मुस्लिम आबादी और आप्रवासन सम्बंधी साम्प्रदायिक मिथकों का भंडाफोड़ करो

भारत की शासक पार्टी भाजपा के निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों एवं भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्यों ने विगत 11 जुलाई 2019 को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाते हुए, भारत में मुसलमानों की आबादी के बारे में खुद ही गढ़े हुए जहरीले साम्प्रदायिक मिथकों का प्रचार किया.

केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री गिरिराज सिंह ने उस दिन जंतर मंतर पर आयोजित एक रैली को सम्बोधित करते हुए मांग पेश की कि तथाकथित “हिंदुओं की आबादी में गिरावट और गैर-हिंदू आबादी की वृद्धि की समस्या” से निपटने के लिये एक जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाया जाये. रैली में भाग लेने वाले लोगों ने खुलेआम हिंसक जनसंहार की धमकियां देते हुए नफरत भरी भाषणबाजी की. एक भागीदार ने तो मुसलमानों के लिये मानवाधिकारों तक में कटौती करने का आह्नान कर डाला. एक और भागीदार ने विलाप किया कि सारे मुसलमानों का सिर काट डालने की उनकी दिली अभिलाषा को पूरा करने में भारत का संविधान उन्हें रोक रहा है. रैली ने जहरीला साम्प्रदायिक और झूठा प्रचार करते हुए दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ, जो बहुपत्नी प्रथा की इजाजत देता है, के चलते अगर मुसलमानों की आबादी इसी रफ्तार से बढ़ती रही जैसी आजकल है, तो देर नहीं जब मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी.

चंद रोज पहले उत्तर प्रदेश के बलिया से भाजपा लोकसभा सदस्य सुरेन्द्र सिंह ने घोषणा की थी कि मुसलमान जानवरों की तरह होते हैं, जो “पचास औरतें रखते हैं और एक हजार पचास बच्चों को पैदा करते हैं.” पिछले साल भी उन्होंने इसी किस्म का एक बयान दिया था और आह्वान किया था कि हर हिंदू दम्पति को कम से कम पांच संतानें पैदा करना चाहिये.

इस किस्म का साम्प्रदायिक प्रचार, जो दावा करता है कि मुसलमान लोग बहुपत्नी प्रथा, ‘लव जिहाद’ और “बांग्लादेशी घुसपैठ” जैसे औजारों का इस्तेमाल करके एक दिन हिंदुओं को आबादी में पछाड़ देंगे, दरअसल आरएसएस एवं भाजपा की मूल साम्प्रदायिक पाठ्य-पुस्तक में लिखी हुई जानी-पहचानी पटकथा है. गुजरात में वर्ष 2002 में हुए साम्प्रदायिक दंगे के बाद नरेन्द्र मोदी, जो उन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री थे और आज भारत के प्रधानमंत्री हैं, ने दंगा-पीड़ित मुसलमानों के राहत शिविरों को “बच्चा पैदा करने की फैक्टरियां” बताया था. वर्ष 2015 में भाजपा के सांसद साक्षी महाराज ने हिंदू दम्पतियों से आग्रह किया था कि वे कम से कम चार बच्चे पैदा करें. विश्व हिंदू परिषद की नेता “साध्वी” प्राची ने इसी नुस्खे को दुहराया था और इसी बहाने समलैंगिक सम्बंधों के खिलाफ नफरत का जहर भी उगल डाला था. अपने बयान की पैरवी करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा था कि उनकी ख्वाहिश है कि हिंदू “चार बच्चे” पैदा करें, “चालीस पिल्ले नहीं” – जिसका आशय था कि मुसलमान कुत्तों जैसे होते हैं.

लेकिन यह प्रचार आबादी के आंकड़ों को देखने से सरासर झूठ साबित होता है. आबादी में वृद्धि के आंकड़े अशिक्षा, बदहाली और गरीबी जैसे कारकों से जुड़े होते हैं. मुस्लिम महिलाओं के बीच साक्षरता की दर में सुधार होने के साथ साथ मुसलमानों की आबादी वृद्धि दर वास्तव में हिंदुओं की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से घट रही है. 1991-2001 की जनगणना से लेकर 2001-2011 की जनगणना के बीच की अवधि में, हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर 3.16 प्रतिशत घटी है, जबकि इसी अवधि में मुस्लिम आबादी की वृद्धि की दर कहीं ज्यादा तेजी से, 4.92 प्रतिशत घटी है. पिछले दो दशकों के दौरान मुसलमानों की आबादी की वृद्धि आज सबसे कम दर पर पहुंच गई है.

इसी प्रकार, 2015-16 का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) का आंकड़ा दर्शाता है कि मुस्लिम महिलाओं के प्रजनन की दर में भी, साक्षरता की बढ़ती दर के अनुरूप ही, उल्लेखनीय कमी आई है. हिंदू परिवारों में प्रजनन की दर जहां पिछले सर्वेक्षण (2005-06) में 2.6 थी, वह 2015-16 के सर्वेक्षण में घटकर 2.1 रह गई है, जबकि मुसलमान परिवारों में इसी अवधि में प्रजनन दर 3.4 से अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा घटकर 2.6 पर आ गई है. सर्वेक्षण में इससे भी ज्यादा उल्लेखनीय बात यह पता चली कि हिंदू और हिंदू परिवारों के बीच प्रजनन की दर में जो अंतर था वह 2005-06 में 30.8 प्रतिशत से गिरकर 2015-16 में 23.8 हो गया है.

