13 अप्रैल, जलियांवाला बाग की वर्षगांठ पर


–  तुहिन देब

13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग नृशंस हत्याकाण्ड के 102 वर्ष गुजर गए हैं. असंख्य स्वतंत्रत संग्रामी क्रांतिकारियों के बलिदान से मिली औपचारिक आजादी को भी 74 वर्ष पूरे हो गए हैं. यह भारत के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करीब 100 वर्ष पूर्व की घटना के विश्लेषण का एक विनम्र प्रयास है.

आज के भारत में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अनुगूंज


– दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा(माले)

23 जनवरी 2021 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती थी. जब हम इस ऐतिहासिक अवसर को मना रहे हैं, तो यही समय है कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन के इस महान नायक की मूल दृष्टि और विरासत पर हम पुनः निगाह डालें.

सत्ता की साजिशों पर भारी पड़ा किसान आंदोलन का पलटवार


– पुरुषोत्तम शर्मा

जिस तरह से दिल्ली के सीएए विरोधी आंदोलन को तोड़ने और बदनाम करने के लिए केंद्र की सत्ता और भाजपा-आरएसएस ने दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा की साजिश रची, भाजपा नेता कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को उसका नायक बनाया, उसी तरह से 26 जनवरी 2021 को पिछले पांच माह से शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से चल रहे किसान आंदोलन को भी बदनाम करने और हिंसक बनाने के लिए साजिश रची गई.

किसान आंदोलन, ट्रैक्टर परेड और हिंसा


दिल्ली में 26 जनवरी को किसान आंदोलन द्वारा किसान ट्रैक्टर परेड का आयोजन किया गया. हजारों की तादाद में ट्रैक्टर सड़कों पर उतरे. इसी के एक हिस्से में हिंसा हुई और एक किसान की मौत हुई. निश्चित ही हिंसा होना ठीक नहीं है, अराजकता का होना भी ठीक नहीं है. इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए. यह आंदोलन के लिए भी उचित नहीं है.

लेकिन इससे कुछ सवाल उठते हैं. पहला यह कि क्या उस ट्रैक्टर परेड की मुख्य विशेषता हिंसा थी? दूसरा क्या हिंसा एकतरफा थी? सवाल यह भी है कि क्या किसान आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने हिंसा का समर्थन किया?

आत्मनिर्भर किसान का मोदी माॅडल


प्रधानमंत्री की बहुप्रचारित किसान सम्मान योजना के तहत भूमिहीनों व गरीब  किसानों को छोड़कर 6000 रु. वार्षिक/किसान परिवार देने की घोषण की गई अर्थात 500रु प्रति परिवार प्रति माह. ज्ञात हो देश के किसी किसान ने सरकार से इस राशि की मांग नहीं की थी. फिर सरकार किसानों पर अचानक इतना मेहरवान क्यों हो गई? आइए जरा गौर करें सरकार किसानों से कितना ले रही है और कितना उनको दे रही है.

किसान आंदोलन में दलितों-भूमिहीनों का एजेंडा



दिल्ली में किसानों के ऐतिहासिक पड़ाव के साथ ही देश भर में उठ खड़े हुए वर्तमान किसान आंदोलन के साथ देश के दलितों, भूमिहीनों और गरीबों का वैसा जुड़ाव नहीं दिख रहा है, जैसा कि होना चाहिए. तो क्या इस आंदोलन के एजेंडे में सिर्फ किसानों की मांगें ही हैं? क्या तीन कृषि कानूनों का देश के गरीबों, दलितों, भूमिहीनों के जीवन से कुछ भी लेना देना नहीं है?