13 अप्रैल, जलियांवाला बाग की वर्षगांठ पर

वर्ष - 30
अंक - 16
17-04-2021


–  तुहिन देब

13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग नृशंस हत्याकाण्ड के 102 वर्ष गुजर गए हैं. असंख्य स्वतंत्रत संग्रामी क्रांतिकारियों के बलिदान से मिली औपचारिक आजादी को भी 74 वर्ष पूरे हो गए हैं. यह भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करीब 100 वर्ष पूर्व की घटना के विश्लेषण का एक विनम्र प्रयास है.

प्रथम विश्व युद्ध और भारत

सन् 1914 के बीचोंबीच प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत होती है. दुनिया के बाजार पर कब्जे के लिए साम्राज्यवादी ताकतों के बीच की होड़ और आपसी छीना-झपटी ही विश्व युद्ध का कारण था. जर्मनी के खिलाफ ब्रिटेन द्वारा युद्ध की घोषणा करने के साथ ही भारत जैसे उसके उपनिवेश भी युद्ध की आग से बच नहीं सके थे.
इस युद्ध की चपेट में भारत स्वेच्छा से नहीं आया था. भारत पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शासन होने के कारण यहां की सेना को उनकी तरफ से युद्ध में लड़ना पड़ा था. बहरहाल, इस युद्ध में भारत का योगदान कुछ कम नहीं था. फ्रांस से लेकर चीन तक विस्तृत रणक्षेत्र में दस लाख से अधिक भारतीय सैनिक लड़े थे. प्रति दस घायल या मृत सैनिकों में एक भारतीय था. इस युद्ध में कुल 17 करोड़ 70 लाख पौंड का खर्च आया था और इससे भारत पर राष्ट्रीय ट्टण 30 प्रतिशत तक बढ़ गया था, जिसका पूरा बोझ भारत की आम जनता को वहन करना पड़ा था.

सन् 1914 के दिसंबर माह में आयोजित कांग्रेस के मद्रास महाधिवेशन में भारत सम्राट और ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी प्रदर्शित कर प्रस्ताव पारित किया गया. उस समय महात्मा गांधी गुजरात के खेड़ा में धूम-धूमकर प्रत्येक गांव से कम-से-कम 20 समर्थ पुरुषों को ब्रिटिश फौज में शामिल होने का आह्वान कर रहे थे. उन्होंने जनता के प्रति अपनी अपील को गौरवान्वित और महिमामंडित करने के उद्देश्य से “साम्राज्य और स्वराज के लिए त्याग करने” (Sacrifice for empire and swaraj) को कहा था .

अंग्रेजों का विश्वासघात

प्रथम विश्व युद्ध, जो 1914 से 1918 तक चला था, के अन्त में उत्पादन के क्षेत्र में बड़ी मंदी छा गई. कल-कारखाने बंद हो गए, लोगों का रोजगार छीनने लगा, चारों ओर औद्योगिक संकट अपने पंजे फैलाने लगा. ब्रिटिश सरकार ने टैक्स बढ़ा दिया. महंगाई बहुत बढ़ गई. ब्रिटिश साम्राज्य के अनुगत व्यापारियों की तो चांदी हो गई थी. गरीब जनता की हालत और अधिक खराब हो गई.

विश्व युद्ध की आग में जबरदस्ती झोंके जाने के कारण और युद्ध के दरम्यान असंख्य भारतीय सैनिकों की मौत ने देशवासियों को आक्रोशित कर दिया था. युद्ध से लौटकर आने वाले सैनिक पहले की तरह अपनी वफादारी ब्रिटिश सरकार के प्रति नहीं दिखा पाए. इधर तुर्की के प्रति ब्रिटिश साम्राज्य का रूख तथा खिलाफत आंदोलन के सवाल पर भारतीय मुसलमानों में भी अंग्रेजों के प्रति असंतोष फैलने लगा था.

