अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति

अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति

1.     वैश्विक आर्थिक संकट और नव-उदारवादी शासनों द्वारा इसे दूर करने के लिए किये गए उपायों (कारपोरेट के लिए राहत-पैकेज और आम लोगों के लिए जन-हितकारी मदों में कटौती) ने पिछले दशक में बेरोजगारी बढ़ाई है, काम और जीवन की स्थितियों को तबाह और अस्थिर किया है और असमानता को बढ़ाया है. वैश्विक गैर-बराबरी पर एक हालिया अध्ययन दिखाता है कि अमेरिका और भारत में आय का केन्द्रीकरण 1920 के दशक के स्तर तक पहुँच गया है.

2.     2017-18 रूसी क्रांति का शताब्दी वर्ष और मार्क्स के ग्रंथ ‘पूँजी’ के प्रकाशन का 150वां साल है. सोवियत संघ के विघटन से लेकर आज तक उसके कई महत्त्वपूर्ण घटक तत्व संकट से गुजर रहे हैं फिर भी समाजवाद के विचार के प्रति लोगों का रुझान अमेरिका और ब्रिटेन सहित दुनिया के तमाम हिस्सों में नए सिरे से बढ़ा है. इस बढ़ते हुए रुझान का मुख्य कारण भीषण गैर-बराबरी और लोक कल्याण की मदों में की जाने वाली भारी कटौती है.

3.     आश्चर्य नहीं कि गहन असुरक्षा और वंचना का यह माहौल पूरी दुनिया में फासीवादी और अधिनायकवादी शक्तियों के उभार के लिये भी उपजाऊ जमीन साबित हुआ है जो इस गैर-बराबरी और असुरक्षा के लिए नव-उदारवादी नीतियों की जगह अल्पसंख्यकों और आप्रवासियों को जिम्मेदार बताती हैं. इन ताकतों ने एक तरफ ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर पराये देश के लोगों और इस्लाम से नफरत को बढ़ाने और दूसरी तरफ आर्थिक-राजनीतिक पुनरुत्थान और राष्ट्र की ‘महानता’ को पुनस्र्थापित करने के वादे के जरिये अपनी शक्ति बढ़ाई है और यहां तक कि चुनाव में नाटकीय सफलताएं भी हासिल की हैं.

4.     जहां इन ताकतों ने सत्ता हथिया ली है, वहां फासीवादी गिरोहों द्वारा संगठित नस्लीय/साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ी है. असहमति, नागरिक आजादी व अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता पर हमले बढ़े हैं. महिलावाद विरोधी राजनीति का उभार हुआ है और महिला अधिकारों पर हमले बढ़े हैं. घृणा और पूर्वाग्रह बढ़ाने के लिए झूठी खबरों के इस्तेमाल के साथ-साथ व्यक्ति पूजा व एक मजबूत नेता में शक्तियों के केन्द्रीकरण को बढ़ावा मिला है. भारत में मोदी और अमेरिका में ट्रंप इस तरह की राजनीति के सफलतम उदाहरणों में से है. फ्रांस में मरीन ला पेन के नेशनल फ्रंट (एफएन), जर्मनी के अल्टरनेटिव फाॅर जर्मनी (एएफडी), आस्ट्रेलिया में नव-नाजी विचारधारा वाली फ्रीडम पार्टी और ब्रिटेन में सफल ब्रेक्जिट वोट फासीवादी राजनीति के उभार के कुछ और उदाहरण हैं.

5.     तुर्की में एर्दाेगान और रूस में पुतिन भी ऐसे नेताओं के उदाहरण हैं जिन्होंने हाल के वर्षों में अपने देशों की सत्ता पर अधिनायकवादी पकड़ को मजबूत किया है. हालांकि ढांचागत स्तर पर ये चुनावी लोकतंत्र के रूप में मौजूद हैं लेकिन अपनी अंतर्वस्तु में बेहद अलोकतांत्रिक सत्ताओं में बदल चुके हैं. विरोधों का दमन, मीडिया पर नियंत्राण और इन नेताओं को लम्बे समय तक शासन की इजाजत देने के लिए अपने-अपने देशों के संविधान में संशोधन इनके प्रमुख लक्षण हैं. यहां अधिनायकवाद को देशभक्ति बताकर पेश किया जाता है. पुतिन की सरकार रूस के कुलीन पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करती है और उनके इशारों पर नाचती है. पुतिन खुद इनमें से एक हैं.

6.     धनी श्वेत लोगों के बीच श्वेतों की श्रेष्ठता के उभार के जरिये और अमेरिका के बेरोजगार श्वेत मजदूर वर्ग के गुस्से व असुरक्षा की भावना को नस्लीय और विदेशियों के प्रति घृणा की दिशा में मोड़कर ट्रंप ने जीत हासिल की. ट्रंप खुद खरबपति कारोबारी हैं और उनकी आर्थिक नीतियां नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था को जरा भी चुनौती नहीं देतीं. मजदूर अधिकारों और मजदूर कल्याण की नीतियों पर हमला करते हुए वे बेरोजगारी की समस्या को आप्रवासन को रोकने के जरिये हल करने का दावा करते हैं.

7.     ट्रंप की जीत ने श्वेत श्रेष्ठतावादी पफासीवादी ताकतों के हौसले बुलंद किये हैं जिससे आप्रवासी और अश्वेत लोगों के खिलाफ घृणा के अपराधों में तेजी आई है. फासीवाद विरोधी प्रदर्शनों पर फासीवादी समूहों ने संगठित हमले किये हैं.

8.     सात मुस्लिम-बहुल देशों पर लगाए गए यात्रा-प्रतिबंध और मैक्सिको के खर्च पर मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने की जिद,  इस्लाम के खिलाफ नफरत और नस्लवाद ट्रंप के मनमाने नीतिगत फैसले हैं.

9.     अपने चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने पश्चिम एशिया में युद्धों में अमेरिका की भागीदारी का विरोध करते हुए वादा किया था कि वे वैश्विक पुलिस की जगह ‘सर्वप्रथम अमेरिका’ की नीति अपनाएंगे, लेकिन अब यह स्पष्ट है कि ट्रंप युद्धोन्माद के साम्राज्यवादी एजेंडे और दुनिया भर में अपने मनपसंद शासक स्थापित करने के मुद्दे पर अपने पूर्ववर्तियों की नीति का ही अनुसरण कर रहे हैं.

10.     ट्रंप उत्तर कोरिया और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्यवाही की धमकी देने और ट्विटर जैसे संवेदनशील मंच पर परमाणु ताकत की शेखी बघारने के खतरनाक खेल में शामिल हैं. अमेरिकी प्रशासन उत्तर कोरिया को अपने नस्लीय प्रचार के जरिये बुरी ताकत बताकर उत्तर कोरिया के खिलाफ जारी आर्थिक युद्ध और सैन्य घेरेबंदी को जायज ठहरा रहा है. अमेरिकी हस्तक्षेप को दरकिनार करते हुए उत्तर और दक्षिण कोरिया द्वारा आपस में बातचीत के लिए उठाये गए कदम उत्साहवर्धक हैं.

