पश्चिम बंगाल में चुनाव नजदीक आ रहे हैं और भाजपा किसी भी कीमत पर चुनावी फायदा लेने के लिए निराशोन्मत्त प्रयास कर रही है. स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत और बंगाल में वाम जनवादी आन्दोलनों ने यहां प्रगतिशील और समावेशी माहौल पैदा किया है. भाजपा और आरएसएस बंगाल के इस वैविध्यपूर्ण सांस्कृतिक तानाबाना को नष्ट करने और अपने झूठे प्रचार के जरिये बंगाल के प्रतिष्ठित शख्सियतों को हड़पने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी ओर, जीवन व आजीविका, नागरिकता, स्वास्थ्य व शिक्षा, रोजगार व सामाजिक सुरक्षा जैसे जनता की अनेक मांगें हैं, जिनकी उपेक्षा की जा रही है.

2021 के आसन्न चुनावों में जनता की आवाज को बुलंद करने के लिए लंबे संघर्षों के दौरान उठाई गई मांगों को शामिल करते हुए ‘पश्चिम बंगाल के नागरिकों का मांगपत्र’ (जनता का मांगपत्र: 2021 के लिए आह्वान) सूत्रबद्ध किया गया है. इसे सूत्रबद्ध करने की प्रक्रिया में किसानों, मजदूरों, छात्रों व विभिन्न आन्दोलनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, कलाकारों, लेखकों, पर्यावरणविदों व बौद्धिक तबकों से भी मशविरा किया गया है.

यह क्रिया लगभग एक महीने तक चली और उसके आधार पर 8 फरवरी को कोलकाता युवा केंद्र ऑडिटोरियम में आयोजित ‘नागरिक कन्वेंशन’ में इसे अंतिम और आधिकारिक स्वरूप प्रदान किया गया. इस कन्वेंशन के आयोजकों में कुमार राणा, कौशिक सेन, दीपंकर भट्टाचार्य, मौसमी भौमिक, अमित भादुरी, तनिका सरकार, गौतम भद्र, मरूना मुर्मू, शमीम अहमद, नव दत्त, पुण्यव्रत गून आदि शामिल थे. इस मांगपत्र में जनता की विभिन्न बुनियादी मांगों के साथ-साथ सामाजिक न्याय व समान अधिकार, संघीय ढांचा, भाषा व संस्कृति का अधिकार आदि जैसे मुद्दे भी शामिल हैं. जिस दिन प्रधान मंत्री मोदी ने विरोध की आवाज को कुचलने की खातिर ‘आन्दोलनजीवी’ व ‘परजीवी’ कार्यकर्ताओं के खिलाफ हमला बोलने के लिए अपने गुर्गों को ललकारा था, उसी दिन कोलकाता में सैकड़ों प्रगतिशील नागरिकों ने इकट्ठा होकर जनता का मांगपत्र स्वीकार किया और भाजपा की फासीवादी मुहिम से बंगाल को बचाने का संकल्प लिया.

नैहट्टी अगिनवीणा सांस्कृतिक संस्था के संगीत कार्यक्रम के साथ इस कन्वेंशन की शुरूआत हुई. कुमार राणा ने आए तमाम लोगों का स्वागत किया और इस कन्वेंशन के मकसद पर संक्षिप्त चर्चा की. वरिष्ठ नेता सनत राॅयचौधरी ने किसान आन्दोलन के शहीदों और लाॅकडाउन, अमफन चक्रवात तथा उत्तराखंड विपदा में जान गंवाने वालों की स्मृति में शोक प्रस्ताव का पाठ किया. शमीम अहमद ने 10 प्रस्ताव पेश किए जिन्हें कन्वेंशन में शामिल लोगों ने गर्मजोशी से स्वीकार कर लिया. कन्वेंशन ने नए कृषि कानूनों, श्रम संहिताओं, एनआरसी-एनपीआर-सीएए, नई शिक्षा नीति आदि को वापस लेने की मांग उठाई. कन्वेंशन में सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण के खिलाफ और आरएसएस व भाजपा की सांप्रदायिक विभाजनकारी नीतियों और आन्दोलन के कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमें लादने के खिलाफ भी आवाज बुलंद की.

कन्वेंशन को संबोधित करते हुए भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने बताया कि भाजपा की बहुमतवादी व सांप्रदायिक नीतियां कैसे हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा बन गई हैं. उन्होंने बंगाल को प्रगतिशील मूल्यों और लोकतांत्रिक आन्दोलनों का गढ़ बताया और बंगाल में फासीवादी घुसपैठ के खिलाफ मजबूत एकताबद्ध प्रतिरोध निर्मित करने पर जोर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि हमें मौजूदा किसान आन्दोलन और बिहार में हुए हालिया चुनाव से भी सबक लेना चाहिए.

इन मांगों को बुलंद करते हुए, कन्वेंशन को समीरुल इस्लाम, मरूना मुर्मू, अलीक चक्रवर्ती, नव दत्त, हाफिज आलम सैरानी, पल्लव कीर्तनिया, कपिल कृष्ण ठाकुर, अभिजीत बसु, स्वपन गांगुली, अनुराधा देब, शरदेंदु उद्दीपन और अशोक विश्वनाथन आदि ने संबोधित किया. प्रख्यात समाज विज्ञानी पार्थ चट्टोपाध्याय ने इस पहलकदमी के साथ अपना एकजुटता संदेश भेजा था. कन्वेंशन के जरिये 21 फरवरी के दिन एस्प्लेनेड में एक बड़ी जन सभा करने का भी फैसला लिया गया.

इस आह्वान के संदेश को आगे ले जाते हुए दक्षिण बंगाल के अनेक स्थानों पर सभाएं और कन्वेंशन आयोजित कर अभियान चलाया गया. 13-18 फरवरी के बीच कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य ने भी हुगली, वर्धमान और नादिया जिलों की कई जगहों पर जन कन्वेंशनों को संबोधित किया.

21 फरवरी को, अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर, एस्प्लेनेड में बड़ी जन सभा आयोजित की गई. सुबोध मल्लिक चौक ओर हावड़ा से दो जुलूस निकाले गए जो जोशीले नारों व गीतों के साथ सुसज्जित सभा स्थल पर पहुंचे. इन जुलूसों और सभा में विभिन्न राजनीतिक और जन संगठनों, सांस्कृतिक संस्थाओं व नागरिक संगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कलाकारों, लेखकों आदि ने भी शिरकत की. प्रख्यात कलाकार और निर्देशक कौशिक सेन, भाकपा(माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य और निर्देशक व संपादक अर्जुन गौरीसरिया समेत वाम जनवादी आन्दोलन, ट्रेड यूनियन आन्दोलन और छात्र व ग्रामीण मजदूर आन्दोलन आदि के महत्वपूर्ण नेताओं ने इस सभा को संबोधित किया. इन वक्ताओं ने ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक पार्टी’ के सिद्धांत के आधार पर भारत की वैविध्यमूलक संस्कृति को नष्ट करने की भाजपा-संघ की कोशिशों को नाकाम कर देने का आह्वान किया. विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं के कलाकारों व गायकों ने जन संघर्षों के साथ एकजुटता दिखाते हुए अपने देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए कई गीत व नाटक पेश किए. ‘हम होंगे कामयाब’ के समवेत गान और जोरदार नारों के साथ सभा का समापन हुआ.

Bengal's struggle for public rights