सामान्य कार्यक्रम

प्रस्तावना

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्कसवादी-लेनिनवादी) अपने सर्वोच्च वर्ग-लक्ष्य की प्राप्ति के लिये संघर्षरत भारतीय सर्वहारा का सर्वोच्च राजनीतिक संगठन है. इसका गठन जनता के अगुआ दस्तों को लेकर हुआ है और यह लिंग, जाति, धर्म-संप्रदाय, भाषा या राष्ट्रीयता का भेद किये बिना स्वतंत्र नागरिक के रूप में भारतीय जनता के सामंती बेड़ियों और बड़ी पूंजी एवं साम्राज्यवाद की लूट और वर्चस्व से मुक्ति पाने तथा समान अधिकार और तीव्र प्रगति हासिल करने के संघर्ष में नेतृत्व-केंद्र का कार्य करती है.

भारत में नव जनवादी क्रांति को पूरा करने के न्यूनतम कार्यक्रम से शुरू करके पार्टी समाजवादी रूपांतरण और साम्यवाद लाने के अधिकतम कार्यक्रम के प्रति, मानव द्वारा मानव के शोषण के सभी रूपों के खात्मे के अंतिम लक्ष्य के प्रति अपने-आपको निछावर करती है.

पार्टी अपना विश्व-दृष्टिकोण मार्कसवादी दर्शन से ग्रहण करती है और मार्कसवाद-लेनिनवाद व माओ विचारधारा की एकल प्रणाली को अपने कामकाज के मार्गदर्शक उसूल के बतौर स्वीकार करती है. पार्टी भारतीय क्रांति की सही लाइन का विकास करने के लिए सुधारवाद, संशोधनवाद, विलोपवाद, बुर्जुआ उदारवाद, अराजकतावाद तथा अन्य तमाम गलत विचारों और प्रवृत्तियों के खिलाफ पार्टी केे भीतर और बाहर निर्मम संघर्ष चलाती है.

पार्टी सर्वहारा अंतर्राष्ट्रवाद को बुलंद करती है और उस पर अमल करती है तथा साम्राज्यवाद, प्रभुत्ववाद, उपनिवेशवाद/नव-उपनिवेशवाद, विस्तारवाद, नस्लवाद, अंधराष्ट्रवाद, आक्रमण एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों में हर प्रकार की दादागिरी का विरोध करती है. यह दुनिया के विभिन्न हिस्सों की तमाम क्रांतिकारी कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट और मजदूर पार्टियों व संगठनों के साथ एकता की आकांक्षा रखती है. यह समूची दुनिया के मजदूरों, उत्पीड़ित जनगण और राष्ट्रों के संघर्ष का समर्थन करती है तथा समूची मानवजाति की पूर्ण मुक्ति के अंतिम लक्ष्य के साथ साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के विरुद्ध होने वाले इन तमाम आंदोलनों में अपने को साझीदार मानती है. बिरादराना रिश्तों में पार्टी स्वतंत्रता, अहस्तक्षेप, समानता तथा आपसी सम्मान व सहयोग के उसूलों का अनुसरण करती है.

पार्टी-कार्यशैली के तीन आधारभूत उसूल हैं -- सिद्धांत को व्यवहार के साथ मिलाना, जनसमुदाय के साथ घनिष्ठ संपर्क बनाए रखना और आलोचना, आत्म-आलोचना तथा समयोचित सुधर करने पर अमल करना. पार्टी अपने व्यवहार को उन्नत करने के लिए हमेशा तथ्यों से सत्य की तलाश करने तथा गहन जांच-पड़ताल व गंभीर अध्ययन संचालित करने की नीति का अनुसरण करती है.

पार्टी सदस्य जनता से असीम प्यार करते हैं, भारतीय समाज की तमाम उत्कृष्ट क्रांतिकारी परंपराओं का पक्षपोषण करते हैं तथा खुद अपनी जान की बाजी लगाकर भी सत्य और साम्यवाद का झंडा बुलंद करने का साहस रखते हैं.

भारतीय समाज

यद्यपि भारत को आज एक उदीयमान एशियाई शक्ति और सूचना प्रौद्योगिकी (आई.टी.) महाशक्ति माना जा रहा है, जो दुनिया में करोड़ों-अरबों डाॅलरों की सम्पत्ति वाले धन्नासेठों की संख्या में सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाले देशों में एक है, लेकिन अब भी यहीं दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब निवास करते हैं. भारतीय कारपोरेट कम्पनियां दुनिया भर में अपने पंख पसार रही हैं, मगर हमारा देश मानव विकास सूचकांक के लिहाज से फिसड्डी ही बना हुआ है जिसकी प्रति व्यक्ति आय दयनीय है.  

