[ भाकपा(माले) के एक उच्चस्तरीय जांच दल ने पिछले दिनों असम के दरांग जिले के उस गांव का दौरा किया जहां विगत 23 सितंबर को भाजपा की हेमंत विश्वसरमा सरकार की पुलिस ने सांप्रदायिक नफरत व हिंसा का खुल्लमखुला प्रदर्शन करते हुए बरसों से अपनी जमीन पर बसे मुस्लिम समुदाय के लोगों के भरे-पूरे गांव को उजाड़ डालने, उनके घरों, मस्जिदों, मदरसों और कब्रगाहों को जला डालने और मटियामेट कर देने तथा एक युवक मोईनुल हक (38 वर्ष) तथा एक 13 वर्षीय बच्चे फरीद को गोली मार कर मौत की नींद सुला देने की एक बेहद बर्बरतापूर्ण काार्रवाई को अंजाम दिया. घटनास्थल का आंखों देखा हाल बता रहे हैं भाकपा(माले) जांच दल के सदस्य और भाकपा(माले) विधायक कामरेड रामबली सिंह यादव ]

गुवाहाटी से 25 सितम्बर 2021को जांच दल के सदस्यों – का. कविता कृष्णन, का. बलिंद्र सैकिया, का. क्लिफ्टन डी रोजेरियो और युवा रवि रंजन तथा एआइकेएस के नेता जयंत गोगोई, जिपाल कृषक संघ के नेता प्रणव डोले, बिदिशा, संग्रामी कृषक मजदूर संघ के नेता दिनेश दास और जोहरुल इस्लाम के साथ हमलोग दो गाड़ियों से घटना स्थल – दरांग  जिले के धोलपुर (गौरु खुटी) गांव के लिए रवाना हुए.

हमें लगातार यह रिपोर्ट मिल रही थी कि वहां पहुंचना मुमकिन नहीं है. पुलिस किसी को भी वहां जाने नहीं दे रही है. जंगली ग्रामीण इलाके के रास्ते पर तकरीबन 80 किमी चलने के बाद (घटना स्थल से लगभग 10 किमी पहले) फिर से यह सुचना मिली कि पुलिस जाने नहीं देगी. हालांकि रास्ते में कुछ पत्रकारों की गाड़ियां हमें आते-जाते मिल रही थीं. हमने तय किया गया कि इसी रास्ते से चला जाए, जो होगा, देखा जाएगा. जिस रास्ते हमलोग चले उसमें कहीं बाधा उत्पन्न नहीं हुई और हमलोग एक बरसाती नदी के किनारे जा पहुंचे. हमें वहां हुए भयानक दमन का चिन्ह दिखाई पड़ने लगा. उजाड़े गए लोग अपने बचे-खुचे सामान के साथ नदी पार कर सपरिवार कहीं चले जा रहे थे. हमलोगों ने नाव से नदी पार किया और पैदल चलने का इरादा कर आगे बढ़े. लेकिन, दूसरे छोर पर बसे गांव के लोगों ने ने हमारा परिचय जानने के बाद हमें मोटर साइकिल पर बिठा कर ध्वस्त हुए गावों तक पंहुचा दिया. यह गांव मलबे में तब्दील हो चुका था. गांव के दूसरे छोर पर भी कुछ ही दूरी पर एक दूसरी नदी थी. ग्रामीण अपना बचा-खुचा सामान लेकर उस नदी के पार भी जा रहे थे और उस किनारे पर फिर से टिन का झोपड़ा लगा रहे थे. दोनों नदियों के बीच लगभग 5 किमी का इलाका ग्रामीण बसावट और खेती योग्य भूमि का है. इस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी वाले कई गांव बसे हुए हैं. इनमें कुछ गांव खिलौंजिया (असमियाभाषी जो अपने आपको स्वदेशी मुसलमान कहते हैं) लोगों और कुछ गांव बंगलाभाषी मुसलमानों के हैं. गांव के वाशिंदों को एनआरसी का कागज भी मिला हुआ था.