इधर अंग्रेजों ने विश्व युद्ध के पूर्व भारतवासियों से किए गए सारे वायदे भुला दिए. उसने जनता के अंसतोष को दबाने के लिए प्रशासनिक सुधार के नाम से 1918 में ‘मान्टेग्यू-चेम्सफोर्ड’ प्रशासनिक सुधार कानून लाया. लेकिन यह असल में स्वायत्त शासन के नाम पर जनता को ठगा जा रहा था.

स्वायत्त शासन के नाम पर असली सत्ता अंग्रेजों के पास ही रहनी थी. लेकिन इस पहल के प्रति कांग्रेस में एक मोह था. गांधीजी ने इसे सीधे-सीधे नकारने की जगह सहानुभूति के साथ विवेचना करने को कहा था. इसके साथ ही साथ, तीव्र दमन-पीड़न चल रहा था. देशवासियों की अपेक्षा थी कि युद्ध के दरम्यान लागू “डिफेन्स आफ रियालम एक्ट” (Defence of Realm Act) या “डोरा” तथा “डिफेन्स आफ इंडिया एक्ट” (Defence of India Act) को युद्ध की समाप्ति के बाद वापस ले लिया जाएगा. मगर ऐसा हुआ नहीं. इन्हीं कानून को कठोरता से लागू करने के लिए ‘रौलेट एक्ट” लाया गया, जिससे लोग और भी क्रोधित हो गए. असल में, 1917 में रूस में सर्वहारा क्रान्ति के जरिए दुनिया का पहला समाजवादी देश सोवियत संघ अस्तित्व में आया था. अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति का प्रभाव दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों पर पड़ना शुरू हुआ.

“अंग्रेज, रूस की बोल्शेविक क्रान्ति से उठे तुफान से डरने लगे. ‘मान्टेग्यु-चेम्सफोर्ड’ की रिपोर्ट में कहा गया कि “रूस की बोल्शेविक क्रान्ति ने भारतवासियों के राजनैतिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया है.” ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग के तत्कालिन प्रमुख के. सिसिल ने कहा कि “इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रूस का बोल्शेविकवाद कई देशों के क्रान्तिकारी आन्दोलन को प्रभावित कर रहा है और भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन को तो विशेष रूप से प्रेरित कर रहा है.” इंग्लैंड के गृहसचिव मैकफार्सन को सौंपे अपने रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि “कई लोगों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की किसान सभा और बंगाल की रैयत सभा पूरी तरह बोल्शेविकपंथी हैं ... भारतवर्ष में क्रान्ति, लेनिन की चाहत है, लेकिन मुझे लगता है कि लेनिन चाहते हैं भारत में विक्षोभ आन्दोलन अपने स्वयं की गति से आगे बढ़े.”

ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में समाजवाद की अग्रगति से तथा भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन के तेज होने से परेशान था. इसलिए उसने प्रबल दरिद्रता के शिकार और निस्सहाय आक्रोशित जनता के खिलाफ कठोर दमन नीति का सहारा लिया. इसी समय गांधीजी ने सत्याग्रह का आह्वान किया.

सत्याग्रह और पंजाब

1918-19 में पंजाब में अनावृष्टि (सूखा पड़ने) से किसानों को बहुत नुकसान हुआ. विभिन्न क्षेत्रों में प्लेग बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया. 4-5 महीनों में इन्फुएंजा से भी बहुत से लोग मारे गए. साथ ही साथ, कई बहानों से ब्रिटिश सरकार अत्याचार तेज करते जा रही थी. 1913 में माइकल-ओ-डायर के पंजाब के गवर्नर नियुक्त होने के बाद अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था. माइकल-ओ-डायर ने पंजाब में लोकमान्य तिलक और विपिनचन्द्र पाल के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था. ‘न्यू इंडिया’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘इंडिपेंडेट’ सहित कई समाचारपत्रों के प्रसारण पर पंजाब में रोक लगा दिया. डायर ने गदर आन्दोलन का निर्मम दमन किया. इन अत्याचारों से पंजाब की जनता का आक्रोश कम होने के बजाय, बढ़ता ही गया. इसी आक्रोश की अभिव्यक्ति सत्याग्रह आन्दोलन में देखने को मिली.

