कोलकाता में ‘एकजुट हो मुकाबला करो’ जन कन्वेंशन

कोलकाता में 30 जुलाई 2019 को ‘एकजुट हो, मुकाबला करो’ जन कन्वेंशन में ‘हम साम्प्रदायिक फासीवादी आरएसएस को पश्चिम बंगाल और भारत को बरबाद नहीं करने देंगे’ के संकल्प के साथ हजारों हजार लोग पहुंचे. यह कन्वेंशन भाकपा(माले) के 50 वर्ष पूरे होने और कामरेड चारु मजुमदार की शतवार्षिकी के अवसर पर आयोजित किया गया था.

पश्चिम बंगाल रोज ही नई-नई साम्प्रदायिक घटनाओं के साथ भाजपा और आरएसएस के अनिष्टकारी उभार को देख रहा है. अभी पिछले चुनावों में भाजपा के कार्यकर्ताओं ने बंगाल के प्रतिष्ठित समाज सुधारक और शिक्षक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति को तोड़ दिया था. बंगाल में प्रगतिशील सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों की विरासत के प्रति भाजपा का बैर इस घटना में खुल कर दिखाई दिया था. इसी पृष्ठभूमि में दृढ़ निश्चय को दिखाता यह जोशीला जन कन्वेंशन वाम प्रतिरोध को सशक्त करने की अदम्य भावना से ओत प्रोत था.

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भाकपा(माले) की ओर से कामरेड अभिजित मजुमदार, राजाराम सिंह और कविता कृष्णन ने कन्वेंशन के भागीदारों और अतिथियों का स्वागत किया. इससे पहले कामरेड सलीम ने स्वाधीनता संग्राम, कम्युनिस्ट आन्दोलन, भाकपा(माले) – खासकर नक्सलबाड़ी – के शहीदों और विभिन्न जन संहारों, आपदाओं एवं हत्याकांडों में मारे गये लोगों की याद में एक शोक प्रस्ताव प्रस्तुत किया और सभी ने दो मिनट का मौन रख कर उन्हें श्रद्धांजलि दी.

तदुपरान्त कई भाषाओं में पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, आन्ध्र प्रदेश और असम आदि राज्यों की सांस्कृतिक टीमों ने ‘मुक्त होबे प्रिय मातृभूमि’ का गायन किया. यह गीत नक्सलबाड़ी आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों के सर्वप्रिय गीतों में से एक रहा है, और सत्तर के दशक में जब युवाओं को भारी संख्या में सलाखों के पीछे कर दिया गया था उस समय जेल की दीवारों पर इस गीत की पंक्तियां उकेरी हुई अक्सर दिखाई देती थीं. ‘महान भारत की जनता महान/ जनता का होगा ही भारत’ लाइनों को सुन कर नेताजी स्टेडियम में आये हजारों लोग भाव विह्वल हो एक साथ लाल झण्डा लहरा रहे थे. मानो सभी एक विशाल लहराते लाल समुद्र के बीच में खड़े हैं.

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आज के दौर में बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक सवालों पर कन्वेंशन में 16 प्रस्तावों को पेश किया गया और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पूरे सदन ने उन पर स्वीकृति दी. इसके बाद प्रसिद्ध गायिका पूरबी मुखर्जी ने पाॅल राॅब्सन और भूपेन हजारिका की याद में क्रमशः ‘ओल’ मैन रिवर’ और ‘विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार... ओ गंगा बहती हो क्यों’ का गायन किया. इसके बाद उन्होंने लोकप्रिय जनगीत ‘उट्ठा है तूफान जमाना बदल रहा’ गीत को पूरे आवेग के साथ प्रस्तुत किया जिसके दौरान पूरे स्टेडियम में लाल झंडे लहराते रहे और उपस्थित लोग भी उनकी लाइनें दुहरा रहे थे.