पुलिस ने धोलपुर नं. 1, 2, 3 गांवों को निशाना बनाया, इन गावों में बांग्लाभाषी मुस्लिम परिवार निवास करते थे. 200 घरों की तीन बस्तियों में 4 मस्जिदों, 4 मदरसों और कब्रगाहों को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया और घरों में आग लगा दी गई. जरूरत के सभी सामानों को पुलिस ने जला दिया और घरों की छत के रूप में इस्तेमाल होने वाले टीन के करकट को भी जेसीबी से कुचलवा दिया. मस्जिद का माइक भी टूटकर बिखरा पड़ा था. वहां बचा हुआ था सिर्फ सरकारी स्कूल का भवन और आंगनबाड़ी का बोर्ड, जिसमें पढ़नेवाला अब कोई नहीं था. मकान जलाते हुए  देख कर 38 वर्षीय मोईनुल हक ने विरोध किया तो पुलिस ने उनको गोली का निशाना बना दिया. कलेक्टर के कार्यालय में रिपोर्टिंग करने वाले एक पत्रकार ने मोईनुल की लाश पर उछल-कूद किया. आधार कार्ड बनवा कर घर लौट रहे 13 वर्षीय फरीद को भी पुलिस ने रास्ते में ही गोली मार दी.

हम लोग इस गांव से आगे नदी के किनारे सामान ले जाकर पुनः बसने के जद्दोजहद में लगे  परिवारों के बीच गए. मोइनुल हक के परिजन अभी तक नदी के इस पार ही टिके हुए थे. वे नदी के उस पार नया आशियाना बसाने की कोशिश कर रहे थे. हम उनके झोपड़े में गए और उनके रोते बिलखते बच्चों व अन्य परिजनों से मिले. उनका एक 8 वर्ष का बेटा और 2 वर्ष की एक बेटी है. बेटी तो इस कदर रो रही थी, मानो जान ही दे देगी. कामरेड कविता कृष्णन ने उसे गोद में उठा लिया. उसे चुप कराने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी. वहां काफी संख्या में महिला-पुरूष जमा हो गए. हमने उनकीे आपबीती सुनी और उनके पक्ष में खड़ा होने का भरोसा दिलाया. गुवाहाटी वापसी के दौरान हमलोग लगातार सोचते रहे कि ये लोग अचानक पानी और रोशनी का इंतजाम कैसे कर पाएंगे.

अगले दिन, 26 सितंबर को गुवाहाटी के चन्द्रप्रभा भवन में प्रेस को सम्बोधित करने के बाद हम अस्पताल में भर्ती घायलों से मिलने पहुंचे. गुवाहाटी मेडिकल काॅलेज अस्पताल की दूसरी मंजिल पर हमारी घायलों से मुलाकात हुई. इमरजेंसी वार्ड में एक तरफ वे 10 ग्रामीण भर्ती थे जो पुलिस की गोली से घायल हुए थे और जिन्हें परिवार वालों ने खुद अस्पताल लाया था. उनके शरीर के जिन अंगों पर गोली मारी गई थी उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि उन्हें जान से मारने के ही नियत गोली चलाई गई थी. संयोगवश ही वे बच गए और अब खतरे से बाहर थे.

यह रिपोर्ट भी आ रही थी कि 11 पुलिस वाले भी घायल हैं. हमलोगों ने घायल पुलिसवालों से भी मिलने का मन बनाया. बगल के वार्ड में ही एक पुलिसकर्मी इलाज करवा रहा था. पुलिस ही उसे अस्पताल लेकर लायी थी. उसने हमें बताया कि वह कार्बी इलाके का निवासी है. वह डीएसपी के सुरक्षा दस्ते में था. किसी ने पीछे से उसके सिर पर लाठी से मारा था. वह कौन था वह यह नहीं देख पाया. वह स्पष्ट नहीं था कि उसे ग्रामीणों ने या खुद पुलिसवालों ने ही मारा है. कोई अन्य पुलिसकर्मी यहां भर्ती नहीं था.

