कानूनों में दानवी और अलोकतांत्रिक संशोधन

मोदी-2 शासन ने ढेर सारे दानवी ‘आतंक-विरोधी’ कानून पारित कर दिये हैं. गृह मंत्री अमित शाह इन कानूनों पर सवाल उठाने वालों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार देते हैं, उन्हें मुस्लिमों का ‘तुष्टिकरण’ करने वाला बताते हैं; और मुस्लिमों को तो बेधड़क आतंकवादी ही बता दिया जाता है. लेकिन वही अमित शाह कहते हैं कि ‘समझौता बम विस्फोट’ के आरोपियों को झूठमूठ आतंकवादियों के बतौर फंसाया जा रहा है, क्योंकि वे तो हिंदू हैं.

मानवाधिकार रक्षा (संशोधन) बिल

लोक सभा द्वारा पारित यह बिल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को तेज बनाता है. इसमें इजाजात दी गई है कि सिर्फ भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के तमाम पूर्व न्यायाधीशों को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. इसमें मानवाधिकार आयोग में दो के बजाय तीन मानवाधिकार विशेषज्ञों की नियुक्ति का प्रावधान है, जिनमें एक महिला विशेषज्ञ होंगी. इसके अलावा, इसमें यह भी प्रस्तावित है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे आयोगों के अध्यक्ष भी इस मानवाधिकार आयोग के सदस्य होंगे.

इस बिल पर हुए वाद-विवाद के दौरान भाजपा के नेताओं और मंत्रियों ने मानवाधिकारों और संविधान के प्रति खुली अवमानना का इजहार किया. भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह (मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त और पूर्व एचआरडी राज्य मंत्री) ने कहा कि भारतीय संस्कृति में हमेशा ही मानव-जाति का सम्मान किया गया है, और कि मानवाधिकार एक विदेशी, पश्चिमी अवधारणा है. उन्होंने दावा किया कि हमारे संविधान-निर्माता मौलिक अधिकारों का विषय सामने आने पर अमेरिकी संविधान से अनुप्रेरित हो गए थे.

सत्यपाल सिंह ने आगे कहा कि उनकी सरकार ‘आतंकवादियों और बलात्कारियों’ की नहीं, बल्कि ‘सही लोगों’ के मानावाधिकारों की रक्षा करती है. सदन में पूछे गए सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इसी भावना को मुखरित करते हुए कहा, “हमारी सरकार आतंकवादियों और यौन अपराधियों के नहीं, बल्कि पीड़ितों के मानवाधिकारों के पक्ष में खड़ी रहती है.” ऐसे बयानों में मानव अधिकारों के बुनियादी उसूलों की जानकारी का पूर्ण अभाव ही परिलक्षित होता है. इसका पहला उसूल यह है कि अपराधों के आरोपी, और यहां तक कि सजायाफ्ता, से भी ये अधिकार नहीं छीने जा सकते हैं – और इस उसूल को हर लोकतांत्रिक देश को बुलंद रखना होगा.

इसके अलावा यह भी विडंबनापूर्ण है कि जो सरकार संसद में खुलेआम कहती है कि ‘आतंकवादियों’ को कोई अधिकार नहीं है, उसी के अधीन उसी लोक सभा में भाजपा की एक आतंकवाद-आरोपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर भी मौजूद है. प्रज्ञा ठाकुर के मामले में भाजपा (बिना किसी साक्ष्य के) दावा करती है कि उसके मानवाधिकारों का हनन हुआ है और उसे यातनाएं झेलनी पड़ी हैं! इस प्रकार, जब भाजपा यह कहती है कि आतंकवाद का आरोप झेल रहे लोगों को मानवाधिकार नहीं मिलना चाहिए, तो वह आतंकवाद के संघी अभियुक्तों को इसके दायरे से बाहर रखना चाहती है.

यूएपीए और एनआइए कानूनों में संशोधन

यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि निवारण ऐक्ट) जैसे पहले से ही दानवी कानूनों में मोदी सरकार द्वारा किए जा रहे बदलावों को गहराई से समझना होगा. लोक सभा ने यूएपीए में एक संशोधन पारित किया है, जिसके अनुसार एनआइए (राष्ट्रीय खुफिया एजेन्सी) को अधिकार मिल जाएगा कि वह उस व्यक्ति को भी आतंकवादी घोषित कर दे जिसके बारे में यह संदेह हो कि उसका कोई आतंकी संपर्क है. इस बिल के कानून बनने के पहले तक सिर्फ संगठनों को ‘आतंकी संगठन’ करार दिया जाता है. इस मौजूदा कानून में पहले से ही आतंकी गतिविधियों के लिए किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाने और उसे दंडित करने का प्रावधान है. इस संशोधन का मकसद है दानवी यूएपीए को और कठोर बनाना जो अभी भी सुधा भारद्वाज तथा अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है.

