जब यूपीए की सरकार सत्ता में थी, तब मीडिया ने सरकारी खाते में जितने घोटाले दर्ज थे, उनके बारे में विस्तार से खबरें प्रकाशित की थीं - खासकर, उन घोटालों की जिनमें शासक पार्टी और कुछ कॉरपोरेटों के बीच पिट्ठू (क्रोनी) पूंजीवादी रिश्ते बखूबी जाहिर हो रहे थे. लेकिन, पिछले चार वर्षों में अधिकांश मीडिया ने उन घोटालों और क्रोनी पूंजीवाद के उदाहरणों पर बहुत कम ध्यान दिया है जिनमें शासक भाजपा के नेताओं की संलिप्तता रही है. नतीजतन,लोगों के लिए इन घोटालों को भुला देना काफी सहज है. इसीलिए हम ‘लिबरेशन’ में प्रकाशित ‘स्कैम वाच’ को कुछ अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं.
इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस
मोदी सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) द्वारा गठित ‘शक्ति-प्रदत्त विशेषज्ञ समिति (ईईसी) की ओर से अभी तक अस्तित्व-हीन जियो इंस्टीट्यूट ऑफ रिलायंस फाउंडेशन को ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ (उत्कृष्ट संस्थान) (आइओई) का तमगा प्रदान करने का फैसला खुल्लमखुल्ला क्रोनीवाद (पिट्ठू या भाई-भतीजावाद) को रेखांकित करता है जो मोदी मार्का शासन का खास प्रतीक है.
तथ्य यह बतलाते हैं कि एमएचआरडी ने ही ‘ग्रीनफील्ड कैटॅगरी’ (ऐसे प्रस्तावित संस्थान जिनकी स्थापना अभी हुई नहीं है) के लिए ऐसे नियम-कानून बनाए हैं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि अंबानियों के अलावा कोई और इस कैटॅगरी के लायक खुद को साबित न कर सके. अब, स्वार्थों के टकराव का एक शास्त्रीय नमूना तो देखिये - आइओई योजना (जिसे उस वक्त ‘विश्व स्तरीय संस्थान’ योजना कहा जाता था) को मूर्त रूप देने के समय विनयशील ओबेरॉय एमएचआरडी सचिव थे, और दूसरी ओर वे मुकेश अंबानी की अगुवाई में उस 8-सदस्यीय जियो टीम के भी अंग थे जिसने ईईसी के समक्ष अपना प्रस्ताव रखा था.
मोदी सरकार और अंबानी ग्रुप के बीच क्रोनी रिश्ता तब और स्पष्ट हो जाता है, जब हम देखते हैं कि रिलायंस फाउंडेशन इंस्टीट्यूशन ऑफ एडुकेशन एंड रिसर्च (आरएफआइईआर) का एक कंपनी के रूप में उसी दिन पंजीकरण हुआ जिस दिन यूजीसी (विवि अनुदान आयोग) ने प्रेस रिलीज जारी कर इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए थे.
उत्कृष्ट संस्थान के लिए अधिसूचित नियम कानूनों को इस प्रकार निर्मित किया गया है कि अन्य अधिकांश संस्थान इस कैटॅगरी से बाहर हो जाएं और सिर्फ रिलायंस फाउंडेशन जियो इंस्टीट्यूट की अर्हता सुनिश्चित हो सके. एक नियम में कहा गया है कि प्रस्तावित संस्थान के "प्रायोजक संगठन" के हर-एक सदस्य के पास कुल मिलाकर 50 अरब रुपये की शुद्ध संपत्ति होना जरूरी है. मुकेश अंबानी जैसे मुट्ठी भर लोगों के अलावा और कितने लोग होंगे जो इतनी विशाल "शुद्ध संपत्ति" रखने का दंभ भर सकें? एक अन्य नियम में कहा गया है कि उस संगठन के पास "किसी भी क्षेत्र में (जरूरी नहीं कि उच्चतर शिक्षा के ही क्षेत्र में; लेकिन इसमें हो तो बेहतर) योजनाओं को वास्तविक उपलब्धियों में तब्दील करने" का पुख्ता इतिहास मौजूद हो - ये शब्द सुनिश्चित करते हैं कि उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में कोई अनुभव न होने के बावजूद रिलायंस इस क्षेत्र में "उत्कृष्टता" के लिए अपना दावा पेश कर सके !
