13 अप्रैल, जलियांवाला बाग की वर्षगांठ पर

वर्ष - 30
अंक - 17
24-04-2021

 

– तुहिन देब

(गतांक से आगे)

कत्लेआम के बाद

जनरल डायर के इस बर्बर हत्याकांड को अंग्रेज शासकों ने उल्लास के साथ समर्थन किया. विलायत के प्रशासनिक प्रमुखों से लेकर अंग्रेज पत्रकारों तक, सभी ने डायर के पक्ष में पैरवी करते हुए अखबारों में विज्ञप्ति दी. ब्रिटेन में लोगों ने चन्दे के जरिए 26000 पौण्ड जमा किया और उसकी माला बनाकर जनरल डायर को पहनाया गया. अंग्रेज ही क्यों, भारत में भी कुछ लोग और संगठन उस दिन जनरल डायर के पक्ष में खड़े हुए थे. कट्टर साम्प्रदायिक संगठन ‘पंजाब हिन्दू महासभा’ की भूमिका आज भी हमें शर्मिन्दा करती है. इस संगठन ने रौलेट एक्ट विरोधी सत्याग्रह आन्दोलन में भाग नहीं लिया. केवल यही नहीं, हिन्दू महासभा ने 1919 में पैदा होने वाली जन असंतोष की घोर निन्दा करते हुए ब्रिटिश राज के प्रति अपनी वफादारी प्रदर्शित की. (द पंजाब हिन्दू सेवा एण्ड कम्युनल पाॅलिसिज 1906-23, लेखक - के.एल. टुरेजा)

केवल कुछेक अंग्रेज पादरी व महामति दीनबन्धु एंड्रूज ने इस हत्याकांड की निन्दा की. एंड्रूज को पंजाब में प्रवेश करने की अनुमति नहीं मिली. गांधीजी को भी पंजाब आने की अनुमति नहीं मिली. समूचा भारतवर्ष सहसा मूक हो गया. सारे भारत में लज्जा, अपमान, दुःख, पीड़ा, असहायता का अंधेरा छा गया. उस अंधेरे को चीरते हुए उजाला लेकर आगे आये कवि गुरू रविन्द्रनाथ ठाकुर.

जलियांवाला बाग और रविन्द्रनाथ ठाकुर

जलियांवाला बाग जनसंहार का समाचार प्रचारित न हो पाए, इस बारे में अंग्रेज सरकार बहुत सतर्क थी. लेकिन उसी के बीच दो-चार समाचार लोगों तक पहुंच रहा था. जितना भी समाचार मिला, उससे रविन्द्रनाथ उत्तेजित हो उठे. उस समय समग्र भारत, भारत रक्षा कानून के अंतर्गत था. जलियावाला बाग जनसंहार पर कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई नहीं पड़ रही थी. देश के नेतागण चुप थे. कलकत्ता में डाक्टर नीलरतन सरकार, महाकवि की जांच कर पूर्ण विश्राम लेने को कह गए थे. प्रशांतचंद्र महलानविश ने अपनी स्मृतियों संजोते हुए लिखा है – “कवि का शरीर इतना कमजोर हो गया है कि दूसरे माले से तीसरे माले में चढ़ने में बहुत तकलीफ होती है. पूरा दिन एक लम्बे सी कुर्सी में सोए रहते हैं. लिखना बन्द हो गया था. बहुत कम बात करते थे. हंसी-ठठ्ठा तो बिल्कुल नहीं. पंजाब की खबर पाकर ऐसी हालत में भी कवि अस्थिर हो उठे. एंड्रूज साहब को बुलवा भेजा. पंजाब में इतनी बड़ी घटना घटी है और पूरे भारत में एक भी व्यक्ति प्रतिवाद नहीं करेगा, ये बात कवि के लिए असहनीय थी. उन्होंने दीनबन्धु एंड्रूज को गांधी के पास एक संदेश देकर भेजा. उस समय बाहर से पंजाब में किसी के प्रवेश करने पर प्रतिबंध था. कवि की इच्छा थी कि यदि महात्मा गांधी राजी हों तो दिल्ली में आकर वे उनसे मिलेंगे. वहां से दोनों पंजाब में प्रवेश करने की कोशिश करेंगे. ऐसे करने पर इन दोनों की गिरफ्तारी ही इनका प्रतिरोध होगा.