गांधीजी के आह्वान पर पहले हड़ताल का दिन 30 मार्च 1919 को तय हुआ था. बाद में उसे बदलकर 6 अप्रैल कर दिया गया. पूरे भारत में वह समाचार न पहुंचने के कारण, कई जगहों पर जनता ने 30 मार्च को ही हड़ताल कर दिया. अमृतसर में 30 मार्च को पूरे शहर में हड़ताल थी. 35000 लोगों की एक विशाल आम सभा को लोकप्रिय नेता डाक्टर सैफुद्दिन किचलू ने सम्बोधित किया और जनता से शान्ति बनाए रखने की अपील की. पंजाब सरकार ने बदले की कार्यवाही करते हुए डा. सत्यपाल एवं डा. किचलू पर आम सभा में बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया.

6 अप्रैल 1919 को पूरे देश में हिन्दू-मुसलमान समेत तमाम समुदायों के लोगों ने एकजुट होकर हड़ताल को सफल बनाया. मजदूर-किसान सहित आम जनता ने बड़े जोशोखरोश से सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया. आम हड़ताल से पंजाब का जनजीवन थम-सा गया. बैरिस्टर बदरूल इस्लाम खां की अध्यक्षता में अमृतसर में 50000 लोगों की बड़ी आम सभा आयोजित हुई. जनता स्वतःस्फूर्त रूप से और शांतिपूर्ण तरीके से आन्दोलन में भाग ले रही थी. राष्ट्रीय चेतना के इस नवजागरण से माइकल आ डायर बहुत परेशान हो गया तथा पंजाब के लोगों को सबक सिखाने के लिए मौका ढूंढने लगा.

हड़ताल के दिन देश के विभिन्न स्थानों पर आन्दोलनकारियों के साथ पुलिस की झड़प हुई. दिल्ली में पुलिस फायरिंग से हिन्दू-मुसलमान दोनों सम्प्रदाय के लोग हताहत हुए. फायरिंग की खबर सुनकर गांधीजी दिल्ली की ओर रवाना हुए, मगर उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार कर मुम्बई भेज दिया गया. गांधीजी की गिरफ्तारी के समाचार से जनता उद्वेलित हो उठी. आन्दोलनरत जनता पर पुलिस ने निर्मम लाठी-चार्ज किया.

अशान्त पंजाब

आन्दोलन क्रमशः तेज होने लगा. गांधीजी समझ गए कि उनके अहिंसक सत्याग्रह की लगाम अब उनके हाथ से निकलती जा रही है. अचानक ही उन्होंने तीव्र जन आन्दोलन के ज्वार को रोकने के लिए सत्याग्रह स्थगित करने की घोषणा की. लेकिन जिस तरह वेगवान नदी के जल को रोकना बहुत मुश्किल होता है, उसी तरह तीव्र जन आन्दोलन को रोकना और भी तकलीफदेह हो जाता है. आन्दोलन की तीव्रता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिना किसी अपराध के लोकप्रिय जननेता डा. सत्यपाल और डा. किचलू को गिरफ्तार करने के आदेश के खिलाफ विद्यार्थियों समेत अमृतसर की जनता ने प्रबल प्रतिरोध किया. पुलिस ने विद्यार्थियों के शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर गोलियां चलाई. जनता ने अपने नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर के घर के सामने धरना-प्रदर्शन के लिए जुलूस निकाला. उस जुलूस पर भी पुलिस ने गोलियां चलाई. तब जनता का धैर्य चूक गया और शान्तिपूर्ण जनता उत्तेजित होकर रेल पटरियों को उखाड़ने लगी, टेलीग्राफ के तार काटने लगी तथा बैंक सहित कई सरकार कार्यालयों को आग में भस्म कर दिया.

अमृतसर में हवाई जहाज से सेना ने आंदोलनकारियों पर बम फेंके तथा मशीनगन से गोलियों की बौछार की. इससे कई लोग हताहत हुए, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य अमृतसर की जनता को डरा नहीं सका. अमृतसर में फौज उतारी गई. जालंधर फौजी छावनी से एक ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को अमृतसर भेजा गया. उस समय शहर में फौज हर घर में घुसकर तलाशी ले रही थी, जिसे चाहे गिरफ्तार कर रही थी, यातनाएं दे रही थी. अमृतसर पूरी तरह एक फौजी छावनी बन चुका था. फौज ने महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा.