इसी बीच, मोदी सरकार के एक अन्य प्रसिद्ध क्रोनी और भाजपा को सबसे ज्यादा धन देने वाले वेदांता ग्रुप को ओडिशा में अपने प्रस्तावित विश्वविद्यालय की खातिर "उत्कृष्ट संस्थान" का तमगा लेने के लिए आवेदन करने हेतु अंतिम समय-सीमा में एक महीने का विस्तार मिल गया. (स्मरण रहे, इसी ओडिशा राज्य में विशाल जन आंदोलनों के जरिए अल्युमिना रिफायनरी लगाने की वेदांता परियोजना को शिकस्त दी गई थी, क्योंकि उससे नियामगिरि पर्वत नष्ट हो जाता !)
जिन निजी संस्थानों को "उत्कृष्टता" का तमगा दिया जाएगा, उन्हें ‘स्वायत्तता’ मिल जाएगी - यानी, वे मनमाना भारी-भरकम शुल्क वसूलेंगे और उत्पीडि़त जातियों के लिए आरक्षण प्रावधानों को लागू करने में भी आनाकानी करेंगे. मुंबई स्थित धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में एलकेजी से कक्षा 4 तक के लिए प्रति वर्ष 2.05 लाख रुपये और 11-12वीं कक्षा के लिए सालाना 9.65 लाख रुपये लिये जाते हैं. इतना भारी-भरकम शुल्क यह सुनिश्चित करने के लिए ही है कि इन स्कूलों में सिर्फ अति-धनिकों के बच्चों का पालन-शिक्षण हो सके !
"उत्कृष्टता" के लिए चयन की समूची प्रक्रिया भी त्रुटिपूर्ण है. सबसे भारी गड़बड़ी तो यह है कि ईईसी ने स्पष्टतः विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों का कोई प्रत्यक्ष दौरा किए बगैर अथवा उनका मूल्यांकन और रैंकिंग किए बगैर ही अपनी चयन प्रक्रिया संपन्न कर ली, जबकि यूजीसी के गाइडलाइन में चयन-पूर्व यह सब करना अनिवार्य बताया गया है.
2014 में सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले में 1993 और 2009 के बीच हुए तमाम कोयला-ब्लॉक आवंटनों को अवैध, मनमाना, अ-पारदर्शी तथा किसी क्रियाविधि के बगैर संपन्न हुआ घोषित किया गया था. यकीनन, ‘आईओई’ के लिए यह चयन भी मनमाना और अ-पारदर्शी है, इसीलिए अवैध भी है !
विडंबना देखिए कि जहां अ-जन्मे जियो इंस्टीट्यूट को ‘उत्कृष्ट’ घोषित किया जा रहा है, वहीं वंचित और पिछड़ी पृष्ठभूमि के छात्रों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाले मौजूदा विश्वविद्यालयों और आईआईटी संस्थानों को भारत सरकार ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दे रही है.
स्टरलाइट तांबा संगलक संयंत्र और चेन्नै-सलेम ग्रीन एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट भी संभावित भ्रष्टाचार के सवाल खड़े करते हैं: मोदी सरकार के क्रोनी समझे जाने वाले वेदांता, जिंदल और अडानी जैसे कॉरपोरेशनों को नियम-कानून तोड़ने और विनाशकारी प्रोजेक्ट लगाने की इजाजत क्यों मिल जाती है ?
