बिहार राज्य विद्यालय रसोईया संघ (ऐक्टू) के बैनर तले राज्य की हजारों विद्यालय रसोइया बहनों ने सरकारी कर्मी घोषित करने, कोरेन्टाइन सेंटरों में काम के मेहनताने का भुगतान करने, मानदेय 21 हजार रुपये करने, मध्याह्न भोजन योजना को एनजीओ के हवाले करने पर रोक लगाने के साथ साथ मंहगाई रोकने, मजदूर-किसानों को गुलाम बनाने वाले 4 श्रम कोड व 3 कृषि कानून तथा 12 घण्टा कार्य आदेश रद्द करने की मांग पर 26 फरवरी 2021को बिहार विधानसभा के समक्ष (पटना के गर्दनीबाग में) प्रदर्शन किया.

यह प्रदर्शन विद्यालय रसोइया संघ अध्यक्ष सोहिला गुप्ता, महासचिव सरोज चौबे, सुनीता देवी, किरन देवी, मु. हैदर, विभा भारती, सावित्री देवी, सुधा रानी सिंह, परशुराम पाठक, माधुरी गुप्ता, दमयंती सिन्हा, राखी मेहता, पूनम देवी आदि के नेतृत्व ने निकला. प्रदर्शन में ऐपवा महासचिव मीना तिवारी, आल इंडिया स्कीम वर्कर्स पफेडरेशन की राष्ट्रीय संयोजक शशि यादव, ऐक्टू महासचिव आरएन ठाकुर, ऐक्टू नेता जितेंद्र कुमार, अनिता सिंहा व मूर्तजा अली भी शामिल थे. प्रदर्शन के जरिए 17 सूत्री मांग पत्र सरकार को सौंपा गया.

प्रदर्शन को संघ महासचिव सरोज चौबे, भाकपा(माले) विधायक दल के नेता महबूब आलम, विधायक सुदामा प्रसाद, वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता, संदीप सौराभ, मनोज मंजिल व गोपाल रविदास सहित ऐपवा, ऐक्टू व विद्यालय रसोइया संघ से जुड़े राज्यस्तरीय नेताओं ने संबोधित किया. नेताओं ने प्रदर्शन में शामिल रसोइयों को संबोधित करते हुए मोदी-नीतीश सरकार पर रसोइयों के मेहनताना की चोरी करने और गुलामों जैसा खटाने का गम्भीर आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी व राज्य की नीतीश सरकार रसोइयों से लगातार दो दशक से अधिक समय से सरकारी कर्मचारियों जैसा काम ले रही है लेकिन मानदेय के नाम पर केवल 1500 रूपए ही भुगतान करती है और वह भी 10 महीनों का ही. नेताओं ने मोदी सरकार को अडानी-अम्बानी सरीखे कारपोरेट-पूंजीपतियों की सरकार बताते हुए कहा कि एक तरफ लाॅक डाउन में बैंको का लाखों-करोड़ रुपये के डिफाॅल्टरों का कर्जा माफ कर दिया गया लेकिन दशकों से तुच्छ राशि पर गुलामों जैसे खटने को मजबूर विद्यालय रसोइयों के मानदेय में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की गई. कोरोना काल में कोरेन्टाइनसेंटरों में उनसे काम की मजदूरी का भी अभी तक समुचित भुगतान नहीं किया गया.

बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ (ऐक्टू) महासचिव सरोज चौबे ने कहा कि ‘कोरोना वारियर्स’ रसोइयों को न तो किसी प्रकार की सुविधा दी गई न ही मरने पर मुवावजा. पूरे देश में विद्यालयों का मर्जर किया रहा है और भोजन बनाने का काम एनजीओ को सौंपा जा रहा है. मृत रसोइयों के अनुग्रह अनुदान और रसोइयों की नई भर्ती पर भी रोक है.

Demonstration before the Assembly