भाकपा(माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि ‘हम देश के सभी कोनों से आज यहां एकत्र हुए हैं. हम अलग अलग भाषाएं बोलते हैं. हमार धर्म भी अलग अलग हैं. हमारा पहनावा भी अलग है. भोजन भी तरह तरह का है. यही विविधता हमारी सामूहिक पहचान है और इस पर हमें गर्व हैं. हम किसी भी संगठन को, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, अथवा किसी भी सरकार को चाहे वह कितनी भी ताकतवर हो, यह तय करने की इजाजत नहीं दे सकते कि हम क्या भाषा बोलें, कैसा हमारा पहनावा हो, कैसा खाना खायें, और कौन से नारे लगायें. हमारी एकता की जड़ें हमारी विविधता में हैं और एकरूपता व समरसता के नाम पर इस एकता को नष्ट करने की इजाजत किसी को नहीं है.’ उन्होंने आगे कहा कि ‘अपने मतान्तरों का सम्मान करते हुए हम अपनी विविधता का उत्सव मनाते हैं. वहीं संघ-भाजपा प्रतिष्ठान हमारे मतान्तरों की तौहीन कर और उन्हें विकृत रूप में पेश कर हमारे बीच पूर्वाग्रहों और नफरत की दीवारें खड़ी कर रहा है, भय और हिंसा का माहौल बना रहा है. अपने मतभेदों के बावजूद हम सब भारतीय एक बराबर हैं, सच्चाई तो यह है कि हमारे यही मतान्तर और विविधतायें हमारे सांस्कृतिक फलक को और अधिक विस्तृत बनाते हैं एवं हमारी एकता को और मजबूत करते हैं.’

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उन्होंने आगामी 72वें स्वतंत्रता दिवस का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘हम अपनी आजादी के आन्दोलन की महान विरासत से प्यार करते हैं तथा इस आजादी को सम्पूर्णता में सभी तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. साम्राज्यवादी गुलामी से आजादी के साथ ही हर तरह की सामाजिक गुलामी, उत्पीड़न और भेदभाव से भी आजाद होना जरूरी है. संविधान द्वारा भारत की जनता को दिया गया न्याय, स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे का वायदा किसी भी हालत में राज्य संरक्षित खाप पंचायतों और हत्यारी भीड़ों के हवाले नहीं होने देंगे’.

कामरेड दीपंकर ने कहा कि पश्चिम बंगाल प्रगतिशील मूल्यों और लोकतांत्रिक आन्दोलनों का गढ़ रहा है और यहां की जनता इस विरासत को नष्ट करने की भाजपा की कोशिशों को हर हाल में नाकाम कर देगी. ‘हमें पूरा भरोसा है कि बंगाल की लोकतंत्र पसंद प्रगतिशील जनता प्रदेश को साम्प्रदायिक नफरत, फासीवादी आतंक और गुन्डागर्दी की प्रयोगशाला हरगिज नहीं बनने देगी. बंगाल की वामपंथी शक्तियों के सामने त्रिपुरा का आखें खोल देने वाला अनुभव भी है, राज्य में चलाया जा रहा उपद्रव भी सब देख रहे हैं, इसके साथ पूरे देश में 2014 से तेज हुआ लोकतंत्र पर हमला तो हम सबके सामने है. पश्चिम बंगाल प्रगतिशील विचारों, साम्प्रदायिक सद्भाव और लोकतांत्रिक अधिकारों एवं समाज सुधारों के आन्दोलनों का हमेशा मजबूत गढ़ रहा है.’

उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि ‘भाकपा(माले) ने अपनी यात्रा इसी कलकत्ता शहर से शुरू की थी, और कामरेड चारु मजुमदार को पुलिस हिरासत में इसी शहर में मार दिया गया था. आज हमारी पार्टी 50 साल की हो चुकी है और हम कामरेड चारु मजुमदार की शतवार्षिकी मना रहे हैं. कोलकाता में हो रहे इस ऐतिहासिक जन कन्वेंशन के मंच से हम एक सच्चे लोकतांत्रिक, भेदभावहीन और संघीय भारत के लिए अपने संकल्प को दोहराते हैं और लोकतंत्र, सामाजिक न्याय एवं जनता के अधिकारों के लिए संघर्षरत सभी प्रकार की ताकतों को अपने पूर्ण सहयोग व समर्थन का वायदा करते हैं. आइये, एकजुट हों और प्रतिरोध को आगे बढ़ायें. जीत हमारी ही होगी’.

