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डा. अम्बेडकर के समतामूलक व जातिविहीन समाज के निर्माण के सपने को कांशीराम ने दलित मुख्यमंत्री-दलित प्रधानमंत्री बनाने व दलितों को अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करके एक नये राजनीतिक जागरण को पैदा किया था. मगर कांशीराम की राजनीति के केन्द्र में हमेशा दलित ही थे.

विगत 10 वर्षों में चाहे राजनीतिक नारों के बदलाव के जरिये हो, जिकरपुर (सहारनपुर) की दलित बस्ती में सामंती शक्तियों द्वारा आग लगाने की घटना हो, 2 अप्रैल 2018 को एससी-एसटी एक्ट बचाने के लिए दलित संगठनों द्वारा घोषित भारत बंद को समर्थन देने का सवाल हो, दलित युवती से बलात्कार की हाथरस जैसी घटनाए हों, भाजपा सरकार की जन विरोधी-दलित विरोधी नीतियों के खिलाफ खड़े होने का सवाल हो, मायावती के नेतृत्व ने दलित वर्ग को न सिर्फ मायूस किया है बल्कि उनके नेतृत्व मे दलित वर्ग व उसके सवाल किनारे की तरफ धकेल दिये गये हैं.

गुजरात में मोदी के लिए चुनाव प्रचार करने और भाजपा के साथ साझा सरकार बनाने के समय में भी जिन्हें बसपा में भाजपा विरोध दिखता था, उन्हें भी आज यह महसूस हो रहा है कि बसपा का भाजपा विरोध समाप्त-सा हो गया है, इसका परिणाम ही था कि 2017 में बड़ी आसानी के साथ बसपा के कोर वोट जाटव को छोड कर अन्य दलित जातियों को अपनी ओर खींचने में भाजपा कामयाब रही. 2017 में योगी सरकार बनने से लेकर 2019 में मोदी सरकार की पुनर्वापसी में भाजपा को जीत दिलाने में अतिपिछडी जातियों के साथ ही दलित जातियों की भाजपा के पक्ष मे गोलबंदी ने बड़ी भूमिका निभाई थी. यही नहीं, 2019 में सपा-बसपा गठबंधन को शिकस्त दे कर भाजपा ने 1992 में मुलायम-कांशीराम के मिलने से हुई अपनी हार का न सिर्फ बदला ले लिया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि दलितों-पिछड़ों का उसे उनसे ज्यादा समर्थन हासिल है.

उत्तर प्रदेश में दलितों ने बसपा के दबंग सामंती हिस्से से आने वाले प्रत्याशियों को कांग्रेंस-भाजपा के दबंग प्रत्याशियों के मुकाबले वोट देना इसलिए कुबूल किया था कि कुछ भी हो, आखिर इन प्रत्याशियों का नियंत्रण हमारी जाति की नेता के हाथों में है. ऐसा सोचने वाले बसपा समर्थक दलित हिस्से को भी बसपा के ‘राम मंदिर’ बनाने की हालिया घोषणा ने पूरी तरह मायूस कर दिया है. बसपा के उन समर्थकों को अब लगने लगा है कि खुद मायावती और पूरी बसपा पर ही सवर्ण सामंती ताकतों ने नियंत्रण हासिल कर लिया है. अम्बेडकरवादी तो पहले ही बसपा की राजनीति पर सवाल उठाते रहे हैं, अब कांशीराम समर्थकों को भी लगता है कि मायावती ने कांशीराम जी के मिशन से गद्दारी कर दी है.

उत्तर प्रदेश में बसपा के इस वैचारिक-राजनैतिक पतन ने दलित राजनीति में एक शून्य पैदा किया है, जिसे भरने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे चंद्रशेखर रावण की भीम आर्मी कोशिश कर रही है, कांग्रेस दलितों मे जा रही है, सपा को बसपा से दल-बदल कर आ रहे नेताओं के जरिये उस जनाधार के अपने पास आने की उम्मीद है. वहीं बसपा एक हिस्से को ब्राहम्णों के सहयोग से सत्ता में आने का सपना दिखा कर रोकने की कोशिश कर रही है. मगर सबसे अहम सवाल तो यह है कि दलितों का वह हिस्सा जिसे भाजपा पिछले चुनाव में जीतने मे कामयाब हो गयी थी उसे कौन और कैसे वापस लायेगा.

