जलवायु परिवर्तन पर प्रस्ताव

जलवायु परिवर्तन पर प्रस्ताव

1.     पिछले कुछ दशकों से जीवाश्म ईंध्न के उपयोग के कारण भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों के हो रहे उत्सर्जन के चलते जलवायु परिवर्तन एक स्थापित तथ्य बन चुका है. आज हम अपने चारों तरफ हो रहे जलवायु परिवर्तन के आसानी से पहचानने योग्य चिन्हों को स्पष्टतः देख पा रहे हैं.

2.     उदाहरण के लिए बाढ़ और तूफान जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़े हुए हैं. हिमालय में ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जो भारत में हिम-स्रोत वाली नदियों के पूरे वर्ष बहाव को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा. जैसा कि हम जानते हैं, ये नदियां कृषि की जीवन रेखा हैं -- और इस महत्वपूर्ण संसाधन में किसी भी तरह की बाधा पड़ने से पहले ही संकट में पड़ी कृषि अर्थव्यवस्था में भयावह तबाही आयेगी.

3.     हिम-स्रोत वाली नदियों के अलावा, जलवायु परिवर्तन का विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों और प्राकृतिक पारिस्थिकीय संरचनाओं पर दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है. बारिश का पैटर्न लगातार अधिक से अधिक असंतुलित होता जा रहा है. जंगलात और जलाशय लगातार सीमित होते जा रहे हैं. और हम जिन्हें जलवायु की ‘असामान्य’ घटनाएं कहा करते थे, वही अब क्रमशः नियम बनती जा रही हैं.

4.     ये तब्दीलियां और परिवर्तन अनेक कारकों के परिणाम हैं, जिनमें ‘विकास’ के अपनाये गये माॅडल की प्रकृति, समुचित प्रशासनिक व्यवस्था और नियमन की कमी और नीतियों की गलत प्राथमिकता आदि शामिल हैं. पर्यावरणीय संकट इजारेदार वित्तीय पूंजी द्वारा पर्यावरण दोहन की लगातार बढ़ती मांग के कारण और गहराता जा है. इसके अलावा, नव-उदारवादी नीति के ढांचे ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया है.

5.     चूंकि इस संकट के कारण व्यवस्थाजनित हैं, जो आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना की गहराई में जड़ जमाये हुए हैं, इसलिए इसका समाधान भी व्यवस्थाजनित ही होगा. जलवायु परिवर्तन की समस्या को व्यक्ति के ‘नैतिक’ विवेक, ‘आचार’ सम्बंधी अंतःकरण के प्रति अपील करके, व्यक्तिगत उपभोग तथा जीवन शैली को बदलने का आह्नान करके नहीं हल किया जा सकता है.

6.     जलवायु को बिगाड़ने में अति विशाल बहुराष्ट्रीय काॅरपोरेशनों की बहुत बड़ी भूमिका है. कार्बन मेजर्स डाटाबेस ने अपनी 2017 की एक रिपोर्ट में बताया है कि 1988 से अब तक हुए ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन के 70 प्रतिशत से अधिक का श्रोत केवल 100 कम्पनियां हैं. इतना ही नहीं, दुनियां में 1988 से अब तक हुए औद्योगिक उत्सर्जन के आधे से अधिक के लिए मात्रा 25 काॅरपोरेट और सरकारी उद्यम जिम्मेदार हैं.

7.     पारिस्थिकीय संतुलन में होने वाले इन बदलावों से उत्पन्न समस्याओं का अधिकांश बोझ गरीबों और हाशिये पर खड़े लोगों -- मछुआरों, भूमिहीन खेत मजदूर, जमीन पर निर्भर आदिवासी, ग्रामीण महिलाओं, लगातार सघन होते शहरों के झुग्गीवासियों -- पर पड़ता है.

8.     सभी तरह के उपलब्ध विश्वसनीय अध्ययनों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन खाद्य सुरक्षा और आजीविका के सामने भयानक खतरा पैदा करने जा रहा है, जिसमें कृषि और मत्स्य पालन क्षेत्रों को सबसे अधिक नुकसान झेलना होगा. आईएलओ का 2014 का आंकड़ा दिखाता है कि प्राकृतिक विपदाओं के कारण लगभग 1.93 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे, जिनमें से अधिकांश लोग भारत जैसे विकासशील देशों से थे. इसलिए हम भारत में भी इस मुद्दे से निपटने से नहीं कतरा सकते.

