रविवार, 17 अक्टूबर 2021 को कुर्जी स्थित ब्रज किशोर मेमोरियल भवन में कामरेड प्रो. अरविंद कुमार की स्मृति सभा आयोजित की गयी. कामरेड अरविंद ने 1980 के आसपास भाकपा(माले) लिबरेशन से जुड़े और तब से लेकर अपने अंतिम क्षणों तक पार्टी के सक्रिय सदस्य के बतौर कार्य करते रहे. भाकपा(माले) के कई पत्र-पत्रिकाओं जैसे - समकालीन जनमत, लोकयुद्ध, श्रमिक सॉलिडेरिटी आदि के प्रकाशन के काम से आजीवन जुड़े रहे. भाकपा-माले के पूर्व महासचिव विनोद मिश्र की संकलित रचनाओं के प्रकाशन में उनकी अहम् भूमिका रही थी. साल 2019 में हुए एक दुर्घटना के बाद उन्हें कई प्रकार के शारीरिक संकटों से गुजरना पड़ा. 2021 में कोविड के दूसरे उभार में 12 अप्रैल को वे कोविड से संक्रमित हो गए. 14 अप्रैल को पटना के रुबन अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया था. उनकी तबियत लगातार बिगड़ती गयी और अंततः 10 मई 2021 को लगातार दो हार्ट अटैक आने से वे हमारे बीच नहीं रहे. प्रतिकूल परिस्थितियों में उनके चले जाने के कारण उनके परिजन, निकट संबंधी, सहकर्मी, साथी व छात्र आदि उन्हें अंतिम विदाई भी नहीं दे सके थे. स्मृति सभा के आयोजन से उनके चाहनेवालों ने उन्हें याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

स्मृति सभा की शुरुआत वहां मौजूद तमाम लोगों द्वारा उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण, पुष्पांजलि व मौन श्रद्धांजलि देने के साथ हुई. इस मौके पर मौजूद जसम की नाट्य-गायन इकाई हिरावल के सदस्यों द्वारा कामरेड महेश्वर के चर्चित गीत ‘सृष्टि बीज का नाश न हो’ के गायन के साथ कार्यक्रम आगे बढ़ा. उनकी निकट संबंधी व बिहार सचिवालय सेवा संघ की नेत्री सुनीता सिन्हा द्वारा अरविंद जी के जीवन और उनके द्वारा किए गए कार्यों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने और अरविंद जी के पुत्र अभिनव द्वारा तैयार किये गए पीपीटी जिसमें कामरेड अरविंद जी की यादगार तस्वीरों को संकलित किया गया था, के प्रदर्शन के बाद स्मृति वक्तव्यों का सिलसिला शुरू हुआ.

स्मृति सभा में प्रथम वक्ता के रूप में उनके चचेरे भाई ने अरविंद जी के साथ अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि वे एक सुलझे व्यक्तित्व के आदमी थे. हर किसी की मदद करना उनके व्यक्तित्व का एक खास अंग था. वे हर जरूरतमंद व्यक्ति के लिए वे खड़े रहते थे.

उनके निकट मित्र व पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. शिवरतन ठाकुर ने कहा कि अरविंद जी साधारण व्यक्ति नहीं थे. वे विलक्षण प्रतिभा वाले इंसान थे. वे आजीवन समाज को बेहतर बनाने के प्रति संकल्पित दिखे. चाहे लेखन के माध्यम से हो या शिक्षण के माध्यम से उन्होंने हमेशा समाज में बेहतर विचारधारा से पोषित छात्रों को खड़ा करने का कार्य किया था.

एनआइटी पटना के सेवानिवृत प्रो. संतोष कुमार, पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. भारती एस कुमार (छप्ज्, पटना कॉमर्स कॉलेज के प्राध्यापक प्रो. सैयद अली व प्रो. संजय कुमार, बिहार इंजीनियरिंग सेवा संघ के पूर्व महासचिव ई. श्यामनन्दन सिंह, भाकपा(माले) पोलित ब्यूरो के सदस्य का. प्रभात कुमार चौधरी, टिस पटना के निदेशक पुष्पेंद्र कुमार आदि ने भी प्रो. अरविंद कुमार को याद करते हुए उनसे जुड़ी स्मृतियों को साझा किया.

