जन आंदोलन के रूप में विकसित होता भारत का किसान आंदोलन

वर्ष - 30
अंक - 40
01-10-2021


- पुरुषोत्तम शर्मा

संयुक्त किसान मोर्चे के आह्वान पर आयोजित 5 सितंबर की मुजफ्फरनगर रैली और 27 सितंबर के सफल ‘भारत बंद’ के बाद वर्तमान किसान आंदोलन ने एक नए चरण में प्रवेश कर लिया है. भारत बंद को देश के लगभग सभी राज्यों में समाज के विभिन्न तबकों द्वारा मिले सक्रिय समर्थन ने अब भारत के इस एतिहासिक किसान आंदोलन की एक देशव्यापी जन आंदोलन में तब्दील होने की राह खोल दी है. इस भारत बंद की एक खास विशेषता यह रही कि देश की वामपंथी पार्टियों सहित पूरे विपक्ष की पार्टियों ने इसे समर्थन दिया था. पंजाब, हरियाणा में बंद का व्यापक असर होगा यह देश की जनता जानती ही थी. केरल, तमिलनाडु और झारखंड जैसे राज्यों में राज्य की सत्ताधारी पार्टियों का सक्रिय समर्थन मिलने से वहां भी बंद का प्रभाव ज्यादा व्यापक दिखा. बिहार में किसान संगठनों के साथ ही भाकपा(माले) और महागठबंधन से जुड़े दलों के सड़कों पर उतरने से सम्पूर्ण बिहार बंद रहा.

पश्चिम बंगाल में लगभग 325 स्थानों पर आंदोलनकारी सड़कों पर उतरे और 14 राष्ट्रीय राजमार्गों पर चक्का जाम रहा. इस बार कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश सहित पूरे दक्षिण भारत में किसान संगठनों के साथ ही समाज के अन्य हिस्सों की व्यापक गोलबंदी किसानों के भारत बंद के समर्थन में दिखी. पूरे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में जहां जल्द ही चुनाव होने वाले हैं, बंद के समर्थन में हर जगह गोलबंदी देखी गई, जबकि कई बाजार और कचहरियों में व्यापारियों व वकीलों ने बंद रख किसानों का समर्थन किया. मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र के साथ ही उत्तर पूर्व और हिमांचल, जम्मू कश्मीर में भी इस बंद के समर्थन में बड़े पैमाने पर लोग किसानों का साथ देने सड़कों पर उतरे. दिल्ली के मोर्चों पर जमे किसानों ने गाजीपुर बार्डर पर एनएच 24 को सुबह 6 बजे से ही पूरी तरह जाम कर दिया था. टीकरी के जत्थों ने बहादुरगढ़ में रेल पटरियों पर पड़ाव डाल दिया था और सिंघू के जत्थे केएमपी को जाम किए रहे.

यह आंदोलन जितना लंबा होता जा रहा है, मोदी राज में सत्ता की मार झेल रहे लोगों व समूहों के लिए प्रेरणा का श्रोत बनता जा रहा है. चाहे चार श्रम कोड बिलों के जरिए नई गुलामी की ओर धकेला जा रहा देश का मजदूर वर्ग हो, निजीकरण की मार से प्रभावित सार्वजनिक व सरकारी संस्थानों के कर्मी हों, पदों की समाप्ति, नौकरियों के कम होते अवसरों से बेरोजगारी की मार झेल रहा नौजवान हो, बिना वेतन खटाए जा रहे स्कीम वर्कर हों, या झूठे मुकदमों में फंसाए जा रहे नागरिक अधिकार व मानवाधिकार कार्यकर्ता हों, शिक्षा के निजीकरण व व्यवसायीकरण से पीड़ित छात्र हों या समानता और सुरक्षा के लिए लड़ रही देश की महिलाएं हों, खुदरा क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और कारपोरेट कंपनियों के दखल से पीड़ित व्यापारी वर्ग हो या बढ़ती कीमतों की मार झेल रही आम जनता, सभी के साथ आज के किसान आंदोलन के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से सात साल के शासन काल में यह एकमात्र ऐसा आंदोलन टकराया जिससे निपटने में उसकी सारी तरकीबें अब तक पफेल होती गई हैं. आज तक तमाम आंदोलनों को तोड़ने के लिए आजमाए गए फार्मूलों के असफल होने के बाद मोदी सरकार ने इस आंदोलन को थकाने और निराशा की तरफ धकेलने का रास्ता अपनाया. इसके लिए किसान संगठनों के साथ चल रही वार्ता के 11 दौर के बाद सरकार ने 22 जनवरी 2021 के बाद वार्ता बंद कर दी और दिल्ली के मोर्चों पर जमे किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया. सरकार को उम्मीद थी कि आंदोलन के प्रति उसकी बेरुखी दिल्ली के मोर्चों पर जमे किसानों के धैर्य को तोड़ देगी और अंततः किसान संगठनों को सरकार की शर्तों पर वार्ता के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