ऐतिहासिक भौगोलिक तथ्य

असम का ग्रामीण इलाका ब्रह्मपुत्र नदी का कोप झेलते रहता है. नदी घाटी का इलाका हमेशा बाढ़, कटाव और विस्थापन का दंश झेलते रहता है. ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों के कटाव से पुराने गांव हमेशा उजड़ते हैं और दूसरी जगह बसते हैं. ग्रामीणों की वह जमीन जिसके अधिकार का कागज उनके पास होता है, नदी में चली जाती है. लोग फिर से दूसरी जगह पर बस जाते हैं. सरकार बसावट की नई जमीन का कागज उनको बना दिया करती है. इस पूरी प्रक्रिया को ‘सेटलमेंट’ कहते हैं. यहां की मिट्टी भी अत्यंत ही हल्की है जो राख की तरह होती है. दिन में वह  धुंए की तरह हवा में उड़ती दिखती है.

दरांग जिले के मंगलादेई तालुका में सिपहझार विधानसभा अंतर्गत धोलपुर खुट्टी गांव 1979 में इसी तरह के  कटाव के बाद सरकारी जमीन पर बसा हुआ गांव था. यहां बसनेवालों को 7 फरवरी 1979 को जमीन का कागज मिला था. यह गांव आपस में सटे हुए तीन टोलों से बनता है जो 1, 2, 3 नंबर टोले कहलाते हेैं. गांव के दायें-बायें बाजू करीब पांच किलोमीटर के दायरे में दो छोटी नदियां (बाढ़ से उत्पन्न बोरहोल)  बहती हैं. दोनों नदियों के बीच कई गांव बसे हैं. गांव पूर्णतः मुस्लिम आबादी वाले हैं. असमिया बोलनेवाले (खिलौंजिया मुसलमान) और बांग्ला बोलने वाले (स्वदेशी मुसलमान) अलग-अलग गांवों में रहते हैं. भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण व नफरत की राजनीति ने मुस्लिम एकता को भी काफी कमजोर किया है. यहां भाजपा ने असमिया बोलने वाले मुसलमानों को असम का मूल निवासी और बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी मुसलमान बता कर आपस में काफी अलग-थलग कर दिया है. भाजपा के जरिए यह भी प्रचार चलाया जाता रहा है कि जिन बांग्लादेशी मुस्लिम परिवारों को हटाया जायेगा, उनकी जमीनों में 2-2 एकड़  जमीन सरकार स्वदेशी लोगों को दे देगी. इस लोभ में पड़कर असमिया बोलनेवाले मुसलमानों ने भी भाजपा के सुर में सुर मिलाना शुरू किया और चरागाह योग्य जमीनों पर बसे लोगों को हटाने की मांग करने लगे. इसी का फायदा उठाकर सरकार और पुलिस ने मई महीने से बांग्लाभाषी मुसलमानों पर दमन करना और उनके गांवों को उजाड़ना शुरू कर दिया. कई इलाके में इस तरह से उजाड़ने का अभियान सरकार ने मई 2021 से ही शुरू कर दिया. इसी का वीभत्स नजारा दरांग के धोलपुर में देखने को मिला.

लेकिन, गरीब असमिया मुसलमानों को भी अब बात समझ आने लगी है. जिस नाव से हमलोग नदी पार कर रहे थे उसके नाविक असमिया भाषी मुसलमान थे. उन्होंने अपनी भाषा में कहा – ‘उजाड़ना तो सबको है. बांग्लाभाषी मुसलमानों को बांग्लादेशी कहकर उजाड़ा जा रहा है और हमलोगों को पाकिस्तानी कह कर उजाड़ा जाएगा.’

दो दिन पहले ही बगल के एक गांव को जहां की 99% आबादी मुस्लिम है, यह कहकर उजाड़ा गया था कि मुसलमान हिन्दू मंदिर की जमीन को कब्जाकर बस गए हैं. विदित हो कि गांव में एक 50 वर्ष पुराना मंदिर था. उसके पुजारी पार्वतीदास के अनुसार मुसलमानों के बीच भी मंदिर पूर्णतः सुरक्षित था. पुलिस ने मंदिर के पुजारी पार्वती दास को भी घर से बेदखल कर दिया.