9.     सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय पर्यावरणीय न्याय से अभिन्न और आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है. इन्हें आपस में गूंथने वाले गहरे अंतर्सम्बंधों को देखते हुए व्यापक मुद्दे के एक पहलू को बाकी पहलुओं से अलग करने की कोशिश वास्तव में बड़ी भूल होगी. भारत में हमने जलवायु परिवर्तन की समस्या को ऐतिहासिक तौर पर लगभग एकमात्र जलवायु परिवर्तन के सवाल पर होने वाले अंतर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं के दौरान भारत द्वारा अपनाई गई स्थिति (या उससे कतराने) के रूप में देखा है. हम मानते हैं कि इतिहास के इस मोड़ पर हमें जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अंतर्राष्ट्रीय के साथ-साथ घरेलू स्तर पर भी ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है.

10.     अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकतान्त्रिक समझौता वार्ता के लिए अमेरिकी धौंस और दबाव का विरोध करने के अलावा हमें घरेलू स्तर पर भी बहुआयामी अभियान शुरू करने की जरूरत है. इन अभियानों का निशाना भारत सरकार को, और स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन, औद्योगिक प्रबंधन और राज्य सरकारों को बनाने की जरूरत है. खासतौर पर हमें सस्ती सार्वजनिक जन-परिवहन प्रणाली और ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य और ईंधन की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की मांग पर दबाव बनाने की जरूरत है.

11.     जहां तक जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं का सरोकार है, हमें बार-बार इस बात को दुहराने की जरूरत है कि यह बातचीत समानता और ऐतिहासिक जवाबदेही की नींव पर आधारित होनी चाहिए. उन्हें इस बात को स्वीकारने की जरूरत है कि वातावरण पर दुनिया के हर एक नागरिक का समान अधिकार है. माल्थुसियन सोच पर आधारित इस संदिग्ध दावे को, जो संसार के सबसे गरीब देशों में ‘जनसंख्या विस्फोट’ को इसके लिए दोषी मानता है, और प्रदूषण की पूरी जिम्मेदारी तीसरी दुनिया के ‘अति जनसंख्या’ वाले देशों के ऊपर डालता है, हमें खारिज करना पड़ेगा और इसका विरोध करना होगा. जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं को अमेरिकी धौंस तथा भारत और चीन के गरीबों का तिरस्कार करने के लिए जाना जाता है. इसका सबसे विचित्र उदाहरण धान की खेती और गौ-पालन से उपजने वाली ग्रीनहाउस गैसों की तुलना दुनिया के अत्यधिक औद्योगीकृत देशों के उद्योगों और मोटरकारों द्वारा उत्पन्न की जा रही ग्रीनहाउस गैसों से करने का है. इसका मजबूती के साथ विरोध होना चाहिए और समझौता वार्ताओं में प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को आधार बनाना चाहिए.

12.     इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन की परिघटना में सक्रिय कारक के बतौर अमरीका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया जैसी अत्यधिक औद्योगीकृत अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की ऐतिहासिक जबावदेही को इन समझौता वार्ताओं में मजबूती के साथ उठाना चाहिए. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं में विगत के उत्सर्जनों की मात्रा के आधर पर वर्तमान में उत्सर्जन घटाने की जिम्मेदारियों को बांटने की उसूली स्थिति को ही खारिज कर दिया है. दुनिया भर के गरीब और हाशिए के लोगों की एकता बनाने की बजाय इसने अमेरिकी दबाव के आगे नतमस्तक हो जाना ही चुना है. 1997 के क्योटो प्रोटोकाॅल ने विकसित देशों के लिए कार्बन डाई आॅक्साइड एवं अन्य ग्रीनहाउस गैसों के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को घटाने के लक्ष्य तय किये थे. लेकिन 2011 के डरबन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में अमेरिका व अन्य विकसित देशों के दबाव के आगे भारत झुक गया और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मापदण्ड को हटाने के लिए मान गया. इससे चीन और भारत जैसे देशों के ऊपर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने का बोझ असमान रूप से काफी बढ़ गया है.