11.     ट्रंप चीन के प्रति संरक्षणवादी नीति अपनाने की धमकी देते रहे हैं लेकिन उनका का यह रुख इस डर के चलते है कि कहीं चीन बदले की कार्यवाही करते हुए अमेरिकी निवेश के लिए अपने बाजार बंद न कर दे. इससे अमेरिकी कारपोरेट बुरी तरह प्रभावित होंगे क्योंकि चीन में उनका काफी निवेश है. ‘सर्वप्रथम अमेरिका’ की नीति के नाम पर ट्रंप ने ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी से अपने को अलग कर लिया. यह अमेरिका के नेतृत्व में बारह देशों का व्यापार समझौता था जिसका मकसद चीन के खिलाफ संतुलन कायम करना था. चीन ने इस अलगाव का फायदा उठाया. भू-राजनीतिक स्तर पर ट्रम्प प्रशासन अपने पूर्ववर्ती प्रशासनों की ‘चीन को नियंत्रित’ करने की नीति को और तेजी से आगे बढ़ा रहा है. इसी नीति के तहत ट्रम्प प्रशासन ने इस क्षेत्रा को ‘एशिया-पैसिफिक’ की जगह ‘इंडो-पैसिफिक’ कहना शुरू कर दिया है. ट्रम्प ने हाल ही में आयातित स्टील पर 25 प्रतिशत सीमा शुल्क एवं एल्यूमिनियम पर 10 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाने की योजना बनाई है जो कि मुख्यतः सस्ती धतुएं निर्यात करने वाले देश चीन के विरुद्ध लक्षित जुरमाना है. इस प्रकार के शुल्क भारत के लिए भी अनिवार्यतः नुकसानदेह साबित होंगे. अमेरिका के दोहरे मानदण्ड स्पष्ट हैं, एक ओर वह अपने उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयातित सामग्री पर दण्डात्मक रूप में सीमा शुल्क थोपता है, जबकि भारत जैसे अन्य देशों को यही कदम उठाने से रोकने के लिए डब्लू.टी.ओ. एवं अन्य संस्थाओं का इस्तेमाल करता है.

12.     चीन को ‘नियंत्रित’ करने की रणनीति में भारत को भागीदार बनाने के क्रम में ट्रम्प ने पाकिस्तान की आर्थिक मदद बंद करने का बयान दिया, पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ पर भारतीय रुख का समर्थन किया, एशिया पैसिफिक क्षेत्रा को भारतीय पैसिफिक क्षेत्रा घोषित किया, अफगानिस्तान में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया और हैदराबाद में हुए वैश्विक उद्यमिता शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए अपनी बेटी और राश्ट्रपति की सलाहकार इवांका ट्रंप को भेजा, आदि. भारत के साथ इस रणनीतिक लगाव का भारत को कोई लाभ नहीं मिला है. इस लगाव के साथ ही अमेरिका की अपनी संरक्षणवादी नीतियां जारी हैं जिसका उदाहरण है एच-1 बी वीजा के विस्तार में रोक. इससे अमेरिका में मौजूद हजारों कुशल भारतीय कामगारों को भारत वापस भेज दिए जाने का खतरा पैदा हो गया है. अमेरिका में मौजूद हिंदुत्व-लाॅबी ट्रम्प की अप्रवासी-विरोधी नीतियों का समर्थन करती है किंतु वहां बढ़ती नस्लीय हिंसा व दुनिया के दूसरे देशों से आए लोगों पर बढ़ती हिंसा पर चुप्पी साधे है. इस हिंसा का निशाना भारतीय भी बने हैं.

13.     ट्रंप का कार्यकाल इजराइली कब्जे के मुखर समर्थन के लिहाज से भी उल्लेखनीय है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण येरुशलम को इजराइल की राजधानी घोषित करना है. ट्रंप प्रशासन द्वारा येरुशलम के सवाल पर समर्थन के लिए दूसरे देशों को तमाम धमकियां देने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका बुरी तरह अलग-थलग पड़ गया जिसने इस सवाल पर निर्णायक मतदान किया.

14.     यूकेआईपी जैसी दक्षिणपंथी पार्टियों और कंजर्वेटिव पार्टी के एक धड़े के विदेशियों के प्रति नफरत के लिए चलाये गए अभियानों के चलते ब्रिटेन में हुए जनमतसंग्रह में ब्रेक्जिट(ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से अलग होने का प्रस्ताव) को आश्चर्यजनक जीत हासिल हुई. इस अभियान ने ब्रेक्जिट पर जनमतसंग्रह को आप्रवासियों और शरणार्थियों के खिलाफ जनमतसंग्रह में तब्दील कर दिया और इसके जरिये कटौती के कदमों के खिलाफ व्यापक गुस्से व दुश्चिंताओं का इस्तेमाल अपने नस्लीय एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया. ब्रिटेन में ब्रेक्जिट की जीत के साथ ही नस्लीय, विदेशियों और इस्लाम के प्रति नफरत की हिंसा के अपराधों में वृद्धि हुई.

15.     यदि ब्रेक्जिट जनमतसंग्रह ने ब्रिटेन की राजनीति में गहरे धंसे नस्लवाद को बेपर्दा किया तो उसके बाद की घटनाओं ने वामपंथी राजनीति की संभावनाओं को भी सामने रखा जो कटौती और नव-उदारवाद की नीतियों के बरक्स सकारात्मक और प्रेरणादायी विकल्प के रूप में सामने आया. जून 2017 में प्रधानमंत्राी टेरेसा मे द्वारा कराये गए औचक चुनाव में टेरेसा मे की कंजर्वेटिव पार्टी ने अपना बहुमत खो दिया और जेरेमी कोर्बिन की लेबर पार्टी ने अपना वोट 10 प्रतिशत बढ़ाते हुए अपनी सीटें 30 से बढ़ाकर 262 कर लीं. सितम्बर 2016 में अपनी लेबर पार्टी के भीतर ब्लेयर समर्थकों को हराकर कोर्बिन लेबर पार्टी के नेता बन गए. इस औचक चुनाव में कोर्बिन को युवा मतदाताओं का बड़ा समर्थन हासिल हुआ. उनके अभियान का नारा था: ‘मुठ्ठी भर लोगों के लिए नहीं, सबके लिए’. कोर्बिन की यह जीत मीडिया द्वारा चलाये गए उस अभियान के बावजूद हुई जिसमें उनके एजेंडे को अव्यवहारिक और खतरनाक वामपंथी कहकर प्रचारित किया गया था.

16.     ब्रिटेन की तरह ही अमेरिका में भी जब दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों का उभार है तो हमें ध्यान देना चाहिए कि अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनाने के लिए बर्नी सैंडर्स के प्रति युवाओं में अधिक उत्साह और सक्रियता थी. बर्नी सैंडर्स खुद को ‘लोकतांत्रिक समाजवादी’ घोषित करते हैं और उनका एजेंडा वामपक्ष की ओर झुका हुआ था. सिएटल सिटी काउंसिल में सोशलिस्ट आॅल्टरनेटिव की प्रत्याशी क्षमा सावंत की लगातार दो बार जीत हुई. उनका एजेंडा मजदूर वर्ग के लिए न्यूनतम मजदूरी और आवास का अधिकार था. यह जीत छोटी ही सही, पर वाम राजनीति के लिए उत्साहजनक संकेत है.

17.     अमेरिका में ट्रंप के सत्तासीन होने के बाद प्रगतिशील ताकतें और सक्रिय हुई हैं और प्रतिरोध के लिए फासीवाद विरोधी मोर्चे का निर्माण कर रही हैं. ओबामा के दूसरे कार्यकाल के दौरान पुलिस द्वारा अश्वेत व्यक्ति की हत्या व अश्वेतों पर हमले के खिलाफ शुरू हुआ ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आन्दोलन प्रतिरोध का मुख्य आधार बनकर उभरा है. ट्रंप के कार्यकाल के पहले दिन से ही महिलावादी, लातीनी मजदूरों और अश्वेत लोगों ने बड़ी गोलबंदियों के लिए हाथ मिलाया है. यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘मी टू’ और ‘टाइम्स अप’ आन्दोलन अमेरिका के नारीवादी आन्दोलन के लिए ऐतिहासिक बन गये हैं और इनकी अनुगूंज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनी जा रही है.

18.     अमेरिका में इस आंदोलन के साथ-साथ, 2017 और 2018 में 8 मार्च (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवसद) पर अंतर्राष्ट्रीय महिला हड़ताल के आह्नान के चलते नारीवादी आन्दोलन में पूंजीवाद-विरोधी एवं साम्राज्यवाद-विरोधी प्रवृत्ति का जोर भी दिखा है. इस महिला हड़ताल को अमेरिका और 50 अन्य देशों में भारी समर्थन मिला था.

