भाजपा के उम्मीदवार शुभेन्दु अधिकारी द्वारा खुल्लमखुल्ला साम्प्रदायिक घृणा प्रचार पर भारतीय निर्वाचन आयोग को पत्र

वर्ष - 30
अंक - 16
12-04-2021


प्रेषित,
मुख्य निर्वाचन आयुक्त, भारतीय निर्वाचन आयोग

विषय: भाजपा उम्मीदवार शुभेन्दु अधिकारी द्वारा खुल्लमखुल्ला साम्प्रदायिक घृणा प्रचार

महोदय,

हमें यकीन है कि आपने पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम चुनाव क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार शुभेन्दु अधिकारी द्वारा दिये जा रहे भाषणों में खुल्लमखुल्ला घृणा प्रचार को अवश्य ही संज्ञान में लिया होगा, जिसकी मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई है.

अधिकारी ने सिलसिलेवार ढंग से अपने भाषणों में अपनी प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ममता बनर्जी को  “बेगम” कहा है, जिसका तात्पर्य है कि यह मुस्लिम हैं, मानो कि जो हिंदू मुसलमानों से नफरत नहीं करता वह वोट पाने लायक नहीं है.

मगर उन्होंने 29 मार्च 2021 को नंदीग्राम में आयोजित सार्वजनिक सभा को सम्बोधित करते हुए घृणा प्रचार की सारी हदें पार कर दी हैं जब उन्होंने कहा: “अगर बेगम सत्ता में आती हैं, तो राज्य मिनी पाकिस्तान में बदल जायेगा. ममता नियमित रूप से ‘ईद मुबारक’ कहा कहती हैं, यह उनकी आदत बन चुकी है. यह आदत इस हद तक बढ़ चुकी है कि ‘दोल’ (बंगाल में होली के एक दिन पहले मनाया जाने वाला वसंतोत्सव) के अवसर पर वे सभी लोगों को ‘होली मुबारक’ कहती हैं. ... उन्होंने विभिन्न ग्राम पंचायतों में छोटे-छोटे पाकिस्तान बना रखे हैं. अगर पाकिस्तान कोई क्रिकेट मैच जीत जाता है, तो वे पटाखे छुड़ाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और मांस खाते हैं. क्या आप नंदीग्राम को उनके हवाले करना चाहते हैं ... जरा इसके बारे में सोचकर देखिये.” यहां वे “मुबारक” जैसे उर्दू मूल के बहु प्रचारित शब्दों के खिलाफ नफरत फला रहे हैं और और इस डर का हौवा खड़ा कर रहे हैं कि उनके प्रतिद्वंद्वी की जीत का मतलब होगा कि पश्चिम बंगाल पर मुसलमानों का कब्जा हो जायेगा और वह राज्य “मिनी पाकिस्तान” में बदल जायेगा. भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान से जोड़ देना और यह (झूठा) दावा करना कि वे क्रिकेट मैचों में पाकिस्तान की जय जयकार करते हैं, मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत और हिंसा को उकसावा देने का सबसे आम तरीका बन गया है.

उन्होंने ऐसी नफरत भड़काने के लिये अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कई मुस्लिम नेताओं का नाम भी लिया है. तृणमूल के स्थानीय नेता शेख सूफयान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “अगर यहां से मैडम जीत गईं तो वे खुद यहां से चली जायेंगी. आपको अपना सारा कागजाती काम कराने के लिये शेख सूफयान के घर जाना होगा. क्या सूफयान के घर जाना महिलाओं के लिये सुरक्षित होगा? क्या वह किसी के लिये भी सुरक्षित होगा?” इसका खुल्लमखुल्ला अर्थ यह है कि अगर कोई राजनेता मुसलमान है तो वह महिलाओं के लिये खतरा है.

7 मार्च 2021 को दिये गये भाषण में अधिकारी ने एक बार फिर उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल यह जताने के लिये किया कि उनकी प्रतिद्वंद्वी को इसलिये वोट नहीं देना चाहिये क्योंकि वह मुसलमानों से घनिष्ठता रखती हैं, और मुसलमानों को उन्होंने “घुसपैठिया” बताया – “यहां आपको कोई बंगाल की बेटी कहकर स्वीकार नहीं करता है. आप घुसपैठियों की ‘फूफू’ (इस शब्द का इस्तेमाल मुख्यतः मुसलमान अपनी बुआ के लिये करते हैं) और रोहिंग्या लोगों की ‘खाला’ (इस शब्द का इस्तेमाल मुख्यतः मुसलमान अपनी मौसी के लिये करते हैं) लगती हैं.” यहां रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ नफरत फलाने के जरिये वोट जुटाने की कोशिश बिल्कुल स्पष्ट है.

