यह बजट देश के बड़े कर चोरों को तीन साल बाद कर चोरी की माफी देता है. जबकि यह बजट रोजगार सृजन के बड़े क्षेत्रों को निराश करता है. महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का भी बजट में कोई जिक्र तक नहीं है. जबकि ग्रामीण गरीबों के लिए यह मनरेगा योजना आशा की अंतिम किरण है. कोरोना संकट के समय भूखे-प्यासे वापस गांव लौटे मजदूरों को भी इससे कुछ राहत मिली थी.

संसद में पेश केंद्रीय बजट 2021-22 को देश के साथ बड़ा धोखा है. यह देश के संसाधनों और खेती की नीलामी का देश बेचू बजट है. किसान आंदोलन जिन बड़े खतरों को चिन्हित कर रहा है, बजट भाषण ने उनकी पुष्टि ही की है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा पेश इस बजट में किसानों, खेती और देश के गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है. सभी आंकड़े और घोषणाएं पुरानी और देशवासियों की आंखों में धूल झौंकने वाली हैं. बजट में सरकारी सार्वजनिक संस्थानों और जमीन, सड़कों, रेल लाइनों, पुलों की बड़े पैमाने पर नीलामी का प्रावधान है. यहां तक कि रक्षा उद्योगों के निजीकरण के बाद अब सैनिक स्कूलों की भी नीलामी का प्रावधान सरकार ने कर दिया है.

किसान महासभा ने कहा कि कोरोना काल में आर्थिक पैकेज के नाम पर तीन काले कृषि बिलों की घोषणा करने वाली वित्त मंत्री इतने बड़े किसान आंदोलन के बाद भी बजट में इस पर चुप हैं. किसानों की आय दोगुनी करने और एमएसपी पर फसलों की खरीद जारी रखने की मौखिक घोषणा करने वाली सरकार के बजट में इसके लिए किसी वित्तीय प्रावधान की घोषणा नहीं है.

एमएसपी पर फसलों की सरकारी खरीद के लिए राज्यों को कैश क्रेडिट जारी रखने और एफसीआई के जरिये उसकी खरीद जारी रखने के बारे में भी यह बजट चुप है. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने भारतीय खाद्य निगम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ करने के लिए किसी प्रावधान का जिक्र तक नहीं किया. यह बजट डब्ल्यूटीओ के दबाव में अब बिजली और पानी के निजीकरण की वकालत करता है, जो देश की खेती और गरीबों पर नया आर्थिक हमला है. बजट प्रावधानों में सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर अब कारपोरेट बीमा कंपनियों के साथ ही विदेशी बीमा कंपनियों के रहमोकरम पर किसानों की किस्मत को छोड़ रही है.
– अखिल भारतीय किसान महासभा