भाजपा व योगी राज के खिलाफ दलितों में बढता आक्रोश

भाजपा ने दलितों में आमतौर पर मुस्लिमों का भय दिखा कर हिन्दुत्व की राजनीति के जरिये घुसपैठ की थी और बसपा ने दलितों के दम पर हासिल सत्ता की सारी मलाई ‘जाटव’ जाति को ही खिला दी है, यह प्रचार चला कर अन्य दलित जातियों को अपने पाले मे खींचा था. इससे पासी-कोरी जैसी बड़ी दलित जातियां भाजपा के पक्ष में गोलबंद हुई थीं.

योगी राज में उत्तर प्रदेश में सवर्ण सामंती ताकतों का दबदबा किस तरह कायम रहा है, यह किसी से छुपा नहीं है. योगी राज मे डा. अम्बेडकर की मूर्ति को भगवा रंग मे रंगने से लेकर उन्हें तोडने व अपमानित करने की घटनाएं तो आम रही हैं. आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने, दलितों-पिछड़ों के नौकरी पाने के अवसर छिनने और एससी-एसटी एक्ट को समाप्त करने की कोशिशों के खिलाफ दलित संगठनों द्वारा 2 अप्रैल 2018 को बुलाए गये भारत बंद पर योगी सरकार द्वारा ढाये गये बर्बर दमन, मुकदमों, और दलित नौजवानों की गिरफ्तारियों से दलितों, खासकर दलित नौजवानों में भाजपा के खिलाफ व्यापक आक्रोश है. बसपा ही नहीं, अन्य विपक्षी पार्टियां सपा-कांग्रेस भी इन मुद्दों पर खामोश रही हैं. चुनाव नजदीक आने पर जाति जनगणना की बात उठा कर सपा जरूर दलितों-पिछड़ों की हिमायती बनने की कोशिश कर रही है, मगर योगी राज में पुलिस एनकाउन्टरों व पुलिस हिरासत में बड़ी संख्या में मारे गये दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों की हत्याओं पर इन्होंनें कोई बडी़ पहल नहीं ली. इस सबके विपरीत लोगों ने 2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान पहली बार लाल और नीले झंडे को इतने बड़े पैमाने पर एक साथ संघर्ष करते हुए देखा.

भाजपा के लोग सपा-बसपा व कांग्रेस द्वारा विपक्ष की भूमिका निभाने में की गयी ढिलाई, दलित जातियों के सामने सपा-कांग्रेस को लेकर मौजूद असमंजस और बसपा छोडने के बाद सपा-कांग्रेस में जाने के बजाय भाजपा में जाने को लेकर यह प्रचार फैला रहे हैं कि भाजपा का कोई विकल्प नहीं है. जबकि मायावती जी को अभी भी लगता है कि जिस तरह सपा द्वारा अल्पसंख्यकों के सवाल पर कोई पहल न लेने पर भी मुसलमान सपा के साथ जा सकते हैं, उसी तरह दलितों का एक हिस्सा भी देर-सबेर  बसपा में लौट आयेगा.

दलित राजनीति उत्तर प्रदेश में संक्रमण काल से गुजर रही है. दलितों के बड़े हिस्से में बसपा से जुड़ने के संकेत नहीं दिख रहे हैं. इससे उत्तर प्रदेश में बसपा हाशिये की तरफ जा रही है. उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक बदलाव आ रहा है. इस दौर में बड़े पैमाने पर नये-नये दलित संगठन और अम्बेडकरवादी समूह उभरे हैं. वे चुनाव में किस तरफ जाते हैं, यह देखना है. मगर नौजवानों का एक हिस्सा जो बसपा से मायूस है और जिसका स्थापित दलित नेताओं-पार्टियों से मोहभंग हो रहा है, जो दलितों का हित भाजपा के खिलाफ लडाई में देखता है, आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर शामिल हो रहा है. वह योगी-मोदी की जालिम सरकार के खिलाफ नये-नये गीत लिख रहा है. ऐसे नौजवानों का एक हिस्सा वामपंथ के साथ भी जुड़ रहा है. रायबरेली, बस्ती, गाजीपुर व सीतापुर में, जो बड़ी दलित आबादी के जिले है, दलित नौजवानों का भाकपा(माले) के साथ जुड़ना राजनीति का एक नया अध्याय बनता जा रहा है.

उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति में आ रहे ये बदलाव आने वाले दिनों में क्या राजनीतिक शक्ल लेंगे, देखना बाकी है.