रोजगार और घोटालों से लोगों का ध्यान हटाकर नफरत सुलगाने की भाजपाई साजिश को शिकस्त दें !

पिछले कुछ दिनों में मोदी जमाने के घोटाले के सबूतों का बड़ी तेजी से खुलासा होता जा रहा है. और, मोदी सरकार की भेंट बेरोजगारी तथा घोटालों की ओर से लोगों का ध्यान हटाने के लिए भाजपा के नेतागण रोज अपने भाषणों में कभी मतदाताओं को डरा-धमका रहे हैं तो कभी इस्लाम का हौवा दिखाते हुए उसके खिलाफ नफरत भड़का कर उनका ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. दुर्भाग्यवश, सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं भी ऐसी असंवैधानिक धमकियों और नफरतभरे बयानों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करके अपनी बेबसी और पक्षपाती रवैये का ही प्रदर्शन कर रहे हैं.

एक फ्रांसीसी समाचारपत्र ‘ल मोंद’ ने यह तथ्य उजागर किया है कि अनिल मोदी द्वारा राफेल सौदे में ऑफसेट अनुबंध झटक लेने के थोड़े ही दिन बाद फ्रांस ने वहां पंजीकृत एक कंपनी का 1200 करोड़ का टैक्स माफ कर दिया, जिसका मालिक अनिल अंबानी है. अंबानी की यह कंपनी गहरी वित्तीय कठिनाई झेल रही थी, और यह टैक्स-माफी उसके लिए जीवन रक्षक बनकर सामने आई है. फ्रांस सरकार ने क्यों इतनी उदारतापूर्वक इतनी विशाल टैक्स-राशि माफ कर दी और दसाऊ ने क्यों एचएएल की बजाए अंबानी को ऑफसेट अनुबंध थमा दिया? क्या इसलिए, कि भारतीय प्रधान मंत्री मोदी ने इसके बदले में राफेल डील को कमजोर बना दिया - राफेल जेट की कीमत तीन गुने बढ़ा दी तथा टेक्नोलॉजी हस्तांतरण की शर्तों, सरकारी गारंटी और भ्रष्टाचार-निरोधी कानूनों को तिलांजलि दे दी?

अपने पिठ्ठू (क्रोनी) अनिल अंबानी के लिए इस अतिप्रिय सौदे की दलाली के बदले में मोदी को क्या मिला? यह तो हम अभी तक नहीं जान सकते हैं - क्योंकि मोदी की चुनावी बौंड योजना (जिसके तहत भाजपा को 95 प्रतिशत बौंड हासिल हुए हैं) यह गारंटी करती है कि भाजपा के चुनावी अभियान में धन देने वालों के नाम गुप्त रहेंगे! चुनावी बौंड मसले पर विलंब से सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राजनीतिक दल “मुहरबंद लिफाफे” में धन देने वालों का विवरण चुनाव आयोग को सौंप दें - और, इस प्रकार कोर्ट ने सुनिश्चित कर दिया कि मतदाता यह नहीं जान पाएंगे कि कौन से भारतीय या विदेशी धन-दाता भाजपा की चुनावी मुहिम में पैसा देकर भाजपा की निष्ठा का बदला चुका रहे हैं अथवा उसकी निष्ठा खरीदने की कोशिश कर रहे हैं.

इसी बीच, एक सुनवाई में एक बचाव एजेंट की जमानत अर्जी का विरोध करते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने न्यायालय को बताया कि मोदी शासनकाल में पिछले दिनों कम से कम 36 व्यवसायी - जिनमें विजय माल्या, ललित मोदी, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और सुदेसरा ब्रदर्स शामिल हैं - देश छोड़ कर भाग चुके हैं. यह बात भी सामने आई कि पिछले दशक में धूर्त कर्जदारों के जितने बैंक ट्टण माफ किए गए हैं उसमें 80 प्रतिशत माफी मोदी शासन के दौरान दी गई है. ऐसा लगता है कि अपने कॉरपोरेट पिठ्ठुओं के लिए “कॉरपोरेट लूट सेवा” और “लूटो और भागो सेवा” योजना ही मोदी राज की प्रमुख उपलब्धि रही है !