यह शर्मनाक है कि छह सांसदों (नेशनल कंफ्रेंस के हसनैन मसूदी, भाकपा के के. सुब्बारायण, माकपा के पीआर नटराजन और अब्दुल मजीद आरिफ तथा एआइएमआइएम के सैयद इम्तियाज जलील व असदुद्दीन ओवैसी) के अतिरिक्त लोक सभा के संपूर्ण विपक्ष ने घुटने टेकते हुए ऐसे दानवी संशोधन के पक्ष में वोट दिया.

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डीएनए प्रोफाइलिंग बिल: गोपनीयता का हनन

मोदी कैबिनेट ने डीएनए प्रोफाइलिंग बिल को मंजूरी दे दी है जिसे जनवरी 2019 में लोक सभा ने पारित तो कर दिया था, लेकिन जो राज्य सभा में समर्थन के अभाव में निरस्त हो गया था. इस नये मसविदा विधेयक में राष्ट्रीय डीएनए डाटा बैंक और आंचलिक डीएनए डाटा बैंक बनाने की बात कही गई हैइस बिल में यह भी सोचा गया है कि हर डाटा बैंक में कई किस्म की सूचनाएं रखी जाएंगी, जैसे कि अपराध सूचकांक, संदिग्ध या विचाराधीन (अंडर ट्रायल) व्यक्ति सूचकांक, गुमशुदा व्यक्ति सूचकांक और अज्ञात मृतक सूचकांक, आदिइस विधेयक में डीएनए नियामक बोर्ड गठित करने का भी प्रावधान है. किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के लिए डीएनए नमूनों का विश्लेषण करने वाली हर प्रयोगशाला को इस बोर्ड से मान्यता लेनी होगी.

इस बिल के अंतर्गत, किसी व्यक्ति से डीएनए नमूना हासिल करने हेतु उसकी लिखित सहमति लेना अनिवार्य होगा, लेकिन उन लोगों से यह सहमति लेना जरूरी नहीं होगा जिन्हें अपने अपराध के लिए सात वर्ष से ज्यादा की जेल अथवा मौत की सजा मिली हो. यह भारतीय नागरिकों की गोपनीयता और शारीरिक प्रतिष्ठा का स्पष्ट उल्ल्ंघन है. पिछले कई वर्षों से मोदी सरकार कुछ खास किस्म के अपराधों के आरोपियों को दोषी मान लेने और उन्हें मानवाधिकारों के अयोग्य समझ लेने की कार्रवाई कर रही है.

सूचना अधिकार अधिनियम को नाकारगर करना

सूचना अधिकार कानून में प्रस्तावित संशोधनों को लोक सभा में पेश किया जा चुका है. इन संशोधनों के जरिये सूचना अधिकार की मूल भावना को ही शिथिल और विकृत करने का प्रयास किया जा रहा है. यहां हम ‘जनता के सूचना अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान’ के बयान को विस्तार से प्रस्तुत कर रहे हैं:

“यह गहरी चिंता का विषय है कि सूचनाधिकार कानून में ये संशोधन बिलकुल गुपचुप तरीके से और केंद्र सरकार की पूर्व-विधाई परामर्श नीति का खुला उल्लंघन करते हुए लागू कर दिए गए, क्योंकि यह नीति मसविदा विधेयकों के सार्वजनिक खुलासे और परामर्श को अनिवार्य बनाती है. इन संशोधनों को अ-लोकतांत्रिक तरीके से लागू करने के चलते इनके विषय-वस्तु सांसदों, नागरिकों और मीडिया को तबतक पता नहीं चल सके, जबतक कि उसे पेश किए जाने के ठीक पहले ये मसविदा संशोधन लोक सभा सदस्यों के बीच विताति नहीं कर दिए गए.

इस बिल के जरिये सूचनाधिकार कानून में संशोधन कर केंद्र सरकार को यह अधिकार दे दिया जाएगा कि वह केंद्र व राज्यों में सूचना आयुक्तों के सेवा-काल, वेतन, भत्ते तथा अन्य सेवा-शर्तों को एकतरफा तौर पर निर्धारित कर सके. अपने मौजूदा स्वरूप में सूचनाधिकार कानून के अंतर्गत सूचना आयुक्तों के लिए 5 वर्ष का सेवा काल (65 वर्ष से ज्यादा आयु नहीं) निर्धारित है. इसके अलावा, केंद्रीय सूचना आयोग के अध्यक्ष के वेतन, भत्ता और अन्य सेवा शर्तें वहीं हैं जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त के होते हैं. यह मौजूदा कानून के बुनियादी ढांचे का अंग है, और इसीलिए इन प्रावधानों में कोई भी संशोधन सूचनाधिकार कानून के बुनियादी ढांचे को ही नष्ट कर देगा.