एंड्रूज, महात्मा गांधी से मिलकर रविन्द्रनाथ ठाकुर के घर आए और कहा कि गांधीजी अभी पंजाब जाने के लिए इच्छुक नहीं हैं क्योंकि वे अभी सरकार को परेशान करने के पक्ष में नहीं हैं. यह सुनकर कवि एकदम चुप हो गए. इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोले.

गांधीजी की ओर से आशानुरूप प्रतिक्रिया न पाकर, कवि एक प्रतिवाद सभा के आयोजन का प्रस्ताव लेकर कई लोगों के पास गए. लेकिन हर जगह से निराशा हाथ लगी. तब कवि समझ गए कि जो कुछ करना है उन्हें ही अकेले करना होगा. बाद में ‘नाइटहुड’ का खिताब लौटाने का कारण बताते हुए कवि ने लिखा है कि “मैं यह करने को मजबूर था क्योंकि जो पंजाब में घटा है उसका प्रतिवाद करने के लिए हमारे राजनैतिक नेताओं में मुझे निराश किया.” (मार्डन रिव्यू, फरवरी 1926, पृष्ठ 158)

1919 के 30 मई को ‘सर’ का खिताब लौटाने के लिए लार्ड चेम्सफोर्ड को कवि रविन्द्रनाथ ने पत्र लिखा. उस ऐतिहासिक पत्र की हर पंक्ति में इस राष्ट्रीय अपमान और पीड़ा की गहन अन्तर्वेदना उभरकर आती है. कितने मर्माहत होकर कवि ने ‘नाइटहुड’ त्यागने का निर्णय लिया था, यह उस पत्र को पढ़कर हम आसानी से समझ सकते हैं.

नाइटहुड त्यागने की प्रतिक्रिया

कवि के नाइटहुड खिताब त्यागने का समाचार प्रकाशित होते ही देश-विदेश में प्रबल प्रतिक्रिया देखने को मिली. नेपाल मजूमदार ने लिखा है क – “उस समय के घोर दुर्याेग के अंधकार में देशवासियों के सारे अपमान की कालिमा को कवि ने पूरा अपने अकेले के ऊपर लगा लिया. रविन्द्रनाथ के इस प्रतिवाद पत्र ने उस समय तमाम देशवासियों के सीने में जो आशा-भरोसा और साहस का संचार किया, कितने विपुल स्वजात्यबोध और आवेग की सृष्टि की, उसे बोलकर अभिव्यक्त कर पाना संभव नहीं है. केवल इस एक प्रतिवाद के माध्यम से ऐसा लगा मानो भारतीय जनता ने विश्व के दरबार में अपने लिए न्याय और प्रतिकार की मांग की हो.”

रविन्द्रनाथ द्वारा ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटाने की बात ने साहित्यकार शरतचन्द्र के अन्तर्मन को भी हिला दिया था. उन्होंने कहा कि देश की वेदना के बीच अकेले रविबाबू ही हमारी लाज रखे हैं. बंगाल के साहित्यकार रामेन्द्र सुन्दर त्रिवेदी उस समय मृत्यु शैया पर थे. उन्होंने रविन्द्रनाथ से मिलने की अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की. कवि उनसे मिलने गए. रामेन्द्र सुन्दर ने कहा कि आप भारतीय जनता के विवेक हैं और उनके पैरों की धूल को माथे से लगा लिया. चार दिन बाद उनकी मृत्यु हुई.