19.     जनवरी 2015 में कटौती-विरोधी आन्दोलनों की लहर पर सवार होकर वाम गठबंधन सिरिजा के चुनाव जीतने और दक्षिणपंथी एएनईएल के साथ गठबंधन करके सरकार बनाने के हम गवाह रहे हैं. एलेक्स सिप्रास के नेतृत्व वाली सिरिजा सरकार ने जून 2015 में एक ऐतिहासिक जनमतसंग्रह कराया कि क्या ग्रीक कर्ज संकट के चलते यूरोपियन कमीशन, आईएमएफ और यूरोपियन सेन्ट्रल बैंक द्वारा थोपी गई बेल-आउट की शर्तों को स्वीकार किया जाना चाहिए? ग्रीक लोगों ने बड़े पैमाने पर जनमतसंग्रह में इससे इनकार कर दिया. एक महीने बाद सिरिजा नेतृत्व द्वारा जनादेश के विपरीत जाकर बेल-आउट की शर्तों के सामने आत्मसमर्पण करने के कारण सिप्रास सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और फिर से चुनाव कराना पड़ा. सितम्बर 2015 में सिरिजा-एएनईएल गठबंधन फिर से चुनाव जीत गया लेकिन तभी से ही उसे व्यापक लोकप्रिय प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है. इन लोकप्रिय आन्दोलनों के केंद्र में ट्रेड-यूनियनें और वाम ताकतें हैं. मगर ग्रीस में फासीवादी शक्तियों का उभार भी देखा जा रहा है.

20.     फिदेल कास्त्रो की मृत्यु के बाद भी क्यूबा अमेरिकी साम्राज्यवाद को धता बताते हुए अपनी आजादी बरकरार रखे हुए है. ओबामा प्रशासन ने क्यूबा पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को खत्म करने की दिशा में कदम उठाये थे, लेकिन ट्रंप प्रशासन उन्हें पिफर से लागू करने की दिशा में बढ़ा है. फिदेल कास्त्रो की मृत्यु के बाद ट्रंप द्वारा किये गए ट्वीट में अमेरिका प्रायोजित सत्ता-बदल के संकेत थे. इस ट्वीट में कास्त्रो को तानाशाह कहा गया था और जिनकी विरासत ‘अकल्पनीय यातना, गरीबी और बुनियादी अधिकारों के अपहरण’ की थी. ट्रंप ने घोषणा की कि वह अपनी क्षमता भर क्यूबा के लोगों की मदद करेंगे ताकि वे ‘सम्पन्नता और स्वाधीनता की ओर अपनी यात्रा शुरू’ कर सकें. क्यूबा के लोगों ने कास्त्रो की अंतिम यात्रा में बड़े पैमाने पर भागीदारी करके इन दावों का जवाब दिया और क्यूबा की क्रान्ति के प्रति अपने समर्थन और उम्मीदों को एक बार फिर दोहराया.

21.     वेनेजुएला में भी शावेज के उत्तराधिकारी राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से बाहर करने के लिए अमेरिका लगातार दक्षिणपंथी विपक्ष की मदद कर रहा है. ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था का ‘गला घोंटने’ के लिए नए आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये हैं और सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी है. 2015 के नेशनल असेम्बली चुनाव में यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी आॅफ वेनेजुएला (पीएसयूवी) को हार का सामना करना पड़ा. वह 167 में से सिर्फ 55 सीटें जीत सकी. मुख्य विपक्षी पार्टी डेमोक्रेटिक यूनिटी कोयालिशन (एमयूडी) के वोटों में सिर्फ 4.22 प्रतिशत का इजाफा हुआ.

22.     लेकिन पीएसयूवी के जनाधार की अपेक्षाकृत निष्क्रियता और सरकार की पूंजीपतियों के प्रति दब्बू और समझौतावादी नीति ने पीएसयूवी की हार में बड़ी भूमिका निभाई. पीएसयूवी और मादुरो सरकार ने इस हार से सबक लेते हुए खुद को सुधारा. विपक्ष द्वारा प्रायोजित हिंसा के बावजूद नेशनल कांस्टीचुएंट असेम्बली के चुनाव में लोगों की बड़े पैमाने पर भागीदारी हुई. वेनेजुएला के संविधान द्वारा अनुमोदित इस असेम्बली में ट्रेड-यूनियनों, स्थानीय सामुदायिक परिषदों, गरीब किसानों, मूल निवासी समूहों, छात्रों और पेंशनयाफ्ता लोगों का चुना हुआ प्रतिनिधित्व होता है. विपक्ष ने इस चुनाव में भागीदारी से इनकार कर दिया लेकिन कांस्टीचुएंट असेम्बली चुनाव के प्रति लोगों के उत्साह और भागीदारी ने विपक्ष के एजेंडे को पीछे धकेल दिया. इसके बाद अक्टूबर 2017 में हुए गवर्नर पद के चुनाव में पीएसयूवी को भारी अंतर से जीत हासिल हुई और दिसंबर 2017 के मेयर चुनाव में एकतरफा जीत मिली. यह बात बहुत साफ है कि बहुत सारी चुनौतियों और अंतर्विरोधों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के आक्रामक हमलों के बावजूद बोलिवरियन क्रान्ति अभी भी लड़ रही है और उसे व्यापक जन-समर्थन हासिल है.

23.     ब्राजील में 2011 से महसूस किये जा रहे वैश्विक आर्थिक संकट के प्रभाव ने वर्कर्स पार्टी द्वारा अपनाये गये विकास के सामाजिक जनवादी माॅडल – जिसने अमीरों को फायदा पहुंचाने के साथ-साथ गरीबों के जीवन में भी सुधर लाने का अवसर दिया था – को अव्यवहारिक बना दिया है. यह आरोप लगाते हुए कि डिल्मा रूसेफ ने बजट की कमियों को छुपाने के लिए सार्वजनिक बैंकों के ध्न का दुरुपयोग किया है, वहां एक विवादास्पद महाभियोग लाकर वर्कर्स पार्टी को सत्ता से एवं उसकी नेता डिल्मा रूसोफ को राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया. महाभियोग कितना छलावाभरा और हास्यास्पद था, यह इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि डिल्मा रूसोफ को दोषी ठहराने वाले ब्राजील की सीनेट के कई सदस्य, तथा वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी के अन्य कई नेता और साथ ही वर्कर्स पार्टी के भी कई नेतागण खुद ही रिश्वत, राजनीतिक फण्डिंग और क्रोनी पूंजीवाद से जुड़े एक बड़े घोटाले में दागदार हैं. इसके बाद, वर्कर्स पार्टी के प्रमुख नेता और पूर्व राष्ट्रपति लुई इनाशिओ लूला डा सिल्वा को भ्रष्टाचार के बेबुनियाद और फर्जी आरोप लगा कर सजा सुना दी और 12 सालों के लिए जेल भेज दिया गया. सजा सुनाये जाने के कारण लूला संम्भवतः 2018 में राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ पायेंगे. उन्हें सजा देने के बाद वहां की सरकार और सीनेट ने मजदूरों को संरक्षण देने वाले श्रम कानूनों को खत्म करने की कार्यवाही शुरू कर दी है. लूला को जेल में डाल देने से वर्कर्स पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह अभी देखना बाकी है.