एक ओर बेलगाम धनसंचय और खुल्लमखुल्ला भोगविलास की रंगरेलियों में मस्त छोटा सा ऊपरी तबका और दूसरी ओर समाज की बुनियाद के बतौर सारी सम्पदा पैदा करके भी दरिद्रता के अंधेरे दलदल में डूबा विराट जनसमूह, दोनों के बीच का निर्मम विरोधाभास बेहद असंतुलित विकास रणनीति का नतीजा है. इसी रणनीति के चलते कृषि, जो आज भी हमारी जनता की विशाल बहुसंख्या के लिए आजीविका और रोजगार का स्रोत है, लेकिन बड़े पैमाने पर मौजूद अर्ध-सामंती लघु कृषक अर्थव्यवस्था के बोझ तले कराह रही है और जोतदारी रास्ते से पूंजीवादी संक्रमण के स्थायी संकट से ग्रस्त है, को गिरावट की ओर धकेला जा रहा है; अधिकांश परंपरागत उद्योग ठहराव के शिकार हैं जबकि ऐसे सेक्टर आगे बढ़ रहे हैं जो निर्यात बाजार से जुड़े हैं, विदेशी हितों या अभिजात वर्गों के उपभोग की जरूरतों को पूरा करते हैं; सट्टेबाजी तथा भूसम्पत्ति-व्यवसाय के सेक्टरों को विकास के इंजन के बतौर प्राथमिकता में रखा जा रहा है, जबकि हमारे प्राकृतिक और मानव संसाधनों का दरवाजा कारपोरेट-साम्राज्यवादी लूट के लिए अध्किाध्कि खोला जा रहा है.

कृषि समेत तमाम क्षेत्रों में पूंजी की लगातार बढ़ती और चैतरपफा घुसपैठ उत्पादन सम्बंधों और मूल्यबोध के स्तर पर सामंतवाद के जड़ जमाये अवशेषों को खत्म करके नहीं बल्कि उनका इस्तेमाल करते हुए हो रही है और इस तरह उन्हें नये-नये रूपों में पुनरुत्पादित कर रही है. ये अवशेष न केवल भारतीय बड़ी पूंजी और साम्राज्यवाद दोनाों के लिए सस्ती श्रमशक्ति और कच्चे मालों को सुलभ बनाने की गारंटी करते हैं, बल्कि ये दकियानूसी, संकीर्ण विचार तथा अक्सर अत्यंत बर्बर रूपों में व्यवस्थित जातिवादी और सामंती-पितृसत्तात्मक उत्पीड़न के बने रहने का ढांचागत आधार भी प्रदान करते हैं. संक्षेप में, देश के आर्थिक जीवन एवं संसदीय जनवाद की संस्थाओं पर बढ़ता कारपोरेट नियंत्रण सामंती अवशेषों के साथ सांठगांठ करके उत्पादक शक्तियों के विकास को अवरुद्ध तथा विकृत कर रहा है और भारतीय समाज एवं राजव्यवस्था के सर्वांगीण जनवादीकरण की राह में सबसे भारी रुकावट  बना हुआ है.

अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत के बावजूद, राजनीतिक तौर पर शासक नौकरशाह-इजारेदार पूंजीपति वर्ग अपने मूल दलाल चरित्रा को बरकरार रखे हुए है. इसने बहुत से गैर-साम्राज्यवादी देशों के साथ घनिष्ठ आर्थिक रिश्ते कायम किये हैं और विभिन्न विदेशी ताकतों के साथ मोल-तोल की पर्याप्त क्षमता विकसित की है. यह पड़ोसी तथा अन्य देशों में आर्थिक विस्तारवाद की महत्वाकांक्षा को पूरा करने और खनिज एवं तेल संसाधनों पर नियंत्राण हेतु प्रतिद्वंद्विता करने के लिये काफी बड़ी मात्रा में पूंजी का निर्यात भी करता है लेकिन यह सब कुछ बुनियादी तौर पर साम्राज्यवाद पर निर्भरता के चैखटे में ही हो रहा है, जिसकी अभिव्यक्ति सूक्ष्म स्तर पर विभिन्न तकनीकी, वित्तीय तथा बाजार-सम्बंधी गठजोड़ों के बतौर, और उससे कहीं अधिक स्थूल स्तर पर नव-उदारवाद के आर्थिक दर्शन को पूरी तरह अपनाने तथा साम्राज्यवादी योजना के अधीन रहने की राज्य की नीति में होती है.

इसके पफलस्वरूप साम्राज्यवादी प्रभुत्व वाली बहुपक्षीय एजेन्सियां और बड़ी विदेशी ताकतें हमारे घरेलू आर्थिक एवं राजनीतिक मामलों और नीतिगत मसलों में नग्न हस्तक्षेप करने में, और ‘रणनीतिक साझेदारी’ के पर्दे में भारत को अपनी भू-राजनीतिक चालबाजियों में कनिष्ठ साझीदार के बतौर शामिल करने में सक्षम हो जाती हैं. यह निर्भरता हमारे राष्ट्र की स्वाधीनता की भारी कीमत वसूलती है तथा हमारी समप्रभुता के और अधिक क्षरण का वास्तविक खतरा हमेशा बना रहता है, जिसमें हमारे शासक नव-औपनिवेशिक निर्भरता में बंधे आश्रितों जैसा आचरण करते जा रहे हैं.