इस किस्म के खुल्लमखुल्ला क्रोनीवाद के उदाहरणों को प्रकाशित करने वाले पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा चलाने की धमकियां दी जाती हैं, जबकि अधिकांश गोदी मीडिया लोगों का ध्यान भटकाने की कार्यनीति अपनाते हैं; वे अल्पसंख्यकों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं के खिलाफ सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और झूठी खबरें फैलाते हैं, और वे कभी भी भ्रष्टाचार के इन मामलों पर सरकार से जवाब-तलब का अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं.
राफेल सौदा - एक अन्य क्रोनी अंबानी के लिए
फ्रांस के साथ हुआ राफेल फाइटर जेट सौदा तमाम प्रतिरक्षा घोटालों की जननी है जिसके सामने बोफोर्स "बौना दिखता है", जैसा कि प्रशांत भूषण ने कहा है.
तथ्य क्या हैं ?
इसके पूर्व यूपीए सरकार 54,000 करोड़ रुपये में 126 राफेल जेट खरीदने का सौदा कर रही थी, जिसमेें 18 जेट उड़ने के लिए तैयार स्थिति में मिलने थे और शेष जेट सार्वजनिक क्षेत्र की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा तैयार किए जाने थे और इसके लिए टेक्नोलॉजी दसाऊ कंपनी (फ्रांस) द्वारा हस्तांतरित किया जाना था. यह सौदा खारिज कर दिया गया और रातोंरात मोदी सरकार ने एक नया सौदा हस्ताक्षरित कर लिया जिसके मुताबिक 58,000 करोड़ रुपये में 36 जेट तैयार स्थिति में मिलने वाले हैं, लेकिन कोई टेक्नोलॉजी भारत को नहीं मिलेगी. इस करार के सम्पन्न होने के ठीक दो सप्ताह पहले पंजीकृत होने वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड (आरडीएल) कंपनी के मालिक अनिल अंबानी प्रधान मंत्री मोदी के साथ फ्रांस के दौरे पर गए और उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की अनुभवी कंपनी एचएएल की जगह खुद अपनी कम्पनी की दसाऊ के साथ साझेदारी हासिल कर ली. और 16 अक्टूबर को करार के ठीक दो सप्ताह बाद इस नए आरडीएल ने 20,000 करोड़ का शुरूआती सौदा झटक लिया.
आइए, अब इस क्रोनी तमाशे का निष्कर्ष निकालें
जिस प्रकार मोदी सरकार से ‘उत्कृष्टता संस्थान’ (इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेन्स) का उपहार झटकने के लिए रिलायंस फाउंडेशन इंस्टीट्यूशन ऑफ एडुकेशन एंड रिसर्च (आरएफआइईआर) का आनन-फानन में पंजीकरण कराया गया, उसी तरह से मोदी सरकार द्वारा नए सिरे से हस्ताक्षरित राफेल सौदा के अंग के बतौर दसाऊ के साथ प्रतिरक्षा उत्पादन साझेदारी झटकने के लिए रिलायंस डिफेंस लिमिटेड (आरडीएल) का आनन-फानन पंजीकरण कराया गया. सार्वजनिक क्षेत्र के अनुभवी एचएएल के बजाय महज 2 सप्ताह पुराने अनुभव-रहित आरडीएल को भला क्यों तरजीह दी गई? नए करार में टेक्नोलॉजी हस्तांतरण क्यों नहीं शामिल है, जबकि पुराने करार में यह शर्त मौजूद थी ? करार के बाद, प्रारंभिक ठेके का सबसे बड़ा हिस्सा अंबानी के आरडीएल के हाथों कैसे चला गया?