24.     लातीन अमेरिका में अमेरिकी साम्राज्यवाद ने विध्वंस मचाना जारी रखा है. होंडुरास में अमेरिका समर्थित राष्ट्रपति ओरलांडो हर्नान्डेज को फिर से चुनाव जीता हुआ घोषित करने के बाद बड़े पैमाने पर प्रतिरोध की लहर फूट पड़ी. यह बहुत साफ था कि वहां के चुनाव में धांधली हुई है. हर्नान्डेज की पीठ पर अमेरिका का हाथ है और अपने पिछले कार्यकाल में नशा-व्यापार और अपराध को रोकने के नाम पर उन्होंने अमेरिका प्रशिक्षित सुरक्षा बलों की फौज खड़ी की थी. अब इन्हीं सुरक्षा-बलों का इस्तेमाल चुनाव-धांधली के खिलाफ होने वाले विरोध प्रदर्शनों के दमन के लिए किया जा रहा है. सैकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गए और कईयों को रात में घरों से उठवा कर लापता कर दिया गया.

25.     2006 में मूवमेंट पफाॅर सोशलिज्म (एमएएस) के नेता इवो मोरालेस बोलीविया के राष्ट्रपति बने. 2016 तक बोलीविया ने अत्यधिक गरीबी को आधे से ज्यादा घटाकर 38.2 प्रतिशत से 16.2 प्रतिशत कर लिया. बोलीविया की सरकार ने मूल निवासियों के अधिकारों और पर्यावरणीय न्याय के मुद्दे को आगे बढ़ाया. 2010 और 14 के बीच में वैश्विक स्तर पर बढ़े पेट्रोलियम के दाम का फायदा बोलीविया की सरकार ने तेल और गैस क्षेत्र का राष्ट्रीकरण करके हासिल किया. मौजूदा समय में पेट्रोलियम के दामों में गिरावट ने बोलीविया के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. 2016 के जनमतसंग्रह में मोरालेस और एमएएस को हार का सामना करना पड़ा. इस जनमतसंग्रह में मोरालेस को चैथी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की इजाजत देने के लिए संविधान में संशोधन का प्रस्ताव था. लेकिन बोलीविया की सर्वाेच्च अदालत बहुराष्ट्रीय संवैधानिक न्यायालय ने राष्ट्रपति के फिर से चुनाव लड़ने की राह में मौजूद कानूनी और संवैधानिक सीमाओं को समाप्त कर दिया है.

26.     लातीन अमेरिका में अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और चिले में रूढ़िवादी या दक्षिणपंथी ताकतें चुनाव जीत गईं. इस दक्षिणपंथी उभार के बावजूद क्षेत्राीय सहयोग और एकजुटता के लिए बोलिवरियन अल्टरनेटिव फाॅर अवर अमेरिकाज (एएलबीए) और कम्युनिटी आॅफ लैटिन अमेरिकन एंड कैरेबियन स्टेट्स (सीईएलएसी) जैसी क्यूबा और वेनेज़ुएला की अगुआई में ली गई पहलकदमियां अपनी भूमिका निभा रही हैं. अमेरिका-पोषित ‘आॅपरेशन कोंडोर’, जिसने छह लातीन अमेरिकी देशों में क्रूर अधिनायकवादी सत्ता का समर्थन किया और जिसके नतीजतन इन देशों में राजनैतिक नेताओं की हत्याएं हुईं और 60,000 लोग लापता हो गए, की जांच के लिए अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे, उरुग्वे और बोलीविया ने संयुक्त रूप से ‘ट्रुथ कमीशन’ बैठाया है.

27.     इराक पर अमेरिकी हमला और उस पर कब्जे के बाद ‘डी-बाथिपिफकेशन’ (बाथ पार्टी के लोगों की सत्ता एवं सरकारी पदों से बेदखली) की प्रक्रिया इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस या आईएस) या दाइश के उदय की वजह बनी. अमेरिकी कब्जे में इराक की सुन्नी अवाम में खुद को हाशिए पर पाने के चलते विक्षोभ बढ़ा, जिसके चलते सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी के पुराने नेता आईएसआईएस/दाइश में शामिल हो गए. अब इस बात के सबूत सामने आये हैं कि अमेरिका और सऊदी अरब ने दाइश को पैसा मुहैया कराया और इजरायल उन देशों में है जिन्होंने इसे हथियार सप्लाई किये थे. अरब वसंत के उभार के समय में, मिस्र के होस्नी मुबारक जैसे तानाशाहों के खिलाफ दाइश को बहुत कम लोगों ने गम्भीरता से लिया था, आईएसआईएस उस समय तक ज्यादा प्रभावकारी भूमिका में नहीं आया था. अरब वसंत के दमन और नतीजे में उभरे हताशा व मायूसी के माहौल ने आईएसआईएस के लिए उर्वर जमीन का काम किया.

28.     सीरिया में अरब-वसंत के हिस्से के रूप में बशर-अल-असद सरकार के खिलाफ विद्रोह हुआ. असद ने इस विद्रोह पर क्रूर दमन ढाया, नतीजतन वहां गृहयुद्ध और मानवीय संकट खड़ा हो गया और लाखों शरणार्थी सीरिया से विस्थापित होने को मजबूर हुए. शहरों को ‘आतंकियों’ से मुक्त कराने के नाम पर असद सरकार ने नागरिक आबादी पर क्रूरतापूर्वक बमबाजी और रासायनिक हमले करवाए. जहां एक तरफ रूसी सेना ने विपक्ष के खिलाफ असद सरकार का साथ दिया, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने अल कायदा व उसके पूर्व सहयोगी अल नुसरा समेत विपक्ष की कुछेक शक्तियों की पीठ पर हाथ रखते हुए सीरिया पर बमबारी का रास्ता अपनाया और वहां छल-बल-कौशल से सत्ता-परिवर्तन की कोशिश में लगा. मगर हाल में सीरिया और असद सरकार के प्रति रूस और अमरीका के रवैयों में मेल दिख रहा है. हम साम्राज्यवादी युद्धों और उस इलाके में रूस व अमेरिकी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं. जरूरत तो यह है कि संयुक्त-राष्ट्र अपनी देख-रेख में सीरिया के गृहयुद्ध का राजनीतिक हल निकाले.

29.     आईएसआईएस/दाइश अति-प्रतिक्रियावादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है. अन्तर्राष्ट्रीय आतंकी हमलों की एक शृंखला के साथ ही आईएसआईएस ने नागरिकों का भीषण दमन किया है, खासकर अपने कब्जे वाले इलाकों में अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर. इसका मुख्य कारण कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (पीकेके), जो कई दशकों से तुर्की, सीरिया और ईराक में पृथक कुर्दिस्तान के लिए संघर्ष चला रही है, और उसकी मिलीशिया (वाईपीजी), द्वारा किया गया प्रतिरोध है. पिछले दो वर्षों के दौरान डाइश के विरुद्ध युद्ध में कुर्दों को अमेरिका ने मदद दी है और वे अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी बन चुके हैं. लेकिन तुर्की पीकेके और वाईपीजी को आतंकवादी ताकतें मानता है, और इस साल जनवरी से वह सीरिया स्थित वाईपीजी के मजबूत गढ़ आफरीन शहर के नागरिक केन्द्रों पर बेरहमी से बमबारी कर रहा है जिसमें सैकड़ों निहत्थे पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे जा चुके हैं. तुर्की अब उत्तरी सीरिया पर जमीनी हमला करने की तैयारी कर रहा है, जिससे कुर्दों का जनसंहार और तेज होगा. तुर्की के राष्ट्रपति रेसिप तैय्यप एर्दोगान, जो वस्तुतः वहां के तानाशाह हैं, ने अपने नाटो सहयोगी अमेरिका पर उनके देश की सीमाओं पर एक ‘आतंकवादी’ ताकत का गठन करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि उसे सहन नहीं किया जायेगा और उससे ‘जन्म लेने से पहले ही’ निपट लिया जायेगा.

