योगी राज की निर्लज्जता की कोई इंतिहा नही

सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से वसूली

लखनऊ प्रशासन ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान को रिकवरी के लिए 13 लोगों को रिकवरी सर्टिफिकेट और डिमांड नोटिस जारी किए हैं. सभी लोगों को एक सप्ताह के भीतर अतिरिक्त जुर्माना भरने को कहा गया है. वे उन 57 लोगों में से हैं जिन्हें पिछले साल19 दिसंबर को प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को लेकर 1.55 करोड़ रुपये की वसूली की नोटिस भेजी गई थी और 30 दिनों के भीतर जुर्माना भरने और ऐसा नहीं करने पर उनकी संपत्ति जब्त करने को कहा गया था.

इन 13 लोगों से 21.67 लाख रुपये का भुगतान करने को कहा गया है. इन नोटिसों में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों को हर्जाने से इतर अतिरिक्त 10 फीसदी की राशि एक सप्ताह के भीतर जमा करनी है. ऐसा नहीं करने पर जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी. इनमें ओसामा सिद्दीकी, मो. कलीम, मुख्तार अहमद, मो. जाकिर, मो. सलीम, मुबिन, वसीम, मो. शफीउद्दीन, महनुर चौधरी और हाफिजुर रहमान शामिल हैं.

लखनऊ प्रशासन ने वसूली के लिए इन प्रदर्शनकारियों के होर्डिंग लगा दिए थे, जिन पर इनकी तस्वीरें थी, और नाम-पते लिख हुए थे. हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसके लिए सरकार को फटकार लगाई थी. अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. मालूम हो कि 21 दिसंबर के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर कानपुर में जिन 21 लोगों को इसी तरह के नोटिस जारी किए गए थे. उनमें से छह लोगों ने सोमवार को ड्राफ्ट के जरिए 80 हजार रुपये की धनराशि जमा कर दी है.

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छात्र-युवा नेता भी गिरफ्तार किए गए

विगत 15 मार्च 2020 को लखनउफ पंलिस ने आइसा की उत्तर प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष नितिन राज, माले के युवा कार्यकर्ता अश्विनी यादव व कई अन्य युवाओं को गिरफ्तार कर लिया. उनकी गिरफ्तारी यह कहते हुए की गई कि वे घंटाघर पर दो माह से चल रहे महिलाओं के सीएए, एनआरसी, एनपीआर विरोधी आंदोलन के समर्थन में वहां मौजूद रहते हैं.

छात्र-युवा नेताओं की अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी व गंभीर आपराधिक धाराएं लगाकर जेल भेजने का प्रतिवाद करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ भवन पर 17 मार्च की योगी सरकार का पुतला दहन किया गया. इस मौके पर आइसा के प्रदेश अध्यक्ष शैलेश पासवान ने कहा कि सरकार को लोकतांत्रिक आंदोलन से भय सता रहा है. पूरे प्रदेश में आंदोलनकारियों का दमन व गिरफ्तारी की जा रही है.

इनौस के प्रदेश सचिव सुनील मौर्य ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वालों के होर्डिंग चौराहों पर लगाने को निजता के अधिकार का उलंघन बताया. इसके बावजूद बेशर्मी की हद के परे जाकर अभी भी योगी सरकार ने लखनऊ में चस्पां किए पोस्टर नहीं हटाये. योगी सरकार का यह दोहरा मापदंड नही चलेगा.

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घंटाघर धरना पर पुलिस का हमला

लखनऊ स्थित घंटाघर पर बैठी महिलाओं को लगातार पुलिस-प्रशासन हटाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन महिलाएं हैं कि हटने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि एनपीआर और एनआरसी किसी भी कोरोना से ज्यादा ख़तरनाक है. लिहाजा वे कत्तई धरने से नहीं उठेंगी.

19 मार्च को घंटाघर पर धरने पर बैठी महिलाओं पर लखनऊ पुलिस गाज बनकर गिरी. खाकी वर्दीधारियों के झुंड ने अचानक हमला बोल दिया. जिसमें कई महिलाएं घायल हो गईं और कई को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है. तीन महिलाएं पुलिसिया दहशतगर्दी से अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ीं.

पुलिस ने महिलाओं के पेट पर लाठी, लात और घूसों से वार किया. इतना ही नहीं पुलिस धार्मिक ग्रंथ क़ुरान का भी अपमान करने से नहीं बाज आयी. पुलिस बर्बरता ढाने के पक्के इरादे के साथ ही वहां आयी थी. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमलावर पुलिस के जवानों की वर्दी पर नेम प्लेटें नहीं थीं और उसके जवान अपने चेहरों को रुमाल से ढके हुए थे. पुलिस ने बुजुर्ग महिलाओं तक को नहीं बख्शा. हमले के समय पूरे इलाके को रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने घेर रखा था

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भाकपा(माले) ने पुरजोर निंदा की

भाकपा(माले) की राज्य इकाई ने घंटाघर व अन्य जगहों से लखनऊ पुलिस द्वारा युवा नेताओं को गिरफ्तार करने की कड़ी निंदा की. पार्टी ने इसे योगी सरकार की अलोकतांत्रिक और दमनकारी कार्रवाई बताते हुए सभी की अविलंब बिना शर्त रिहाई की मांग की. पार्टी ने कहा कि यह योगी सरकार में जारी पुलिस राज का ही नतीजा है कि एक संविधान सम्मत और शांतिपूर्ण आंदोलन को लोकतांत्रिक समर्थन देना जुर्म हो गया है.

पार्टी ने कहा कि रिकवरी अध्यादेश 2020 जैसे ‘काले कानून’ को प्रदेश में लागू कर योगी सरकार न्यायपालिका का अपमान करने के साथ-साथ हर तरह के लोकतांत्रिक प्रतिवाद का दमन कर देना चाहती है. सामाजिक कार्यकर्ताओं से वसूली के लिए राजधानी के चौराहों पर लगे होर्डिंग हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद न हटाकर वह खुद की गैर-कानूनी कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए दिन-रात एक किए हुए है. लेकिन नागरिकों की ओर से प्रत्युत्तर मिलने पर उसकी बौखलाहट और दोरंगी नीति उजागर हो जाती है.

वर्ष - 29
अंक - 13
21-03-2020