13.     भारत के प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दोनों का जलवायु परिवर्तन का उपहास करने और इस समस्या से ही इंकार करने का इतिहास रहा है. 2014 में मोदी ने बाकायदा घोषित कर दिया कि जलवायु में परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि सर्दी सहने की लोगों की क्षमता घट गयी है. हालांकि उसके बाद ऐसे घोर अवैज्ञानिक इंकार की भाषा की जगह मोदी इस मुद्दे पर कुछ दिखावटी बातें बोलने लगे. लेकिन ट्रम्प लगातार जलवायु परिवर्तन की समस्या को ‘अमेरिकी उत्पादन को गैर-प्रतिद्वंदी बनाने के लिए चीन द्वारा गढ़ा गया’ एक ‘छलावा’ या ‘मिथक’ बताते रहे हैं. ट्रम्प के नेतृत्व में अब जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते से अमेरिका बाहर निकल गया है.

14.     जलवायु परिवर्तन पर पर्यावरणीय विमर्श की बहस ‘ग्लोबल नार्थ’ (उत्तरी दुनिया) बनाम ‘ग्लोबल साऊथ’ (दक्षिणी दुनिया) के बीच ध्रुवीकृत होती जा रही है. जबकि जलवायु परिवर्तन के संकट को पैदा करने तथा उसे तीखा करने के मामले में ‘उत्तरी दुनिया’ के औद्योगीकृत देशों की भूमिका को रेखांकित करने की जरूरत है. वहीं हमें उत्तरी दुनिया के देशों के बीच व्याप्त सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी को भी स्वीकार करने की जरूरत है. ठीक जैसे भारत में आर्थिक रूप से संपन्न तबका अपने उपभोग के पैटर्न के चलते जलवायु संकट में प्रति व्यक्ति के हिसाब से भी बहुत ज्यादा योगदान कर रहा है, उसी तरह से उत्तरी दुनिया में भी सम्पन्न अभिजातों द्वारा जलवायु संकट में योगदान की तुलना तथाकथित ‘विकसित’ और औद्योगीकृत अर्थव्यस्था में गरीब मजदूर वर्ग तथा हाशिये पर रहने वाले देशज लोगों के योगदान से नहीं की जा सकती. जलवायु परिवर्तन के असली शिकार लोगों -- गरीबों, अश्वेत लोगों और देशज लोगों के साथ, जो जलवायु संकट का अधिकांश हिस्सा खुद झेलते हैं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय एकजुटता कायम करना आज की जरूरत है,

15.     जलवायु परिवर्तन पर अन्तर्राष्ट्रीय चर्चाओं के अलावा, हमें घरेलू स्तर पर एक स्पष्ट स्थिति विकसित करने की जरूरत है. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक उसूली स्थिति अख्तियार करने के लिए भारत सरकार पर दबाव बनाने के साथ-साथ हमें इस बात को सुनिश्चित करने की जरूरत है कि भारत सरकार अन्तर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं का इस्तेमाल यहां के जलवायु संकट की चुनौतियों से निपटने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाने में न कर ले. ऐसे समय में, जब ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका वस्तुतः जलवायु परिवर्तन की आग में ‘गैसोलीन’ (अत्यंत ज्वलनशील ईंधन) झोंक रहा है, तब हम केवल अन्तर्राष्ट्रीय समझौता वार्ताओं पर निर्भर नहीं रह सकते.

