-- प्रो. सुधा चौधरी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, ऐपवा

ऐपवा की वरिष्ठ नेता एवं पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष साथी श्रीलता उन कामरेडों  में से एक थीं जिन्होंने अपने जीवन को महिलाओं के सम्मानजनक व अधिकारपूर्ण जीवन जीने के लिए दुनिया भर में चल रहे संघर्ष के लिए समर्पित किया और ताउम्र पूरी निष्ठा, जीवंतता और प्रतिबद्धता के साथ सीखते हुए उस लड़ाई को लड़ती रहीं. कामरेड के जीवन, पार्टी कार्यक्रमों, संवाद, बहस में महिलाओं के मुद्दे प्रमुख रहते थे. पार्टी के भीतर और बाहर महिला विरोधी विचारों और पितृसतात्मक प्रवृतियों की पूरजोर खिलाफत करती रहीं. महिलाओं की राजनीतिक चेतना को बढ़ाने के लिए हर पार्टी कार्यक्रम में उनकी बढ-चढ़ कर भागीदारी हो, इसके लिए पार्टी कामरेडों को प्रेरित करती थीं. ऐपवा साथियों की बैठकों  में वह उनको सम्मान के साथ जीने व गलत का विरोध करने की समझदारी बनाने की कोशिश करती थीं. जब भी वे महिलाओं के किसी मुद्दे या सवाल को उठातीं तो अपने साथियों को साथ रखती थी ताकि वो सीख जायें कि आगे कैसे चलना है. प्रदेश भर में महिलाओं के साथ होनेवाले हर अपराध केलिए लड़ती रहीं. 4 सितम्बर, 1987 को राजस्थान के सीकर जिले में जब रूप कंवर नाम की राजपूत लड़की को सती के नाम पर पति की चिता के साथ जला दिया था तो कामरेड ने अन्य महिला-संगठनों एवं जनतांत्रिक प्रतिरोधी ताकतों के साथ मिलकर जबर्दस्त आन्दोलन चलाया और दोषियों को सजा देने के लिए विधानसभा मार्च निकाला. इसी तरह 1992 में सामाजिक कार्यकर्त्ता और महिलाओं की आजादी केलिए संघर्षशील साथिन भंवरी भटेर जब अपने गांव में बाल-विवाह रुकवाने गई तो उसके साथ उच्च जाति के लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया. तब श्रीलता ने भंवरी को न्याय दिलाने के लिए अन्य महिला संगठनों के साथ मिलकर प्रदेश भर में जुझारू आन्दोलन-प्रदर्शन किये और अपराधियों को जेल भिजवाया. 2003 में अजमेर जिले की बीसलपुर परियोजना में काम  करनेवाली मजदूर का उसके ठेकेदार द्वारा बलात्कार कर थ्रेसर से काट दिये जाने से हुई मौत के खिलाफ उन्होंने ऐपवा के अपने साथियों के साथ जयपुर तक आन्दोलन-धरना-घेराव किया और अपराधियों को सजा दिलवाई. उनके नेतृत्व में राजस्थान ऐपवा ने 10 वर्ष तक विधवा पेंशन संबंधी कानून में बदलाव (जिसमें बेटा यदि 20 वर्ष का है तो विधवा को पेंशन नहीं मिलेगी) हेतु विधानसभा के सामने कई बार प्रदर्शन-घेराव किया और सरकार को 20 वर्ष के बेटे की शर्त को हटाने के लिए बाध्य होना पड़ा. उन्होंने घर में काम करनेवाली महिलाओं के वेतन सम्बन्धी कानून बनाने की मांग को ऐपवा कार्यकर्माे का अभिन्न हिस्सा बनवाया. वे राज्य भर में महिलाओं के साथ किये जानेवाले हर तरह के भेदभाव के खिलाफ लड़ती रही. मनरेगा में पूरी व समान मजदूरी, कार्य स्थल पर होनेवाले यौन शोषण केलिए कड़ा संघर्ष किया. वे जिस इलाके में रहती थीं उसमें महिलाऐं ‘डायन’ जैसे अपराध की शिकार थीं जिसको खत्म करने के लिए उन्होंने ठोस कदम उठाये. उनका मानना था कि ‘डायन परिघटना’ महिला का  सामाजिक कत्ल है. जिसका दंश झेलने के लिए महिलाएं अभिशप्त हैं. डायन की घटना पर बात करते हुए हमेशा यह बात समझाने की कोशिश करती थीं कि इस विषमता पीड़ित तंत्र में धर्म  किस तरह कमजोर व्यक्ति, विशेष रूप से महिलाओं के उत्पीड़न का न केवल हथियार बनाता है बल्कि धर्म आधारित सोच किस तरह  मानसिक रूप से व्यक्ति को निहत्था व पंगु भी बनाता है और जिसके चलते उसकी आजादी के आन्दोलन में वैचारिक भटकाव का खतरा बढ जाता है. इसलिए वह साथियों के साथ बैठकों में उनके स्वयं के जीवन के  छोटे-छोटे उदाहरण से सदैव वैज्ञानिक समझदारी को बढ़ाने पर जोर देती थीं और यह बताने कि कोशिश करती थीं कि समाज में उनके साथ हो रहे भेदभाव व दमन के कारणों की पड़ताल एक समग्रतावादी नजरिये से ही की जा सकती  है. तभी हम हमारे आन्दोलन व साथियों के बीच यह बता पाएंगे कि दहेज हत्या, कन्या भ्रूण हत्या, सती, देवदासी जैसे अनगिनत सामाजिक अपराध एक दूसरे से अलग-थलग नहीं हैं, ये ‘रोग’ नहीं उसके ‘लक्षण’ हैं. रोग है मौजूदा  वर्गीय-पितृसतात्मक सामाजिक ढांचा. इस दृष्टि से ही महिलाएं इन अपराधों के  मूल में चल रहे  सत्ता-संघर्ष की शिनाख्त कर पाएंगी. इसलिए, जिस भी महिला को डायन बनाया जाता था, उसमें दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करती जिसके कारण इलाके में डायन जैसे सामाजिक व सामूहिक अपराध से महिलाएं काफी हद तक मुक्त हुई हैं. वे शराब पीने के सख्त खिलाफ थीं और इसे महिलाओं के साथ एक तरह का अपराध मानती थी. उन्होंने देखा कि पति शराब पी कर पत्नी को पीटता है, गाली-गलौज करता है, पैसे छीन लेता है. वे आदिवासी महिलाओं की तकलीफों के प्रति बहुत ही संवेदनशील थीं. प्रसव के समय इलाके की महिलाओं कीं चिकित्सकीय सहायता मिल पाने के अभाव को देखते हुए कामरेड श्रीलता ने स्वयं 2020 में दाई का प्रशिक्षण प्राप्त किया, उनके ईलाज केलिए होम्योपेथी का अध्ययन किया और उनके रोजगार के साधन बढाने के लिए दरी बनाने के लिए उनको हथकरघा प्रशिक्षण प्रदान किया.