आश्चर्य की बात है कि देश के प्रसिद्ध नेतागण इस मसले पर चुप्पी साधे हुए थे. महात्मा गांधी ने 6 जून 1919 को श्रीनिवास शास्त्री को लिखे पत्र में कविगुरू को प्रोत्साहित करने के बजाय, हतोत्साहित किया. पत्र में उन्होंने लिखा कि “कवि की ओर से भेजा गया एक ज्वलंत पत्र पंजाब के आतंक को बढ़ा रहा है. मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि यह एक अपरिपक्व कदम है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता.” पंजाब में मार्शल लाॅ और कत्लेआम के बाद लम्बे समय से अंग्रेजों द्वारा देशवासियों को “सीने के बल घिसट-घिसटकर रास्ता पार करने” जैसे घृणित, अपमानजनक दण्ड दिया जा रहा था. मगर इसके खिलाफ राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा बिल्कुल भी विरोध नहीं किए जाने से कवि बहुत व्यथित थे. इसीलिए अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में जब जलियांवाला बाग स्मृति स्तम्भ निर्माण का प्रस्ताव पारित हुआ तो कवि ने काफी दुःख और क्षोभ से कहा कि “मैं, उत्पीड़न कितना भी कठिन हो, सहूंगा, लेकिन अपमान, अवमानना बिल्कुल नहीं सहूंगा – पंजाब की ऐसा पौरूष वाणी सुनने की मेरी आशा थी. किन्तु जब नहीं सुना, तब सबसे पहले हमें खुद को ही धिक्कारना है” (शांतिनिकेतन पत्रिका, 1930, वैशाख, प्रथम अंक, पृष्ठ 65-66). असल में पूरे देशवासियों समेत कवि को यह अपेक्षा थी कि अमृतसर में कांग्रेस के अधिवेशन में ब्रिटिश साम्राज्य की बर्बरता के खिलाफ तीव्र निंदा सूचक प्रस्ताव पारित किया जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. रविन्द्रनाथ के गहरे दुःख के बावजूद, कवि के नाइटहुड त्यागने और ब्रिटिश साम्राज्य को प्रतिवाद पत्र भेजने की घटना को तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व द्वारा तनिक भी सम्मान या स्वीकृति नहीं दी गई. अमल होम के बहुत प्रयास करने के बावजूद, इस महान काम के लिए अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन से कविगुरू के नाम कोई धन्यवाद ज्ञापन तक नहीं दिया गया.

लेकिन जहां चोट लगनी थी, वहां जरूर लगी. सात वर्ष पूर्व कवि जब इंग्लैण्ड गए तो वहां उनके व्यक्तित्व के आकर्षण से सुधी समाज के कई लोग उनके प्रशंसक बन गए थे. लेकिन नाइटहुड त्यागने के बाद उनमें से कई लोगों ने अपना मुंह फेर लिया. कवि ने इस बारे में मैत्रीय देवी को कहा था – “इस बात से इंग्लैण्ड में मेरे मित्रा काफी अपमानित महसूस कर रहे थे. मैंने इंग्लैण्ड में इस बार जाकर देखा कि वे मेरे नाइटहुड त्यागने की बात भुला नहीं पा रहे हैं. असल में, अंग्रेज राजभक्त हैं, इसीलिए उनके राजा द्वारा दिए गए सम्मान को जब मैंने लौटाया तो उन्हें बड़ी चोट पहुंची.”

और सौ साल बाद

एक दिन किशोर भगत सिंह ने जलियांवाला बाग में खून से सने मिट्टी को माथे पर लगाकर देश से ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे की शपथ ली थी . सौ वर्ष पूर्व की उस नृशंसता के गवाह थे बालक उधम सिंह. उस घटना के 21 वर्ष बाद उस बालक ने 14 मार्च 1940 को लंदन में इंडियन एसोसिएशन की एक सभा में पंजाब के भूतपूर्व गवर्नर सर माइकल-ओ-डायर को गोली मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की. लंदन की अदालत में शहीद उधम सिंह ने कहा था – “सर माइकल को यह सजा मिलनी ही थी. मुझे इसकी परवाह नहीं है कि मेरे साथ क्या होता है. मैं मरने से नहीं डरता. मैंने अपने देश के लिए मृत्यु को गले लगाया है.” जलियांवाला बाग की घटना से जो समूचे भारत को भीषण दर्द व तकलीफ सहना पड़ा था, उधम सिंह के बलिदान ने उस जख्म पर कुछ मरहम लगाया था.