16.     हमारे जन संगठनों को, खासतौर पर हमारी ट्रेड यूनियनों को अपनी सोच और अपनी विशिष्ट मांगों में जलवायु परिवर्तन के एजेंडा को शामिल करना होगा. हमारे कृषि जन मोर्चाें और पहाड़ी, समुद्रतटीय क्षेत्रों एवं अन्य पारिस्थितीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे जन संगठनों को जंगलात-आधारित नीतियों पर नजर रखनी होगी. यह विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय कारपोरेट कम्पनियां और उनके हिमायती चिन्तक पूरी सक्रियता से ऐसी नीतियों पर जोर दे रहे हैं जो जलवायु परिवर्तन का केन्द्रबिंदु ‘विकासशील’ देशों में स्थानांतरित कर देंगी. ऐसी नीतियों को विश्व बैंक, आईएमएपफ तथा घुटनाटेकू घरेलू सरकारों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है. इस प्रकार कार्बन सिंक (वातावरण से कार्बन डाइ आॅक्साइड का अवशोषण करने की क्षमता से लैस स्थान जैसे जंगल, समुद्र आदि) का बाजार तैयार करने और जलवायु परिवर्तन का ‘मुकाबला करने’ के नाम पर स्थानीय जंगलों और संसाधनों को अंतर्राष्ट्रीय निगमों और सरकारों के नियंत्रण के अधीन लाया जा सकेगा. इसका पुरजोर तरीके से प्रतिरोध करना होगा और प्रतिरोध की प्रक्रिया में केंद्र और राज्य सरकारों तथा स्थानीय प्रशासनों के खिलाफ अभियानों को शामिल करना होगा. एशिया तथा अफ्रीका के गरीब देशों को अमीरों के लिये न तो कूड़ाघर बनाने की अनुमति दी जा सकती है, और न ही उनके बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल औद्योगीकृत देशों में पैदा किये गये जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए किया जा सकता है.

17.     मौजूदा सरकार नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव फिर से लाने पर विचार कर रही है. औपनिवेशिक ब्रिटिश राज में सबसे पहले यह प्रस्ताव लाया गया था, उसके बाद अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में 2000 में इसे पुनर्जीवित किया गया. पूरे देश में भारी पैमाने पर विस्थापन और आजीविकायें छीने जाने के साथ साथ वनों एवं जैव-विविधता के भारी नुकसान से होने वाले पर्यावरण के महाविनाश के लिए इस महाकाय प्रोजक्ट की काफी आलोचनायें हो चुकी हैं. यह बेहद महंगा प्रोजेक्ट यदि लागू हो गया तो जलवायु संकट और गम्भीर बन जायेगा. जंगलों का विनाश निस्संदेह रूप से बहुमूल्य कार्बन सिंक का विनाश होगा. इसके अतिरिक्त यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में जल के भण्डार मीथेन एवं कार्बन डाई आॅक्साइड के श्रोत होते हैं. अतः इस प्रोजेक्ट को लाने की हर कोशिश का जोरदार विरोध करना होगा.

18.     शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में गरीबों एवं हाशिये पर खड़े लोगों के बीच काम करने वाले हमारे जन संगठनों को इस बात को सुनिश्चित करने के लिए अभियान खड़ा करना पड़ेगा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने से सम्बंधित मुद्दे देश के राजनीतिक एजेंडा में शामिल हो सकें. सार्वजनिक जन-परिवहन, गाड़ियों में स्वच्छ ईंधन, रसोई का स्वच्छ ईंधन और स्वच्छ विद्युत् की उपलब्धता को सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. वाहनों और जेनरेटरों में पेट्रोल उत्पादों के बढ़ते जा रहे उपयोग को चिन्हित करने की जगह केन्द्र सरकार, व अन्य राज्यों की सरकारें भी, दिल्ली में वायु प्रदूषण संकट के लिए किसानों को निशाना बना रही हैं. हमें ईथेनाॅल आधरित ईंधन एवं तकनीकी की ओर जाने की मांग पर पहल करनी चाहिए. भारत में ईथेनाॅल उत्पादन के लिए गन्ना का उपयोग किया जा सकता है, इससे कृषि अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा.