श्रीलता ने अपना कार्य क्षेत्र मुख्यतः दक्षिण राजस्थान के सुदूर जनजातीय बहुल इलाके बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, चितौड़गढ़ जिलों को बनाया. इस क्षेत्र के तमाम किस्म के सवालों मसलन –  बंधुआ मजदूरी, विस्थापन, अधूरी मजदूरी, सामंती ज्यादतियां, पुलिस-प्रशासन की दबंगई, सांप्रदायिक भूमाफिया ताकतों का आतंक, इत्यादि को  पूरी दृढ़ता, साहस व जोश के साथ उठाया और उनके लिए  संघर्ष करते हुए अनेक बार जेल र्गइं. उनका घर घंटाली था जहां सड़क, बिजली, स्कूल जैसी बुनियादी जरूरतों का नामोनिशान न था. कच्ची सड़क व उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना, पहाड़ियों पर घर बनाकर रहना जहां पैदल चलकर ही पहुंचा जा सकता था, घुप्प अंधेरे में लालटेन की रोशनी में पढ़ना-पार्टी क्लास चलाना, स्वयं खाना बनाना, झाड़ू लगाना, बर्तन साफ करना, नदी से पीने का पानी लाना, मीटिंग के लिए दूर-दूर तक पैदल चलना, इत्यादि उनकी दिनचर्या के हिस्से थे. बातचीत के दौरान वे अपने शुरुआती दिनों के बारे में चर्चा करते हुए बताती थीं कि किस तरह से लोग उसके पास आने व मिलने से घबराते थे जिसके चलते काफी विरोध झेलना पड़ा. वे कहती थीं कि लोगों का विश्वास जीतने में हमें  20 वर्ष लग गये. धीरे-धीरे वे उनकी ऐसी ‘बहनजी’ बन र्गइं जो उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझती थीं. गांवों में सड़क बनवाने, बिजली का कनेक्शन करवाने, स्कूल खुलवाने के लिए उन्होंने अनेक पहल व प्रयास किये. प्रकृति प्रिय कामरेड हमेशा कहती थीं कि प्रकृति हमें बहुत सिखाती है क्योंकि उसका कोई स्वार्थ नहीं है. इन्सान तो अपने अनुभव ज्ञान को भी बिना स्वार्थ के किसी से साझा नहीं करता है.

सन 1985 में मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई. उनके आकर्षक और आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्तित्व को देख कर जीवन जीने का एक नया दर्शन मिल गया. रातभर पार्टी क्लास और उसमें हो रही बहस को जमीनी हकीकतों से जोड़ते हुए पार्टी लाईन पर चलने का उनका तरीका बेहद अनूठा एवं तार्किक था. वो हमेशा इस बात पर बल देती थीं कि विचार को पकड़ो, व्यक्ति पूजा पार्टी के जीवन के लिए घातक है. पार्टी साहित्य पढ़ो, उसे जीवन के साथ जोड़ते हुए अपनी समझदारी बनाओ. यही दृष्टि तुम्हें पार्टी में अपना योगदान देने की ऊर्जा देगी. हर परिस्थिति से सीखते हुए क्रांतिकारी मंजिल की तरफ आगे बढ़ो.