सौ वर्ष पश्चात जलियांवाला बाग के सामने बनाया गया शहीद स्तम्भ, बाग की दीवारों पर आज भी बने गोलियों के निशान, वह अंधा कुंआ सब, अंग्रेज सरकार की उस दिन की बर्बरता के गवाह हैं. जलियांवाला के उस बाग और संग्रहालय में जाने से इतिहास जीवंत हो उठता है. 1936 में मुरिएल लिस्टर ने यहां आकर लिखा था – “यहां एक घंटा बिताना तपस्या करने की तरह है.” और एक अंग्रेज डोनल्ड डी कनिंधम ने 1938 में जलियांवाला देखने के बाद लिखा -- “मैं इस जगह को देखने के बाद मेरी कौम के लिए शर्म से मरा जा रहा हूं. मुझे ऐसा लगता है कि प्रत्येक भारतीय मेरी तरफ देखकर ऐसा सोचते हैं कि मैं भी जनसंहार करने वाली ब्रिटिश कौम का एक हूं. मैं सिर्फ आशा करूंगा की यह महान बलिदान साम्राज्यवाद के घृणित व्यवस्था को खत्म करे.

साम्राज्यवाद की घृणित व्यवस्था का आज तक खात्मा नहीं हुआ. आज शायद उसका रूप बदला हो, लेकिन उसकी मानवता विरोधी लूट और नफरत आज भी विश्वव्यापी है. भारत में आकर अमृतसर में जाकर भी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री या वहां के राजा-रानी ने लिस्टर और कनिंधम की तरह भारत की जनता से आज तक क्षमायाचना नहीं किया है. न ही भारत के दलाल शासक वर्ग ने आज तक ब्रिटिश सरकार से जलियांवाला बाग के जुल्मों के लिए क्षमायाचना की मांग की है. आज ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जगह ले ली है दुनिया की जनता का एक नम्बर दुश्मन अमेरिकी साम्राज्यवाद ने. उसकी अगुवाई में साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया भर में साम्राज्यी लूट के लिए जंग और जनसंहार किए जा रहे हैं. जब तक साम्राज्यवाद मौजूद है, स्थाई शान्ति दूर की कौड़ी है.

बहुत दुखदायी होने पर भी यह एक वास्तविकता है कि हजारोंझार क्रांतिकारियों, देशवासियों के बलिदान के बावजूद हमें सच्ची आजादी आज तक नहीं मिली. 1947 में सत्ता के हस्तांतरण के जरिए साम्राज्यवाद के देशी दलाल भारत को लूटते रहे हैं. और अब शहीदों के सपनों को रौंदकर देश को एक असहिष्णु, बहुसंख्यकवादी हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर संघी-कारपोरेट फासीवादी गिरोह ले जा रहे हैं. 1947 के बाद से ही एक के बाद एक सत्ताधारी वर्ग ब्रिटिश राज के रौलेट एक्ट की तरह मीसा, आफ्सपा, टाडा, पोटा और फिर यूएपीए जैसे निरंकुश कानूनों के जरिए जनता की मौलिक आजादी को छीनते आ रहे हैं. इस मामले में क्या कांग्रेस, क्या भाजपा और क्या अन्य संसदीय दल, सबकी सोच एक समान है. सभी चाहते हैं कि जनता बिल्कुल सवाल न करे और सब कुछ सहन करती रहे. इस स्वाधीन भारत में नागरिक को यह साबित करना होता है कि वह राजसत्ता के लिए खतरा नहीं है. समाचार माध्यमों की आजादी को तो पहले ही खत्म कर दिया गया है, जनता के पक्ष में आवाज उठाने वाले विद्यार्थी हों या बुद्धिजीवी हो (नताशा, देवांगना हो या सुधा भारद्वाज हों) या फिर प्रशांत भूषण के जैसे जन पक्षधर वकील हो, अभिव्यक्ति की आजादी इन सबके लिए बेमानी है. इससे भी अगर बात न बने तो धर्म-विरोधी, देशद्रोही या राष्ट्र-विरोधी का ठप्पा लगाकर डा. नरेन्द्र दाभोलकर, कामरेड गोविन्द पन्सारे, डा. एमएम कलबुर्गी या गौरी लंकेश बनाकर दीवार पर चित्र टंगवा दो.

