राष्ट्रीय परिस्थिति

आक्रामक फासीवादी एजेंडा

1.     भारत ने पिछले चार सालों में बड़े पैमाने का राजनीतिक बदलाव देखा है. भाजपा ने शासकवर्गों की वर्चस्वशाली प्रतिनिधि पार्टी के बतौर निर्णायक तौर पर कांग्रेस को पीछे धकेल दिया है. भारत के संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा ने न सिर्फ अपने बूते केंद्र में बहुमत हासिल किया है बल्कि अपने बल पर या अन्य दलों के साथ गठजोड़ बना कर वह कुछेक राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों की शासक पार्टी बन कर भी उभरी है. त्रिपुरा में, जहां पिछले 25 साल से वामपंथ लगातार सत्ता में थी, अपनी हाल की जीत के साथ भाजपा की उत्तर-पूर्व में पकड़ मजबूत हुई है. केन्द्र एवं राज्यों में भारत के प्रमुख शासक दल के रूप में भाजपा के इस उभार के चलते यह पार्टी और पूरा संघ परिवार अभूतपूर्व तेजी एवं आक्रामकता के साथ अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सक्षम हुआ है.

2.     2014 के चुनाव में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, यह आक्रामकता उसी समय स्पष्ट दिखाई देने लगी थी. 2014 के संसदीय चुनाव के अभियान को भाजपा ने अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान की तरह संचालित किया. इस दौरान मोदी और उनके तथाकथित गुजरात माॅडल के इर्द-गिर्द एक मजबूत मिथक गढ़ा गया. मोदी द्वारा दिए गए ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ जैसे नारों और ‘भारत-विजय’ जैसी रैलियों में यह आक्रामकता साफ जाहिर थी. तबसे आज तक भाजपा 2014 की चुनावी जीत (केवल 31 पफीसदी वोट के साथ) को इस तरह समझ रही है मानो उसने सच में भारत-विजय कर ली हो और संघ-भाजपा की विचारधारा और एजेंडा के अनुरूप हर चीज को बदल देने का लाइसेंस उनको हासिल हो गया हो. भाजपा ने संविधान पर खुलेआम हमला बोल दिया है और मोदी के अनंत हेगड़े जैसे मंत्रियों ने सीधे-सीधे संविधान बदलने के भाजपा के मिशन पर जोर दिया है.

3.     भारत में फासीवादी हमला राज्य और तमाम गैर-सरकारी ताकतों, दोनों के आपस में तालमेल और घनिष्ठ गठजोड़ द्वारा संचालित है. राज्य मशीनरी लगातार निरंकुश और हस्तक्षेप करने वाली होती गयी है, जबकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस संघ गिरोह को संरक्षण दे रही है जो भीड़ हत्याओं, असहमति जाहिर करने वाले बुद्धिजीवियों एवं कार्यकर्ताओं की चुन-चुन कर हत्या एवं लगातार चलाये जा रहे जहरीले घृणा अभियान के जरिये सांप्रदायिक व जातिवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था थोपने की कोशिश कर रहा है.  मोदी सरकार नागरिकता की शर्तों से लेकर गणतंत्र के मूल स्वरूप तक में बदलाव कर भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की असल बुनियाद को ही नष्ट करने की कोशिशें कर रही है.

संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश

4.     संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम-काज के कैबिनेट सिस्टम को पूरी तरह से नकारते हुए मोदी, अमरीकी राष्ट्रपति की तर्ज पर अपनी सरकार चला रहे हैं. विदेश मंत्रालय को पूरी तरह दरकिनार करते हुए अक्सर होने वाले मोदी के विदेश दौरे हों, उत्तर प्रदेश चुनावों के ठीक पहले अचानक किया गया नोटबंदी का ऐलान हो, फ्रांस यात्रा के दौरान मोदी द्वारा पहले की सरकार से ज्यादा बुरी शर्तों पर राफेल विमानों की खरीद की घोषणा हो, संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर आधी रात को जीएसटी लागू करने का निर्णय हो -- मानो भारत को दूसरी बार आजादी मिली हो -- या पिफर सरकारी खजाने को लगभग तीन करोड़ रुपये प्रति दिन का चूना लगाते हुए चलाया गया व्यापक प्रचार अभियान हो, सरकार सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण और बेशर्मी के साथ मोदी की व्यक्तिगत छवि चमकाने में लगी हुई है.

5.     मोदी सरकार पहले दिन से ही संसदीय संस्थाओं, प्रक्रियाओं और परम्पराओं को सुनियोजित तरीके से धता बता रही है और क्षतिग्रस्त कर रही है. योजना आयोग को खत्म करके संदिग्ध नीति आयोग बनाना, जो अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की सलाह देते समय आम लोगों के मुद्दों पर जुबानी जमाखर्च भी नहीं करता, यहां तक कि चुनाव आयोग को लोकसभा व विधान सभा के चुनाव एक साथ करवाने की सलाह देना और ‘मनी बिल’ का चोला पहनाकर धोखाधड़ी भरे ‘आधार’ समेत ढेर सारे विवादास्पद कदमों को पास करवाना इसके चंद ज्वलंत उदाहरण हैं.

6.     ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के लिए भाजपा की बढ़ती चीख-पुकार संघवाद और राजनीतिक विविधता के सिद्धांतों को कमजोर करने की कोशिश है. एक साथ चुनाव का इस्तेमाल करके वे जनता की राजनैतिक पसंद को सीमित करने और राजनीतिक विमर्श को हर स्तर पर सत्ताधारी पार्टी व बड़े मीडिया घरानों द्वारा गढ़े गए आख्यान के मातहत रखने के जरिये और बड़े पैमाने का राजनीतिक वर्चस्व लादना चाहते हैं.

7.     नई सरकार द्वारा नियुक्त ज्यादातर राज्यपाल संघ के प्रचारकों की तरह काम कर रहे हैं. ये राज्यपाल विपक्ष शासित राज्यों में भी अपने पद का दुरुपयोग करते हुए आरएसएस के एजेंडे को खुल्लमखुल्ला बढ़ावा दे रहे हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को शह दे रहे हैं. राज्यपाल के कार्यालयों, जोकि संवैधानिक रूप से इस प्रकार बनाया गया है कि राज्यों के ऊपर केन्द्र की स्थिति मजबूत बन सके, का भाजपा सत्ता हथियाने के औजार के रूप में खुल कर दुरुपयोग कर रही है. इस प्रकार वह राज्यों के अधिकारों एवं हमारे संवैधनिक ढांचे में निहित संघीय संतुलन के प्रत्येक पहलू का हनन कर भारत में पूरी तरह अपनी ही हुकूमत कायम कर लेना चाहती है.

क्रोनी पूजीवाद, भ्रष्टाचार और आर्थिक तबाही

8.     प्रधानमंत्री के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण और संसदीय रवायतों व प्रक्रियाओं को दरकिनार करने के चलते उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के एजेंडे को निर्ममता से लागू करने में सहूलियत हुई है. सत्ता में आते ही नरेंद्र मोदी ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में निहित जमीन और जीविका खोने वालों के लिए मुआवजे और पुनर्वास की सुरक्षा एवं बेहतर शर्तों को खत्म करने की कोशिश की. तीखे विरोध के चलते उनकी सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को कानून में तब्दील नहीं कर सकी, लेकिन इससे सरकार को अपने एजेंडे पर निर्लज्जतापूर्वक आगे बढ़ने और हर तरह से कारपोरेट हितों को बढ़ावा देने से नहीं रोका जा सका. मोदी सरकार के आर्थिक एजेंडे में ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए खोल देने और विदेशी निवेश को रिझाने, साझा उपक्रमों, निजी-सार्वजनिक भागीदारी के जरिये निजीकरण को सुनियोजित ढंग से बढ़ावा देने और यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र की परिसम्पत्तियों और कम्पनियों को सीधे बेच देने पर ही मुख्य जोर है, जिसके परिणामस्वरूप विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर बेदखली और विस्थापन हो रहा है.

9.     बैंकिंग क्षेत्र का पुनर्निर्माण और आर्थिक लेन-देन का डिजिटलीकरण मोदी सरकार के आर्थिक कार्यक्रम का एक अन्य प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा है. सभी जानते हैं कि भारत में बैंकिंग क्षेत्र के संकट का कारण एनपीए (डूबंत परिसम्पत्ति) का भारी बोझ है. एनपीए और कुछ नहीं, तकनीकी भाषा में कारपोरेट घरानों द्वारा न चुकाए गए कर्जे हैं. कर्जा न चुकाने वाले कारपोरेट घरानों को सजा देने की जगह सरकार समय-समय पर उनको कर्जमाफी और संकट से उबारने वाले पैकेज देती रहती है. नोटबंदी के जरिए 86 फीसदी मुद्रा को जबर्दस्ती चलन से बाहर कर देने के बाद अब सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि बैंकों को संकट से उबारने के लिए जमाकर्ताओं के पैसे को बैंकों के शेयर में तब्दील कर दिया जाय. गौरतलब है कि डिजीटलीकरण हो, आधार हो या एफआरडीआई बिल के निरंकुश प्रावधान हों, वित्तीय क्षेत्र के पुनर्गठन के सारे प्रयास अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सरगनों के नक्शे-कदम पर हो रहे हैं. इनमें से ज्यादातर मुद्दों पर मोदी और भाजपा ने सरकार में आने के बाद अपना रुख पूर्णतः बदल लिया है. अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय क्षेत्र से भारत के आपेक्षिक अलगाव या उससे एकीकरण में कमी ने अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट के दौरान भारतीय वित्त क्षेत्र को बर्बाद होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. भारत के वित्तीय क्षेत्र को उथल-पुथल और अन्तर्राष्ट्रीय वित्त के आक्रमण से बचा सकने वाले सुरक्षा-उपायों को ध्वस्त करके मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी दबावों और झटकों के सामने खतरनाक रूप से कहीं ज्यादा अरक्षित बना दिया है.