30.     पश्चिम एशिया में दूसरी महत्वपूर्ण परिघटना है साम्राज्यवाद के सहयोगियों सऊदी अरब और इजराइल की ईरान के खिलाफ एकजुटता. सऊदी की अगुवाई वाले गठबंधन, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन साथ थे, ने उत्तरी यमन पर शिया हूतियों के प्रभाव को खत्म करने के लिए यमन में बमबारी की जिसके चलते वहां बड़े पैमाने पर नागरिक जनसंहार हुए और भयानक मानवीय संकट पैदा हो गया. ईरान पर हमले में इजराइल की मदद बहुत साफ है. लेबनानी प्रधानमंत्राी साद हरीरी का सऊदी अरब की राजधानी रियाध् में मौजूदगी के दौरान दिया गया ‘इस्तीफा’ बाध्यता से और जबरदस्ती लिखवाया गया माना जा रहा है. हालांकि सऊदी अरब और इजराइल ने इस ‘इस्तीफे’ को लेबनान की सरकार में हिज्बुल्लाह की भागीदारी और पूरे क्षेत्रा में इसकी राजनीतिक व सैन्य भूमिका का खात्मा करने के एक अवसर की तरह लिया. तबसे सऊदी अरब के सहयोगी हरीरी ने अपना ‘इस्तीफा’ स्थगित कर रखा है.

31.     ईरान में आम ईरानी नागरिक सरकार के खिलाफ व्यापक जन-संघर्ष में उतर पड़े हैं. आंदोलनकारियों के मुख्य मुद्दे बेरोजगारी, गरीबी और वंचना हैं, जिन्हें हल करने में राष्ट्रपति हसन रूहानी की अगुवाई वाली सुधारवादी सरकार असफल रही है. अमेरिका और इजराइल द्वारा इन आंदोलनों का समर्थन और वहां सत्ता-परिवर्तन के अपने एजेंडे के लिए इन आंदोलनकारियों के इस्तेमाल की नीति को ईरानी आंदोलनकारियों ने नकार दिया है. आंदोलनकारी रूहानी सरकार की नव-उदारवादी नीतियों/ कल्याणकारी खर्च में कटौतियों, शिक्षा का निजीकरण, छूटों में कटौती और आसमान छूती बेरोजगारी को निशाना बना रहे हैं. आंदोलनकारी इस बात से भी वाकिफ हैं कि कटौती के इन कदमों के पीछे साम्राज्यवादी सरकारों द्वारा ईरान पर थोपे गए प्रतिबंधों का भी हाथ है. ईरान में 1983 से सरकार द्वारा थोपी गई महिलाओं के लिए हिजाब पहनने की अनिवार्यता को चुनौती देते हुए और उसे खारिज करते हुए महिलाओं के बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं.

32.     2014 में गाजा की घेराबंदी, जिसमें फिलिस्तीनियों को जान-माल की भीषण तबाही झेलनी पड़ी, के बाद इजरायली कब्जा और फिलिस्तीनी जनता के विरुद्ध उसके युद्ध में और तेजी आई है. गाजा की घेराबंदी आज भी जारी है. वहां मेडिकल आपूर्ति बंद है तथा खाना व जरूरत के सामानों की कमी लगातार बनी हुई है. हाल ही में एक 16 वर्षीया फिलिस्तीनी बच्ची अहद तमीमी, जिसे एक इजरायली सैनिक को चांटा मारने के जुर्म में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, के मामले ने पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है कि इजरायली राज्य कितना बर्बर है, जो हर साल सैकड़ों फिलिस्तीनी बच्चों की धरपकड़ करता है, उनसे जिरह करता है और उन्हें यातनाएं देता है, और उसके खिलाफ फिलिस्तीनियों का प्रतिरोध् संघर्ष किस कदर जारी है. अहद तमीमी के साहस व दृढ़ निश्चय, व्यापक अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता एवं इजरायल के कारनामों की भर्त्सना और फिलिस्तीनी युवाओं की भारी गोलबंदी के मिलेजुले दबाव के सामने इजरायल को आंशिक रूप से पीछे हटकर अहद के खिलाफ लगाये गये ज्यादा गम्भीर आरोपों को वापस लेना पड़ा – जिनके कारण उसे तीन साल तक की सजा हो सकती थी. यहूदीवादी राज्य के विरोध् को यहूदी विरोध् बताकर अपने आलोचकों को चुप कराने की लगातार कोशिशों के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘बायकाॅट, डाइवेस्टमेण्ट एण्ड सैंक्शंस’ (बीडीएस – ‘बहिष्कार, भण्डाफोड़ एवं प्रतिबंध) आन्दोलन सशक्त हो रहा है और यह आम समझदारी बन चुकी है कि 1994 से पहले के दक्षिण अफ्रीका की तरह आज का इजरायल एक नस्लवादी देश है, जिसका साम्राज्यवाद विरोधी, नस्लवाद विरोधी सभी ताकतों को मजबूती से विरोध करना चाहिए. इजरायल के साथ भारत के बढ़ रहे रणनीतिक सम्बंधें को देखते हुए हमारे लिए जरूरी है कि यहां भी बीडीएस आन्दोलन को मजबूत किया जाय.

33.     जिम्बाब्वे में 37 साल सत्ता में रहने के बाद राॅबर्ट मुगाबे ने अपने खिलाफ चल रहे एक महाभियोग की सुनवाई और सेना द्वारा नियंत्राण संभाल लेने की घटनाओं के बीच नवम्बर 2017 में इस्तीफा दे दिया है. वहां के पूर्व उपराष्ट्रपति एमर्सन म्नांगग्वा नये राष्ट्रपति बने हैं. वे शासक पार्टी जानू-पीएफ द्वारा अपने विरोध्यिों पर ढाये गये जघन्यतम अत्याचारों में सहभागी रहे हैं. उन्होंने काफी उत्साह के साथ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को अपना लिया है. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से सम्बंध्ति मुगाबे का स्वदेशीकरण का कानून, जिसमें विदेशी कम्पनियों के व्यवसाय में अश्वेतों के 51 प्रतिशत मालिकाने की गारंटी की गई थी, को हीरा एवं प्लैटिनम खदानों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए खारिज कर दिया गया है.

34.      दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस सरकार के नेता जेकब जुमा ने भ्रष्टाचार और क्रोनी पूंजीवाद के आरोपों के बाद इस्तीफा दे दिया है. जुमा पर आरोप है कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के व्यवसाय में बड़े हिस्सेदार गुप्ता बंधुओं (उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पले-बढ़े भारतीय मूल के व्यापारी और दक्षिण अफ्रीका के व्यवसाय के बड़े हिस्से के नियंत्राक) के हाथों में दक्षिण अफ्रीका राज्य को लगभग गिरवी रख दिया. हाल ही में दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से सत्ताधारी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए सिरिल रामापफोसा ने जुमा की जगह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का पद सम्भाला है. दक्षिण अफ्रीका के सर्वाधिक धनी व्यक्तियों में से एक रामाफोसा जुमा का दायां हाथ थे. वे खनन कम्पनी लोन्मिन के निदेशक और शेयर-धारक हैं. लोन्मिन की मरिकाना खान में हड़ताल करते हुए खनन-मजदूरों का जब 2012 में दक्षिण अफ्रीकी सुरक्षा बलों ने जन-संहार किया था, तब यही रामाफोसा और अधिक दमन की मांग कर रहे थे.

35.     उपरोक्त घटनाओं से यही संकेत मिलता है कि सिरिल रामाफोसा कार्यकाल में भी क्रोनी पूंजीवाद, दमन और नस्लवाद के मुद्दों  से दक्षिण अफ्रीकी सरकार घिरी रहेगी. लेकिन वहां एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम में दक्षिण अफ्रीकी संसद ने जमीन के श्वेत लोगों से अश्वेत मालिकों के नाम हस्तांतरण में तेजी लाने के लिए संविधन में परिवर्तन करने के रेडिकल वामपंथी इकाॅनामिक फ्रीडम फाइटर पार्टी (ईएफएफ) के एक प्रस्ताव को समर्थन दे दिया है. अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस द्वारा जमीन के मालिकाने में नस्लीय गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए आवश्यक सुधर लाने का लम्बे अरसे पहले किया गया वायदा रंगभेद समाप्त होने के दो दशकों के बाद भी पूरा नहीं हुआ है, शताब्दियों तक चली बर्बर औपनिवेशिक बेदखली के चलते दक्षिण अफ्रीका में आज भी अध्किांश भूमि पर श्वेतों का ही कब्जा बरकरार है. दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने इन सुधरों को आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया है, हालांकि उनका जोर इस पर भी है कि इस प्रक्रिया में खाद्यान्न उत्पादन और सुरक्षा में कमी नहीं आनी चाहिए.