इस दौरान, भाजपा नेतृत्व आदर्श आचार संहिता के अभूतपूर्व खुल्लमखुल्ला उल्लंघन, सांप्रदायिक कट्टरता और मतदाताओं को धमकाने में मशगूल है. प्रधान मंत्री मोदी सैन्य बलों के नाम पर वोट मांग रहे हैं और घोषणा कर रहे हैं कि एक भी हिंदू पर आतंकवाद का आरोप लगाना समस्त हिंदुओं का अपमान है. उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी ‘अली बनाम बजरंग बली’ जुमले के साथ मतदाताओं के मन में जहर घोलने और उनका साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया है. अमित शाह ने सारे अल्पसंख्यकों को ‘घुसपैठिया’ करार देने की कोशिश की है. केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और गुजरात के विधायक रमेश कटारा ने भाजपा को वोट न देने वालों के साथ भेदभाव बरतने की धमकी दी है. केरल के भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि मुस्लिम लोगों के कपड़े उतार कर उनकी शिनाख्त की जा सकती है. साक्षी महाराज ने कहा कि जो  लोग भाजपा को वोट नहीं देंगे, उन्हें वे शाप देंगे ऋ जबकि बंगलोर से भाजपा उम्मीदवार तेजस्वी सूर्या ने कहा कि मोदी को वोट न देने वाले लोग राष्ट्र-विरोधी हैं. त्रिपुरा में वामपंथी वोटरों के घरों में मुर्गे के कटे-फटे सरों के साथ मार दिये जाने की हस्तलिखित धमकियां पाई जा रही हैं - उन्हें चेतावनी दी जा रही है कि अगर उन्होंने वोट डाले तो उन्हें मार डाला जाएगा.

इन मामलों में निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने हिचकिचाते हुए, कमजोर और पक्षपातपूर्ण जवाब दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को आदित्यनाथ, मायावती और आजम खान के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया - इसके बाद आयोग ने उन्हें कुछ दिनों के लिए चुनाव अभियान में जाने से रोक दिया. तत्पश्चात, आयोग ने मेनका गांधी पर भी ऐसा ही प्रतिबंध लगाया. अगर आजम खान की “खाकी निक्कर” वाली टिप्पणी जयाप्रदा के लिए थी, तो बेशक वह गंदी और निंदनीय थी. लेकिन आयोग ने शशिधरन की उस टिप्पणी पर क्यों नहीं कार्रवाई की जिसमें उन्होंने कहा कि मुस्लिम लोगों के कपड़े उतार कर उनकी पहचान की जा सकती है ? कांग्रेस के बजाय ‘गठबंधन’ के पक्ष में वोट देने के लिए मायावती द्वारा की गई अपील किसी समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण की श्रेणी में नहीं आती है और न ही उसे धर्म के नाम पर वोट मांगना कहा जा सकता है. इन टिप्पणियों को भाजपा नेताओं द्वारा सांप्रदायिक अपमान, नफरतबाजी और वोटरों को धमकाने के समतुल्य मानना तो हर्गिज सही नहीं हो सकता है.

इसके अलावा, मोदी और शाह के भाषणों पर सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग की खामोशी अपनी कहानी आप कर देती है. भाजपा अध्यक्ष और गांधीनगर से उम्मीदवार अमित शाह ने ऐलान किया कि भाजपा ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण’ और ‘नागरिकता संशोधन बिल’ को लागू करेगी ताकि “हर हिंदू, सिख और बौद्ध शरणार्थियों की पहचान कर उन्हें नागरिकता दी जा सके और घुसपैठियों को इससे निकाला जा सके.” दूसरे शब्दों में शाह कह रहे हैं कि भारत में रहने वाले हर मुस्लिम और ईसाई को (चाहे वे नागरिक हों, आ-प्रवासी मजदूर हों या शरणार्थी हों) संदिग्ध घुसपैठिया समझा जाएगा, उनकी धर-पकड़ होगी, उन्हें हिरासतों में रखा जाएगा, उनके वोट देने के अधिकार छीन लिए जाएंगे और उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर किया जाएगा - जबकि हरेक हिंदू, सिख और बौद्ध आ-प्रवासी को शरणार्थी माना जाएगा और उसे नागरिकता प्रदान की जाएगी ! सांप्रदायिक और फासिस्ट मंशा की इससे ज्यादा स्पष्ट बयानबाजी और क्या हो सकती है ? जैसे कि शाह ये कह रहे हैं कि कोई हिंदू कभी भी “घुसपैठिया” नहीं हो सकता है, वैसे ही मोदी कह रहे हैं कि कोई हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता है - वह भी नहीं, जो बम धमाके करता है और चुन-चुन कर हत्याएं करता है !

यह तथ्य, कि सर्वोच्च न्यायालय और निर्वाचन आयोग ने इन खतरनाक और असंवैधानिक बयानों की तरफ से अपने आंख-कान बंद कर रखे हैं, भारत की लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को कमजोर बनाता है. भाकपा(माले) ने निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर बताया है कि पिछले दृष्टांत (बाल ठाकरे मामला) के मद्देनजर नफरत-बयानी और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के ये दृष्टांत भी अनेक वर्षों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध के लायक हैं.

अगर निर्वाचन आयोग भाजपा की नफरत-बयानी, भय पैदा करने की कोशिशों और खुली ठगबाजी की सजा नहीं देता है, तो भारत के वोटर ही उनको यह सजा देंगे, और उन्हें ऐसा करना ही चाहिए. भारत वैसे सांसदों और वैसी सरकार के पक्ष में वोट करेगा जो जनता के प्रति जवाबदेह हों और भारतीय लोकतंत्र व संविधान पर उद्दंडतापूर्ण हमलों के लिए मोदी शासन और भाजपा को दंडित करें.

वर्ष28
अंक18