10.     भ्रष्टाचार और क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ बढ़ते जन-विक्षोभ पर सवार होकर, यूपीए सरकार के ढेर सारे घोटालों पर हमला करते हुए मोदी सत्ता में आए लेकिन अतीत की कोई भी सरकार कारपोरेट हितों और उसमें भी मुठ्ठी भर बड़े घरानों के हितों के साथ उतने घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध नहीं थी जितनी कि मोदी सरकार. देश के भीतर प्राकृतिक संसाधनों, सार्वजनिक क्षेत्र की परिसम्पत्तियों और बैंकों के वित्त आदि पर चैतरफा कारपोरेट कब्जे की पैरवी से लेकर देश के बाहर अम्बानी, अडानी के हितों को आगे बढ़ाते हुए यह सरकार इतने कम समय में क्रोनी पूंजीवाद की साक्षात प्रतीक बन गई है. विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े आर्थिक अपराधियों को देश छोड़कर भागने में सरकार की मिलीभगत, जय अमित शाह के चकरा देने वाले भाग्योदय जैसे मामलों का भंडाफोड़ करने वाले मीडिया को धमकाना और व्यापारिक गोपनीयता व राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सरकार द्वारा राफेल लड़ाकू विमान सौदे में चुकाई गई कीमत को संसद के सामने उजागर करने से इन्कार भ्रष्टाचार के सवाल पर सरकार के पाखंड को दिखाता है. सरकार के हर बड़े आर्थिक निर्णय ने आम लोगों को भारी मुश्किल में धकेला है जबकि इन्हीं निर्णयों के चलते चंद पूंजीपतियों को भारी मुनाफा हुआ है.

गहराता कृषि संकट, भारी बेरोजगारी और बढ़ती गैर-बराबरी

11.      छोटे पैमाने के उत्पादन एवं व्यापार में बाधा और तबाही के साथ-साथ कृषि क्षेत्र पर भी तीखा हमला हुआ है. कर्जमाफी की मांग करने वाले किसानों और उचित मजदूरी मांगने वाले ग्रामीण मजदूरों की आवाज को पाशविक दमन के जरिए खामोश किया गया है. झारखंड में भूमि अधिग्रहण को लागू करने के लिए किसानों और आदिवासियों पर बार-बार गोली चलाने, मध्य प्रदेश के मंदसौर में विरोध कर रहे किसानों की हत्या, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कर्जमाफी के नाम पर किसानों से किया गया क्रूर मजाक, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में खेत-मजदूरों की बड़े पैमाने पर बेदखली तथा किसान नेताओं की रासुका जैसे कठोर कानून के तहत गिरफ्तारी इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि भाजपा की राज्य सरकारों ने किसानों के खिलाफ सचमुच युद्ध छेड़ रखा है. गोरक्षा के नाम पर भाजपा द्वारा चलाए गए जहरीले सांप्रदायिक अभियान ने भी पशु-व्यापार और डेयरी फार्मिंग से लेकर मांस व्यवसाय और होटल उद्योग तक समूची शृंखला में खलल डालकर कृषि अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं घटते बजट आवंटन और हर स्कीम को आधार से जोड़ने के फैसले से पड़े खलल के चलते और बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.

12.     कृषि संकट और निर्माण व व्यापार के लघु उद्यमों के लिए अधिकाधिक बुरे हालात ने समग्र आर्थिक वृद्धि की दर को कम कर दिया है. सबसे ज्यादा चिंताजनक तो रोजगार की दर में कमी है. वास्तव में भारत की अर्थव्यवस्था रोजगार-विहीन विकास की जगह मनहूसियत भरे रोजगार-छीन विकास की तरफ बढ़ रही है. रोजगार के कुल अवसरों में शुद्ध गिरावट आई है. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र समेत पूरे संगठित क्षेत्र में लगातार छंटनी के अलावा आईटी और अन्य निर्यात आधारित उद्योगों में, जो पिछले दो दशकों के दौरान उल्लेखनीय रूप से रोजगार के अवसर मुहैय्या करा रहे थे, अब वैश्विक आर्थिक संकट और नोटबंदी व जीएसटी जैसे मोदी सरकार के मनमाने और प्रतिकूल फैसलों के कारण रोजगार के अवसर काफी घटे हैं. हर साल 2 करोड़ नये रोजगार देने के वायदे के साथ सत्ता में आयी मोदी सरकार अब रोजगार मांगने वालों को बता रही है कि वे खुद ही रोजगार देने वाले बन जायं. इसके लिए वह लघु कर्ज वाली ‘मुद्रा’ योजना ;जिसमें औसतन 50 हजार रु. से कम का कर्ज दिया जाता हैद्ध को रोजगार सृजित करने वाली अब तक की सबसे बड़ी योजना बता रही है.

13.     प्रधानमंत्री ने वैश्विक और स्थानीय कारपोरेट कम्पनियों को ‘कारोबार में सहूलियत’ देने की शेखी बघारी है. इस प्रक्रिया में श्रम और पर्यावरण संरक्षण कानूनों को कमजोर व तबाह कर दिया गया है. मोदी-राज की कारपोरेट हितैषी छवि पर पर्दा डालने के लिए मोदी और उनके मंत्री अब ‘कारोबार में सहूलियत’ की शेखी के साथ ‘जीवन की सहूलियत’ की बात भी कर रहे हैं. पर सरकार का यह छल भूख से मौत और किसान आत्महत्याओं की रपटों से तार-तार हो जाता है. जब कोई नया प्रशिक्षण देने और वेतन वाली नौकरियां पैदा करने की जगह बेरोजगारों को रेहड़ी-पटरी लगाने जैसे अनौपचारिक स्वरोजगार के भरोसे छोड़ दिया जाता है और रोजगार देने के नाम पर पकौड़ा बेचने जैसे स्वरोजगार का श्रेय सरकार खुद लेना चाहती है तो मोदी की ‘स्किल इंडिया’ स्कीम के ढोल की पोल इसी से खुल जाती है. रेहड़ी-पटरी वालों ने साफ जबान में बताया है कि जब उन्हें शहर की पटरियों से उजाड़ा जा रहा है, तो इससे उनकी ‘जीवन की सहूलियत’ और ‘कारोबार में सहूलियत’, दोनों पर सीधा हमला हो रहा है. विश्व विकास सूचकांक (अन्तर्राष्ट्रीय लेबर संगठन, आईएलओ-एसटीएटी डेटा बेस, मार्च 2017) दिखाता है कि भारत के कुल रोजगार में वेतन या मजदूरी वाली नौकरियों का हिस्सा 21.2 फीसदी है जो दक्षिण एशिया के औसत 26 फीसदी, बांग्लादेश के 44.5 फीसदी, पाकिस्तान के 39.6 फीसदी, यहां तक कि सबसे ज्यादा कर्जदार देशों के 28.9 फीसदी और सबसे कम विकसित देशों के 33.3 फीसदी से भी शर्मनाक रूप से कम है. हाल में जारी विश्व बैंक के सिस्टमेटिक कंट्री डाइग्नोस्टिक (एससीडी) की मसविदा रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत को अपनी बहुसंख्यक आबादी को जोखिम भरी निम्न आमदनी वाली जीविका की गतिविधियों की ओर धकेलने की बजाय वृद्धिमान आय के वेतन वाली स्थायी नौकरियां पैदा करनी चाहिए.

14.     घटती वृद्धि दर और बहुसंख्यक भारतीयों की वास्तविक आय के गिरने के चलते गैर-बराबरी तेजी से बढ़ी है. यह प्रक्रिया पिछले तीन दशकों से लगातार जोर पकड़ रही थी, पर आम लोगों के लिए बढ़ती आर्थिक आपदा के बीच अनियंत्रित कारपोरेट आक्रामकता के मोदी-युग में यह खास तेज हुई है. 2014 से भारत के सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की आय में वृद्धि छलांग भरते हुए बढ़ी है: 2014 में 49 फीसदी से बढ़कर 2015 में 53 और 2016 में 58.4 फीसदी हो गई. आॅक्सफैम के हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत के सबसे अमीर 1 फीसदी लोगों ने 2017 में पैदा हुई कुल सम्पदा का 73 फीसदी हथिया लिया. इसी दौर में भारत को दुनिया के सबसे भूखे देशों में गिना जाता रहा. ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017 में भारत 119 देशों की सूची में 100वें स्थान पर था!