36.     1965-66 में आज से करीब 53 साल पहले इंडोनेशिया की सुहार्ताे सरकार ने कम्युनिस्टों और कम्युनिस्ट समर्थकों के खिलाफ भयानक कत्लेआम कराया जिसमें 10 लाख से ज्यादा लोगों की हत्या की गई थी. इंडोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी, जो उस समय दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी थी, उसका पूरी तरह सफाया कर दिया गया था. हाल ही में जाकार्ता के अमेरिकी दूतावास की उस समय की गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की गईं, जिनसे पता चलता है कि अमेरिकी सरकार और सीआईए को न सिर्फ इस भयावह जनसंहार की जानकारी थी, बल्कि वे इसके समर्थन में थे. 2014 में मानवाधिकारों के उल्लंघन और भ्रष्टाचार से लड़ने के वायदे के साथ जोकोवी विदोदो राष्ट्रपति चुने गये. उनके अब तक के कार्यकाल में यह उम्मीद कि वे कम्युनिस्ट पार्टी सदस्यों के वारिसों को नौकरियों से ब्लैकलिस्ट करने की नीति को समाप्त करेंगे और जनसंहार की जांच व सुलह की प्रक्रिया की शुरूआत करेंगे, गलत साबित हुई है. इसी बीच 2019 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए दक्षिणपंथी ताकतें, कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार और चीनी मूल के लोगों के खिलाफ झूठी खबरें और नफरत फैलाकर मजबूत हो रही हैं.

37.     नवें महाधिवेशन में हमने चीन के "समाजवाद की ओर किसी सार्थक प्रगति" के लक्ष्य से भटकाव पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि वहां "किसी क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव की मूलभूत मुक्तिकामी दृष्टि, जो सामाजिक असमानता को दूर करती है जनता को सिर्फ राजसत्ता से लाभ प्राप्त करने वालों की जगह उन्हें वास्तविक शासकों में तब्दील करती है, का स्पष्ट अभाव है’. यह स्थिति बिना किसी सकारात्मक बदलाव के अब भी जारी है. वास्तव में चीन से आ रही चिंताजनक रिपोर्टों से यही लगता है कि वहां जनता की जीवन-यावन व कार्यस्थल की स्थितियां और खराब हुई हैं तथा उनके संघर्षों पर दमन तेज हुआ है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 19वें महाधिवेशन ने मजदूर वर्ग और नारीवादियों के प्रतिवादों समेत तिब्बत व शिनजियांग क्षेत्रा के राष्ट्रीयता आंदोलनों से सम्वाद करने के बारे में कोई बेहतर रुख अख्तियार नहीं किया है. चीन का अपनी मुस्लिम आबादी के प्रति बरताव भी चिंता का विषय है. राज्य द्वारा लोगों पर निगरानी के विस्तार तथा नागरिकों की "विश्वसनीयता" का आकलन करने के लिये "सामाजिक साख" की प्रणाली चालू करना आदि स्पष्ट रूप से जनता के अध्किारों एवं उनके कल्याण के लिये खतरनाक हैं.

38.     चीन ने अन्तर्राष्ट्रीय मामलों के क्षेत्रा में खास भूमिका न निभाने की अपनी पुरानी नीति से अलग रास्ता अख्तियार किया है. अब वह पहले की तरह अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में कम दखल देने की नीति की जगह दुनिया के तमाम हिस्सों में अपनी विदेश नीति के जरिए दखल बढ़ाने पर जोर दे रहा है. इस पहल में देश से बाहर एक सैन्य अड्डा बनाना भी शामिल है. आक्रामकता के बढ़ने के साथ-साथ चीन में राष्ट्रपति पद पर रहने के लिए तय अधिकतम समयावधि की सीमा को समाप्त कर दिया गया है, जिसने वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अनिश्चित काल तक पद पर बने रहने की सम्भावनाओं को खोल दिया है. बढ़ती आक्रामकता अमेरिकी एकाधिपत्य के खिलाफ एक बहुध्रुवीय विश्व बनाने की दिशा में संतुलनकारी ताकत का काम कर सकती है, लेकिन हमें चीन के बढ़ते कूटनीतिक हस्तक्षेप के प्रभावों पर सतर्कतापूर्वक निगरानी रखते हुए उसका आकलन करना होगा.

39.     अमेरिका के एकतरपफा राजनीतिक प्रभुत्व के खिलाफ अथवा आई.एम.एफ.-विश्व बैंक-डब्लू.टी.ओ. के आर्थिक शिकंजे के खिलाफ, किसी भी मामले में ब्रिक्स बहुध्रुवीयता को आगे बढ़ाने की निहित सम्भावनाओं पर कभी खरा नहीं उतरा. यहां तक कि ब्रिक्स के सदस्य देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) के बीच भी परस्पर आर्थिक सहयोग में भी बहुत थोड़ी ही प्रगति हो सकी. भारत शंघाई कोआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन (एससीओ) का भी सदस्य है, परन्तु वहां इसकी कोई खास भूमिका नहीं रहती. चीन अथवा अन्य एशियाई देशों के साथ बेहतर सम्बंध् बनाने की दिशा में इस मंच का इस्तेमाल करने की कोई कोशिश भारत ने नहीं की है. इसके विपरीत भारत ने जापान और आसियान देशों के साथ अपने कारोबार व सम्बंधें को (जापान को फायदा पहुंचाने वाली बेहद मंहगी बुलेट ट्रेन का सौदा करके, और 2018 के भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में आसियान राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके) आगे बढ़ाया है.

40.     मोदी सरकार की दादागीरी ने दक्षिण एशिया के पड़ोसियों से भारत के अलगाव को बढ़ाया है. नेपाल ने भारत के प्रति जो गर्मजोशी दिखाई थी, उसे मोदी ने नेपाल में आये भीषण भूकंप में भारत द्वारा दी गई राहत का इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने के लिए करके गंवा दिया. आरएसएस ने नेपाल में संविधान निर्माण के दौरान उसके आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की और अपनी विचारधारा के अनुरूप ही नेपाल को धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए दबाव डाला. नेपाल के गणतांत्रिक संविधान ने मधेसी सवाल को जिस तरह हल किया, मोदी सरकार ने उसकी तारीफ करने की जगह उसे दंड देने की नीति अपनाई. मधेसी सवाल पर नेपाल को भारतीय दबाव के सामने घुटने टेकने पर मजबूर करने के लिए नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी की कोशिशों को मोदी सरकार शह देती रही.

41.     हाल ही में हुए चुनाव में नेपाल में दो प्रमुख वामपंथी पार्टियों -- सीपीएन(यूएमएल) और सीपीएन(माओवादी) ने गठजोड़ बनाया और चुनाव में निर्णायक जीत हासिल की. यह स्वागतयोग्य है. बाद में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के विलय की घोषणा भी स्वागतयोग्य है. नेपाल में गणतांत्रिक लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में यह शुभ संकेत है.