तीव्र आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के नाम पर शासक वर्गों ने राज्य की भूमिका को कारपोरेट लूट के लिए सुविध जुटाने वाले के बतौर पुर्नसंयोजित करने- उत्पादन में इसकी प्रत्यक्ष भूमिका को बड़े पैमाने पर घटाने, जनता के लिये बुनियादी कल्याणमूलक कार्यों को सम्पन्न करने की राज्य की जिम्मेवारी का परित्याग करने और अर्थतंत्रा की बागडोर बड़ी पूंजी के नेतृत्व वाली बाजार की शक्तियों के हाथों सौंपने, जिसमें बड़ी भारतीय कंपनियां विदेशी काॅरपोरेशनों के घनिष्ठ सहयोग में काम कर रही हैं- की रणनीति अपनाई है. राज्य द्वारा प्रस्तुत और उसके ही द्वारा लागू की जा रही बाजार के जरिये आर्थिक विकास की इस रणनीति ने चंद हाथों में विशाल मात्रा में सम्पत्ति का संचय कर दिया है जबकि अमीर और गरीब के बीच की खाई प्रकट रूप से चैड़ी होती जा रही है और विशाल बहुसंख्यक मेहनतकश जनता विस्थापन, बेदखली और दरिद्रता का शिकार हो रही है. इस कारपोरेटपरस्त साम्राज्यवादपरस्त नीतियों के शासन को कारपोरेट मीडिया के प्रबल हिस्से का और आर्थिक उन्नति करते मध्यवर्ग के प्रभावशाली स्तरों का अपेक्षाकृत निर्विवाद समर्थन हासिल है जबकि विस्तृत होते मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा कारपोरेट लूट और साम्राज्यवादी प्रभुत्व के खिलाफ चलने वाली जनता की लड़ाइयों का समर्थन करता है और अक्सर जनवादी अधिकारों एवं जनाकांक्षाओं की दावेदारी की लड़ाई को तीक्ष्णता प्रदान करता है.

कुल मिलाकर, पार्टी भारत को एक कृषि प्रधन पिछड़े पूंजीवादी समाज के रूप में चिन्हित करती है. जड़ें जमाये सामंती अवशेष और खांटी औपनिवेशिक अतीत का खुमार इस समाज को पीछे खींच रहे हैं और फिर यह समाज इन अवशेषों को बल प्रदान कर रहा है, तथा वैश्विक पूंजी एवं साम्राज्यवाद के लुटेरे प्रभुत्व के तले लड़खड़ा रहा है.

भारतीय राज्य

साम्राज्यवाद-परस्त बड़ा पूंजीपति वर्ग जोतदारों और कुलकों के साथ संश्रय कायम करके भारतीय राजसत्ता का नेतृत्व करता है. वैश्विक पूंजी के साथ संश्रय कायम करके भारतीय पूंजी ने विदेशों में अपने कार्यकलाप का विस्तार करना शुरू कर दिया है. भारतीय राज्य भी क्रमशः आंचलिक प्रभुत्ववादी शक्ति के बतौर उभर रहा है, हालांकि ऐसा वह अमरीकी साम्राज्यवाद की वैश्विक योजना में एक प्रमुख सहयोगी के बतौर ही कर रहा है.

भारतीय राज्य आम तौर पर संवैधानिक और संसदीय-जनवादी चैखटे के अंदर ही काम करता है, जहां जनता को संसद, राज्यों की विधनसभाओं तथा विभिन्न स्तरों की पंचायती राज संस्थाओं, नगर निकायों अथवा स्वायत्त परिषदों को चुनने का औपचारिक अधिकार हासिल है. मगर वास्तविक जीवन में निचले स्तर के निर्वाचित निकायों को सत्तांतरण नहीं के बराबर हुआ है और जमीनी स्तर पर भागीदारी-आधरित संसदीय जनवाद की सामान्य धरणा की सम्पूर्ण अवहेलना करते हुए नौकरशाही अपना प्रभुत्व बरकरार रखे हुए है. विभिन्न सामाजिक पहचानों एवं धर्मिक विभाजनों के नाजुक संतुलन का इस्तेमाल करते हुए और राज्य मशीनरी के विभिन्न अंगों एवं मीडिया के प्रमुख हिस्से पर जबर्दस्त पकड़ को काम में लगाते हुए बड़ी पूंजी, साम्राज्यवाद एवं सामंती-कुलक लाॅबियों का गठजोड़ संसदीय जनवाद के समूचे नेटवर्क पर अपना कारगर नियंत्रण बरकरार रखता है.

1970 के दशक के मध्य में, शासक कांग्रेस पार्टी प्रेस की आजादी का हरण करने, कई नागरिक स्वतंत्रताओं एवं जनवादी अधिकारों को स्थगित एवं सीमित करने, चुनाव को टालने और यहां तक कि पूंजीवादी विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार करने के लिये आंतरिक इमरजेन्सी की घोषणा की हद तक चली गई थी. इस किस्म की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर दुबारा नहीं आई, लेकिन देश के कई हिस्सों में अघोषित इमरजेन्सी की स्थिति बनी हुई है और विद्रोह का दमन करने अथवा आतंकवाद का मुकाबला करने के नाम पर नियमित रूप से लोकतांत्रिक आवाजों का गला घोंटा जा रहा है. इसके अलावा, सरकारें आदतन नीति-सम्बंधी महत्वपूर्ण प्रश्नों पर संसद को दरकिनार करती हैं और यहां तक कि दूरगामी रणनीतिक महत्व के फैसलों को बिना किसी संसदीय स्वीकृति के, अथवा जनमतसंग्रह कराने की बात तो दूर, जनता से किसी भी किस्म का सलाह-मशविरा किये बगैर, जबर्दस्ती थोप देती हैं. राष्ट्रीय और प्रादेशिक, दोनों स्तरों पर बड़ी पूंजी और शासक वर्ग की पार्टियों के बीच बढ़ता गठजोड़ संस्थाबद्ध भ्रष्टाचार और बड़े पैमाने के घोटालों तथा कारपोरेट शक्तियों द्वारा पूंजीवादी जनतंत्र के अभूतपूर्व हनन की ओर ले जाता है.

