विभाजन को लेकर मोदी सरकार की सनक आजादी आन्दोलन की विरासत और आजाद भारत की संवैधानिक परिकल्पना को क्षीण करती है


विभाजन से साम्प्रदायिक टकराव और नफरत की भावना को खारिज करने की सीख लें, न कि उसे बढ़ावा देने की

14 अगस्त 2021

अगर सचमुच हम भारत-पाकिस्तान विभाजन की विभीषिका से कुछ सीखना चाहते हैं तो हमें राष्ट्रवाद को धार्मिक पहचान से अलग करना होगा, और भारत की विविधता का सम्मान करना होगा. हमें विभाजन की त्रासदी से बने तीन देशों, पाकिस्तान, बंगलादेश और भारत के बीच दोस्ताना सम्बंधों को बढ़ावा देना होगा.

मोदी सरकार द्वारा 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस घोषित करना अविभाजित भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के गौरवपूर्ण इतिहास को विभाजन की त्रासदी तक सीमित और संकीर्ण करना, और विभाजन के घाव को एक स्थायी बीमारी बनाना है. ऐसा करना आजाद भारत को अपनी राह से भटका कर एक अंधी गली में धकेलने के समान है.

हम हर हाल में विभाजन की भयावहता को फिर से नहीं होने देना चाहेंगे. हमें पिछली गलतियों से सीखना होगा और आगे बढ़ना होगा. यही स्वतंत्र भारत की मूल भावना है और स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा एवं न्याय के स्तंम्भों पर टिके एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाजवादी गणतंत्र की संविधान की परिकल्पना इसी मूल भावना पर आधारित है. मोदी सरकार की आज की घोषणा भारतीय स्वतंत्रता की 74वीं वर्षगांठ पर इसी मूल भावना का अपमान कर उसे खारिज कर रही है.  

— दीपंकर भट्टाचार्य
महासचिव, भाकपा (माले) लिबरेशन