श्रीलता का नजरिया बेहद दार्शनिक दृष्टिकोण वाला रहता था. वे बौद्ध दर्शन से प्रभावित थीं. काफी सालों तक बौद्ध दर्शन की प्रयोगधर्मी रहीं. उनका मानना था कि बुद्ध ने किसी पाखंड व झूठ का सहारा नहीं लिया. बुद्ध जिन्दगी में जो चीज जैसी है वैसी समझने पर बल देते थे और उसकी द्वन्द्वात्मक प्रकृति को जानने की शिक्षा देते थे. उनकी सोच एवं सक्रियता का दायरा बहुत ही व्यापक था. इस समझदारी के चलते उनमें प्रतिकूलताओं से लड़ने की अलग सकारात्मक ऊर्जा थी. इस संबध में वह  मार्क्स और बुद्ध में काफी निकटता देखती थीं. पुस्तकें खरीदने, पढ़ने, पढ़े हुए का जीवन और पार्टी निर्माण में इस्तेमाल करने की उनकी कमाल की प्रतिभा थी. घंटाली और जयपुर दोनों जगह महत्वपूर्ण व हर तरह की पुस्तकों की बहुत ही समृद्ध लाइब्रेरी बनाई, जिसमें पार्टी के क्लासिक साहित्य से लेकर वर्तमान तक की महत्त्वपूर्ण रचनाओं का संग्रह मिलता है. उनकी रचनात्मक दुनिया का क्षितिज बहुआयामी था जिसका उपयोग वह पार्टी को आगे बढाने, कार्यक्रमों को सफल बनाने में करती थीं. 90 के दशक में जब अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ पार्टी का जयपुर की सड़कों पर प्रदर्शन हुआ तब उन्होंने महिला कामरेडों के साथ  मिलकर एक नुक्कड़ नाटक का अभ्यास व निर्देशन किया था. इसमें भाग लेने वाले सभी साथी उनके अभिनय कौशल से आश्चर्यचकित थे. नाटक में भी ‘साम्राज्यवाद और महिला आजादी के सवाल’ को  प्रमुखता से रखा. लेखन उनके कार्यकर्मों का अभिन्न हिस्सा था. उनका रचना संसार समसामयिक विषयों से लेकर क्लासिक मार्क्सवादी साहित्य तक विस्तारित था. धर्म, संस्कृति, द्वंद्ववाद, विवाह, परिवार, जाति, पितृसता, एनजीओ की क्रांति विरोधी भूमिका, भूमंडलीकरण और महिला, जैसे तमाम विषयों पर उनके आलेख मिलते हैं. राजनैतिक इच्छाशक्ति से भरपूर श्रीलता जैसा सोचती थीं वैसा ही वे करती थीं.साहस, उत्साह, निडरता, समझौताहीन संघर्ष एवं स्पष्टवादिता उनके स्वभाव की विशेषताएं थीं. उन्होंने पार्टी लाईन से न कभी समझौता किया और न कभी भटकीं. पार्टी निर्माण के काम या तय किए गये कार्यक्रमों को लागू करने में ढिलाई, एक-दूसरे की पीठ पीछे बुराई करना, अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए दूसरे के आचरण को हथियार बनाना, पार्टी का गलत इस्तेमाल करना जैसे वाम विरोधी मनोविज्ञान के वे सख्त खिलाफ थीं. इसके चलते उन्हें साथियों की  काफी नाराजगी व आलोचना का भी सामना करना पड़ता था. उनका हर प्रयास, अनुभव, ज्ञान, संबध, संवाद, बहस, बातचीत, संघर्ष का उपयोग साथियों को सिखाने, पार्टी बनाने, वैचारिक भटकाव को रोकने की भावना से ओतप्रोत रहता था. बच्चों से लेकर बड़ों तक वह  बेहद प्रिय थीं. उनके मन में तमाम उन लोगों और संघर्षों के प्रति अत्यंत सम्मान था जो  एक बेहतर भविष्य और दुनिया के निर्माण में मजबूती देते हैं. उनको देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आंदोलनों से काफी आशाएं थी. पार्टी साथियों के बारे में वे काफी सोचती थीं. उनका कहना था कि हर कार्यकर्ता एक पौधे की तरह है जिसकी सार-संभाल करते हुए सही दिशा में विकसित करने व वैचारिक रूप से समृद्ध करने की जिम्मेदारी पार्टी के वरिष्ठ साथियों की है. पिछले कुछ वर्षों से जब वे बीमारी के कारण बाहर नहीं जा पाती थीं तो ऊन की टोपियां बनाना सीखा. वे टोपियां बनाकर जरुरतमन्द साथियों को दिया करती थीं.

उनका यह जज्बा, जीवन दर्शन, ऊर्जा और संघर्ष पार्टी व ऐपवा को आगे बढाने में सदैव हमारा मार्गदर्शन करेगा. ऐसे अनुकरणीय साथी को लाल सलाम!