगी थी कि गंगा के लिए मोदी जरूर कुछ करेंगे. लेकिन मोदी के कार्यों से निराशा जाहिर करते हुए अग्रवाल लिखते हैं कि बीते चार सालों में मोदी की सरकार ने गंगा से केवल लाभ कमाने और कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने का काम ही किया है.

गंगा की सफाई के लिए गाल बजाने वाली सरकार में भगवा वस्त्रधारी एक प्रोफेसर 111 दिन तक भूख हड़ताल पर रहता है और उत्तराखंड तथा देश में भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होती है तो इस सरकार के गंगा प्रेम की असलियत समझी जा सकती है.

वैसे मोदी सरकार के गंगा प्रेम और गंगा सफाई के दावों की हकीकत भारत के  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से भी समझी जा सकती है. कैग की रिपोर्ट कहती है कि 31 मार्च 2017 तक गंगा सफाई कोष में 198.14 करोड़ रुपये थे, जिनमें से एक भी रुपया खर्च नहीं हुआ था और सारी धनराशि बैंकों में पड़ी हुई थी. कैग की रिपोर्ट कहती है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम बेहद धीमी गति से चल रहा है. मई 2017 तक नदी संरक्षण क्षेत्र ही चिन्हित नहीं किए जा सके थे. कैग के अनुसार अधिकांश काम या तो आधे-अधूरे हैं या शुरू ही नहीं हुए.

एक तथ्य यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद की 2016 में गठन के बाद आज तक एक भी बैठक नहीं हुई है. बीस हजार करोड़ रुपये की नमामि गंगे योजना की हकीकत कैग की रिपोर्ट और जी.डी. अग्रवाल की मृत्यु से स्पष्ट है.

एक प्रश्न यह भी है कि जी.डी. अग्रवाल किसके एजेंडे के लिए लड़ रहे थे? गंगा की अविरलता का उनका एजेंडा दरअसल तो हिंदुवादियों का ही एजेंडा रहा है. गंगा की सफाई और उस पर जलविद्युत परियोजनाओं के विरोध की जो लड़ाई है, उसके कई पहलू हैं. पर्यावरणीय कारणों से जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध किया जाता रहा है, स्थानीय लोगों का संसाधनों पर अधिकार खत्म करने और उनके विस्थापन के खिलाफ भी इन परियोजनाओं का विरोध किया जाता रहा है. इसका अलावा जो तीसरा विरोध का कारण है, वो हिन्दू धर्म के नजरिए से है, जो पर्यावरणीय पहलुओं से ज्यादा धार्मिक वजहों से गंगा की अविरलता यानि उसके निर्बाध बहाव पर ज़ोर देता है और इसलिए जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध करता है. जी. डी. अग्रवाल इसी अविरलता वाले नजरिए से गंगा की स्वच्छता और परियोजनाओं के विरोध की बात कर रहे थे. इस तरह देखें तो वे हिंदुवादी एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे थे. उनके सारे अनशनों को देखें तो उसमें लोगों के संसाधनों पर अधिकार और विस्थापन की बात नहीं सुनाई देगी, पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की बात भी उसमें गौण है. उनके सारे विरोध का आधार हिंदुवादी नजरिया ही है, जिसमें वे निरंतर गंगा की अविरलता पर ज़ोर देते हैं. हिंदुवादी उन्माद के प्रतिनिधियों वाली सरकार में उनके एजेंडे पर चलने वाला व्यक्ति भी अनशन करते मर गया तो फिर बचेगा कौन ?

जी. डी. अग्रवाल हों या कोई साधारण नागरिक, सबके जीवन की रक्षा करना, सरकार का संवैधानिक दायित्व है. निश्चित ही प्रो. जी. डी. अग्रवाल की मृत्यु दुखद और मोदी सरकार के क्रूर, आलोकतांत्रिक और तानाशाही चेहरे को दिखाती है. यह सरकार इतनी अहंकारी है कि अपनी ही धारा के एक सन्यासी की मौत से भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन साथ ही यह भी समझना होगा कि गंगा या किसी भी नदी के बने और बचे रहने की जरूरत सिर्फ धार्मिक कारणों के लिए नहीं है. इन नदियों के किनारे बसने वाली और इन पर निर्भर बड़ी आबादी की जीवन रेखा हैं ये नदियां. इन नदियों पर पहला अधिकार न तो किसी कॉरपोरेट का हो सकता है, ना ही धार्मिकता इतनी बड़ी हो सकती है कि उसके सामने लोगों का जीवन और उनके अधिकार चर्चा का विषय ही न बनें. खेती, जमीन, मनुष्य सब डूब जाये, लेकिन मंदिर बचा रहे, जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ आंदोलनों का यह तर्क उतना ही मनुष्य द्रोही है, जितना सब कुछ डुबो देने वाला बड़ी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं वाला विकास का मॉडल.

- इन्द्रेश मैखुरी

वर्ष27
अंक45