आज जलियांवाला के सौ वर्ष बाद, जिन हिन्दू महासभा ने हत्यारे जनरल डायर की तारीफ की थी, उसी के उत्तराधिकारी पिछले छह वर्षों से भारत की सत्ता में बैठकर भारत के संविधान, गंगा-जमुनी तहजीब को तार-तार कर शहीद भगत सिंह-शहीद उधम सिंह-दुर्गा भाभी व शहीद प्रीतिलता वाद्देदार की स्मृतियों के साथ राष्ट्रीय विश्वासघात कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रेरणा से और उनके दलाल देशीय राजा-महाराजाओं और जमीन्दारों के तत्वाधान में स्थापित हुआ था, ने न केवल रौलेट एक्ट विरोधी सत्याग्रह आन्दोलन ही बहिष्कार नहीं किया था, बल्कि भारत के स्वतंत्राता संग्राम में इन्होंने कभी भाग ही नहीं लिया. यही नहीं, उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मदद करके भारत के स्वतंत्राता संग्राम की पीठ में छूरा भोंका था. इनके गुरु गोलवरकर के अनुसार, अंग्रेज भारत के दुश्मन नहीं थे, बल्कि कम्युनिस्ट और मुसलमान दुश्मन थे.

ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा लागू ‘पफूट डालो, राज करो’ नीति से उत्पन्न साम्प्रदायिकता की जहरीली हवा से आज भारत का दम घुंट रहा है. ऐसा लगता है, समूचा भारतवर्ष जैसे जलियांवाला बाग बन गया है. साफ हवा के लिए आज जरूरत है शहीद भगत सिंह, शहीद उधम सिंह, शहीद करतार सिंह सराभा जैसे नौजवानों की. आज जरूरत है अंध-राष्ट्रवाद विरोधी मानवतावादी कवि रविन्द्रनाथ ठाकुर के ओजस्वी प्रतिवाद की. और इसलिए सौ वर्ष के बाद भी हम जलियांवाला बाग की स्मृतियों को मन में संजोए हुए हैं.

जलियांवाला बाग और शहीद उधम सिंह

जलियांवाला बाग की कहानी शहीद ऊधम सिंह के बिना अधूरी है. जिस जलियांवाला बाग की खून से सनी मिट्टी से शहीदे आजम भगतसिंह ने प्रेरणा ली थी, उसी जनसंहार के प्रतिकार हेतु शहीद ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन में ओ डायर को गोली मार, मात्र साढ़े चार महीने की अदालती सुनवाई के बाद 31 जुलाई 1940 को फांसी चढकर बलिदान दिया था. उन्होंने धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर मुकदमे के दौरान किसी धर्म ग्रंथ के बजाय वारिस शाह के प्रेम काव्य ‘‘हीर’’ पर हाथ रखकर शपथ ली थी और अपना नाम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था. मुकदमे के दौरान कोर्ट में उन्होंने कहा कि उनकी शत्राुता ब्रिटिश साम्राज्यवाद से है, अंग्रेज मजदूरों से तो उनकी हमदर्दी है. अदालती कार्यवाही से लिया गया उनका पूरा बयान नीचे है --

“मैं कहता हूं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो. तुम कहते हो कि भारत में शान्ति नहीं है. हमारे हिस्से में केवल गुलामी है. तथाकथित सभ्यता की वंशजों ने हमें हर वह चीज दी है जो मानव जाति के लिए गंदी और पतित करनेवाली मानी जाती है. आपको केवल यही करना है कि आप अपना इतिहास पढ़ें. यदि आपके पास थोड़ी भी मानवीय शालीनता है तो आपको शर्म से मर जाना चाहिए. जिस क्रूरता और खून के प्यासे तरीके से तथाकथित बुद्धिजीवी खुद को दुनिया में सभ्यता का शासक कहते हैं, वे कमीने खूनी हैं.... .”