स्मृति सभा में भाकपा(माले) के राज्य सचिव कुणाल, पटना जिला सचिव व पोलित ब्यूरो के सदस्य अमर, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजाराम सिंह, वरिष्ठ नेता केडी यादव, लोकयुद्ध के संपादक संतोष सहर, ऐपवा राज्य अध्यक्ष सरोज चौबे व राज्य सचिव का. शशि यादव, पटना नगर सचिव अभ्युदय, फुलवारी के विधायक गोपाल रविदास, ऐक्टू के महासचिव आरएन ठाकुर व राज्य सचिव रणविजय कुमार आदि समेत दर्जनों की संख्या में भाकपा(माले) नेता व कार्यकर्ता भी मौजूद रहे.

सभा में कामरेड अरविंद कुमार की जीवन संगिनी भाकपा(माले) व ऐपवा नेत्री कामरेड अनिता सिन्हा, उनके पुत्र अभिनव व अमन, उनके भाई अजय कुमार, अरुण कुमार व पंकज आदि समेत उनके कई परिजन और उनके अच्छी-खसी तादाद में उनके ग्रामवासी भी शरीक हुए. प्रो. अरविंद कुमार के शिष्य रहे कई छात्र-छात्राओं ने भी सभा में शिरकत की और कुछ ने उसे संबोधित भी किया. स्मृति सभा का संचालन ऐपवा महासचिव मीना तिवारी ने किया. बड़े पुत्र अभिनव के भाव विह्वल व सारगर्भित वक्तव्य के साथ स्मृति सभा का समापन हुआ.

- प्रियंका प्रियदर्शिनी

 

कामरेड प्रो. अरविंद कुमार सिंह

जन्म : सन 1952 में पटना जिले के मसौढ़ी प्रखंड स्थित पंडितगंज बारा के एक किसान परिवार में

माता-पिता : धिन्वंतरी देवी व उमेश नारायण सिंह

शिक्षा : स्कूली शिक्षा महावीर हाईस्कूल और मारवाड़ी हाईस्कूल, गया व उच्च शिक्षा गया कॉलेज, गया व पटना साइंस कॉलेज से.

जीविका : 1975 में एमएससी पूरा करने के बाद 1976 में उन्होंने आरा के जगजीवन कॉलेज में बतौर लेक्चरर काम शुरू किया और फरवरी 2017 में कॉमर्स कॉलेज, पटना से सेवानिवृत्त होने तक वे प्राध्यापक के बतौर काम करते रहे. अपनी सर्विस के दौरान उन्होंने नौ अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ाया. वैचारिक झुकाव के कारण उनका बार-बार तबादला कर दिया जाता था. जल्दी-जल्दी होने वाले ये तबादले दिखाते हैं कि वामपंथी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध होने के कारण उन्हें बार-बार प्रताड़ित किया जाता रहा.

राजनीतिक जीवन : छात्र जीवन में नक्सलवाड़ी आंदोलन से लगाव हुआ. 1980 के आसपास भाकपा(माले) (लिबरेशन) से जुड़े और फिर एक सक्रिय सदस्य के बतौर काम करने लगे. पार्टी के कई पत्र-पत्रिकाओं जैसे जनमत, लोकयुद्ध, श्रमिक सॉलिडेरिटी आदि के प्रकाशन के काम से ताजिंदगी जुड़ाव रहा. भाकपा(माले) के पूर्व महासचिव विनोद मिश्रा की संकलित रचनाओं समेत कई पुस्तकों के प्रकाशनों में उनकी अहम भूमिका रही.

जीवन की अंतिम सांस पार्टी के केन्द्रीय कंट्रोल कमीशन और बिहार शिक्षा विभाग के सदस्य रहते हुए ली. पूरा जीवन वामपंथी आंदोलन को समर्पित रहा.

 

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