19.     हमारी ट्रेड यूनियनों को जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में अपनी मांगों को सूत्रबद्ध करने की जरूरत है -- जो जलवायु परिवर्तन की समस्याओं को हल करने के अनिच्छुक औद्योगिक प्रबंधनों पर इस बात का दबाव बनायें कि वे इस समस्या से निपटने के लिए दूरगामी तकनीकी बदलाव और कारखानों के स्तर पर बदलाव करें. इन मांगों में बेहतर प्रदूषण नियंत्रण औजार स्थापित करने, ऊर्जा और जल के संरक्षण के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण, इत्यादि को शामिल किया जाना चाहिए. इन चीजों को प्रभावी तरीके से करने के लिए हमारी ट्रेड यूनियनों को संभावनाओं का विश्लेषण करने, वैकल्पिक तकनीकी प्रविधियों का मूल्यांकन करने और उनके पारिस्थितिकीय परिणामों का मूल्यांकन करने की न्यूनतम विशेषज्ञता हासिल करनी होगी. इन कामों को तत्काल प्रभाव से करने की जरूरत है. इन तकनीकी आयामों चिन्हित करने तथा जानने-समझने के लिए उद्योग केन्द्रित अध्ययन संचालित किये जा सकते हैं. इन उद्योग-केन्द्रित मांगों को ट्रेड यूनियनों की मांगों के साथ जोड़ा जा सकता है. इसके अतिरिक्त, विभिन्न उद्योगों में जलवायु परिर्वन से सम्बंधित मांगों का संश्लेषण करके जलवायु परिवर्तन पर केंद्र सरकार को देने के लिए एक व्यापक मांगपत्र तैयार किया जा सकता है. यह मांगपत्र विभिन्न कारखानों द्वारा पालन की जाने वाली विशिष्ट नीतियों तथा किये जाने वाले तकनीकी बदलावों का संग्रह होगा, और सरकारों पर भी इन नीतियों को लागू करने के लिये दबाव दिया जायेगा.

20.     जलवायु परिवर्तन के प्रति हमारा दृष्टिकोण देश में उर्जा उत्पादन के पूरे परिदृश्य को ध्यान में रख कर बनाना होगा. उदाहरण के तौर पर हमें सौर और वायु उर्जा के इस्तेमाल को सक्रियता से बढ़ावा देना चाहिए. यह भी ध्यान में रखना होगा कि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के नाम पर परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने की कत्तई अनुमति नहीं दी जा सकती. तथ्य और आंकड़े इस बात की स्पष्टतः पुष्टि करते हैं कि हम यह मानकर नहीं चल सकते कि कोयला आधारित ताप-ऊर्जा की अपेक्षा परमाणु ऊर्जा पारिस्थिकी के लिये ज्यादा टिकाऊ है. अतः बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. तथ्य यह है कि परमाणु शक्ति जलवायु परिवर्तन के खतरे को केवल तभी उल्लेखनीय रूप से कम कर सकती है, जब परमाणु ऊर्जा प्लांटों का निर्माण अभूतपूर्व गति से हो. एक विश्वसनीय अनुमान के अनुसार पूरे संसार में परमाणु ऊर्जा के वर्तमान अनुपातिक योगदान को महज बरकरार रखने के लिए हर छह हफ्रते में एक नया परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना होगा, जो कि हकीकत में असंभव है. परमाणु ऊर्जा को इस कदर बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना न केवल तकनीकी दृष्टि से संदिग्ध है, बल्कि परमाणु कचरे के निष्पादन के भी अनिवार्यतः त्रसद दुष्परिणाम होंगे, जिसके साथ-साथ लम्बे अरसे तक रेडियोधर्मिता के असर में रहने के कारण औद्योगिक एवं खदान मजदूरों के स्वास्थ्य पर भी भयानक प्रभाव पड़ेगा. वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए), जिसको विश्व में परमाणु ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने का कार्यभार सौंपा गया है, खुद यह स्वीकार करती है कि ‘जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए परमाणु ऊर्जा कोई निकट-कालीन समाधान नहीं है... कार्बन उत्सर्जन को तत्काल और प्रभावकारी रूप में रोकने के लिये ऐसा नजरिया अपनाना होगा जिसे परमाणु रिएक्टरों का निर्माण करने की तुलना में अधिक जल्दी से लागू किया जा सके.’ इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में वस्तुतः मुनाफे का निजीकरण और होने वाली भारी मानवीय क्षति एवं जोखिमों का समाजीकरण किया जा रहा है, ऐसे में हमें कुदनकुलम, जैतापुर और अन्यत्रा कहीं भी जहां नये संयंत्रों को लाया जा रहा हो, में परमाणु ऊर्जा का विरोध जारी रखना होगा.