भारत का कानूनी, न्यायिक एवं प्रशासकीय ऊपरी ढांचा और सशस्त्र सेनाएं अभी भी काफी हद तक औपनिवेशिक अतीत की विरासत हैं. एक विदेशी ताकत द्वारा अधीन जनता पर शासन करने और उनका दमन करने के उद्देश्य से रचित यह ऊपरी ढांचा बहुसंख्यक भारतीय जनता को स्वतंत्र नागरिक के बतौर उनके बुनियादी सम्मान और हैसियत से वंचित करता है. औपनिवेशिक जमाने के शासक-शासित सम्बंध की संस्कृति नागरिकता की आधुनिक लोकतांत्रिक धरणा पर आज भी हावी है, जबकि कट्टर श्रेणीबद्ध जातीय समाज और गोत्रों व समुदायों के पितृसत्तात्मक हुक्मनामे व्यक्तिगत आजादी और अधिकारों की दावेदारी को बुरी तरह से सीमाबद्ध और कमजोर करते हैं. निरंकुश कानून; कानून से परे और न्यायिक प्रक्रिया से परे दमन; हिरासत में यातना, बलात्कार और हत्याऋ नकली ‘मुठभेड़’; बिना सुनवाई के कैद में रखनाऋ अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और राजनीतिक विरोध्यिों की धरपकड़; जन प्रतिवादों पर पुलिस बर्बरता; और यहां तक कि तथाकथित ‘अशांत क्षेत्रों’ में सेना का हस्तक्षेप, जिसमें सशस्त्र बलों को पूरी छूट के साथ दमन के ‘विशेष अधिकार’ दिये गये हैं -- उपनिवेशोत्तर भारत में ‘कानून का शासन’ मानवाधिकारों के रोजमर्रा उल्लंघन का पर्याय बना हुआ है.

भारत बहुतेरी राष्ट्रीयताओं और नृजातीय (एथ्निक) भाषाई समूहों की भूमि है. बढ़ती आर्थिक व सांस्कृतिक अंतःक्रिया तथा उपनिवेशवाद-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन और साम्राज्यवाद-विरोधी व जनवादी संघर्षों के दौरान निर्मित दशकों पुरानी एकता के बल पर अर्जित आपसी समावेशन ने हमारे समाज के बहुराष्ट्रीय तानेबाने को एकीकृत भारतीय पहचान प्रदान की है. लेकिन जनता की एकता के क्रमविकास की यह प्रक्रिया प्रबल क्षेत्रीय विषमताओं तथा अंधराष्ट्रवादी व अति-केन्द्रित भारतीय राज्य द्वारा खुल्लमखुल्ला भेदभाव और निरंतर दमन की नीति का शिकार है, जो कश्मीर एवं उत्तर-पूर्व के राज्यों में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. इसीलिए विभिन्न राष्ट्रीयताएं और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक समूह विभिन्न रूपों और विभिन्न दर्जों के आत्मनिर्णय के लिए दीर्घकालीन संघर्षों में लगे रहते हैं. इन आकांक्षाओं और संघर्षों का बर्बरतापूर्ण दमन करने के अलावा राज्यतंत्र फूट डालो और राज करो की नीतियों तथा विद्रोह-दमन के हथकंडों का भी सहारा लेता है, जिसकी परिणति संकीर्ण एथ्निक झड़पों में होती है तथा निरपराध लोगों के लिए अनवरत हिंसा और असुरक्षा का माहौल बना रहता है.

भारत अनेक धर्मों की भी भूमि है. लेकिन राजनीति व राज्य के मामलों से धर्म के स्पष्ट अलगाव के अर्थ में धर्मनिरपेक्षता को लागू करने की बजाय राज्य ने धर्मनिरपेक्षता को महज साम्प्रदायिक सद्भाव की धरणा तक सीमित कर दिया है. बहुसंख्यक सम्प्रदाय की शक्तिशाली साम्प्रदायिक गोलबंदी के सामने राज्य घुटने टेक देता है और यहां तक कि साम्प्रदायिक हिंसा की ताकतों के साथ सांठगांठ भी कर लेता है. भारत में राजनीतिक साम्प्रदायिकता के इतिहास को हाल के वर्षों में अमरीका द्वारा इस्लाम को शैतानी ठहराने तथा मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही और अमल में लाई जा रही नफरत और दमन की राजनीति से बढ़ावा मिला है. आक्रामक बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता भारत में लोकतंत्र एवं सांस्कृतिक बहुलता के अस्तित्व के लिये फासीवादी खतरा बन गई है. इसलिये धर्मनिरपेक्ष समाज का निर्माण भारत की जनवादी क्रांति का एक प्रमुख कार्यभार बना हुआ है.