यह कानून बनाने के दौरान ही सूचना आयुक्तों की हैसियत के बारे में, यहां तक कि स्थायी समिति में भी, विस्तार के साथ चर्चा कर ली गई थी. वस्तुतः, स्थायी समिति का मत था कि, “सूचना आयोग इस कानून के अंतर्गत एक महत्चपूर्ण निर्मिति है जो इस कानून की प्रशंसनीय योजना को लागू करेगा. ... इसीलिए, यह सुनिश्चित करना होगा कि यह आयोग पूर्ण स्वतंत्रता व स्वायत्तता के साथ काम कर सके.”

समिति ने अनुशंसा की थी कि इस मकसद को पाने के लिए यह उचित होगा कि केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों को क्रमशः मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की हैसियत प्रदान की जाए. समिति की इस सिफारिश को स्वीकार किया गया और सार्वजनिक व संसदीय मशविरों की विस्तृत प्रक्रिया के जरिये संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया था.

इसे उच्च हैसियत प्रदान करने और संवैधानिक निकायों के उच्च-पदस्थ कार्यकारियों के समतुल्य मानते हुए इसकी सेवा शर्तों की हिफाजत करने का उसूल केंद्रीय निगरानी आयोग और लोकपाल समेत स्वतंत्र वैधानिक निगरानी निकायों के लिए अक्सरहा अपनाया जाता रहा है.

इन आयोगों के कार्य-संचालन को शासित करने में कार्यपालिका को समर्थ बनाने से सूचना आयोगों की संस्था ही बुनियादी तौर पर कमजोर हो जाएगी, क्योंकि इससे उनकी स्वतंत्र ढंग से काम करने की क्षमता प्रभावित होगी. ये सूचना आयोग संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार के बतौर मान्य सूचना हासिल करने के दावे पर निर्णय देने वाले अंतिम प्राधिकार हैं. सूचना अधिकार कानून के अंतर्गत इन आयोगों को स्वायत्त हैसियत देकर उन्हें स्वतंत्र ढंग से काम करने में समर्थ बनाया गया है, ताकि उच्चतम प्राधिकार को भी कानून के प्रावधानों का अनुपालन करने को बाध्य किया जा सके. इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा राज्य सूचना आयोगों के आयुक्तों के सेवा काल, वेतन व भत्ते निर्धाारित करने का अधिकार हड़पने से संघवाद के प्रमुख मुद्दों पर ही सवाल खड़ा हो जाता है; और यह केंद्र सरकार द्वारा निर्णय लेने की केंद्रीकृत व अ-लोकतांत्रिक पद्धति का ही जारी संकेत है.

बयान में आगे कहा गया है:

ढेर सारे ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिनपर सरकार को फौरन ध्यान देना जरूरी है ताकि सूचनाधिकार कानून के असरदार क्रियान्वयन को सूनिश्चित किया जा सके, और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के उच्चतर मानदंड को स्थापित किया जा सके. इनमें ये बातें शामिल हैं -

– सूचना आयोगों में रिक्तियों को भरने के लिए कालबद्ध और परदर्शी तरीके से नियुक्तियां की जाएं,
– सूचना चाहने वालों पर हमलों के मुद्दे पर कार्रवाई करना – देश भर में सूचनाधिकार का इस्तेमाल करने वाले 80 से ज्यादा लोगों की हत्या हो चुकी है.
– व्हिस्ल ब्लोअर सुरक्षा कानून पर अमल करना
– सूचनाधिकार कानून की धारा-4 के कमजोर अमल पर ध्यान देना ताकि सूचनाओं के त्वरित खुलासे की अनिवार्यता को मजबूत बनाया जा सके, इस चीज का अभाव वास्तव में सरकार की कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण नीतियों (जैसे कि नोटबंदी) के मामले में महसूस किया गया है,
– चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता के पूर्ण अभाव पर ध्यान देनायह बात समझ से परे है कि सरकार उन मुद्दों पर ध्यान नहीं दे रही है जो अभी जनता के सूचनाधिकार को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं, बल्कि इसके बजाय एनडीए सरकार ने सूचनाधिकार कानून के अधीन निर्णयकारी प्राधिकारों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट करने के तौर-तरीके खोजने में लगी हुई है. यह ताजा विधायी कदम इस देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर बनाने की सरकार की चारित्रिक मंशा का ही एक और उदाहरण है.

वर्ष28
अंक34