गांव का तात्कालिक घटनाक्रम

सरकार के अनुसार सरकार ने दोनों नदियों के बीच के इलाके को कम्युनिटी फार्मिंग के लिए चुना है और 3000 एकड़ जमीन की की जरूरत महसूस की है. इसलिए इस पर बसे लोगों को हटाना जरूरी है. जिन्हें हटाया जाएगा, उन स्वदेशी परिवारों को 2-2 एकड़ जमीन दी जाऐगी.

धोलपुर घटना के पहले भी 800 परिवारों को हटाया जा चुका था. दूसरे इलाके में भी हटाये गए परिवारों को अबतक जमीन नहीं मिली है, अतः सन्देह होना लाजिमी है.

सरकारी रिकाॅर्ड के अनुसार इस क्षेत्र में 47,000 (सैंतालिस हजार) एकड़ खेती योग्य जमीन है, जिसमे से 25,000 (पचीस हजार) एकड़ जमीन पर 3,000 (तीनहजार) परिवारों का कब्जा है. अर्थात 22000  एकड़ जमीन अब भी खाली है.

सवाल उठता है कि (1) जब काफी जमीन खाली है तब फिर गांवों को उजाड़ने की क्या जरूरत थी? (2) जब ग्रामीणों की जमीन का रसीद कट रहा है, बच्चों के लिए सरकारी स्कूल और आंगनबाड़ी बनाया गया है, पुराना वाशिंदा होने के प्रमाण के आधार पर एनआरसी में उनका नाम दर्ज है, इससे पहले भी जमीन के कटाव में चले जाने पर 1979 में उनके साथ सेटलमेंट किया गया है. तब सरकार इसे अतिक्रमण कैसे कह रही है? (3) जब सभी कागजात वाले हैं तब स्वदेशी शब्द का क्या मायने है? असल में सरकार की मंशा गरीबों से जमीन छीन कर कारपोरेट को देने की है.

ग्रामीणों के मुताबिक ‘18 सितम्बर 2021 को कुछ ग्रामीणों के व्हाट्सप्प पर गांव खाली करने का नोटिस मिला और कहा गया कि मंगलादेई तालुका में आकर अपना नोटिस प्राप्त कर लें और इस पर जो भी कहना है, लिखकर दें. लोग राय-विचार कर ही रहे थे कि 20 सितम्बर 2021 को सुबह 8.30 बजे चौकीदार नोटिस लेकर पहुंच गया. कुछ को नोटिस मिला और कुछ को आज तक भी नहीं मिला. नोटिस पर गांव खाली करने की तिथि मिटायी हुई थी. घंटे भर के अंदर 9.30 बजे पुलिस कई जेसीबी लेकर गांव में पहुंच गयी और उसने 1और 2 नम्बर  गांव को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. लोगों ने विरोध किया तो तोड़-फोड़ रोक दी गई. लोगों ने रिश्तेदारों को जानकारी दी और मंगलादेई तालुका जाकर लिखित आवेदन दिया और उच्च न्यायालय जाने के लिए समय की मांग की. 21-22 सितम्बर को कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई. 23 सितम्बर को सभी ग्रामीण एक जगह इकठ्ठा होकर हाईकोर्ट जाने के लिए मीटिंग कर रहे थे कि भारी संख्या में पुलिस पहुंच गई और चारों तरफ से घेर कर खड़ी हो गई. हमलोग इधर उधर भागने लगे तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया और इसके बाद घरों को तोड़ना और आग लगाना शुरू कर दिया. विरोध करने पर पुलिस गोली चलाने लगी.’

विदित हो कि दरांग जिले का एसपी सुशांत विश्वसरमा मुख्यमंत्री हेमंत विश्वसरमा का सगा भाई है. घटना स्थल पर वही पुलिस का नेतृत्व कर रहा था.

पूरे घटनाक्रम को जानने के बाद हमने सरकार से यह मांग की है: – (1) उजाड़े गए सभी लोगों को पुनः बसाया जाए, उनको 5-5 एकड़ जमीन दिया जाए तथा नष्ट किया गये मकान और सभी सामानों का मुवावजा दिया जाए. (2) एसपी पर हत्या का मुकदमा चलाया जाए और उसे अविलंब गिरफ्तार किया जाए. (3) असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वसरमा को बर्खास्त किया जाए.

conspiracy in Darang