42.     चीन के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध जैसे हालात का दिखावा -- जैसा कि डोकलाम सीमा विवाद के मामले में हुआ -- और आरएसएस का चीन विरोधी प्रचार, ठोस आर्थिक सच्चाइयों के चलते झूठ साबित होता है. भारतीय अर्थव्यवस्था के कई बड़े क्षेत्रा चीनी उत्पादों पर पूरी तरह निर्भर हैं. पेटीएम और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफाॅर्म चीन की पूंजी पर निर्भर हैं, तो चीन में बनाये और भारत में सिर्फ असेम्बल हुए मोबाइल फोन भारत के संचार उद्योग की रीढ़ हैं. चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ का विरोध करके भारत की सरकार पूरे उपमहाद्वीप में लगभग अलग-थलग पड़ गई है. खासकर उपमहाद्वीप में चीन द्वारा निभाई जा रही मुखर अंतरराष्ट्रीय भूमिका के चलते भारत की अमेरिका के विश्वसनीय साझेदार के रूप में दिखाने की कोशिशें कुछ खास आकर्षण नहीं पैदा कर पा रही हैं.

43.     चीन और मालदीव के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारत सरकार ने हेकड़ी दिखाते हुए बयान जारी कर मालदीव को ‘भारत प्रथम’ की नीति जारी रखने के लिए कहा. बदले में भारतीय राजदूत के साथ अनाधिकारिक मीटिंग करने के आरोप में मालदीव ने अपने तीन स्थानीय पार्षदों को निलंबित कर दिया. संदेश बहुत साफ था कि भारत को मालदीव से कोई छूट नहीं मिलेगी.

44.     मालदीव की हालिया घटनाएं चिंताजनक हैं. वहां की शीर्ष अदालत ने सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई का आदेश दिया. अब्दुल्ला यामीन की सरकार ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया और आपातकाल की घोषणा कर दी. शीर्ष अदालत को निलम्बित कर दिया गया, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पूर्व राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद ने भारत से राजनयिक और सैन्य हस्तक्षेप की गुजारिश की. मगर भारत का सैन्य हस्तक्षेप अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन होगा. भारत को अपना हस्तक्षेप राजनयिक स्तर तक सीमित रखना चाहिए और मालदीव में लोकतंत्र की बहाली की अपील करनी चाहिए.

45.     म्यांमार में लंबे समय से रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव, उन्हें नागरिकता से वंचित करना और उनके खिलाफ जारी हिंसा अब अपने चरम स्तर पर यानी जनसंहार के स्तर पर पहुंच चुकी है. म्यांमार की नेता आंग सान सू की ने इसे जनसंहार मानने से इंकार कर दिया है. म्यांमार से पलायन कर रहे रोहिंग्या अल्पसंख्यक बांग्लादेश में शरण लेने के लिए मजबूर हैं, जहां उनकी हालत काफी खराब है. विस्थापित रोहिंग्या का जो छोटा हिस्सा भारत आ गया है, वह भारी असुरक्षा के बीच जी रहा है. एक तरफ मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं को दरकिनार करके इन्हें वापस खदेड़ने की धमकी दे रही है, तो दूसरी तरफ सांप्रदायिक संगठन इन शरणार्थियों के खिलाफ हिंसा की धमकी दे रहे हैं. भारत ने अभी तक 1951 के संयुक्त राष्ट्र रिफ्यूजी कन्वेंशन और उसके 1967 के प्रोटोकाॅल पर हस्ताक्षर करने से इंकार किया है. भारत को इस पर तत्काल हस्ताक्षर कर देना चाहिए और रोहिंग्या शरणार्थियों समेत सभी शरणार्थियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकाॅल और मानकों के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए. म्यांमार के रख़ाइन क्षेत्रा में रोहिंग्याओं के खदेड़े जाने के पीछे वहां पेट्रोलियम निष्कर्षण की परियोजना, तेल पाइप-लाइनें बिछाने और सड़कें एवं बन्दरगाह बनाने आदि मूलभूत ढांचे के निर्माण की परियोजनाएं आदि भू-राजनीतिक और आर्थिक कारक भी हैं. इन परियोजनाओं से चीनी और भारतीय कारपोरेट कम्पनियों के निहित स्वार्थ जुड़े हुये हैं. हमारी मांग है कि भारत सरकार हमारे देश में रोहिंग्या शरणार्थियों को सुरक्षा, सम्मान और शरणार्थी का दर्जा प्रदान करे, और साथ ही म्यांमार सरकार के साथ तथा संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रोहिंग्याओं को न्याय, पूर्ण नागरिकता और उनकी सुरक्षित स्वदेश वापसी के लिए काम करे.

46.     बांग्लादेश में लोकतंत्र पर संकट गहरा रहा है. वहां शासक पार्टी ने नव-उदारवादी हमला तेज कर दिया है, लोकतांत्रिक संस्थाओं में तोड़फोड़ की जा रही है, विपक्षी दलों को बोलने की आजादी नहीं है, और ‘भ्रष्टाचार से लड़ाई’ के नाम में लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती की जा रही है. ऐसे दूषित माहौल में वहां की रूढ़िवादी ताकतें मजबूत हो रही हैं और वे धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और तर्कशील शक्तियों का दमन कर रही हैं. 2018 के आम चुनावों के ठीक पहले एक भ्रष्टाचार विरोधी अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोप में पांच साल की सजा सुनाई है. इस बात की पूरी आशंका है कि पिछले चुनावों की तरह ही इस बार चुनाव लोकतंत्र का मखौल बन कर रह जायेंगे.

47.     हम रामपाल विद्युत परियोजना और सुंदरवन इलाके में उसी तरह की रिलायंस व अदानी की विद्युत एवं ऊर्जा परियोजनाओं के समझौतों जैसी पर्यावरण को नष्ट करने वाली भारतीय परियोजनाओं के खिलाफ बांग्लादेशी अवाम के प्रतिरोध को अपना समर्थन देते हैं. हम रूढ़िवाद एवं नव-उदारवाद के खिलाफ संघर्षरत बांग्लादेशी अवाम और वाम व लोकतांत्रिक शक्तियों के भी साथ हैं. ब्रह्मपुत्र नदी के पानी के सवाल पर चीन, बांग्लादेश और भारत के बीच संभावित टकराव एवं प्रतिद्वंदिता सामने आ रही है. यारलुंग त्सांग्पो/ ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन और भारत द्वारा प्रतिद्वंदिता स्वरूप बनाई जा रही जल विद्युत परियोजनाओं के कारण उस क्षेत्रा की जैव-विविध्ता एवं स्थानीय लोगों के जीवन पर खतरा बढ़ गया है. नदी-संसाधनों में हिस्सेदारी को लेकर उत्पन्न टकराव का समाधन पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील नीतियों के आधर पर सम्बंध्ति देशों को वार्ता एवं बहुपक्षीय सहयोग के आधर पर करना चाहिए. बांग्लादेश से भारत में आये तथाकथित गैरकानूनी आप्रवासियों की शिनाख्त और उनहें वापस भेजने का मुद्दा दोनों देशों के बीच एक और संवेदनशील मामला है जिसे द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से ही हल किया जाना चाहिए. इस विषय में भारत द्वारा की गई किसी भी एकतरफा कार्यवाही से भारत-बांग्लादेश सम्बंधें में कड़वाहट आयेगी और एक मानवीय संकट खड़ा हो जायेगा.

