सरकारी आपदा है बिहार में बाढ़

पहली ही बारिश के बाद उत्तर बिहार के सीमांचल, मिथिलांचल, शिवहर, चंपारण आदि इलाकों की बड़ी आबादी बाढ़ की चपेट में आ गई है. अधिकांश नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से उपर बह रहा है. करीब 70 लोगों के मरने की भी खबरें आ रही हैं. कई बच्चे बाढ़ के पानी में डूब कर जान गवां चुके हैं.

बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए भाकपा(माले) विधायक दल ने सदन में कार्यस्थगन का प्रस्ताव दिया था लेकिन सरकार उसपर चर्चा के लिए तैयार नहीं हुई. बाढ़-पीड़ितों की स्थिति का जायजा लेकर उपयुक्त उपाय ग्रहण करने के लिये सभी विधायक बढ़ग्रस्त इलाकों के दौरे पर चले गए. विधायक दल नेता का. महबूब आलम ने कटिहार व सीमांचल के अन्य जिलों, का, सत्यदेव राम ने मधुबनी व दरभंगा तथा का. सुदामा प्रसाद ने मुजफ्फरपुर व सीतामढ़ी जिलों के बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा किया.

sudama

 

का. सुदामा प्रसाद ने मुजफ्फरपुर के बर्री व चंदौली (कटरा प्रखंड), हरखोली, मिश्रोली, तुरकटोलिया, बेनीबाग, भटगावां, बलौर, भगवतपुर (गायघाट प्रखंड) तथा बभनगांवा, बारा, महुवारा, हरनीटोला, मधुबन, बराखुर्द, जोंकी, डुमरी (औराई प्रखंड) और सीतामढ़ी के बड़हरवा, बनगांव, खरपुरवा, बसहां, कचहरीपुर, मलिकपुर व गाजपट्टी (वाजपट्टी प्रखंड) आदि करीब 20 गांवों के बाढ़ पीड़ितों के बीच से लौटकर बताया कि विगत 5 दिनों से लोग भूखे-प्यासे रह रहे हैं. बाढ़ में डूबने तथा सांप के काटने इन गांवों में ध्यानी प्रसाद राय, संध्या कुमारी, मोहम्मद हुसैन व प्रो. हृदया राय की मौत हो गई. बाढ़ पीड़ितों को खाना, पानी, रौशनी, नाव, पाॅलीथिन व पशुओं के लिए चारा के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ रही है.

उनके साथ पार्टी व इंसाफ मंच के नेता सूरज कुमार सिंह, आफताब आलम, जितेन्द्र यादव, असलम रहमानी, फहद जमा, विकेश कुमार, दीपक कुमार, असलम रहमानी, माले नेता मनोज यादव, महफ़ूज आलम, शमशेर आलम, अब्दुल कलाम, नेयाज सिद्दीकी भी थे.

का. सत्यदेव राम ने दरभंगा ज़िला के अलीनगर, किरतपुर, घनश्यामपुर, तारडी, गौरबौराम, बिरौल, मनीगाछी और मधुबनी जिला के पंडौल, झंझारपुर अनुमंडल के कई प्रखंडों का दौरा किया। उन्होंने बताया कि बाढ़ से भारी तबाही मची हुई है. कई जगहों पर तटबन्ध टूटने की आशंका से लोग रतजगा कर रहे हैं. वे तटबंधों को बचाने में ग्रामीण लगे हैं लेकिन सरकार कहीं नहीं दीख रही. प्रशासन के जरिये जो कम्युनिटी किचेन चलाये जा रहे हैं वो नाकाफी हैं. लोगों को खासकर बच्चे-बच्चियों को भूखे रहना पड़ रहा है.

सकरी से लेकर झंझारपुर-निर्मली तक दसियों हजार लोग एनएच-57 पर माल मवेशियों के साथ शरण लिए हुए हैं. उन्हें प्लास्टिक सीट, मवेशी चारा, पानी और चूड़ा-गुड़ तक नही मिला है. सैकड़ों गांव पानी में डूबे अथवा घिरे हुए हैं, लोग उंचे टीलों अथवा पक्का मकान वाले घरों की छत पर शरण लिए हुए हैं. झंझारपुर के सैकड़ों गाव बाढ़ की चपेट में आये हुए हैं. वहां भी पता चला कि स्थानीय जनप्रतिनिधि अभी तक मिलने नहीं आये. लगभग 10 किलो मीटर तक एनएच 57 पर लोग शरण लिए हुए हैं.