जातीय उत्पीड़न और भेदभाव, जिसे ब्राह्मणवादी और नव-ब्राह्मणवादी विचारधारा और संस्कृति वैधता प्रदान करती है, भारतीय समाज और राज्य की एक अन्य घृणित विशेषता बनी हुई है. इसलिये सामाजिक उत्पीड़न की समाप्ति और जातियों का उन्मूलन एक और प्रमुख क्रांतिकारी लक्ष्य है. भारतीय राज्य महिलाओं की समानता और सशक्तीकरण के बारे में लम्बी-चैड़ी बातें करने के बावजूद तमाम किस्म के पितृसत्तात्मक ढांचों और ताकतों की रक्षा करता है और उनको बढ़ावा देता है. भारतीय राजप्रणाली के विभिन्न स्तरों पर मौजूद धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता, जातिवाद, लिंगभेद (सेक्सिज्म), एथ्निक समाजों को अलगाव में डालने, भाषाई एवं आंचलिक श्रेष्ठतावाद की परिघटनाएं महज गुजरे सामंती-औपनिवेशिक जमाने के बचे-खुचे चिरि नहीं हैं, बल्कि वे ‘आधुनिक’ भारत के अभिन्न अंग हैं. शासक वर्ग और उनकी पार्टियां भारतीय जनता की बढ़ती जनतांत्रिक एकता व उनके जागरण को कमजोर करने तथा उसे नष्ट करने में इन औजारों का सोचे-समझे ढंग से उपयोग करते हैं.

क्रांति की मंजिल

भारतीय समाज में चार मुख्य अंतर्विरोध क्रियाशील हैं - साम्राज्यवाद और भारतीय जनता के बीच का अंतर्विरोध, सामंती बेड़ियों एवं अवशेषों और व्यापक जनसमुदाय के बीच का अंतर्विरोध, बड़ी पूंजी और भारतीय जनता, खासकर मजदूरों-किसानों, के बीच का अंतर्विरोध और शासक वर्गों के विभिन्न हिस्सों के बीच का अंतर्विरोध. जहां पहले तीन अंतर्विरोधें की प्रकृति शत्रुतापूर्ण है, वहीं चैथा अंतर्विरोध आम तौर पर गैर-शत्रुतापूर्ण स्थिति में रहता है, जिसे सामान्यतः मोलतोल और समझौतों की एक जटिल प्रक्रिया के माध्यम से सुलझा लिया जाता है. शत्रुतापूर्ण अंतर्विरोधों के उल्लेखनीय रूप से तीखे हो जाने की स्थिति में साम्राज्यवाद, बड़ी पूंजी और सामंती अवशेष एक वास्तविक गठजोड़ के बतौर भी प्रकट होते हैं और हमारी जनता इसी गठजोड़ के कमरतोड़ बोझ तले कराह रही है. अतः इस गठजोड़ और व्यापक भारतीय जनसमुदाय के बीच का अंतर्विरोध ही वर्तमान भारतीय समाज का प्रधान अंतर्विरोध है, और केवल इस अंतर्विरोध को आत्मसात करने व उसे हल करने के जरिये ही मौजूदा उत्पीड़क व्यवस्था को उखाड़ फेंका जा सकता है.

ये मुख्य अंतर्विरोध हमारी क्रांति की मंजिल को निर्धारित करते हैं . यह जनता की जनवादी क्रांति की मंजिल है जिसकी धुरी है कृषि क्रांति. इस जनवादी क्रांति का प्राथमिक उद्देश्य होगा तमाम सामंती अवशेषों का समूल विनाश, साम्राज्यवादी प्रभुत्व का उन्मूलन, कारगर टैक्स निर्धारण, राष्ट्रीयकरण एवं अन्य उपायों से बड़ी पूंजी पर रोक व नियंत्रण और शासन के समूचे औजारों तथा मशीनरी का जनवादीकरण. इसलिये, जनवादी क्रांति की विजय समाजवाद की ओर एक साहसिक कदम भी होगी और बिना रुके समाजवाद में रूपांतरण के लिये भौतिक आधार को शक्तिशाली करेगी.

मजदूर वर्ग का नेतृत्व

भारत में जनता की जनवादी क्रांति केवल मजदूर वर्ग, जो भारतीय जनता का सबसे सुसंगत क्रांतिकारी व सर्वाधिक संगठित और आगे बढ़ा हुआ दस्ता है, के नेतृत्व में ही सम्पन्न की जा सकती है.

