वर्ष - 30
अंक - 17
24-04-2021

 

बांग्ला साहित्य का एक युग अचानक ख़त्म हो गया. कोरोना महामारी एक मूर्धन्य साहित्यकार को निगल गई. वे बांग्ला साहित्य में एक नक्षत्र की तरह थे जिसके टूटने से पूरी बांग्ला साहित्य बिरादरी सकते में है.

शंख घोष के रक्त में विप्लव इस तरह घुला-मिला था कि उन्हें उनकी रचनाओं से अलग करने का मतलब उनकी आत्मा को छीन लेने जैसा ही था. उनकी रचनाएं सिर्फ नवीन ही नहीं वरिष्ठ साहित्यकारों को भी प्रेरणा देती हैं. सबको उनके साहित्य से एक ऊर्जा मिलती थी.

उनका जन्म बंटवारे से पहले के पूर्वी बंगाल यानि आज के बांग्लादेश के चांदपुर में 5 फरवरी सन् 1932 को हुआ था. उन्होंने अपनी बाल्यवस्था की पढ़ाई पाबना में की और भारत आने पर कोलकाता के प्रेसिडेंसी काॅलेज से बांग्ला भाषा व साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की. आगे चलकर उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की. उसके उपरांत उन्होंने अध्यापन को ही अपने पेशे के रूप में चुना और सियालदह के बंगबासी कोलिन काॅलेज, फिर सिटी काॅलेज और जादबपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किया. उनका असली नाम चित्तप्रिय घोष है और शंख घोष उनका छद्मनाम है जिस नाम से उन्होंने कई रचनाएं की. उनके पिता का नाम मनींद्र कुमार घोष और माता का नाम अमलाबाला था.

उन्हें उनके काव्य ग्रन्थ ‘बाबर की प्रार्थना’ के लिए 1977 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ. उन्हें 1977 में ही नरसिंह दास पुरस्कार मिला. वे रबीन्द्र पुरस्कार (1989 में) व सरस्वती सम्मान से भी सम्मानित हुए. 1999 में पुनः उन्हें अनुवाद के लिए साहित्य अकादमी सम्मान मिला. 2011 में वे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों पद्मभूषण से सम्मानित हुए.

उनकी रचनाओं में हमें उनकी राजनैतिक चेतना मुखर रुप में देखने को मिलती हैं. भारत की केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध भी उन्होंने कलम चलाई. उनकी कविता माटी (नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ) हाल के दिनों में काफी चर्चित रही. उन्हें इस बिल पर गहरी आपत्ति थी.

उन्होंने बच्चों के लिए भी रचनाएं की. वे रवींद्रनाथ के साहित्य के गहरे ज्ञाता थे. उनका रवींद्रनाथ पर एक महत्वपूर्ण रिसर्च रहा. उन्हें रवींद्रनाथ के विषय मे पारंगत होने की वजह से प्रसिद्धि भी हासिल थी.

उनका काव्य जितना उत्कृष्ठ था, उतना ही उनका गद्य भी. उनमें भी विशेषकर प्रबन्ध (आलेख), भ्रमण वृतांत, स्मृति लेख, अंतरंग विश्लेषण और आलोचना.

उनके विशेष काव्य ग्रंथ हैं -- (1). दिन गुली रात गुली 1956, (2). एखोन सोमोय नोय 1967, (3). निहित पाताल छाया 1967, (4). बाबोरेर प्रार्थना 1976, (5). मूर्ख बड़ो सामाजिक नोय 1994. बेहद दुख की बात है कि एक साहित्य जगत के चमकते सितारे को कोरोना महामारी ने 21 अप्रैल 2021 को निगल लिया.

उन्हें अस्पताल जाने की इच्छा नहीं थी. वे 14 अप्रैल से अपने ही घर मे आइसोलेशन में थे. 21 अप्रैल की रात नींद में ही उन्होंने आखिरी सांस ली. उनकी उम्र 90 वर्ष थी.

शंख घोष की मृत्यु पर बांग्ला के कवि जय गोस्वामी ने कहा -- एक महा वट वृक्ष आज गिर गया. वे हमारी जाति के विवेक थे. साहित्यकार शीर्षेन्दू मुखोपाध्याय ने कहा -- शंख घोष की मृत्यु से मुझे लग रहा है जैसे सिर के उपर से छत हट गई है. आज मेरा मन बेहद दुखी है. उनका अंतिम संस्कार सादे तरीके से और शांत वातावरण में सम्पन्न हुआ.

– मीता दास