टिप्पणी

दिल्ली में खतरनाक वायु प्रदूषण

दिल्ली का यह शरत काल भारी धुंआ व प्रदूषण के चलते सबसे बुरा बीता है. दिल्ली के लोग पिछले तीन वर्षों से इसके चलते ठीक ढंग से सांस नहीं ले पा रहे हैं. इस वर्ष भी यह समस्या जारी है और प्रदूषण अपनी तमाम सीमाएं पार कर गया है. वायु प्रदूषण और मौसमी अतिशयता एक किस्म का वर्ग युद्ध ही है. गरीब और वंचित लोग ही इसके सर्वाधिक शिकार होते हैं, जबकि जलवायु प्रदूषण के लिये वे जिम्मेवार नहीं हैं. धनी और सुविधा संपन्न लोग तो मास्क और अन्य वायु शोधकों का इस्तेमाल कर सुरक्षित रह जाते हैं, लेकिन गरीब लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं.

‘लालकिले को तोड़ दो आजाद हिंद को छोड़ दो!’

आपको यह नारा अटपटा-सा लग रहा होगा किन्तु ऐसे नारे गुंजायमान थे लाल किले के बाहर, जब आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों पर अंग्रेज अदालतों में मुकदमे चल रहे थे. आजाद हिन्द फौज के 17 हजार जवानों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे के विरोध में जनाक्रोश के सामूहिक प्रदर्शन हो रहे थे. इन प्रदर्शनों में पुलिसिया जुल्म से दिल्ली, मुम्बई, मदुराई और लाहौर में 326 से अधिक लोगों की जान चली गयी थी, वे भारत मां के लिए सड़कों पर शहीद हो गये.

27 लोगों की मौत के बाद अब तो जागो! असम के डरावने डिटेंशन कैम्पों ने अब तक 27 लोगों की जान ले ली है

असम में छह स्थानों पर डिटेंशन कैम्प खोले गये हैं जो जिला कारागारों में बने कामचलाऊ किस्म के घर हैं. पिछले 9 वर्षों में इन कैम्पों में गिरफ्तार लोगों में से 27 लोगों की मृत्यु हो चुकी है.

सावरकर: देशभक्त नहीं, कट्टर धर्मांध

मोदी सरकार वीडी सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न (भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार) से नवाजने जा रही है. मोदी और भाजपा दावा कर रहे हैं कि सावरकर “वीर” थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक नायक थे.

बगावत की आहट : चिली में 10 लाख, लेबनान में 20 लाख लोग सड़कों पर उतरे

–  शमशाद इलाही

गुजरा हफ्ता लैटिन अमेरिका में धधकते जनांदोलनों की खबरों से पटा रहा. इक्वेडोर हो या बोलीविया, हैती हो या चिली, जनता ने भ्रष्टाचार, मंहगाई के खिलाफ और जीने के लिए जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के हक में सड़क पर लामबंदी की है.

सीपीआइ की जन्म शताब्दी: 2020 या 2025 में ?

[ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की मान्यता है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में हुई थी, जिसमें उस वक्त सात सदस्य थे – एम.एन. राय, ईवलीन राॅय-ट्रेंट, अबनी मुखर्जी, रोजा फिटिंगोव, मोहम्मद अली, मोहम्मद शफीक और आचार्य. इसीलिये सीपीआई(एम) 2019-20 को सीपीआई की जन्म शताब्दी मना रही है. मगर क्या ताशकंद की घटना को सचमुच भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म माना जा सकता है? सीपीआई और भाकपा(माले) दोनों की मान्यता है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में ही, कानपुर में हुए उसके पहले सम्मेलन के जरिये हुई थी.

एनसीआरबी के आंकड़े: दर्पण झूठ न बोले

भाजपा-आरएसएस द्वारा मानवाधिकारों का अपमान

मोदी सरकार ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों को पूरे एक साल तक लटकाए और दबाए रखा. मगर अंत में 2017 के आंकड़ों को उसको 2019 में जारी करना पड़ा है. एनसीआरबी ने पहले यह बहाना बनाया था कि यह देरी अंशतः इस कारण हो रही है कि आंकड़ों को संग्रहीत करने और उन्हें चंद नए उपशीर्षकों जैसे भीड़-हत्याएं, खाप पंचायत के आदेश पर की गई हत्याएं आदि में व्यवस्थित करने में समय लग रहा है.

झुके सारे नियम कानून सत्ता के सामने

वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति. दुराचार-भ्रष्टाचार यदि भाजपा या उसके समर्थकों का हो, तो वह भी दुराचार-भ्रष्टाचार न भवति. यह इस देश में नयी परिपाटी स्थापित की जा रही है. शायद यही वो न्यू इंडिया हो, जिसका नारा गाहे-बगाहे खूब उछाला जाता है. ताजातरीन उदाहरण सिक्किम का है. सिक्किम में इसी वर्ष अप्रैल में विधानसभा के चुनाव हुए थे. इस चुनाव में सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा ने जीत हासिल की. इस जीत के बाद प्रेम सिंह तमांग मुख्यमंत्री चुने गए.

सावरकर के बारे में क्या बताती है कपूर आयोग की रिपोर्ट

[ भाजपा ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में वीडी सावरकर को भारत रत्न देने की घोषणा की है. इसके घोषणापत्र में शामिल होने के साथ ही नया विवाद खड़ा हो गया है. सबसे बड़ा एतराज तो इसी बात को लेकर है कि इतने बड़े सम्मान को चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है. ऊपर से जिस शख्स को देने की बात की जा रही है वह खुद इतिहास का सबसे विवादित व्यक्ति रहा है.

धारा 370 का खात्मा: बिहार के मजदूरों की रोजी-रोटी पर हमला

– कुणाल, बिहार राज्य सचिव, भाकपा(माले)

मुझे जानकारी थी कि पूरे बिहार की ही तरह पश्चिम चंपारण से गरीब-गुरबे रोजी-रोटी की तलाश में बाहर काम करने जाते हैं – बल्कि यहां से कुछ ज्यादा ही लोग जाते हैं. लेकिन यह पता नहीं था कि कश्मीर उनका पसंदीदा राज्य है. पूरे भरोसे व सम्मान के साथ वहां उन्हें काम करने का मौका मिलता है. बाहर से काम करने आए मजदूरों के साथ मेहमान की तरह स्थानीय लोगों का व्यवहार होता है.