संसद में राफेल करार के बारे में पूछे गए सवाल पर मोदी सरकार ने गुस्से में उबलते हुए दावा किया कि प्रतिरक्षा सौदों की कीमतों को विस्तार में प्रकट करने से राष्ट्रीय सुरक्षा पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. यह कोरी बकवास है. राफेल करार के गोपनीयता खंड में भारत और फ्रांस के बीच 2008 में हुए सुरक्षा समझौते का हवाला दिया गया है जिसका उद्देश्य ऐसी "वर्गीकृत सूचनाओं" की हिफाजत करना है जो प्रतिरक्षा उपस्करों की सुरक्षा और उसकी प्रचालन क्षमताओं को प्रभावित कर सकती हैं." इससे इनके बिक्रय मूल्य को प्रकट करने में कोई रोक नहीं लगती है. फ्रांस सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मोदी सरकार विपक्ष को विस्तार से कीमतें बता देेने के लिए स्वतंत्र है.
इसके अलावा, मोदी सरकार यह ‘सुरक्षा’ सम्बंधी बहाना देर से हाजिर कर रही है. इसके पहले, इसी सरकार ने यह करार होने के ठीक बाद प्रतिरक्षा पत्रकारों को विस्तार से कीमत का वर्णन किया था, और यह दावा किया था कि राफेल जेट की कीमत सिर्फ 670 करोड़ रुपये है तथा शेष 900 करोड़ रुपये से भी ज्यादा राशि हथियार प्रणाली में कुछ खास किस्म के गोपनीय "उन्नयन" के काम में खर्च होगी. प्रतिरक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2016 में संसद के अंदर कीमतें भी बताई थीं. प्रशांत भूषण ने इस दावे की तुलना इस कथन से की - "आप की कार की कीमत 10 लाख रुपये है, लेकिन इसमें सीटों की कीमत 20 लाख रुपये है." जब इन बेतुके दावों की जांच होने लगी और इस पर सवाल उठने लगे, तब इसके बाद सरकार सुरक्षा के तर्क देने लगी है!
सीबीआई के कलंकित अफसरान
भ्रष्टाचार के इन मामलों की जांच कौन करेगा? मोदी शासन में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केंद्रीय निगरानी आयोग (सीवीसी) को यह लिखा कि ब्यूरो को ऐसे अफसर शामिल करने को कहा जा रहा है जो दागदार हैं और "ब्यूरो के द्वारा जांच किए जा रहे आपराधिक मामलों में संदिग्ध/अभियुक्त के बतौर जिनके खिलाफ सीबीआइ जांच चला रही है"! सीबीआइ ने बताया कि उसके दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना स्वयं अनेक मामलों में जांच के दायरे में हैं और इसीलिए डायरेक्टर आलोक वर्मा की अनुपस्थिति में "सीबीआइ में अफसरों को शामिल करने के लिए उनसे विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता है." सवाल यह है - सरकार सीबीआइ पर दबाव क्यों बना रही है कि वह आपराधिक मामलों के संदिग्धों/आरोपियों को अपने अफसरों के बतौर शामिल कर ले?
मेहनती और चौकस मीडिया के अभाव में भारत की जनता को ही मोदी सरकार के इस कंपनी राज का भंडाफोड़ और प्रतिरोध करना होगा, जो क्रोनीवाद और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है !
झारखंड में अडानी की लूट:
नियमों में संशोधन और तोड़-मरोड़
झारखंड के गोड्डा में अडानी पावर लिमिटेड की 1600 मेगावाट क्षमता वाली कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना के बारे में स्क्रॉल-इन में अरुणा चंद्रशेखर की एक खोजी रपट में बताया गया है कि "सरकारी दस्तावेज दिखाते हैं... कि झारखंड ने 2016 में अपनी ऊर्जा नीति में संशोधन किया ताकि इस कंपनी को सरकार से अन्य ताप विद्युत परियोजनाओं के मुकाबले अधिक कीमत वसूलने की इजाजत मिल सके." जो अडानी प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अभियानों के लिए धन देता है, उसकी कंपनी को लाभ देने के लिए भाजपा सरकार द्वारा ऊर्जा नीति में संशोधन करना क्रोनी पूंजीवाद का ठेठ नमूना है.