48.     पाकिस्तान में भी 2018 में आम चुनाव होने हैं. वहां पनामा पेपर्स मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते प्रधानमंत्राी नवाज शरीफ को इस्तीफा देना पड़ा. बांग्लादेश की तरह पाकिस्तान में भी इसकी पूरी आशंका है कि भ्रष्टाचार को एक प्रणालीगत मुद्दा मानकर उससे निपटने के बजाय इस सवाल का इस्तेमाल राजनीतिक बदला लेने और लोकतंत्र का हनन करने के लिए किया जा रहा है. पाकिस्तान के ईश-निंदा विरोधी कानून ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ ही धर्म-निरपेक्ष व बुद्धिवादी ताकतों की भीड़ द्वारा हत्या का तर्क मुहैय्या करा दिया है. ईश-निंदा के आरोप में विश्वविद्यालय के छात्रा-कार्यकर्ता मशाल खान की अन्य छात्रों द्वारा पीटकर हत्या और उसका वीडियो बनाना हाल की भयावह घटनाओं में से एक है. ध्यान देने की बात है कि पाकिस्तान में ईश-निंदा विरोधी कानून के पक्ष में बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं. इससे उन रूढ़िवादियों के हौसले और भी बुलंद हुए हैं जो इस कानून को चुनौती देने वाले कार्यकर्ताओं को मौत की सजा सुनाते हैं. पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में राष्ट्रीयता आन्दोलन पर भारी दमन ढाया है. पाकिस्तान के ‘फेडरली  एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज’ (एफ.ए.टी.ए.) में भी दमन, लोगों को लापता कर दिये जाने, और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ पख्तूनों का प्रतिरोध् चल रहा है. पख्तूनी मूल के एक माॅडल नकीबुल्लाह महसूद की कराची में पुलिस द्वारा एक फर्जी मुठभेड़ में हत्या के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा और ‘पख्तून लाँग मार्च’ के नाम से एक विशाल रैली निकाली गई. पाकिस्तान में दस वाम और प्रगतिशील पार्टियों ने एक गठबंधन बनाने की दिशा में काम शुरू किया है, जो एक सकारात्मक विकास है. पाकिस्तान के शासक वर्ग ने सीमापार आतंकवाद के प्रश्न को सुलझाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. भारत सरकार की युद्धोन्मादी नीति के साथ-साथ पाकिस्तानी शासक वर्ग की यह भूमिका दोनों उपमहाद्वीप की शांति के लिए खतरा है.

49.     भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर अब तक का सबसे लम्बा खिंचने वाला महाविवाद बना हुआ है. इस विवाद को हल करने की दिशा में कोई गम्भीर प्रयास करने की जगह दोनों देशों की सरकारें केवल विवाद को बनाये रखने तथा उसे और भी गहराने में व्यस्त रहती हैं. भारत की सरकार इस विवाद को मानने से ही इंकार करती है और पहले से कहीं ज्यादा नग्न रूप से कश्मीर के राजनीतिक प्रश्न के सैन्य समाधान पर जोर दे रही है. कश्मीर विवाद का स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान केवल कश्मीरी जनता के विभिन्न तबकों के प्रतिनिधियों और भारत व पाकिस्तान की सरकारों के बीच संवाद के द्वारा ही हो सकता है. ऐसे किसी समाधान को कश्मीरियों की अपनी नियति खुद तय करने की आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए.

50.     श्रीलंका में 2015 के चुनाव में मैत्रीपाला सिरिसेना ने विपक्षी गठजोड़ के प्रत्याषी के बतौर चुनाव लड़ा. सिरिसेना महेंद्रा राजपक्षे सरकार में मंत्री रह चुके थे और उन्होंने राजपक्षे पर भ्रष्टाचार व भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया था. तमिल और मुसलमान अल्पसंख्यकों का वोट हासिल करके सिरिसेना राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए. हालांकि सिरिसेना ने वादा किया था कि वे तमिलों के खिलाफ किए गए युद्ध-अपराधों की जांच कराएंगे और उनकी सरकार ऐसा संविधान लाएगी जो तमिलों को अधिक स्वायत्तता देगा लेकिन नागरिक जमीनों पर सैन्य कब्जे, विसैन्यीकरण और तमिल राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे केंद्रीय सवालों पर काम करने के प्रति उनकी सरकार ने कोई राजनीतिक इच्छा नहीं दिखाई है. तमिलों की मनमानी गिरफ्तारियां और उन्हें ‘लापता करने’ की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं. हाल ही में हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में राजपक्षे के नेतष्त्व वाले श्रीलंका पीपुल्स फ्रंट (एसएलपीपी) की भारी जीत सिरिसेना की गठबंधन सरकार के लिए खतरे का संकेत है. मोदी सरकार सिरिसेना सरकार पर तमिल अवाम के सम्मान और न्याय के प्रष्न पर राजनयिक दबाव डालने के मामले में कुछ नहीं कर रही है. मछली पकड़ने के अधिकार पर विवाद के सवाल पर दोनों मुल्कों के बीच हुई वार्ता के कारण दोनों देशों में गिरफ्तार कुछेक मछुवारों की रिहाई हुई.

51.     जहां श्रीलंका ने विवाद के मूल ‘बाॅटम ट्राॅलिंग’ (पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाला मछली पकड़ने का तरीका) को प्रतिबंधित कर दिया है वहीं भारत ने भी इसे चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर सहमति जताई है. श्रीलंका के जल-क्षेत्र में अवैध रूप से मछली पकड़ने का आरोप लगाकर मछुवारों की गिरफ्तारी और यहां तक कि हत्याएं अब भी जारी हैं. भारत सरकार को इस सवाल पर श्रीलंका की सरकार पर दबाव बनाना चाहिए और मछुवारों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. इस समस्या का हल करने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों ने बाॅटम ट्राॅलरों के स्थान पर गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों को लाने की घोषणा की है, जिसके लिए दोनों सरकारें सब्सिडी उपलब्ध् करायेंगीं. लेकिन इस योजना के अनुसार अपने ट्रालर को रूपांतरित करने के लिए फिलहाल हरेक मछुवारे को 8 लाख रुपये देने होंगे, और इतनी बड़ी कीमत चुकाने की सामर्थ्य न रहने के चलते छोटे मछुवारे इस योजना से वंचित हो गये हैं. ताकि छोटे मछुवारे भी गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाज इस्तेमाल कर सकें, इसके लिये केन्द्र सरकार एवं तमिलनाडु सरकार दोनों को मिल कर समुचित धनराशि उपलब्ध् करानी चाहिए. बाॅटम ट्राॅलिंग छोड़ कर गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए मछुवारों को जरूरी ट्रेनिंग और अन्य सहायता भी सरकारों को मुहैय्या करानी चाहिए.

52.     हाल ही में श्रीलंका के कैण्डी जिले में अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी के विरुद्ध सिंहल बौद्ध गिरोहों द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं, जिनमें पुलिस ने जानबूझ कर निष्क्रियता दिखाकर परोक्ष रूप में दंगाइयों का साथ दिया. वहां के सुरक्षा बलों में मौजूद सिंहल पूर्वाग्रहों के रहते यह स्पष्ट है कि इन इलाकों में की गई आपातकालीन स्थिति की घोषणा वास्तव में अल्पसंख्यक आबादी के हितों के ही खिलाफ जा सकती है. उन्मादी सिंहल अंध्राष्ट्रवादी बौद्ध ताकतों को श्रीलंका के प्रमुख शासक एवं विपक्षी दलों का समर्थन हासिल है.

53.     क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बतौर हमें दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ ही प्रगतिशील जनांदोलन की ताकतों से गहरा रिश्ता विकसित करना चाहिए ताकि स्वतंत्रता व मानवाधिकारों के लिए तथा युद्ध, नस्लवाद व इस्लामोफोबिया के खिलाफ, फिलिस्तीन की आजादी के पक्ष में, अन्तर्राष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत किया जा सके. हमें यह गहरा रिश्ता इसलिए भी विकसित करना होगा ताकि श्रम कानूनों और विभिन्न देशों के कानूनों का उल्लंघन करने वाली वैश्विक पूंजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हमलों के खिलाफ व्यापक एकजुटता व सहयोग विकसित किया जा सके, शांति व लोकतंत्र के लिए दक्षिण एशिया की प्रगतिशील ताकतों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाया जा सके और युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक अतिवाद, घृणा व कट्टरता की राजनीति के खिलाफ व्यापक एकता कायम की जा सके.