21.     कारखाने और उद्योग के स्तर पर तकनीकी बदलाव की पैरवी करते वक्त हम जलवायु परिवर्तन के संकट को कम करने के लिए प्रस्तावित किसी तकनीक-आधारित ‘समाधान’ की सहजात सीमाओं को भी स्वीकार करते हैं. पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में उत्तरोत्तर बढ़ते उत्पादन और उपभोग की आवश्यकता और उत्कट आकांक्षा रहने के चलते ऐसे तमाम तकनीकी ‘समाधान’ गंभीर रूप से सीमित होते हैं. ‘आर्थिक वृद्धि’ पर आधारित एक ऐसे अर्थतंत्र में, जो सहजात रूप से टिकाऊ नहीं है, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने की सनक कूट-कूट कर भरी है, तकनीकी समाधान केवल एक हद तक ही जा सकते हैं. ऐसे में साथ-ही-साथ हमें ‘ग्रीन वाशिंग’ के विभिन्न रूपों से भी सावधान रहने की जरूरत है, जिनमें प्रदूषणकारी उद्योग या तो अपने प्रदूषण और प्रदूषणकारी तकनीकों को ‘तकनीक स्थानांतरण’ के नाम पर गरीब देशों में जमा कर दे रहे हैं, या फिर वे अपनी गरीब-विरोधी, आदिवासी-विरोधी और पर्यावरण-विरोधी हरकतों को ढकने के लिये तकनीक के धूम्रजाल का इस्तेमाल करते हैं. दूसरे शब्दों में, पर्यावरण अथवा तकनीक के प्रश्न को आर्थिक और ‘विकास’ के माॅडल के बड़े प्रणालीगत प्रश्नों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है.

22.     वास्तव में वर्तमान आर्थिक माडल कई तरीकों से गंभीर पारिस्थितिकीय अंतर्विरोधों को जन्म दे रहा है. भूमि के इस्तेमाल के पैटर्न में तेजी से बदलाव पर भी नजर रखना जरूरी है, जो मसलन जंगलात और खेती की जमीन का परिक्षेत्र घटने में नजर आ रहा है, जिसके साथ तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी जुड़ा हुआ है. भूमि के इस्तेमाल में होने वाले तेजी से बदलाव जलवायु परिवर्तन के खतरनाक प्रभावों का मुकाबला करने की किसी भी गंभीर रणनीति पर गंभीर असर डालेंगे. अत्यंत महत्वपूर्ण जंगली परिक्षेत्र को, जो कार्बन सिंक का काम कर सकता है, नष्ट किया जा रहा हैऋ और पारिस्थितिकीय आपदा से निपटने में सक्षम वर्तमान सुरक्षा कवचों (समुद्रतटीय क्षेत्रों के मेंन्ग्रोव प्लांटेशन, या नदी तल) को विभिन्न "विकास" परियोजनाओं द्वारा धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है. हमें इन चीजों पर यथोपयुक्त गंभीरता से विचार करना होगा.

23.     हमें प्राकृतिक संसाधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण के महत्व को बार-बार दोहराने की जरूरत है. ऐसे समय में जब देश में बहुतेरी सरकारें -- चाहे वे राज्य सरकारें हों या केंद्र की सरकार -- प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण करने के लिये कमर कसे हुए हैं, तब हमें ऐसे सभी प्रयासों का जमकर विरोध करना होगा. जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के कार्यभार को संसाधनों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण तथा लोकतांत्रिक निर्णय-प्रक्रिया के व्यापक प्रश्न से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. जलवायु के संकट को मुनाफाखोरी और संसाधनों की कारपोरेट लूट के शासन में कत्तई कम नहीं किया जा सकता है.

24.     जलवायु संकट का समाधान कई मोर्चों पर करने की जरूरत है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमें और अधिक लोकतान्त्रिक समझौता वार्ताओं के लिये दबाव बनाने की जरूरत है और वैश्विक स्तर पर गरीब मेहनतकश और देशज लोगों के साथ और अधिक टिकाऊ एकजुटता कायम करने की जरूरत है. राष्ट्रीय स्तर पर हमें प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण के अभियानों को मजबूत करना है और ऊर्जा प्रबंधन एवं सुदक्ष तकनीक को प्रोत्साहित करना है. कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष एक सर्वांगी संघर्ष है, जो पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है.