उस रिपोर्ट में कहा गया है, "एक गोपनीय ऑडिट रिपोर्ट - जिसकी एक प्रति स्कॉल-इन के पास मौजूद है - में गणना की गई है कि इस संशोधित शर्तों के चलते सरकार को हर साल 296.40 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च वहन करना होगा. 25 वर्षों के दौरान - बंगला देश के साथ अडानी की बिजली खरीद समझौते की अवधि में - झारखंड सरकार को इस कंपनी के हाथों में अतिरिक्त 7410 करोड़ का भुगतान करना पड़ सकता है." सरकारी अकाउंटेंट के कार्यालय द्वारा तैयार इस ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि अडानी के साथ यह समझौता "तरजीही आचरण" जैसा है जिससे इस कंपनी को "बेजा फायदा" मिलेगा.
इसके अलावा, अडानी परियोजना के लिए ग्रामीणों से उनकी जमीन हड़पने की खातिर झारखंड सरकार आदिवासी जमीन को संरक्षण देने वाले कानूनों का उल्लंघन भी कर रही है. भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के अनुसार अगर सरकार किसी परियोजना के लिए जमीन का अधिग्रहण करती है तो उस परियोजना को "सार्वजनिक उद्देश्य" साबित करना होगा. यह सार्वजनिक उद्देश्य सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के जरिए ही निर्धारित हो सकेगा, जिसमें इससे प्रभावित होने वाले लोगों के साथ सलाह-मशविरा करना जरूरी है. और यदि कोई परियोजना "सार्वजनिक उद्देश्य" की कसौटी पर खरी उतरती भी है, तो इसके लिए भूमि अधिग्रहण की खातिर 80 प्रतिशत प्रभावित भू-धारियों की सहमति आवश्यक होगी.
इस अडानी परियोजना से झारखंड या भारत को कोई बिजली नहीं मिलेगी - स्पष्ट है कि यह ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ साबित नहीं कर सकती है. इस प्रभावित गांवों के निवासियों ने स्क्रॉल-इन को बताया कि "उन्हें सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन की सुनवाइयों से जबरन अलग रखा गया," और उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने उनकी सहमति के बगैर उनकी जमीन की घेरेबंदी कर ली. इन सुनवाइयों की जगह पर "कंपनी के एजेंटों ने प्रवेश मार्ग को नियंत्रित कर रखा था. मोतिया गांव में दस बीघा जमीन रखने वाली चंपा देवी ने कहा, "उन लोगों ने हमसे सीधा पूछा - तुम लोग अपनी जमीन दोगे ? हमलोगों ने कहा, नहीं ! उनलोगों ने कहा कि हम तुमलोगों को अंदर नहीं आने देंगे. बक्सारा, पटेवी और बलिया बित्ता गांवों में लगभग 100 बीघा जमीन की मालकिन बेबी देवी ने स्क्रॉल-इन को बताया, "जब हमलोग वहां गए तो उन लोगों ने कहा कि वे लोग सिर्फ पीला और हरा कार्ड रखने वाले लोगों को ही अंदर आने देंगे - वे लोग इसे अडानी आइडी कार्ड कहते हैं." जब एक महिला अनिता किसी तरह से अंदर चली गई और उसने पूछा कि सुनवाई में भाग लेने वाले कितने लोगों के पास वास्तव में जमीन है, तो प्रशासन ने बाहर खड़े लोगों पर लाठीचार्ज करवा दिया, जो अंदर जाने की मांग कर रहे थे.
यह भूमि अधिग्रहण एक अन्य वजह से भी गैर-कानूनी है: क्योंकि "गोड्डा संथाल परगना प्रमंडल का हिस्सा है, जो संथाल परगना पट्टेदारी कानून से शासित होता है, जिसमें चंद अपवादों को छोड़कर कृषि भूमि का स्थानांतरण, लीज या क्रय-विक्रय की अनुमति नहीं दी गई है."
नोटबंदी घोटाला:
अमित शाह क्या छिपाना चाहते हैं ?