जनता की जनवादी क्रांति को विजय की ओर ले जाने के लिये मजदूर वर्ग के लिए यह निहायत जरूरी है कि वह एकताबद्ध एवं स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के बतौर उभरे और आम जनवादी आंदोलन पर अपना वर्चस्व कायम करे. इस उद्देश्य को हासिल करने के लिये मजदूर वर्ग को निम्नलिखित काम अवश्य करने होंगे:

(क) ग्रामीण क्षेत्रों में अपने सबसे विशाल दस्ते तथा शहरी इलाकों में बिखरे बहुसंख्यक असंगठित मजदूरों पर विशेष ध्यान देते हुए स्वयं को एकताबद्ध करना, मेहनतकश जनता की जीवन-दशा और कार्य-स्थितियों में सुधर के लिये लड़ना, वैश्विक पूंजी और भारतीय बड़ी पूंजी द्वारा अपने नियतकालिक संकटों का बोझ भारतीय जनता के कंधें पर लादने के प्रयासों का प्रतिरोध करना;

(ख) ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांतिकारी किसान संघर्षों को संगठित करना व उनका समर्थन करना तथा शक्तिशाली गढ़ों का निर्माण करना;

(ग) भारतीय जनता के समस्त जनवादी व साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों को संगठित करना और उनका समर्थन करना;

(घ) महिला मुक्ति के आंदोलन को संगठित करना, उसका समर्थन करना तथा उसके साथ एकताबद्ध होना;

(च) दलितों एवं अन्य उत्पीड़ित समुदायों पर तमाम किस्म के उत्पीड़न तथा उनके खिलाफ भेदभाव एवं पूर्वाग्रहों के खात्मे के लिये और खुद जाति व्यवस्था के विनाश के लिए संघर्षों को संगठित करना, उनका समर्थन करना तथा उनके साथ एकताबद्ध होना;

(छ) आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्षों का, धार्मिक व सांस्कृतिक आजादी के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों के संघर्षों का, मर्यादा, समानता और न्याय के लिए जनजातीय समुदायों व अन्य देशज लोगों के संघर्षों को संगठित करना, उनका समर्थन करना और उनके साथ एकताबद्ध होना;

(ज) बौद्धिक जगत की प्रगतिशील जनवादी आकांक्षाओं तथा पहलकदमियों का समर्थन करना और उन्हें प्रोत्साहित करना;

(झ) कारपोरेट वर्चस्व वाले प्रतिक्रियावादी मीडिया के खिलाफ लोकतांत्रिक मीडिया का विकास करने और पलायनवादी मनोरंजन की प्रबल मुख्यधारा को चुनौती देने के लिये जन संस्कृति के क्षितिज का विस्तार करने के हर प्रयास का समर्थन करना;

(ट) दक्षिण एशिया के अन्य देशों में प्रगतिशील जन संघर्षों का समर्थन करना और उनके साथ एकजुटता कायम करना;

(ठ) विदेशों में रहने वाले भारतीयों एवं दक्षिण एशियाई मूल के अन्य लोगों द्वारा अपने अधिकारों और सम्मान के लिये तथा नस्लवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ चलाये जा रहे प्रगतिशील संघर्षों एवं पहलकदमियों का समर्थन करना और उनके साथ एकताबद्ध होना;

(ड) अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के साथ एकताबद्ध होना तथा साम्राज्यवाद व प्रतिक्रियावाद के खिलाफ और स्वतंत्रता, जनवाद एवं समाजवाद के लिये विश्व की जनता के संघर्षों का समर्थन करना.

मजदूर वर्ग की राजनीतिक प्रहार क्षमता को तीक्ष्ण और सुदृढ़ करने के लिए पार्टी बड़ी पूंजी और साम्राज्यवाद के हमलों के खिलाफ प्रतिरोध में तमाम वामपंथी शक्तियों के बीच कार्यवाही की एकता विकसित करने पर विशेष जोर देती है. तमाम वामपंथी और जनवादी शक्तियों की व्यापक आधार वाली एकता के निर्माण की हर संभव पहल लेने के साथ-साथ पार्टी कम्युनिस्ट आंदोलन में पिछलग्गू सामाजिक-जनवादी प्रवृत्ति एवं वामपंथी दुस्साहसवादी व अर्द्धअराजकतावादी प्रवृत्तियों के खिलाफ निरंतर संघर्ष के जरिये सभी भारतीय कम्युनिस्टों को एकल पार्टी के झंडे तले एकताबद्ध करने के ऐतिहासिक लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध है.

जनता का जनवादी मोर्चा

शासक वर्गों के निर्मम शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ भारतीय जनता बार-बार उठ खड़ी हुई है. उसकी जागृति अनेक रूप ग्रहण करती है. अक्सर उसका नेतृत्व विभिन्न किस्म की पार्टी अथवा गैर-पार्टी शक्तियों के हाथ में रहता है, तो कभी-कभार उसका नेतृत्व शासक वर्गो की विपक्षी पार्टियां भी करती हैं. पार्टी ऐसे तमाम आंदोलनों का समर्थन करती है और उन्हें हमेशा जनता की जनवादी क्रांति के लक्ष्य की ओर ले जाने की कोशिश करती है.