नावों के लिए अफरा-तफरी मची हुई है. कहीं कोई सरकारी नाव नहीं चल रही हैं. गांव वालों को नाव नहीं मिल रही हैं. सरकार ने बाढ़ पूर्व न तो नावें बनवाई और न ही खरीदीं. सब कुछ प्राइवेट नावों के सहारे चल रहा है. कई जगहों पर नाव दुर्घटना में लोग मरे हैं. सांप काटने से बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हो रही है. बचाव और राहत कार्य मे तेज़ी लाने और एनएच-57 पर जगह-जगह मेडिकल कैम्प खोले जाने की मांग की.

दरभंगा ज़िला सचिव का. बैद्यनाथ यादव ने बताया कि रासियारी पुल के नीचे करीब 60 परिवार पानी मे फंसे हुए हैं, उन्हें कोई सुविधा नहीं मिली है. लाखिया मुशहरी में भी अभी तक कोई सरकारी सुविधा नहीं मिली है. रासियारी, बौर, ककोढ़ा आदि दर्जनों गांव की स्थिति भयावह है. कोरथु, पुन्हाद आदि गावों में तटबन्ध पर दबाव बना हुआ है. हायाघाट, हनुमाननगर, सिंघवाड़ा, जाले आदि प्रखंडों के दर्जनों पंचायतें बुरी तरह प्रभावित हैं. बहादुरपुर, सदर, केवटी, बहेड़ी के भी कुछेक पंचायतों पर दबाव है. बागमती नदी के तटबंध पर सरैया-रतनपुरा में दबाव बना हुआ है. लोग भारी संख्या में रेलवे प्लेटफार्म, ऊंचे टीलों और सड़कों पर शरण लिए हुए हैं। उन्हें तत्काल प्लास्टिक सीट, चूड़ा-गुड़ व अन्य राहत सामग्रियां मिलनी चाहिए. इन इलाकों में भी कम्युनिटी किचन शुरू होना चाहिए.

barh

बाढ़ से निपटने की सरकार की तैयारी अपर्याप्त

यह तो पहली बार नहीं है कि बिहार में बाढ़ है. आखिर सरकार ने बाढ़ पूर्व कौन सी व्यवस्था की थी? हर साल बाढ़ का कहर बिहार के लोग झेल रहे हैं. लेकिन डबल इंजन की सरकार इसके स्थायी समाधान की बात जाने दी जाए, बाढ़ पूर्व न्यूनतम व्यवस्था भी नहीं करती. यदि ऐसा किया होता तो जान-माल की यह व्यापक क्षति नहीं होती. सरकार द्वारा चलाया जा रहा राहत अभियान भी नाकाफी है. बाढ़ प्रभावित लोगों के सरकारी आश्रय स्थल नाकाफी हैं. बाढ़ प्रभावित बड़ी आबादी तटबंधों, हाइवे अथवा घर की छतों पर खुले आसमान में शरण लिए हुए हैं.

जिस तरह से आश्रयस्थलों की घोर कमी है, उसी प्रकार राहत के दूसरे इंतजाम भी नाकाफी हैं व ज्यादातर तो वे पूरी तरह से गायब हैं. यही वजह है कि लोगों का आक्रोश जगह-जगह पफूटने लगा है. सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि जो स्थानीय जनप्रतिनिधि है वो भी बाढ़ पीड़ितों से नही मिल रहे है. स्थानीय जदयू विधायक मदन सहनी जो बिहार सरकार के खाद्य मंत्री भी हैं और दरभंगा से भाजपा के सांसद है गोपाल जी ठाकुर हैं. दोनों ही क्षेत्र से गायब है. बाढ़ पीड़ितों का आक्रोश भी अब जगह-जगह फूटता दीख रहा है. बारसोई में बाढ़ प्रीज्ञावितों ने तीन घंटे तक सड़क जाम किया. बाढ़ पीड़ितों ने राहत की मांग करते हुए 18 जुलाई को गायघाट प्रखण्ड का घेराव भी किया है

वर्ष28
अंक31