22 जून को आइएएनएस ने खबर दी कि "एक जिला सहकारी बैंक, अमित शाह जिसके निदेशक हुआ करते हैं, में 500 और 1000 रुपयों के सबसे ज्यादा नोट (जिसे 8 नवंबर 2016 को अचानक प्रतिबंधित कर दिया गया था) जमा किए गए थे." आरटीआइ के तहत मुंबई के एक कार्यकर्ता मनोरंजन एस. राय द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में ‘नाबार्ड’ ने यह बताया था. दूसरी सबसे बड़ी राशि राजकोट जिला सहकारी बैंक में जमा की गई थी जिसके अध्यक्ष जयेश भाई बिट्ठल भाई राडाडिया गुजरात में भाजपा सरकार के कैबिनेट मंत्री हैं - इस बैंक को पहले पांच दिनों में 693 करोड़ रुपये के नोट मिले. यह याद रखें कि "सभी जिला सहकारी बैंकों पर रोक लगा दी गई थी कि वे 14 नवंबर 2016 से - नोटबंदी के पांच दिन बाद से - आम लोगों से प्रतिबंधित नोट न लें, क्योंकि यह आशंका थी कि इन बैंकों के जरिए काला धन जमा कर दिया जाएगा." आइएएनएस की रिपोर्ट में आगे कहा गया कि, "संयोगवश, अहमदाबाद-राजकोट जिला सहकारी बैंकों में जमा नोटों की राशि शीर्ष के गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में जमा राशि (महज 1-11 करोड़ !) से कहीं ज्यादा थी."
अगर इस खबर में कोई चौंकाने वाली बात नहीं लगती है, तो अगली खबर जरूर चौंकाने वाली है. ‘न्यूज 18’ और ‘फर्स्टपोस्ट’ (ये दोनों मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा नियंत्रित है) तथा ‘टाइम्स नाउ’ ने आइएएनएस की इन खबरों को आधार बनाकर, इसके प्रकाशित होने के कुछ ही घंटे के अंदर, अपनी-अपनी खबरें बना दीं - और ऐसा करने की कोई सफाई भी उन्होंने नहीं दी! ‘इकॉनोमिक टाइम्स’ ने इस खबर को हू-ब-हू नहीं लिया, बल्कि इसको संपादित कर दिया (यह भी किसी सफाई के बगैर!) और इसमें से अमित शाह का नाम हटा दिया. ऐसा लगता है कि अधिकांश मीडिया शाह और मोदी के सामने रेंगने लगा है -इन्होंने झुकने का निर्देश पाने का इंतजार तक न किया !
‘नाबार्ड’ ने इस रिपोर्ट पर एक सफाई पेश की है, लेकिन उसने आइएएनएस की खबर को खारिज नहीं किया. इस प्रकार, नाबार्ड के सफाई-बयान में इस बात की ठीक-ठीक व्याख्या नहीं होती है कि अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक - अमित शाह जिसके निदेशक हैं - में नोटबंदी की घोषणा के पांच दिन के अंदर, और ऐसे नोट लेने से इन बैंकों को रोक दिए जाने के पहले, प्रतिबंधित नोटों की इतनी अति-विशाल राशि कैसे जमा हो गई ? ‘नाबार्ड के वक्तव्य से जितने जवाब मिलते हैं, उससे कहीं ज्यादा सवाल खड़े हो जाते हैं. नीरज नामक एक व्यक्ति ने ट्वीट किया - "नाबार्ड कहता है कि विचाराधीन बैंकों के 98.66 प्रतिशत खातों में 2.5 लाख से कम नोट जमा किए गए. इसका मतलब है कि लगभग 1.58 लाख खातों में लगभग 395 करोड़ रुपये के नोट जमा किए गए. (यह मानते हुए कि हर बैंक में 2,49,999 रुपये जमा हुए). तब, क्या इसका यह मतलब है कि शेष लगभग 2 हजार खातों में करीब 351 करोड़ रुपये जमा किए गए ?"