मजदूर वर्ग द्वारा संचालित जनवादी क्रांति की मुख्य शक्ति किसान समुदाय है. पार्टी ग्रामीण सर्वहारा एवं गरीब किसानों पर पूर्णत: निर्भर करती है, मध्यम किसानों एवं अन्य मध्यम तबकों के साथ दृढ़तापूर्वक एकताबद्ध होती है, जबकि धनी किसानों के एक हिस्से को अपने पक्ष में खींचने तथा शेष को तटस्थ बना देने की कोशिश करती है, ताकि उनके बहुमत को क्रांति के दुश्मनों का साथ देने से रोका जा सके. शरही गरीब और मेहनतकश जनसमुदाय पार्टी के शहरी जनाधार के प्रमुख स्तंभ हैं जबकि मध्यवर्ग के कुछेक हिस्से महत्वपूर्ण संश्रयकारी हैं. छोटे व्यापारी, मैन्युफैक्चरर तथा छोटे-मंझोले पूंजीपति और बुर्जुआ बुद्धिजीवी आम तौर पर ढुलमुल और अस्थिर संश्रयकारी हैं.

जनता की जनवादी क्रांति को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि इन तमाम वर्गों को लेकर मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता के एक जनवादी मोर्चे का निर्माण किया जाए जिसकी बुनियाद मजदूर-किसान संश्रय हो. इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये पार्टी विविध वर्गीय एवं तबकायी संगठनों तथा बहु-वर्गीय संयुक्त मोर्चा संगठनों का गठन करती है तथा उनके सहयोग से और उनके भीतर रहकर भी कार्य करती है. राजनीतिक परिस्थिति की जरूरतों के अनुसार पार्टी तमाम किस्म की संघर्षरत जनवादी शक्तियों के साथ मुद्दा-आधारित संयुक्त अभियानों में हाथ मिलाने और यहां तक कि उपयुक्त साझा कार्यक्रम के आधार पर उनके साथ, अल्पकालीन हो तो भी, संश्रय में जाने को तैयार रहती है.

क्रांतिकारी रास्ता

भारत जैसे विशाल और विविधताओं व जटिलताओं वाले देश में जनता की जनवादी क्रांति को पूरा करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी को काम के हर उपलब्ध रास्ते का और संघर्ष के गैर-संसदीय व संसदीय रूपों का इस्तेमाल करने तथा संघर्ष के विविध रूपों को तेजी से एक-दूसरे में बदलने की कला में विशेष रूप से महारत हासिल करनी होगी. लिहाजा, पार्टी संघर्ष व संगठन के सभी आवश्यक रूपों के जीवंत संश्रय के जरिए सुसंगत क्रांंतिकारी व्यवहार विकसित करने का प्रयास करती है.

सामान्य परिस्थितियों में भारतीय राजप्रणाली कम्युनिस्टों को खुले, कानूनी और संसदीय तरीकों के कार्य करने की इजाजत देती है. पार्टी को संयुक्त मोर्चा की अपनी बुनियादी लाइन के साथ संगति रखकर उपयुक्त चुनावी कार्यनीति विकसित करते हुए लम्बे अरसे तक संसदीय रंगमंच पर क्रांतिकारी विपक्ष की भूमिका निभाने के लिये तैयार रहना होगा. चुनावी संघर्ष के दौर में यह संभव है कि कम्युनिस्ट स्थानीय निकायों में और यहां तक कि राज्य विधायिका में भी बहुमत हासिल कर लें. दीर्घकालीन और जोरदार राजनीतिक संघर्ष के जरिए वर्ग शक्तियों के संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने के साथ-साथ पार्टी स्वतंत्र रूप से अथवा समान विचारों वाली शक्तियों के साथ संश्रय कायम करके ऐसे अवसरो का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है, बशर्ते कि पार्टी के पास मतदाताओं के साथ किए गये अपने वादों को पूरा करने की शक्ति हो.

हर हालत में ऐसे स्थानीय निकायों और सरकारों के साथ पार्टी का संबंध और उनके अंदर पार्टी की भूमिका का मार्गदर्शन निम्नलिखित बुनियादी उसूलों के जरिए होगा :

(क) पार्टी हर कीमत पर अपना स्वतंत्र सांगठनिक कार्यकलाप चलाती रहेगी और राजनीतिक पहलकदमी अपने हाथों में रखेगी,

(ख) स्थानीय निकायों / सरकारों को प्राप्त अधिकारों का पूरा उपयोग क्रांतिकारी जनवादी सुधार संचालित करने और जन-चेतना को एक नए जनवादी विकल्प की दिशा में मोड़ने के लिये किया जाएगा,

(ग) ऐसे स्थानीय निकायों / सरकारों को केंद्रीय सत्ता समेत अपने उच्चतर सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ व्यापक क्रांतिकारी विपक्ष के अभिन्न अंग के रूप में कार्य करना होगा, तथा

(घ) पार्टी और उसके नेतृत्व में चलने वाले स्थानीय निकायों / सरकारों को इस बात की गारंटी करनी होगा कि जनवादी शक्तियों, जनवादी चेतना और जनवादी आंदोलन के स्वतंत्र विकास की राह में किसी भी स्थिति में कोई रुकावट पैदा न हो.