11 अप्रेल 1919 की दोपहर को पंजाब चैम्बर ऑफ काॅमर्स के डिप्टी चेयरमैन लाला गिरधारी लाल कपूर कानपुर से कलकत्ता मेल में अमृतसर पहुंचे. उन्होंने देखा कि स्टेशन पर कहीं कोई कुली नहीं है, कोई यात्री नहीं है. चारों तरफ सिर्फ फौज और पुलिस के सिपाही रेलवे स्टेशन और पटरियों पर पहरा दे रहे हैं. लालाजी बड़ी मुश्किल से फुट ओवरब्रिज तक पहुंचे. वहां भी देखा तो अंग्रेज सिपाहियों का कड़ा पहरा था. वे किसी भी व्यक्ति की पूरी तलाशी लिए बिना शहर में घुसने नहीं दे रहे थे. शहर के बाहरी ओर हर रास्ते हर मोड़ पर रायफल और संगीन लिए फौज और पुलिस तैनात थी. पूरा शहर एक युद्ध क्षेत्र लग रहा था. पूरे अमृतसर में पानी और बिजली की आपूर्ति बन्द कर दी गई थी. ऐसी परिस्थिति में 1919 के 13 अपैल को वह खूनी शाम आई.

खून से सना जलियांवाला बाग

13 अप्रैल 1919 की सुबह जनरल डायर ने सभा-समावेश पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन प्रतिबंध का समाचार कई क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाया. विशेष रूप से शहर के केन्द्र स्थल, स्वर्ण मंदिर क्षेत्र के लोगों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. वह दिन रविवार था, साथ में बैशाखी का दिन था. पंजाब में वैशाखी का त्योहार नई फसल की खुशी में जोरशोर से मनाया जाता है. इस दिन प्रदेश के हर जगह से किसान आकर बड़े शहरों में जुटते हैं. सिक्खों के लिए यह वह पवित्र दिन है जब खालसा का जन्म हुआ था. इसीलिए उस दिन स्वर्ण मंदिर और उसके आसपास कितने लोग इकट्ठे हुए थे, उसका हिसाब नहीं है. बहुत सारे तो स्वर्ण मंदिर के पवित्र सरोवर में डूबकी लगाने आए थे.

उस दिन जलियांवाला बाग में हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख, शिशु-वृद्ध-महिला, समाज के सभी समुदाय और उम्र के लोग हाजिर थे. त्योहार मनाने वाली जनता और आम सभा में भाग लेने वाली जनता दोनों एकाकार हो गई थी. उस दिन बीस हजार से अधिक लोग आम सभा में उपस्थित थे, जिनमें से अधिकांश को प्रतिबंध के बारे में जानकारी नहीं थी. उस दिन प्रतिरोध सभा में कोई प्रसिद्ध नेता उपस्थित नहीं था. मंच पर केवल डा. किचलू का चित्र शोभायमान था.

अपराह्न 4 बजे जनरल डायर नब्बे रायफलधारी फौजियों को लेकर मार्च करते हुए जलियांवाला बाग की ओर बढ़ने लगा. दो हथियाबन्द गाड़ियां भी उसके साथ थी. बड़ी सड़क को छोड़कर एक पगडंडी होकर वे बाग की ओर बढ़ने लगे. बाद में जब उन्हें पूछा गया कि “आप क्यों तेजी से नहीं बढ़े”. उनका जवाब था, “उस समय बहुत गर्मी पड़ रही थी”. शाम को 5 बजे के कुछ देर बाद वे जलियांवाला बाग पहुंचे. असल में जनरल डायर चाहता था कि बाग लोगों से पूरी तरह भर जाए. फौज के वहां पहुंचने से पहले एक हेलीकाॅप्टर बाग के ऊपर कुछ देर तक चक्कर लगाता रहा. फिर चला गया.