पर आठ महीने बीतते-बीतते मोदी सरकार का यह दांव भी उल्टा पड़ता जा रहा है. इन 10 महीनों में लगभग 650 शहादतों के बाद भी दिल्ली के मोर्चों पर जमे आन्दोलनरत किसानों का जोश व जज्बा कम नहीं हुआ है. आंदोलन के मोर्चे पर बढ़ते दिनों के बावजूद किसानों की शंकल्प शक्ति में लगातार इजाफा हो रहा है. जो किसान दस माह पूर्व सिर्फ दो दिन के लिए दिल्ली की ओर चले थे, वे अब मई 2024 में इस किसान-मजदूर विरोधी मोदी सरकार को सत्ता से उखाड़ कर ही लौटने का संकल्प लिए मोर्चे पर डटे हैं. असल में, यह कानून किसानों के लिए जीवन-मरण के प्रश्न बन गए हैं. किसान यह समझ रहा है कि खाली हाथ लौट जाने के बाद इन तीन कानूनों की वजह से वह मारा ही जाएगा. ऐसे में अगर मरना है तो यहीं संघर्ष के मोर्चे पर क्यों नहीं? किसान इस लड़ाई को अपनी फसलों और आगे की नस्लों को बचाने की लड़ाई मानता है.

आखिर किसानों को इतनी लंबी लड़ाई लड़ने की यह ताकत कहां से मिल रही है? पंजाब से शुरू हुए एक साल पूर्व के संघर्ष में 650 के करीब शहादतों के बाद भी इन किसानों के हौसले क्यों बुलंद हैं? इसके लिए यह जानना जरूरी है कि इस पूरे संघर्ष को लेकर देश के किसानों और उनके नेतृत्व की क्या समझ बनी है. पहला, इस आंदोलन के माध्यम से किसान नेतृत्व ने लगातार घाटे की खेती के कारण कर्ज में डूबकर आत्महत्या के लिए मजबूर देश के किसानों के अंदर आत्महत्या करने के बजाय लड़कर एक नई और बेहतर जिंदगी जीने की आस जगा दी है. इस आंदोलन से किसानों के अंदर जगी नई आस के बाद देश में किसान आत्महत्याओं में भारी गिरावट आई है. अब किसान आत्महत्या करने के बजाए संघर्ष के मोर्चे पर शहादत देना ज्यादा बेहतर विकल्प मान रहा है. इसीलिए आंदोलन के मोर्चे पर इतनी शहादतें भी किसानों को विचलित नहीं कर पा रही हैं.

दूसरा, किसानों को यह समझ आ रही है कि इन कारपोरेट परस्त कानूनों के लागू होने के बाद उनकी जमीनें धीरे-धीरे उनके हाथ से निकल जाएंगी. कांट्रेक्ट खेती का कानून और नया मंडी कानून किसानों को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फांसने की चाल हैं, जो हमारी खेती को कारपोरेट के कब्जे में धकेल देंगी. ऐसे में जो पुश्तेनी रोजगार का एक साधन जमीन के रूप में किसान के हाथ में बचा है, वह भी छिन जाएगा. इसी को किसान कह रहे हैं कि  हमारी लड़ाई अपनी ‘आज की फसल और आगे की नस्ल’ बचाने की है. अगर हमारी फसल और नस्ल नहीं बचेगी तो हमारे जीने का क्या फायदा है. इसीलिए ये किसान चाहे जितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़े, लड़ने को तैयार हैं.

तीसरा, इन आन्दोलनरत किसानों ने समझ लिया है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन देश के अन्न भंडारण पर कारपोरेट का कब्जा कराने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त कराने की साजिश है. अगर देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली खत्म हो गई और कारपोरेट मनमानी कीमत पर अनाज बेचने लगा, तो किसानों के परिवार से ही मजदूर बने करोड़ों लोगों, गांव के खेत मजदूरों, दलितों, आदिवादियों के सामने बड़ा खाद्य संकट खड़ा हो जाएगा. इसलिए किसान मजदूर बने अपने ही बच्चों, अपने गांव के गरीबों की खाद्य सुरक्षा की लड़ाई भी लड़ रहा है. उनका साथ किसानों को इस आंदोलन में मिल भी रहा है.

आज 10 माह बाद किसान आंदोलन के मुद्दों में निजीकरण और सरकारी-सार्वजनिक संपत्तियों की नीलामी का विरोध भी जुड़ गया है. देश में मजदूर-किसान एकता को और मजबूत करते हुए जहां देश की 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें किसानों की मांगों का शुरू से समर्थन करती रही हैं, वहीं भारत बंद के आह्वान तक पहुंचते-पहुंचते किसान आंदोलन के एजेंडे में भी चार श्रम कोड बिलों की वापसी की मांग प्रमुखता पा गई. इस तरह अगर देखें तो किसानों का यह ऐतिहासिक आंदोलन समय के बढ़ते जाने के साथ अपने दायरे को बढ़ाता हुआ एक राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन का रूप ग्रहण करता जा रहा है. यह आंदोलन राजनीतिक पार्टियों के साथ अपने मंच को साझा करने से बचते हुए भी राजनीतिक नारों को गढ़ने की तरफ बढ़ गया है. भारत बंद का प्रमुख नारा ‘कारपोरेट खेती छोड़ो-नरेंद्र मोदी गद्दी छोड़ो!’ इसका उदाहरण है. भारत बंद की सफलता ने किसान आंदोलन की 8 माह से उपेक्षा कर रही मोदी सरकार की बैचैनी को बढ़ा दिया है. अब सरकार इस आंदोलन से जल्द छुटकारे के लिए किसी रास्ते की तलाश में जुटी दिख रही है.

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