अल्पसंख्यकों, दलितों एवं असहमति के सभी रूपों पर हमला  

15.     इस आक्रामक कारपोरेटपरस्त आर्थिक एजेंडा के साथ अति-राष्ट्रवादी लफ्फाजी की जुगलबंदी चल रही है. असहमति जाहिर करने और दिक्कततलब सवाल पूछने वाली हर आवाज को राष्ट्रद्रोही बताकर खामोश कराया जा रहा है और उनको देश की सीमा पर तैनात जवानों के बलिदानों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है. यह अति-राष्ट्रवाद केवल मुस्लिम विरोधी जहरीली नफरत और हिंसा के लिये एक झीने आवरण का काम करता है. बीफ खाने व जानवरों का व्यापार करने से लेकर अंतर्धर्मिक विवाह, जिन्हें संघ परिवार ने ‘लव जिहाद’ का नाम दिया है, या ऐसी कोई अफवाह या झूठे आरोप के कारण कभी भी और कहीं भी मुसलमानों को मारा जा सकता है. हमने देखा कि किस तरह मोहम्मद अखलाक को आधी रात में घर से खींच कर मार दिया गया, झारखंड में इम्तियाज और मजलूम को मार कर पेड़ से टांग दिया गया, पहलू खान को राजस्थान में सड़क पर दिन-दहाड़े ट्रक से निकाल कर मार दिया गया, नौजवान जुनैद की हत्या भीड़ भरे रेल के डिब्बे में कर दी गयी, स्वच्छ भारत अभियान के नाम में महिलाओं का अपमान और उन पर हिंसा का प्रतिरोध करने पर कामरेड जफर हुसैन खान को मार डाला गया, मोहम्मद अफराजुल की हत्या करके वीडियो बनाया गया और उसे लव-जिहाद के खिलाफ एक भड़काऊ भाषण के साथ सोशल मीडिया पर फैलाया गया. यहां तक कि खुद मुस्लिम महिला संगठनों द्वारा लम्बे सामाजिक और कानूनी संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक बार में तीन तलाक की मनमानी प्रथा को अवैधानिक घोषित करने के निर्णय को भी अब मुसलमान पुरुषों के खिलाफ निन्दा और उत्पीड़न के हथियार में तब्दील करने की कोशिश चल रही है.

16.     जहां संघ परिवार द्वारा मुसलमानों को एक समुदाय के रूप में निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ दलितों के खिलाफ भी उनका हमला जारी है. विभिन्न पदों और सत्ता-संस्थानों में संघ-गिरोह के लोगों के पहुंच जाने के कारण दलितों के उत्पीड़न में गुणात्मक रूप से इजाफा हुआ है. बिहार में भूपतियों की निजी सेनाओं से संघ परिवार का जुड़ाव सर्वविदित है जिनमें सबसे कुख्यात रणवीर सेना थी जिसने 1990 दशक के अंतिम वर्षों और 2000 के दशक के शुरूआती वर्षों में कई जनसंहारों को अंजाम दिया. आज दलितों के खिलाफ हिंसा का एक ज्यादा व्यापक अभियान दूर-दराज के गांवों से लेकर बड़े शहरों के विश्वविद्यालयों तक चल रहा है. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में युवा दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और ऊना में दलित युवाओं पर चाबुक बरसाने और उसका वीडियो बनाने से लेकर सहारनपुर में दलितों पर हिंसा और भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ को अत्याचारी कानून रासुका के तहत जेल में बंद करने तक, योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में, और अब बिहार में भी, हिंदू युवा वाहिनी के बैनर तले ऊंची जाति के आक्रामक युवाओं की गुंडागर्दी और भाजपा शासित महाराष्ट्र में दलितों पर बढ़ते हमलों तक एक साफ सिलसिला दिखाई पड़ रहा है. सांप्रदायिकता और जातिवाद, संघ की विचारधारा के एक सिक्के के ही दो पहलू हैं. हालांकि संघ परिवार धार्मिक अल्पसंख्यकों (चाहे वे मुसलमान हों या ईसाई) के खिलाफ सांप्रदायिक आक्रामक अभियान में दलितों को प्यादे की हैसियत से भरती के लिये भी बेताब है.

17.     इन सांप्रदायिक और जातिवादी हमलों के तीव्र होने के चलते महिलाओं पर होने वाली हिंसा, नैतिक पुलिसगीरी और जकड़बंदी बढ़ी है. अब इसे लागू करने वाली ताकतों में केवल परम्परागत खाप पंचायतें ही नहीं, नवगठित निगरानी गिरोह भी हैं, जो कानून-व्यवस्था की मशीनरी के परोक्ष समर्थन या फिर खुले संरक्षण से स्वयंभू एंटी रोमियो स्क्वाड बनकर सड़कों पर खुलेआम घूम रहे हैं. मोदी सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे धेखे भरे नारों और तीन तलाक कानून जैसे कदमों के ज़रिए खुद को महिला समर्थक दिखाना चाहती है लेकिन बीएचयू जैसे विश्वविद्यालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक न्याय के लिए उठती पुकारें इस बात की गवाह हैं कि महिलाओं पर पितृसत्तात्मक हमले और अधिक तेज व व्यापक हुए हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह स्त्राी-विरोधी संस्कृति मनुस्मृति के सिद्धांतों और परम्परा पर आधारित है जो जातिगत उत्पीड़न और पितृसत्तात्मक वर्चस्व की नियमावली है, जिसे संघ गिरोह भारत का सर्वाेच्च और मूल संविधान मानता है.

18.     संघ के विचारधारात्मक ढांचे में मुसलमानों, दलितों (और आदिवासियों के एक हिस्से के, जिन्हें माओवादी या ईसाई कहकर निशाना बनाया जाता है) एवं महिलाओं के खिलाफ नफरत और हिंसा का विस्तार कम्युनिस्टों, वाम/उदारपंथी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं तक चला जाता है. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे बुद्धिवादियों और सामाजिक न्याय का अभियान चलाने वालों की हत्या एवं हत्या के बाद उसका उत्सव मनाने से लेकर छात्रा-युवा नेताओं व कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह और रासुका के मुकदमे लादने, असुविधजनक सवाल पूछने वाले, जवाबदेही मांगने वाले और सच उजागर करने वाले पत्रकारों की ध्रपकड़, सोशल मीडिया और मुख्यधारा के इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया में असहमति की हर आवाज के खिलाफ एक पूरी ट्रोल सेना खड़ी करने, देश के विभिन्न हिस्सों में कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्रतरों, कार्यकर्ताओं और कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रतीकों पर बढ़ते हमले -- नफरत भरे झूठों के व्यवस्थित प्रचार तथा राज्य उत्पीड़न और राज्य समर्थित निजी स्तर की हिंसा के सम्मिश्रण के ये उदाहरण मोदी के भारत के हर हिस्से में दिखाई पड़ रहे हैं.

19.     और कश्मीर जैसे राज्य में, जहां तीखे राज्य दमन का सामना करते हुए लोग आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लम्बे समय से संघर्षरत हैं, भाजपा अभी सत्ता में हिस्सेदार है. उसने कश्मीर में संवैधानिक शासन का ढोंग भी त्याग दिया है और वह आम कश्मीरियों के साथ वस्तुतः युद्धबंदियों जैसा व्यवहार कर रही है. भारतीय राज्य द्वारा अनथक दमन के साथ पिछले दो सालों में कश्मीरी जनता का प्रतिरोध तीखा हुआ है. वहां महिलाओं एवं स्कूली बच्चों समेत नागरिकों के व्यापक तबके घाटी में सेना व पुलिस के साथ टकरावों में नियमित रूप से हिस्सेदारी कर रहे हैं. भाजपा की केन्द्र और जम्मू एवं कश्मीर की सरकारें दिखावे के लिए भी मुद्दे का समाधन करने की कोशिशें छोड़ चुकी हैं और पूरे भारत में अपने इस्लामोफोबिक और अति-राष्ट्रवादी एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए ईंधन के रूप में कश्मीर का इस्तेमाल कर रही हैं.

मोदी राज के मूल तत्वः फासीवाद का असंदिग्ध उभार

20.     बढ़ी हुई कारपोरेट लूट, बेरोकटोक बढ़ती सांप्रदायिक आक्रामकता और जातिगत उत्पीड़न, असहमति का सुनियोजित दमन और कम्युनिस्टों की लानत-मलामत, मोदी सरकार के निर्धारक केंद्रीय तत्व हैं. मुख्यधारा के अधिकांश भारतीय मीडिया ने कड़ी मेहनत के जरिए मोदी को एक ऊर्जस्वी नेता, विकास पुरुष और कोई बकवास न बर्दाश्त करने वाले प्रशासक के रूप में इस तरह पेश किया कि गुजरात 2002 की स्मृतियां लोगों की याददाश्त से मिट जाएं. इस मीडिया का एक हिस्सा तो संघ-भाजपा के प्रचार दस्ते या मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहा है. 2014 की चुनावी जीत को मोदी के विकास पुरुष के नए अवतार की स्वीकृति के रूप में पेश किया गया. लेकिन शुरूआती दिनों में ‘अच्छे दिन’, काले धन की वापसी और स्वच्छ भारत जैसी लफ्फाजी में देश को उलझाए रखने के बाद मोदी सरकार ने अब अपना असली रंग दुनिया के सामने जाहिर कर दिया है.