तब जज ने उन्हें बोलने से रोक दिया, लेकिन कुछ चर्चा के बाद उन्होंने जारी रखा -- “मुझे मौत की सजा की परवाह नहीं है. इसका मतलब कुछ भी नहीं है. मुझे मरने या किसी अन्य बात की परवाह नहीं है. मुझे इसकी बिल्कुल भी चिन्ता नहीं है. मैं एक मकसद के लिए प्राणों की आहुति दे रहा हूं.” उन्होंने कठघरे के घेरे को ठोकते हुए कहा, “हम ब्रिटिश साम्राज्य से पीड़ित हैं.” फिर उधम सिंह ने नरम स्वर में कहना जारी रखा. “मैं मरने से नहीं डरता. मुझे अपनी जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए मरने पर गर्व है और मुझे आशा है कि जब मौत हो जाएगी, तो मेरे स्थान पर मेरे देश के हजारों लोग तुम गंदे कुत्तों को बाहर निकालने के लिए, मेरे देश को मुक्त करने के लिए आगे आएंगे.

“मैं एक अंग्रेज न्यायाधीशों के सामने खड़ा हूं. मैं एक अंग्रेज अदालत में हूं. आप लोग भारत जाते हैं और जब आप वापस आते हैं तो आपको पुरस्कार दिया जाता है और हाउस ऑफ काॅमन्स में शामिल किया जाता है. हम इंग्लैंड आते हैं और हमें मौत की सजा दी जाती है.”

“मैंने कभी भी कुछ नहीं चाहा था, लेकिन मैं इसे अपने साथ ले जाऊंगा. मुझे इसके बारे में कभी कोई परवाह नहीं है, लेकिन जब आप गंदे कुत्ते भारत आते हैं तो एक समय आएगा जब आपको भारत से बाहर कर दिया जाएगा. आपके पूरे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चकनाचूर कर दिया जाएगा.”

“जहां भी आपका कथित लोकतंत्रा और ईसाई धर्म का झंडा लहराता है, भारत की सड़कों पर मशीनगनें हजारों गरीब महिलाओं और बच्चों को कुचल डालती हैं.”

“आपका आचरण, आपका आचरण -- मैं ब्रिटिश सरकार के बारे में बात कर रहा हूं. मैं अंग्रेज जनता के खिलाफ बिल्कुल भी नहीं हूं. भारत में मेरे जितने मित्र हैं उसकी तुलना में इंग्लैंड में मेरे अधिक अंग्रेज मित्र हैं. इंग्लैंड के श्रमिकों के साथ मेरी अत्यधिक सहानुभूति है. मैं साम्राज्यवादी सरकार के खिलाफ हूं.”

“मजदूरों -- आप लोग पीड़ित हैं. इन गंदे कुत्तों से हर कोई पीड़ित है, ये पागल जानवर हैं. भारत केवल गुलाम है. ब्रिटिश साम्राज्यवाद -- हत्या कर रहा है, अंग-भंग कर रहा है और विनाश ढा रहा है. लोग अखबारों में इसके बारे में नहीं पढ़ते हैं. हम जानते हैं कि भारत में क्या हो रहा है.”

इस बिन्दु पर आकर न्यायाधीश ने कोई और सुनवाई करने से इंकार कर दिया, लेकिन सिंह ने कहना जारी रखा --

“आप मुझसे पूछते हैं कि मुझे क्या कहना है. मैं यह कह रहा हूं. क्योंकि आप गंदे लोग हैं. आप हमसे यह नहीं सुनना चाहते हैं कि आप भारत में क्या कर रहे हैं.”

फिर उन्होंने अपना चश्मा वापस अपनी जेब में डाला, और हिन्दुस्तानी में तीन शब्दों का उच्चारण किया और फिर जोर से कहा -- “ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो! ब्रिटिश गंदे कुत्तों का नाश हो!” वे, साॅलिसिटर की मेज के ऊपर थूकते हुए, कठघरा छोड़कर जाने के लिए मुड़े. (समाप्त)

संदर्भ
1. स्वाधीनता संग्राम -- विपनचन्द्र, अमलेश त्रिपाठी, वरूण दे
2. जलियांवाला बाग -- 13 अप्रैल 1919, प्रकाशन विभाग, सूचना प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
3. भारते जातीयता ओ अन्तरजातीयता एवं रविन्द्रनाथ (द्वितीय खण्ड), नेपाल मजूमदार (बांग्ला)
4. भारत के मुक्ति संग्राम में मुस्लिम योगदान, शांतिमय राय
5. जलियांवाला बाग - निर्मलचन्द्र गांगुली (बांग्ला में)