haldarकन्वेंशन में युवा मदरसा अध्यापक शाहरूफ हालदार, जिन पर पिछले दिनों एक लोकल ट्रेन में साम्प्रदायिक भीड़ ने हमला किया और उन्हें ‘जय श्री राम’ बोलने पर मजबूर किया था, ने भी सम्बोधित किया. शाहरूफ ने कहा कि वह भी उन अनेक मुसलमानों में से एक है, जिन पर देश भर में उन्मादी भीड़ों द्वारा केवल इसलिए हमले हो रहे हैं क्योंकि वे सर पर टोपी पहनते हैं और दाढ़ी है. उन्होंने कहा कि ऐसे साम्प्रदायिक आतंक के वातावरण में भी उन्हें पूरा विश्वास है कि आम हिन्दुओं और मुसलमानों की एकता अंत में जीतेगी.

 

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जानी मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने कहा कि संविधान और लोकतंत्र पर हमले बढ़ रहे हैं. भले ही संसद में विपक्ष कमजोर है और वह भ्रष्टाचार व दल बदल के बीच और ज्यादा कमजोर होता जा रहा है, जनता मुखर हो कर इस हमलों का विरोध कर रही है. उन्होंने आसनसोल के इमाम को याद किया जिनके बेटे को ‘जय श्री राम’ के नाम पर मार दिया गया था, फिर भी उन्होंने सभी से शांति और भाईचारा बनाये रखने की अपील की थी. उन्होंने कहा कि यह वही आरएसएस है जिसने आजादी की लड़ाई से गद्दारी की और ब्रिटिश सरकार के साथ मिल कर काम किया था. उन्होंने असम में नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) पर भाजपा की राजनीति की निन्दा करते हुए कहा कि एनआरसी को पूरे देश में फैलाने की योजना और नागरिकता संशोधन बिल साम्प्रदायिकता बढ़ाने और नागरिकों को साम्प्रदायिक आधार पर बांटने की एक गहरी साजिश है.

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लेखक एवं शोधकर्ता परंजय गुहा ठाकुरता ने भी कन्वेंशन को सम्बोधित किया और कहा कि मोदी-शाह के जमाने में भारतीय मीडिया पर भारी संकट छा गया है. सरकार से सवाल पूछने वालों, और विरोध की आवाजों को दबाया जा रहा है और मीडिया में आज वही टिक सकता है जो सरकार का पालतू बन कर काम करे.

कन्वेंशन में अरिन्दम सेन द्वारा लिखी पुस्तक ‘हिटलरशाही का उभार: मोदी के भारत से एक नजर’ के मलयालम संस्करण का तीस्ता सीतलवाड और परंजय गुहा ठाकुरता द्वारा विमोचन किया गया.

प्रोफेसर मारूना मुर्मू ने कहा कि मैला ढोने का काम दलितों के प्रति भारी अत्याचार है. उन्होंने आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा और बेदखली और जंगल पर उनके अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानूनों पर हमलों के लिए मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की.

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इस कन्वेंशन में स्वास्थ्य और मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. विनायक सेन, नाटककार चन्दन सेन, जंगल अधिकार कार्यकर्ता सुमन गोस्वामी, जादवपुर विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति अशोकनाथ बसु, कवि सव्यसाची देव, लेखक किन्नर राय, इन्स्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर शुभनील चौधरी, और थियेटर कार्यकर्ता तीर्थंकर समेत अन्य कई लोगों ने भागीदारी की. कन्वेंशन के अंतिम भाग में ‘हासा-भासा ओ अस्तित्व’ के अपने अधिकारों को बुलंद करते हुए आॅल बंगाल आदिवासी अधिकार विकास मंच के तत्वावधान में आदिवासी गीत-नृत्य की भव्य प्रस्तुति की गई. विभिन्न सांस्कृतिक टीमों द्वारा समवेत ‘हम होंगे कामयाब’ के गायन के साथ कन्वेंशन का समापन हुआ.

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वर्ष28
अंक34