21.     उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बतौर योगी आदित्यनाथ का चयन और उन्हें मोदी और शाह के बाद भाजपा के तीसरे अखिल भारतीय नेता के रूप में पेश करने, सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ द्वारा हत्याओं की हर कार्रवाई में संघ और भाजपा की संलिप्तता व खुल्लमखुल्ला समर्थन ने इस उदारवादी भ्रम को खत्म कर दिया कि भाजपा अब महज मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टी के रूप में विकसित हो चुकी है और उसकी कट्टर सांप्रदायिक प्रवृत्ति महज ‘हाशिए का तत्व’ है. बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों में स्वयं मोदी द्वारा संचालित प्रचार अभियानों ने बारम्बार स्पष्ट कर दिया है कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की राजनीति ही मोदी ब्राण्ड का केंद्रीय तत्व है. जहां खुद मोदी और भाजपा व आरएसएस के उनके वरिष्ठ सहयोगी संघ गिरोह द्वारा किए गए जघन्य अपराधों पर शर्मनाक चुप्पी साध लेते हैं, वहीं दूसरे नेता खुलकर इन अपराधों को सही ठहराते हैं और यहां तक कि उनका जश्न मनाते हैं, जैसा कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद या बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी के दिन राजस्थान के राजसमंद में मोहम्मद अफराजुल की हत्या करके उसका वीडियो बनाने की घटना में देखा गया.

22.     मौजूदा सरकार की इन प्रमुख विशेषताओं के साथ संघ की विचारधारा और इतिहास को मिलाकर देखें तो हम आज असंदिग्ध रूप से भारत में फासीवाद के उत्थान के सामने खड़े हैं. बहुतेरे मामलों में अक्सर मोदी सरकार की सीधी तुलना इंदिरा गांधी के आपातकाल से की जाती है. दोनों दौरों में व्यक्ति पूजा, अनुशासनबद्ध प्रचार, स्वतंत्रता पर सुनियोजित अंकुश और विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं के विध्वंस जैसी महत्वपूर्ण समानताएं हैं. दरअसल, आपातकाल के दौरान बड़े पैमाने पर मौलिक अधिकारों का दमन, प्रेस की सेन्सरशिप, विपक्षी पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद में गिरफ्तारी, अनिश्चितकाल के लिए चुनाव टालने, विधायिका के कार्यकाल में विस्तार जैसी लाक्षणिकताएं देखी गई थीं जो अभी तक मौजूदा शासन में स्पष्टतः सामने नहीं आई हैं. लेकिन यदि हम राज्य और शासन के इर्द-गिर्द दिखने वाले इन लक्षणों से परे हट कर देखें तो इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौर और मौजूदा मोदी सरकार के दौर में बहुत महत्वपूर्ण अंतर दिखाई पड़ेगा. जहां आपातकाल प्राथमिक तौर पर दमनकारी राज्य के इर्द-गिर्द घूमता है, वहीं मौजूदा मोदी राज, राज्य के नेतृत्व में कारपोरेट हमले और हिंदू वर्चस्व में बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के अभियान के संगम के रूप में दिखाई पड़ता है. संघ गिरोह को प्रायः उन्मादी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के जरिए अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की खुली छूट मिली हुई है. यही आपातकाल के दौर की निरंकुशता के हमारे अनुभव को मोदी माॅडल के निरंकुश शासन से अलग करता है.

राज्य मशीनरी का साम्प्रदायीकरण,  शिक्षा एवं विचारों पर कसता शिकंजा

23.     वर्तमान में भाजपा की सरकारों के शासन के तौर-तरीके फासीवाद की बानगी लिए हुए हैं. भाजपा का चुना हुआ जनप्रतिनिधि खुलेआम संविधान बदलने की बात कहता है. फासीवाद को निरंकुशता से अलग करने वाला एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि फासीवाद राज्य दमन को वैधता प्रदान करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के लिए समाज के एक हिस्से को गोलबंद करने में सक्षम होता है. हाल ही में मोहन भागवत द्वारा कुख्यात रूप से की गई आरएसएस और भारतीय सेना की तुलना हिंदू समाज के सैन्यीकरण और भारतीय सेना के सांप्रदायीकरण/ राजनीतिकरण के आरएसएस के एजेंडा को प्रकट कर देती है. इस एजेंडे पर लम्बे समय से काम किया जा रहा है. इटली के फासीवादी नेता मुसोलिनी से मिलने और उनसे प्रभावित होने वाले हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे द्वारा 1937 में नागपुर में स्थापित की गयी भोंसला मिलिटरी अकादमी इस एजेंडे के दोनों पक्षों को पूरा करती है.  2012 में खुद भागवत ने कहा था कि भोंसला अकादमी, सेना में अधिकारियों की कमी को पूरा करने वाला पूरक संस्थान है. मालेगांव धमाकों में आरोपित एक सेवारत सैन्य अधिकारी ने इसी अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त किया था. सेवानिवृत्त और सेवारत सैन्य अधिकारियों और सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईबी अधिकारियों ने अकादमी में प्रशिक्षकों की भूमिका निभाई है. अकादमी बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को हथियारों का प्रशिक्षण भी देती है जो मुसलमानों के खिलाफ संगठित सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम देते हैं. हिंदू युवाओं का सैन्यीकरण करने की आरएसएस की परियोजना मुसलमानों को ‘पाकिस्तानी’ के रूप में चिन्हित करती है और इस तरह सांप्रदायिक हिंसा को ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ ‘राष्ट्रवाद’ का जामा पहना देती है.

24.     भाजपा-शासित राज्यों में शासन का एक और फासीवादी लक्षण है प्रायोजित ‘मुठभेड़ों’ एवं युद्ध-अपराधों को राज्य की नीति घोषित करना. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चैहान द्वारा भोपाल में फर्जी मुठभेड़ में आठ मुसलमान नौजवानों की हत्या का जश्न मनाना,  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा सिलसिलेवार फर्जी मुठभेड़ों का खुलेआम पक्ष लेना, कश्मीरी युवक को जीप के आगे बांधकर घुमाने वाले सेना के मेजर का सरकार द्वारा पक्ष लेना, जम्मू में आठ साल की गुज्जर मुस्लिम लड़की से बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए स्पेशल पुलिस आॅपरेशंस के जवान के पक्ष में हिंदू एकता मंच द्वारा रैली निकालना ऐसे कुछ प्रमुख उदाहरण हैं. वर्दीधारियों के ऐसे अपराध गैर-भाजपा सरकारों के राज में भी हुए हैं, लेकिन तब आधिकारिक नीति ऐसे मामलों का खुलेआम जश्न मनाने की नहीं, बल्कि उनसे इंकार करने की रही है.

25.     शिक्षा को विकृत करना और उसका भगवाकरण करना भी संघ की फासीवादी परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भाजपा सरकारें मददगार हो रही हैं. भाजपा-शासित राज्यों में स्कूलों के पाठ्यक्रमों का भगवाकरण किया जा रहा है. इतिहास की पाठ्य पुस्तकें फिर से लिखी जा रही हैं और यहां तक कि स्कूली बच्चों के लिए संघ के प्रशिक्षण शिविर अनिवार्य किए जा रहे हैं ताकि कच्ची उम्र में ही उनके दिमागों में जहर भरा जा सके. साथ ही उच्च शिक्षा के संस्थानों पर भी लगातार हमला हो रहा है. भाजपा द्वारा नियुक्त उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख बोलने की आजादी, कैंपस लोकतंत्र, सामाजिक न्याय व शोधकार्य को पूरी तरह तबाह करने में लगे हुए हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, असहमति रखने वाली तमाम प्रगतिशील आवाजों पर हमला करने में संघ के आक्रामक जत्थे की भूमिका अदा कर रहा है.

फासीवादी विचारधरा और आर.एस.एस. का उभार

26.     बहुत से मामलों में मोदी राज की असंदिग्ध तुलना हिटलर के नाजी जर्मनी से की जा सकती है. यह भी काबिलेगौर है कि 1920 के दशक में अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस ऐतिहासिक रूप से अपने आपको सैन्य-पौरुषवादी अतिराष्ट्रवाद की विचारधारा पर खड़ा करना चाहता था, जिसके प्रतीक-पुरुष मुसोलिनी और हिटलर थे. भीतरी दुश्मन (नाजी जर्मनी में यहूदी, अन्य अल्पसंख्यक एवं कम्युनिस्ट और मोदी के भारत में मुसलमान, दलित एवं हर किस्म के वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों) के खिलाफ घृणा और हिंसा की केन्द्रीयता, एक सर्वाेच्च नेता की व्यक्ति पूजा को बढ़ावा देने के लिए जन-भावनाओं का सनकभरा दोहन, झूठ और अफवाहों का सतत प्रचार, नाजी जर्मनी के साथ आज के भाजपा शासित भारत की अद्भुत और वास्तविक समानताएं हैं.