जनरल डायर बाग में पहुंचकर प्रवेश करने के बाद ऊंचे रास्ते पर खड़ा हो गया. बाग के उत्तरी दिशा की ऊंची जमीन पर अपने दांयी ओर 25 और बांयी ओर 25 सैनिकों को तैनात कर दिया. घटना की जांच के लिए ब्रिटिश सरकार ने लार्ड हन्टर की अगुवाई में एक जांच आयोग बैठाया था. इस आयोग के समक्ष जनरल डायर ने जो बयान दिया उससे हम उनके मनोभाव को समझ सकते हैं.

लार्ड हन्टर का सवाल था, “आप जब बाग में पहुंचे तो आपने क्या किया”?
जनरल डायर का जवाब था, “मैंने सीधे गोली चलाने का आदेश दिया”.

“तुरन्त”?

“हां, तुरन्त. मैंने पहले थोड़ा सोचा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने सोचने में अपना कर्तव्य तय करने में 30 सेकेन्ड से अधिक का समय लिया”.

“क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि गोली चालन से पूर्व आपको जनता को उस स्थान से चले जाने के लिए चेतावनी देना था”?

“नहीं. मैंने जनता को ऐसा कुछ नहीं कहा. मैंने सिर्फ सोचा था कि इन्होंने मेरे आदेश को नहीं माना. इन्होंने सैनिक कानून का उल्लंघन किया है, इसलिए मेरा कर्तव्य है कि अभी इन पर रायफल से सारी गोलियां दाग दूं”.

“आपके गोली चालन का उद्देश्य क्या सिर्फ जनता को तितर-बितर करना था”?

“नहीं महाशय, मैंने सोचा था कि जब तक ये लोग एकदम से हट नहीं जाते तब तक गोलियां चलाई जाए”.

“जब आपने देखा कि जनता क्रमशः भीड़ में से निकलकर भागने लगी तब आपने गोली चलाना बन्द क्यों नहीं किया”?

“मैंने सोचा, जब तक सारे लोग बाग से हट न जाएं तब तक गोलियां चलाते रहूं. यदि मैं कम गोलियां चलाता तो भी गोली चालन को जो आरोप मेरे ऊपर है, वह तो लगता ही”

असल में जनरल डायर बड़े पैमाने पर जनसंहार करना ही चाह रहा था. पहले गोलियां पैरों पर अधिक चल रही थी, जिसके फलस्वरूप लोग घायल ज्यादा हो रहे थे, मर कम रहे थे. जनरल डायर ने सैनिकों को डांटा, “ये क्या हो रहा है? पैरेां को निशाना बनाकर गोलियां क्यों चला रहे हो? इससे तो सब घायल होंगे, मरेंगे कितने? जहां भीड़ ज्यादा है, वहीं गोलियां चलाओं. जहां से लोग भागने की कोशिश कर रहे हैं वहां सही निशाने पर गोलियां चलाओ. जहां लोग जमीन पर लेटे हुए हैं, उन सबको गोलियों से भून डालो.”

करीब दस मिनट तक गोलियां चली. कुल मिलाकर 1650 राउंड गोलियां चली. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए. करीब 1200 लोग घायल हुए. जलियांवाला बाग के अन्दर पर परित्यक्त कुंआ था. जान बचाने के लिए कई लोग उसमें कूद गए थे. अगले दिन उस कुंए से 10-12 शव निकाले गए. कुछ दिनों बाद जब संड़ांध फैलने लगी और लोग परेशान हो गए. तब कुंए से करीब 100 शव और निकाले गए. कत्लेआम के बाद जलियांवाला बाग के चारों ओर रात के अंधेरे में सिर्फ हाहाकार, दर्द से कराहने की आवाज और कुत्तों का चिल्लाना सुनाई पड़ता रहा. एक बूंद पानी के लिए लोगों ने तड़पते हुए अपनी जान दी. कर्फ्यु के कारण घायलों को अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका. माताएं अपने घायल बच्चों को सीने से लगाए पूरी रात पानी के लिए रोती-बिलखती रहीं.

(अगले अंक में जारी)