हम निर्वाचन आयोग से मांग करते हैं कि इस तरह खुल्लमखुल्ला घृणा प्रचार के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करे. अगर भारतीय निर्वाचन आयोग ऐसा नहीं करता तो इसका मतलब यह संदेश देना होगा कि वह साम्प्रदायिक घृणा प्रचार को स्वीकृति दे रहा है. भारत के निर्वाचन आधारित लोकतंत्र के रक्षकों द्वारा ऐसे घृणा प्रचार वाले भाषणों के साथ सांठगांठ को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा.

कविता कृष्णन  
भाकपा(माले) केन्द्रीय कमेटी की ओर से  

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नंदीग्राम जनसंहार में अधिकारी परिवार की सहभागिता के आरोपों पर ममता को खुलकर स्पष्टीकरण देना होगा

अधिकारी परिवार के खिलाफ ममता बनर्जी द्वारा किये जा रहे तीखे प्रचार ने स्पष्ट रूप से कई सवालों और ढेर सारी अटकलबाजियों को जन्म दिया है.

अगर अधिकारी परिवार नंदीग्राम जनसंहार में सहभागी रहा है और ममता इतने वर्षों से इसके बारे में जानती थी, तो फिर अभी जाकर चुनाव प्रचार के दौरान, जब अधिकारी परिवार ने पाला बदल लिया है और वह भाजपा के खेमे में शामिल हो गया है, तब इस सहभागिता के बारे में सिर्फ खुलासा करने से काम नहीं चलेगा. ममता बनर्जी को ढेर सारे सवालों का जवाब देना होगा और वे महज अपनी “पर्याप्त रूप से स्पष्ट” टिप्पणी से इन सवालों से नहीं कतरा सकतीं.

मगर ममता बनर्जी और अधिकारी परिवार अब एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के दौरान चाहे जितने नये नये “खुलासों” और आरोपों को लेकर सामने आयें, उनसे कुछेक बुनियादी चीजों को नहीं बदला जा सकता.

नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण की योजना एक यथार्थ थी. इसके खिलाफ उपजा जन-विक्षोभ, आंदोलन और जन-जागरण एक सच्चाई थी. जनसंहार हुआ, यह भी तथ्य है. और नंदीग्राम, सिंगूर के साथ मिलकर ठीक इसीलिये नंदीग्राम बना, क्योंकि उससे पहले सिंगूर हो चुका था जहां जमीन का अधिग्रहण वास्तव में बर्बर पुलिस दमन के बल पर किया गया था.

नंदीग्राम में हमारी तथ्यों की जांच करने गई टीम के सारे सदस्यों को, जिसमें दिवंगत कामरेड शंकर मित्र एवं अन्य साथी शामिल थे, गिरफ्तार कर लिया गया था. सिंगूर में भाकपा(माले) के राज्य कमेटी सदस्य और किसान नेता कामरेड तपन बटब्याल को गंभीर चोटें लगी थीं जब पुलिस ने प्रतिवादकारियों की पिटाई की थी, और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था. हम जानते हैं कि सिंगूर और नंदीग्राम, दोनों जगहों पर आम लोगों के साथ कैसा बरताव किया गया था, और उन्होंने कैसा महसूस किया था और विद्रोह पर उतर आये थे.

यकीनन यह कोई अनोखी घटना नहीं है. औद्योगीकरण, विकास और शहरी सौंदर्यीकरण के नाम पर जहां-जहां बलपूर्वक जमीन का अधिग्रहण किया गया है, ऐसे लगभग प्रत्येक मामले में अपनी जमीन और आजीविका खो बैठने वाले आम लोगों का यही प्रत्युत्तर रहा है. कारपोरेट भूमि हड़प के आक्रामक अभियान का मुकाबला करते हुए अपनी जमीन और आजीविका की रक्षा ही हाल के जमाने में किसान आंदोलन को आवेग प्रदान करने वाला प्रमुख कारक रहा है.

यही वह आंदोलन था जिसने औपनिवेशिक जमाने के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का खात्मा किया और 2013 के कानून में बलपूर्वक भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सुरक्षात्मक प्रावधानों तथा भूमि को तथा आजीविका खोने वाले सभी लोगों को क्षतिपूर्ति देने के प्रावधान को शामिल कराया था. उसके बाद से मोदी सरकार द्वारा 2013 के कानून को बदलने की कोशिशों को जनता करारे प्रतिरोध के जरिये शिकस्त दे चुकी है.

ममता के आरोप नंदीग्राम और सिंगूर के सशक्त आंदोलनों को अवैध नहीं करार दे सकते. यकीनन वह खुद एवं उनकी पार्टी ही इन आंदोलनों का सर्वाधिक राजनीतिक लाभ उठाने वाली ताकत बनकर उभरे, लेकिन उससे इन आंदोलनों को राजनीतिक षड्यंत्र में नहीं बदला जा सकता, ठीक उसी तरह जैसे मौजूदा दौर में जारी किसान आंदोलन को मोदी सरकार द्वारा उनके शासन के खिलाफ षडयंत्रों के रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है.

– दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा(माले) लिबरेशन