27.     भारतीय पूंजी अभी 1930 और 1940 के दशकों के जर्मन पूंजी के स्तर तक नहीं विकसित हुई है, संघ ब्रिगेड अभी तक संसदीय लोकतंत्र के ढांचे को ध्वस्त नहीं कर पाया है, अथवा भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश व समाज के पास फासीवाद के बुलडोजर के खिलाफ बहुत से सहजात सुरक्षा कवच मौजूद हैं, यह सोचकर खुद को दिलासा देते हुए इतिहास की शिक्षाओं को अनदेखा करना अदूरदर्शी और आत्मघाती होगा. 20वीं सदी के यूरोप के फासीवाद की तुलना में 21वीं शताब्दी के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर अपनी अलग विशिष्टताओं वाला होगा लेकिन इससे न तो फासीवाद का खतरा कम वास्तविक होता है और न ही उसकी विध्वंसक क्षमता कम घातक हो जाती है. मौजूदा दौर का अन्तर्राष्ट्रीय अर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक माहौल एक बार फिर फासीवादी प्रवृत्तियों के उभार के अनुकूल है, जैसा हम दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में देख रहे हैं. लगातार कायम आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा, इस्लामोफोबिया और आप्रवासी विरोधी उन्माद, ये तमाम चीजें अमेरिका और बहुतेरे यूरोपीय देशों में फासीवादी और नस्लीय राजनीति के उभार के लिए उर्वर जमीन मुहैय्या कर रहे हैं. संकट में फंसी वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था से नजदीकी और खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइल के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारियों ने भारत में फासीवादी प्रवृत्ति को और भी मजबूत बनाया है.

28.     भारत में फासीवाद के उत्थान और विकास का केंद्रीय कारक सांप्रदायिकता है. इस संदर्भ में हमें याद रखना होगा कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सांप्रदायिक राजनीति के उभार, जिसने अंततः भारत को भयावह खून-खराबे और विराट मानवीय विस्थापन वाले बंटवारे की ओर धकेला, को बरतानवी उपनिवेशवाद से पूरी शह मिली थी. आज भारत की विविधतापूर्ण और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान को हिंदू बहुसंख्यवादी वर्चस्वशाली एकरूपी बना देने की कोशिश अमेरिकी साम्राज्यवाद के ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के सिद्धांत के अनुकूल है. इसके मुताबिक इस्लामी अरब दुनिया और कन्फ्यूशियाई चीन के खिलाफ अमेरिका की अगुवाई में चल रहे पश्चिम के युद्ध में हिंदू भारत मुख्य सहयोगी के रूप में देखा जाता है.

29.     भारत में फासीवादी परियोजना में ऊंच-नीच अनुक्रम पर आधारित सामाजिक गैर-बराबरी के चिन्ह और बहिष्करण एवं उत्पीड़न के औजार के रूप में जाति भी केंद्रीय तत्व है. अक्सर इस जातिवादी व्यवस्था का सबसे गहरा आघात महिलाओं पर होता है. डाॅक्टर अम्बेडकर इस सामाजिक परिदृश्य के बारे में बहुत स्पष्ट थे जब उन्होंने संवैधानिक लोकतंत्र को मूलतः अलोकतांत्रिक भारतीय जमीन की सतह पर चढ़ाई परत के रूप में व्याख्यायित किया था. भारत में फासीवाद भारतीय समाज में गहरे पैठे अन्याय और हिंसा से शक्ति पाता है और उसको मजबूत एवं प्रसारित करता है, और आरएसएस आज भारतीय इतिहास व परम्परा में जो कुछ भी लोकतंत्र-विरोधी है, उसका प्रतीक बन गया है.

30.     आरएसएस की स्थापना के बाद शुरूआती पचास वर्षों में उसकी फासीवादी विचारधारा को स्वीकार करने वाले बहुत लोग न थे. इसने खुद को न सिर्फ स्वाधीनता आंदोलन से दूर रखा बल्कि आधुनिक भारत में मौजूद एक प्रमुख समुदाय के रूप में मुसलमानों की स्थिति को कमजोर करने के लिए अंग्रेजी उपनिवेशवाद से कई मोर्चों पर हाथ मिला लिया. गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर न सिर्फ कानूनी प्रतिबंध लगा बल्कि आम लोगों की निगाह में इसकी साख भी गिरी. मगर सांप्रदायिकता के सवाल पर कांग्रेस के विचलन और स्वाधीनता आंदोलन की आकांक्षाओं से गद्दारी ने आरएसएस को फिर से संगठित होने, ताकतवर बनने और वैधता हासिल करने का मौका दिया. 1960 के दशक के शुरूआती वर्षों में आरएसएस ने खोई साख उल्लेखनीय रूप से हासिल कर ली, क्योंकि पहले 1962 के चीन युद्ध, फिर 1965 और 71 के पाकिस्तान के साथ सिलसिलेवार युद्धों के दशक में युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद बढ़ता गया. आपातकाल थोपने की घटना ने आरएसएस को मौका दिया कि लोकतंत्र बहाली के लिए चलने वाले लोकप्रिय आंदोलन के माध्यम से वह अपने संगठन व प्रभाव का विस्तार करे. उदारीकरण की आर्थिक नीतियों और अमेरिकापरस्त विदेश नीति को अपनाने के साथ ही कांग्रेस निर्णायक रूप से स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से अलग हट गयी. अब भाजपा और कांग्रेस के बीच विचारधारात्मक और नीति सम्बंधी अंतर धुंधले पड़ गए. ऐसे में भाजपा को विभिन्न अंचलों और सामाजिक समूहों में अपने नये मित्रा हासिल करने के लिये बस थोड़ा बहुत व्यावहारिक समायोजन करके अपना प्रभाव बढ़ाने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई.

31.     उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को आक्रामक रूप में लागू करने से पैदा हुआ संकट उसी समय आया है जब कांग्रेस और व्यापक दायरे के विभिन्न क्षेत्राीय दल अपनी साख खो चुके हैं और भारत में एक बड़ा राजनीतिक शून्य बना हुआ है, आरएसएस इस मौके का इस्तेमाल करके भारत की ऐतिहासिक व राजनीतिक संकल्पना को बदल उसकी जगह अपनी खुद की ऐतिहासिक-राजनीतिक संकल्पना कायम करना चाहता है. भारत की आजादी के समय आरएसएस ने भारत के संविधान के आधार के रूप में मनुस्मृति को घुसाना चाहा था, पर वह नाकाम रहा. जाति, पितृसत्ता और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के भारत के ‘सामान्य बोध’ का व्यापक हिस्सा होने के बावजूद उस समय की प्रभावकारी राजनीतिक आम सहमति ने इन पूर्वाग्रहों की पुष्टि नहीं की. इसके बजाय नाममात्र ही सही, परंतु राजनीतिक और सामाजिक बराबरी का लक्ष्य ग्रहण किया गया. नेहरू और पटेल जैसे नेताओं ने भी गोलवलकर की भारत-दृष्टि को स्वीकार नहीं किया. अब मोदी सरकार के सत्ता में होने के चलते आरएसएस अपने राष्ट्रवाद, इतिहास और समाज के बारे में अब तक पराजित दृष्टिकोण को एकमात्र स्वीकारणीय ‘भारतीय’ दृष्टिकोण के रूप में स्थापित करने की हड़बड़ी में है. इस प्रक्रिया में वे नेहरू को खलनायक बनानेऋ गांधी को अपने लिए सुपाच्य बनाने, अम्बेडकर व भगतसिंह को विकृत करनेऋ अकबर से लेकर ताजमहल तक मुसलमान हस्तियों को बदनाम करने और ऐतिहासिक इमारतों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताने में जुटे हुए हैं. वे जातिगत व लैंगिक ऊँच-नीच, दकियानूस और घृणित सामाजिक प्रथाओं और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को ‘भारतीय संस्कृति की आत्मा’ के रूप में प्रचारित करते हैं!

32.     इतिहास के पुनर्लेखन और उसको हड़प लेने की इस प्रक्रिया का प्रतिरोध फासीवाद-विरोधी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए. ऐतिहासिक रूप से भारतीय जनता के उपनिवेशवाद-विरोधी जागरण तथा अंग्रेजी राज के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष से अलग-थलग रहने वाला और यहां तक कि उसका विरोध करने वाला आरएसएस हमेशा ही साभ्यतिक या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपना एक काल्पनिक आख्यान गढ़ता रहा है. हमेशा मिथकों का हवाला देना, यहां तक कि उन्हें इतिहास बताना, जालसाजी व हड़पने के रास्ते वास्तविक इतिहास को विकृत करना संघ के सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के झूठे आख्यान में पिफट बैठता है. इसलिए भारत को परिभाषित और विकसित करने के अनवरत संघर्ष में इतिहास एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है. इतिहास को विकृत करने, झुठलाने और हड़पने के आरएसएस के प्रयासों की मुखालफत करते हुए हमें भारत की जनता के इतिहास की और लोकतंत्रा, सामाजिक न्याय और मनुष्य की मुक्ति के लिए चले ऐतिहासिक संघर्षों की विरासत का झंडा बुलंद रखना चाहिए. हमारे मुल्क के महान लोकतांत्रिक और समाजवादी भविष्य के लिए जारी संघर्ष को ऊर्जस्वित करने एवं सशक्त बनाने के लिए हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं में जो भी प्रगतिशील और मुक्तिकामी है, उसे बुलंद करना होगा, विकसित करना होगा और लक्ष्यपूर्ति में लगाना होगा.  
आर्थिक व विदेश नीति के पहलू  