मुस्लिमों में 2.6 की प्रजनन दर को अगर हम सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमें याद रखना होगा कि अनुसूचित जनजातियों (एसटी) में प्रजनन दर 2.5 और अनुसूचित जातियों (एससी) में प्रजनन दर 2.3 है, तथा अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) में 2. 2 है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में समग्र प्रजनन दर3 है. दूसरे शब्दों में, शैक्षणिक रूप से पिछड़े और हाशिये पर मौजूद समुदायों एवं राज्यों में प्रजनन दर अधिक पाई जाती है, जबकि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और उच्चतर महिला साक्षरता वाले समुदायों और राज्यों में प्रजनन की दर कम पाई जाती है. केरल जैसे राज्य में (जहां साक्षरता, खासकर महिला साक्षरता की दर ऊंची है), मुसलमानों की प्रजनन दर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में (जहां साक्षरता और खासकर महिला साक्षरता की दर नीची है) हिंदुओं की प्रजनन दर से कम है.

आरएसएस और भाजपा द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक प्रचार में यह भी दावा किया गया है कि बांग्लादेश से अवैध आप्रवासन के चलते मुसलमान आबादी बढ़ गई है. यह प्रचार अधिकांशतः बांग्लादेश के सीमांत भारतीय राज्यों, जिनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय असम और पश्चिम बंगाल है, में ज्यादा से ज्यादा जोर देकर चलाया जा रहा है. असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की कवायद, जिसके लिये 31 जुलाई 2019 को अंतिम तिथि तय किया गया है, के साथ-साथ भाजपा नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक भाषणबाजी की जा रही है. अमित शाह ने अपने भाषणों में मुसलमानों के बारे में अमानवीय भाषा का व्यवहार किया और कहा कि बांग्लादेशी मुसलमान “दीमक” हैं, जिन्हें एनआरसी के जरिये चुन-चुनकर निकाल बाहर किया जायेगा. उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) का इस्तेमाल करके गैर-मुस्लिम बांग्लादेशी आप्रवासियों को भारत की नागिरकता अवश्य दी जानी चाहिये.

लेकिन तथ्यों के आधार पर “बांग्लादेश से अवैध मुस्लिम आप्रवासन” के तमाम दावे झूठे ठहरते हैं. जनसंख्या के आंकड़ों से दिखता है कि 1991 से 2001 के बीच असम में मुस्लिम आबादी उसी दर से बढ़ी जिस दर से समूचे देश की मुस्लिम आबादी बढ़ी, जबकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर समूचे भारत में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर से धीमी रही. असम में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आबादी में वृद्धि की दर राज्य की मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर से अधिक थी.

यहां तक कि असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के कामकाज की देखरेख कर रहे सर्वोच्च न्यायालय ने भी भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा गढ़े गये दावे को स्वीकार कर लिया कि असम में अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों की संख्या50 लाख है. वास्तविकता यह है कि हाल में सूचना अधिकार (आरटीआई) के जरिये पूछे गये एक सवाल के जवाब में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने ही माना है कि यह संख्या “किसी व्यापक अथवा सैम्पल अध्ययन पर आधारित नहीं है बल्कि कही-सुनी बातों पर, और वह भी इस मामले में निहित स्वार्थ रखने वाले लोगों के कथन पर आधारित है. अतएव, असम में अवैध बांग्लादेशी आप्रवासियों की संख्या का कोई वास्तवसम्मत आंकड़ा पेश नहीं किया जा सकता. पश्चिम बंगाल के मामले में भी आंकड़े गैर-भरोसेमंद आकलनों पर आधारित हैं और वे गलत हैं.”

यह चिंताजनक बात है कि इस प्रकार की “कही-सुनी बातों” और “गैर-भरोसेमंद आकलनों” को एक ऐसी कवायद का आधार बनाया गया है जो 31 जुलाई 2019 को असम में कई लाख भारतीयों को नागरिकता से वंचित करने पर आमादा है.

ऐसी रिपोर्टें आ रही हैं कि बाढ़ग्रस्त असम में बांग्लाभाषी मुसलमान अपना घर बाढ़ में डूब जाने के बावजूद, इस डर से अपने घरों को छोड़कर अस्थायी शरण के लिये नहीं भाग रहे कि इस वजह से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में नागरिकों की सूची में उनका नाम दर्ज कराने का दावा कमजोर हो जायेगा. इस बीच, कुछ तत्वों ने असम में एनआरसी की अंतिम सूची के प्रकाशन की पूर्ववेला में साम्प्रदायिक वैमनस्य भड़काने के लिये बांग्ला भाषी मुसलमानों द्वारा लिखी गई एक प्रतिवादी कविता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया है. इस कविता में, चलताऊ बोली में मुसलमानों को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त शब्द “मियां” को अपनाते हुए और उस पर अपना दावा जतलाते हुए, साम्प्रदायिक और भाषागत कट्टरपंथ को धता बताते हुए अपनी “मियां” पहचान पर गर्वबोध जाहिर किया गया है.

भाजपा और आरएसएस द्वारा मुसलमानों के बारे में झूठी बातें फैलाने और उनसे भय पैदा करने का जो साम्प्रदायिक प्रचार अभियान चलाया जा रहा है उसका मकसद है अपने हिंदू बहुसंख्यावादी और जनसंहार रचाने के एजेंडा के लिये समर्थन का आधार पैदा करना. इस अभियान का, जिसे मोदी सरकार प्रत्यक्ष रूप से संचालित कर रही है, अवश्य ही तुरंत पर्दाफाश करना होगा और उसका प्रतिरोध करना होगा.

वर्ष28
अंक31