33.     यह उम्मीद कि कोई तथाकथित ‘राष्ट्रवादी’ आरएसएस आर्थिक राष्ट्रवाद के एक कार्यक्रम के जरिए भाजपा को अंधाधुंध भूमण्डलीकरण की नीतियों का मुकाबला करने के लिए खड़ा करेगा, उतनी ही बेबुनियाद हुई जितना कि यह हसीन सपना कि भाजपा शासन में आने पर संघ ब्रिगेड की तथाकथित ‘हाशिए की ताकतों’ पर नकेल कसेगी. वाजपेयी सरकार के कुछ हद तक नियंत्रित शुरूआती दिनों से चलते हुए 2002 में गुजरात जनसंहार की बुनियाद पर खड़े गुजरात माॅडल के उत्थान तक, निर्मम दमनकारी और हस्तक्षेप करने वाले राज्य और कारपोरेट कम्पनियों द्वारा वाइब्रैंट गुजरात के जयगान से होते हुए 2014 में हम मोदी-राज में प्रवेश कर चुके हैं, जहां गुजरात माॅडल को पूरे देश में लागू करने का वादा किया हुआ है. अब हम आरएसएस-भाजपा संगत को परिपक्व होता देख रहे हैं जहां एक तरपफ तथाकथित ‘हाशिए के तत्व’ बिना किसी दंड-भय के उत्पात मचाते रहते हैं और आरएसएस व्यक्तिगत आजादी की सीमा और सामाजिक विमर्श की शर्तें तय करता है, दूसरी तरपफ सरकार पूरी निर्लज्जता से विदेशी निवेश को लुभाने और भारतीय व विदेशी कारपोरेट हितों को आर्थिक विकास के रूप में पेश करती है. अमेरिकी साम्राज्यवाद के सबसे वफादार जूनियर साझीदार के बतौर भारत की भूमिका को ट्रम्प प्रशासन ‘प्रमुख विश्व शक्ति’ का प्रमाणपत्र देता है.

34.     मोदी सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा कमोबेश वही है जिसकी शुरूआत 1990 के दशक की शुरूआत में कांग्रेस ने की थी. लेकिन जिस बढ़ी हुई रफ्तार, आक्रामकता और मनमाने तरीके से मौजूदा सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह इसे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार समेत सभी पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करती है. विदेशी निवेश, वित्तीय एकीकरण, डिजिटलीकरण, निजीकरण और श्रम कानूनों पर हमला पहले की सरकारों में कभी भी इतना तीखा और मजबूत न था. योजना आयोग को समाप्त करने, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार गारंटी कानूनों का सुनियोजित उल्लंघन, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जगह बीमा आधारित निजी स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के एजेंडा को तुच्छ करने के लिये स्व-रोजगार को केंद्र में लाना व अब पकौड़ा बेचने, जो कठिन अनिश्चित जीविका का प्रतीक है, को लाभकारी रोजगार का उदाहरण बताने के जरिए मौजूदा सरकार ने सामाजिक कल्याण की जिम्मेदारी का जिस कदर बेशर्मी से पूर्णतः परित्याग किया है, वैसा पहले किसी सरकार में सम्भव नहीं हुआ था.

35.     विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार अमेरिका की रणनीतिक मातहती की नीति को नई ऊंचाइयों पर ले गयी है, और ट्रम्प प्रशासन के साथ लगभग पूरी तरह ऐसे बंध गई है (हालांकि उसने यरुशलेम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के खिलाफ वोट किया है) कि वह अमेरिका में भारतीय आप्रवासियों पर बढ़ते हमलों पर भी खामोश है. अमेरिका स्थित हिंदुत्ववादी संगठन गोरे लोगों के वर्चस्व के ट्रम्प के एजेंडे का खुला समर्थन कर रहे हैं. ऐसे समय में जब इजराइल फिलस्तीन पर कब्जे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में बढ़ते अलगाव और निंदा का सामना कर रहा है, मोदी ने नेतन्याहू को गाजे-बाजे के साथ गले लगाया. चीन को रोकने के नाम पर मोदी सरकार जापान व आस्ट्रेलिया की खुशामद करने और आसियान (एएसईएएन) देशों को रिझाने में लगी हुई है. लेकिन मोदी के चैधराहट भरे रुख के चलते भारत अपने पड़ोसी देशों से अलगाव में पड़ गया है. सभी प्रमुख मुद्दों पर पाकिस्तान और चीन के साथ लगातार बातचीत चलाने और शांति, न्याय व विकास के लिए भारत की आवाज को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की जगह, मोदी द्वारा केवल घरेलू प्रचार और राजनीतिक फायदा उठाने के मकसद से की जा रही असंगत कूटनीति ने भारत की स्थिति को कमजोर कर दिया है. अपने पड़ोसी देशों के साथ देश जितने अलगाव में जा चुका है उतना आज तक कभी नहीं हुआ था.

36.     नागरिकता संशोध्न बिल के माध्यम से मोदी सरकार भारत की नागरिकता की परिभाषा भी बदल देना चाहती है. इस बिल में बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रस्ताव है. इजरायल के ‘यहूदी होमलैण्ड’ के माॅडल की तरह ही यह प्रस्ताव पड़ोसी देशों में सताये जा रहे अल्पसंख्यकों के बीच धर्मिक आधर पर भेदभाव करके और नागरिकता आवेदन करने वाले गैर-मुस्लिमों को विशेष लाभ देकर भारत को छुपे रूप में हिन्दू राष्ट्र के रूप में बताने की एक कोशिश है. इस कदम से असम में भी अशांति और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं, जहां पूर्वानुमान है कि भाजपा इस संशोधन के माध्यम से असम समझौते को निष्प्रभावी बना देगी क्योंकि इससे उक्त समझौते में लागू 24 मार्च 1971 की कट आॅफ तारीख बेमानी हो जायेगी. इस बीच, असम में सर्वोच्च न्यायालय के निरीक्षण में चल रही नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटीजन्स (एन.आर.सी.) को तैयार करने की प्रक्रिया के प्रति भी चिन्तायें व्यक्त की जा रही हैं. असम सरकार के नेताओं के बयान इस बात के संकेत दे रहे हैं कि लाखों लोग जिनके नाम एन.आर.सी. में शामिल नहीं किये गये हैं, उन्हें सामूहिक रूप से देश से बाहर भेज दिया जायेगा. यदि इसे लागू कर दिया तो एक विकराल मानवीय संकट खड़ा हो जायेगा. इस संकट से बचने के लिए केन्द्र सरकार को बंग्लादेश की सरकार के साथ एक समझौता करने और जिनके नाम एन.आर.सी. से बाहर कर दिये गये हैं उन्हें वर्क परमिट देने की संभावनाओं को अवश्य तलाशना चाहिए.

संघ-भाजपा की आक्रामकता को तेज करने वाले प्रमुख कारक  

37.     संघ-भाजपा गिरोह के सत्ता पर काबिज होने और व्यवस्थित रूप से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में कौन सी चीजें मददगार रही हैं? मौजूदा समय में जो चार कारक स्पष्टतः भाजपा के पक्ष में गए हैं, उन पर गहराई से ध्यान देने की जरूरत है. 2014 में भाजपा सिर्फ चुनाव ही नहीं जीती, बल्कि उसने मौजूदा राजनीतिक खालीपन का अधिकतम उपयोग किया. जहां कांग्रेस अपनी साख और नेतृत्व के सबसे बुरे संकट से जूझ रही थी, वहीं लगभग सारी गैर-भाजपा राजनीतिक धाराएं -- क्षेत्रीय पार्टियां, तथाकथित ‘सामाजिक न्याय’ के खेमे की पार्टियां और वामपंथ -- भी चुनावी ताकत के लिहाज से अपने सबसे बुरे दौर में थे. 2014 में मोदी की असरदार जीत से राजनीतिक संतुलन भाजपा के पक्ष में लगातार झुकता गया. तब से हुए विधानसभा चुनावों में एक के बाद एक जीत हासिल करके (दिल्ली, बिहार और पंजाब के अपवादों को छोड़कर) और गैर-भाजपा शासित राज्यों में अपने पसंदीदा लोगों को राज्यपाल बनाकर, साथ ही देश की लगभग सभी संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर अपने लोगों को बिठाकर भाजपा ने अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली है.

38.     दूसरे, पिछले तीन दशकों में हमने सत्ताधारी वर्ग की लगभग सभी पार्टियों के बीच विदेश नीति, आर्थिक नीतियों व आंतरिक शासन के सवाल पर एक वास्तविक सर्वानुमति उभरते हुए देखी है. जब नीतियों में अन्तर नहीं रहा तो भाजपा ने खुद को इन नीतियों के सर्वाधिक आक्रामक और संकल्पबद्ध पैरवीकार के बतौर पेश करने में सफलता पा ली है.

39.     तीसरे, इस नीतिगत सर्वानुमति के दौर में हम यह भी देख रहे हैं कि रोजाना मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया की मदद से एक सामान्य बोध गढ़ा जा रहा है, जिसके मुताबिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर बेदखली अनिवार्य है, उसी तरह राष्ट्रीय एकता की अविलम्ब जरूरत के लिये मानवाधिकारों को छोड़ा जा सकता है, अत्याचारी कानून लागू करने ही होंगे, और आर्थिक दक्षता की सर्वरोगहर दवा के बतौर निजीकरण लाना ही होगा, आदि, आदि.

40.     अंततः इस हद तक नीतिगत सर्वानुमति और गढ़े गए सामान्य बोध के इन हथियारों के साथ भाजपा के पास गोपनीय रूप से काम करने वाला आरएसएस का संगठन है, जिसके पास नफरत, झूठ, अपफवाह और गैर-सरकारी आतंक के नेटवर्क के रूप में अपने खुद के औजार हैं.

फासीवादी हमले के खिलाफ जन-प्रतिरोध

41.     क्रांतिकारी कम्युनिस्ट होने के नाते, लोकतंत्र, सामाजिक बदलाव और सभी तरह के अन्याय और उत्पीड़न से इंसान की मुक्ति के सर्वाधिक दृढ़ और प्रतिबद्ध अगुवा होने के नाते हमें यह समझना चाहिए कि इस दौर में बढ़ता फासीवादी हमला 1947 के बाद से हमारे राष्ट्रीय जीवन में आनेवाली सबसे बड़ी राजनीतिक तबाही है. इसलिए इस दौर में फासीवाद को शिकस्त देना ही हमारे सामने केन्द्रीय राजनैतिक चुनौती है और हमें हर संभव तरीके से इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार रहना होगा.

42.     फासीवाद हमेशा गहरे आर्थिक संकट और असुरक्षा के दौर में फलता-फूलता  है. बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में उभरे क्लासिकल फासीवाद के लिए यह बात सच थी, और आज भी यूरोप और अमेरिका के लिये सच है, जहां बढ़ती बेरोजगारी और कल्याणकारी खर्च में कटौती के खिलाफ उपजे गुस्से और आशंका को भटकाकर और इस्लामोफोबिया, नस्लवाद व विदेशी मूल के लोगों के खिलाफ नफरत की आग भड़काकर फासीवादी प्रवृत्तियां सर उठा रही हैं. भारत में भी हम साफ-साफ देख सकते हैं कि बेरोजगारों की कतारों और मोदी सरकार द्वारा लाई गई आर्थिक तबाही के शिकार लोगों में से ही फासीवादी शक्तियां अपनी सेना के लिए प्यादे भर्ती कर रहे हैं. इसलिए, फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध को जनता के गुस्से और बेचैनी के इस मूल कारण को संबोधित करना होगा और लोगों को उनकी साझा वर्गीय मांगों, आर्थिक सुरक्षा व जीविका के सवालों पर गोलबंद करना होगा.

43.     जहां एक तरफ 2014 की जीत के बाद फासीवादी ताकतों के हमले बढ़े हैं वहीं दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारत के अवाम ने पूरी निडरता के साथ उसका मुकाबला भी जारी रखा है. हमने देखा कि किसानों और आदिवासियों ने 2013 के भूमि अधिग्रहण ऐक्ट के प्रावधानों में या झारखंड के छोटानागपुर और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी और एसपीटी ऐक्ट) में संशोधन की मोदी सरकार की कोशिश को विपफल कर दिया. हाल ही में पूरे मुल्क के किसान संगठनों ने कर्जामुक्ति और कृषि उत्पादों के लिए उचित समर्थन मूल्य के सवाल पर संघर्ष के लिए जुझारू एकता कायम की. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने छात्र समुदाय के एक बीच राष्ट्रव्यापी जागरण पैदा किया जो मनमाने प्रशासनिक हमलों, झूठे मुकदमों, राज्य के दमनकारी उपायों, मीडिया के द्वेषपूर्ण प्रचार और संघी गुंडों के लगातार हमलों के खिलाफ दृढ़ता से खड़ा रहा. वास्तव में संघ से जुड़े विद्यार्थी परिषद को ही देश के तमाम कैम्पसों में लगातार धूल चाटनी पड़ी है. हमने 2016 में 48 घंटे तक चलने वाली मजदूर वर्ग की देशव्यापी हड़ताल में जबर्दस्त गोलबंदी और नवम्बर 2017 में संसद के सामने तीन दिन तक चला लम्बा धरना भी देखा है.

वाम एकता और सभी संघर्षशील शक्तियों में परस्पर सहयोग

44.     गुजरात से उत्तर प्रदेश तक, महाराष्ट्र से बिहार तक हम दलित प्रतिरोध की प्रेरक घटनाओं के गवाह हैं जिनमें जमीन, शिक्षा, रोजगार और सम्मान के बुनियादी सवालों पर क्रांतिकारी राजनीतिक गोलबंदी की नई सम्भावना निहित है. दलितों के खिलाफ तेज होती आरएसएस-समर्थित हिंसा के मुकाबले एक नई पीढ़ी का दलित आंदोलन उभरा है जिसकी अगुवाई युवा दलित नेता कर रहे हैं. इन दलित आंदोलनों का यह पक्ष सर्वाधिक स्वागतयोग्य है कि वे असुरक्षित मुसलमान समुदाय के पक्ष में मजबूती से खड़े हुए हैं और साथ ही सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम देने के लिए दलितों का इस्तेमाल करने की आरएसएस की कोशिश का प्रतिरोध कर रहे हैं. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या और ऊना में हुए अत्याचार के प्रतिरोधस्वरूप उभरे दलित आंदोलन ने आर्थिक/वस्तुगत अधिकारों के लिये संघर्ष और सम्मान के लिए संघर्ष के बीच खड़ी की गई तथाकथित ‘चीन की दीवार’ को तोड़ा है. ऊना आंदोलन ने न सिर्फ ‘गौ-माता’ के संघी प्रतीक के खिलाफ सशक्त दलित चुनौती पेश की है बल्कि श्रम के उत्पीड़नकारी-असम्मानजनक रूपों के खिलाफ और सम्माजनक रोजगार की गारंटी के लिए भूमि-आवंटन के सवालों पर दलितों के संघर्ष को बुलंद किया है. ऐसे संघर्षों ने जाति उन्मूलन और समाज परिवर्तन के मूल एजेण्डा के इर्द-गिर्द अम्बेडकरवादियों के नेतृत्व वाले आंदोलनों और वामपंथियों के नेतृत्व वाले ((खासकर भाकपा(माले) के नेतृत्व वाले)) दलित एवं अन्य दबे-कुचले तबकों के अधिकार व सम्मान के आंदोलनों के बीच स्वागतयोग्य एकता की राहें खोली हैं. ऐसे प्रत्येक बुनियादी संघर्ष को मजबूत करना, प्रतिरोध के इन विविधतापूर्ण मुद्दों के बीच एकता, आपसी सहयोग और एकजुटता कायम करना ही वह कुंजी है जिसके जरिए फासीवाद-विरोधी लोकप्रिय प्रतिरोध को जीवंत रूप से खड़ा किया जा सकता है.

45.     अभी तक ज्यादातर भारतीय संस्थानों ने फासीवाद के सामने लगभग न के बराबर प्रतिरोध किया है. इसमें भी सामंती और औपनिवेशिक रंगत वाली, हमेशा से जन-विरोधी चरित्र वाली नौकरशाही की ओर से उसे किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा. वैसे ही वर्चस्वशाली मीडिया भी सत्ता से सत्य बोलने और उससे जवाबदेही मांगने वाली लोकतांत्रिक संस्था का कर्तव्य निभाने की जगह जारी नव-उदारवादी नीतियों और यहां तक कि फासीवादी सांप्रदायिक हमले का भी प्रबंधक-संगठक और प्रचारक बना हुआ है. हालांकि हाल-फिलहाल न्यायपालिका, नौकरशाही और मुख्यधारा के मीडिया के बीच से भी कुछ आश्वस्तकारी साहसिक विरोध की आवाजें सुनाई पड़ी हैं. सबसे उत्साहवर्धक बात यह है कि हम प्रतिवाद आंदोलनों की एक नई लहर के भी साक्षी हैं, जहां समर्पित युवा कार्यकर्ताओं ने वक्त की चुनौती को स्वीकार किया है और प्रतिरोध व असहमति के नए तरीके ईजाद किए हैं. फासीवादी साजिश को विफल करने और मुल्क की लोकतांत्रिक जमीन के हर कोने की रक्षा करने के लिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को इन सभी सक्रिय ताकतों के साथ सहयोग और समन्वय के गहरे सम्बंध विकसित करने होंगे.

46.     जाहिर है कि फासीवादी ताकतों का प्रतिरोध् करने और उन्हें पराजित करने के लिए लोगों के हाथ में संविधान और वोट, दो कारगर हथियार हैं. इसलिए इन दोनों हथियारों को कुंद करने के प्रयास लगातार जारी हैं. वाजपेयी के जमाने में ही भाजपा ने संविधान की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया था. आज भी भाजपा के मंत्री जब-तब संविधान बदलने की बात कहते रहते हैं. सरकार ऐसे बहुत से कानूनी प्रावधान करने की कोशिश कर रही है जिससे संविधान बुनियादी रूप से पूरी तरह बदल जायेगा. नागरिकता कानून में प्रस्तावित संशोधन भारत की नागरिकता को निर्धारित करने में भेदभावमूलक कसौटी के बतौर धर्म को भी शामिल करता है. इसी आधार पर शरणार्थियों के बारे में भारत का आधिकारिक रवैया तय किया जायेगा. कानूनों को तार्किक बनाने के नाम पर सभी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक अधिकारों की बड़े पैमाने पर काट-छांट की जा रही है. यह काट-छांट विशेष रूप से ट्रेड यूनियन अधिकारों, सामूहिक समझौता वार्तायें और कार्यस्थल पर लोकतंत्र के क्षेत्रों में हो रही है. बहुलतावाद और विविधता, जो भारत की एकता के लिये केन्द्रीय तत्व है, को संघ के हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की अवधारणा के मातहत लाने के लिए बड़े सुनियोजित ढंग से देश के संघीय ढांचे को नकारा जा रहा है और उसमें तोड़-फोड़ की जा रही है.

47.     चुनाव के क्षेत्र में भी नियमों को बदलने की लगातार कोशिशें देखी जा रही हैं. काॅरपोरेट कम्पनियों द्वारा बड़ी पार्टियों की गुमनाम तरीके से फंडिंग को बढ़ावा देने के लिए चुनावी चंदे के नियमों में बदलाव करने से लेकर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की भाजपा की चीख-पुकार जारी है. इससे विकेन्द्रीकृत क्षेत्राीय व सामाजिक प्राथमिकताएं और परिप्रेक्ष्य तत्कालीन केन्द्रीय वर्चस्वशाली राजनीतिक विमर्श के मातहत आ जायेंगे, और विविधतापूर्ण बहुदलीय लोकतंत्र को समेटकर क्रमशः दो-पार्टी लोकतंत्र में बदल दिया जायेगा. ईवीएम के गलत काम करने की बढ़ती शिकायतों, बूथ स्तर पर वोटों की गिनती में अनियमितताओं आदि की वजह से चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और साख पर ही सवालिया निशान लग गया है. मोदी सरकार को इस बात की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए कि वह संविधान और चुनाव प्रक्रिया में तोड़-मरोड़ करने की कोशिशों में सफल हो जाये.

48.     गुजरात चुनाव ने सचमुच मोदी के गढ़ में ही मोदी शासन की कमजोरी को उजागर कर दिया है. राज्य में सशक्त विपक्ष की उपस्थिति के बिना ही जनता के विभिन्न सामाजिक तबकों के एक के बाद एक होने वाले आंदोलनों ने ऐसा माहौल बनाया कि भाजपा लगभग सरकार से बाहर ही हो गई थी. बिहार जैसे राज्य में, जहां भाजपा की पैठ उतनी गहरी नहीं है और जनांदोलनों की लगातार उपस्थिति रही है, वहां मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा विभाजनकारी राजनीति के प्रचार अभियान के बावजूद भाजपा को जबर्दस्त चुनावी शिकस्त देना सचमुच संभव हो गया. क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को वाम एवं अन्य संघर्षशील शक्तियों की एकता एवं दावेदारी को मजबूत करते हुए चुनाव के अखाड़े में प्रभावी हस्तक्षेप की रणनीति बनानी चाहिए. कम्युनिस्ट आन्दोलन की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ कोई भी समझौता किये बगैर जरूरत पड़ने पर फासीवादी भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ गैर-वाम विपक्ष की ताकतों के साथ हाथ मिलाने के विचार के प्रति भी हमें खुला रहना होगा.

फासीवाद को हराओ!  जनता का भारत बनाओ!

49.     फासीवाद को पराजित करने की चुनौती को न तो केवल चुनावी चुनौती तक सीमित किया जा सकता है और न ही ऐसा करना चाहिए. बिहार का अनुभव बताता है कि ऐसा तथाकथित महागठबंधन कितना कमजोर और खोखला हो सकता है, जिसने बिहार में भाजपा को निर्णायक शिकस्त तो दी, लेकिन बाद में वह ढह गया और भाजपा को पिछले दरवाजे से सत्ता में ले आया. गुजरात में कमजोर कांग्रेस विभिन्न आंदोलनों से व्यापक सामाजिक व राजनीतिक समर्थन हासिल करते हुए भाजपा को हराने के काफी करीब पहुंच गई, लेकिन साथ-ही-साथ वह भाजपा द्वारा निर्धारित धार्मिक-सांस्कृतिक एजेंडे पर उससे मुकाबला करने की कोशिश करती भी दिखाई पड़ी. भारत के हाल के इतिहास को देखें तो ऐसी घटनाएं भरी पड़ी हैं जब कांग्रेस ने भाजपा के नारों और प्रतीकों को अपना कर उसके साथ प्रतियोगिता में भाजपा के हिंदुत्व को पछाड़ने की कोशिश की है. ऐसे में वह सिर्फ भाजपा के हाथों खेली है और उसने भाजपा के आक्रामक बहुसंख्यकवाद के एजेंडे को अधिक शक्ति एवं वैधता प्रदान की है. एक और उदाहरण पश्चिम बंगाल का है, जहां ऊपर से तो लगता है कि भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस एक मजबूत विपक्ष के रूप में है, लेकिन उसका आतंक का राज, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र पर सीध हमला वास्तव में उस राज्य में भाजपा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. इसलिए हमें हर हाल में फासीवाद के खिलाफ मजबूत विचारधारात्मक और राजनीतिक विकल्प पेश करने के असली कार्यभार को आंखों से ओझल नहीं करना चाहिए.

50.     जनता के मूलभूत सवालों को संबोधित करने के साथ-साथ हमें फासीवादियों के जुड़वा हथियारों -- घृणा प्रचार और घृणा अपराधों के खिलाफ भी संघर्ष तेज करना होगा. अनुभव बताते हैं कि यदि जनता के स्थानीय संगठन सचेत रहें और सांप्रदायिक ताकतों का साहसपूर्वक मुकाबला करें तो संभावित सांप्रदायिक हिंसा को अक्सर बेअसर किया जा सकता है. संघर्षशील जनता के बीच मुहल्ला-आधारित जुझारू एकजुटता के जरिये फासीवादी षड्यंत्र को शुरूआत में ही कुचला जा सकता है. सांप्रदायिक व जातीय हिंसा को रोकने में सतर्कता और तैयारी तथा अगर ऐसी कोई हिंसा भड़क उठे तो स्थानीय कार्यकर्ताओं व समुदाय के वरिष्ठ नागरिकों द्वारा त्वरित और साहसिक प्रतिरोध बहुत मूल्यवान होता है. सांप्रदायिक फासीवादियों के घृणा-प्रचार को उजागर करते हुए और उसे चुनौती देते हुए जनता को वास्तविक तथ्यों और तार्किक विश्लेषण से लैस करना भी उतना ही जरूरी है. हमें अपने काम-काज के सभी इलाकों में जनता के विभिन्न तबकों के बीच काम कर रहे वर्गीय और जन संगठनों को इस दिशा में अवश्य ही प्रेरित और गोलबंद करना होगा.

51.     हमें सभी कमजोर तबकों -- मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, छात्रा-युवाओं, एलजीबीटीक्यू समुदाय, अंतर्धार्मिक-अंतर्जातीय व समलैंगिक जोड़ों, कश्मीरियों -- द्वारा जन-विरोधी आर्थिक व पर्यावरण नीतियों के साथ-साथ अपने संवैधानिक अधिकारों, सम्मान व जीवन पर हमले के खिलाफ संचालित जनांदोलनों का सक्रिय समर्थन व नेतृत्व करना चाहिए. सांप्रदायिक दादागिरी और हिंसा को ‘राष्ट्रवादी’ नारों और प्रतीकों की आड़ में ढकने की कोशिशों के बारे में हमें खास तौर से सचेत रहना चाहिए. हमें हर सम्भव कोशिश करनी चाहिए कि लोग संवैधानिक, जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों को समझें तथा उनकी रक्षा के लिए गोलबंद हों ताकि एक बेहतर, समतामूलक और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के संघर्ष को तेज किया जा सके.

52.     जिस राजनीतिक शून्य का फायदा उठा कर फासीवादी शक्तियां अस्तव्यस्त और संकटग्रस्त वर्तमान में  स्वयं को ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने का अवसर पा रही हैं, उस शून्य को बेहतर कल की भविष्य-दृष्टि और उसे हासिल करने के लिये संघर्षों से भरा जाना चाहिए. यह भविष्य-दृष्टि एक समृद्ध, बहुलतावादी और समतावादी भारत की है, जो हर भारतीय के लिए बेहतर जीवन और व्यापक अधिकारों की गारंटी कर सके. यदि स्वाधीनता संघर्ष और आजादी के बाद के आरंभिक वर्षों के दौरान राष्ट्र निर्माण को मिली गति समाप्त हो चुकी है, तो हमें दूसरे स्वाधीनता संघर्ष की ऊर्जा की जरूरत है, जो हर नागरिक के लिए पूर्ण सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता की गारंटी करते हुए हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता को मजबूत करे. यदि बढ़ती सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ की राजनीतिक समानता का मजाक उड़ा रही है, तो इस गैर-बराबरी के ढांचे से बाहर निकलने के लिए हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है. यदि अलोकतांत्रिक भारतीय समाज की जमीन, सतह पर चढ़ी लोकतंत्र की परत को लगातार क्षतिग्रस्त कर रही है और फासीवाद हमारे संवैधानिक लोकतंत्र को पूरी तरह से अलोकतांत्रिक जमीन के मातहत लाने की धमकी दे रहा है, तो हमें इस समाज का लोकतंत्रीकरण करना होगा, ताकि लोगों के हाथों में वास्तविक सत्ता आ सके. फासीवाद को जनता को दरकिनार करने और कुचलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. एकताबद्ध जनता फासीवाद के हमले को परास्त करेगी और अपने लिए अधिक मजबूत और गहरा लोकतंत्र हासिल करेगी.