भारत के उपनिवेश-विरोधी संघर्षो और कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में तथा विकासमान कारपोरेट-विरोधी संघर्ष में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब जमीनी स्तर पर ग्राम कमेटियों, कारखानों में मजदूर / नागरिक परिषदों और मजदूर मुहल्लों से लेकर जनता के स्वशासन के विभिन्न अंगों तक, विविध रूपों में और विभिन्न दर्जो की जन सत्ताओं का निर्माण हुआ है, चाहे उनकी अवधि कितनी भी अल्प क्यों न रही हो. पार्टी जनता के हितों एवं अधिकारों की रक्षा के लिये चलाये जाने वाले जन संघर्षो के माध्यम से जनता की इस किस्म की स्थानीय सत्ता के उदय की संभावना को साकार करने का प्रयास करती है तथा उन्हें प्रोत्साहन देती है.

पार्टी इस संभावना से भी इन्कार नहीं करती है कि किन्हीं असाधारण राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्थितियों में – उदाहरणार्थ, किसी निर्णायक जन उभार की स्थिति में – सामाजिक व राजनीतिक शक्ति-संतुलन क्रांतिकारी शक्तियों के हाथों में केन्द्रीय सत्ता के अपेक्षाकृत शान्तिपूर्ण संक्रमण की भी इजाजत दे सकता है. लेकिन एक ऐसे देश में, जहां जनवादी संस्थाएं मूलत: कमजोर और संकीर्ण बुनियाद पर टिकी हुई हैं, और छोटी-छोटी जीतें एवं आंशिक सुधार भी केवल जनता के जुझारू संघर्षो की बदौलत ही हासिल किए और सुरक्षित रखे जाते हैं, वहां सर्वहारा की पार्टी को सभी तरह के संभावित प्रतिक्रांतिकारी हमलों का मुकाबला करके अंतिम निर्णायक विजय हासिल करने और उसे टिकाये रखकर क्रांति सम्पन्न करने के लिए खुद को मुकम्मल तौर पर तैयार करना होगा. लिहाजा, जनता का जनवादी मोर्चा और जन सेना पार्टी के शस्त्रागार में क्रांति के दो सर्वाधिक बुनियादी औजार हैं.

जनता का जनवादी राज्य

बड़े पूंजीपतियों-जोतदारों के संश्रय के शासन को उखाड़ फेंकने के बाद विजयी क्रांति, मजदूरों, किसानों व अन्य क्रांतिकारी वर्गों तथा जनवादी तबकों के शासन – अर्थात् जनता की जनवादी राजसत्ता की शुरूआत करेगी जो निम्नलिखित बुनियादी कार्यभारों को लागू करेगी और समाजवादी संभवना को बढ़ावा देने वाली नव दिशा अख्तियार करेगी :

1.  राज्य के ढांचें और कामकाज का पूर्ण जनवादीकरण:

(क) प्रत्येक स्तर पर सार्विक, समान और प्रत्यक्ष मतदान के आधार पर निर्वाचित निकायों के हाथ में राजनीतिक सत्ता सौंपना तथा प्रशासनिक तंत्र को जनता की निगरानी और नियंत्रण के मातहत लाना;

(ख) जनता को निर्वाचित जन प्रतिनिधियों और साथ ही लोक सेवा अधिकारयों को वापस बुलाने के अधिकार से लैस करना ताकि सत्ता के दुरुपयोग को रोका जा सके और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके;

(ग) जनता के सभी व्यक्तिगत व सामूहिक तथा विभिन्न जनवादी पार्टियों और संगठनों के जनवादी अधिकारों की गारंटी करना;

(घ) राजकीय आतंकवाद, पुलिस बर्बरता और नागरिक मामलों में फौजी हस्तक्षेप की विरासत का अंत करना तथा पुलिस व सशस्त्र बलों को पुनर्गठित करना और उनमें मानवाधिकारों के प्रति सम्मान तथा जनता व राष्ट्र की सेवा करने की नई भावना भरना;

(च) राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन के सभी क्षेत्रों से अपराधीकरण व भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना तथा एक चुस्त और प्रगतिशील न्याय प्रणाली की स्थापना करना.

2. संघीय, जनवादी व धर्मनिरपेक्ष राज्यप्रणाली के आधार पर राष्ट्रीय एकता का पुननिर्माण :

(क) तमाम अल्पसंख्यक समूहों में अपनापन, बराबरी व सुरक्षा की भावना भरते हुए अलग होने के अधिकार समेत राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के विभिन्न स्तरों के अधिकार को मान्यता देना;

(ख) निर्णय प्रक्रिया का प्रभावी तौर पर जनवादीकरण, राष्ट्र-निर्माण में जनता की भागीदारी हासिल करने के लिए पिछड़े इलाकों पर समुचित जोर देते हुए संसाधनों का हस्तांतरण तथा विकास कार्यों का विकेंद्रीकरण;

3. तीव्र, आत्मनिर्भर, टिकाऊ व संतुलित आर्थिक विकास को आगे बढ़ाना तथा व्यापक गरीबी का उन्मूलन :

(क) मुकम्मल भूमि सुधार तथा खेती को चौतरफा राजकीय मदद पर आधारित मजबूत कृषि का विकास;

(ख) कृषि भूमि की संरक्षा तथा तमाम खनिज संसाधनों और तेल व गैस का राष्ट्रीयकरण;

(ग) देश के प्राकृतिक तथा मानव संसाधनों के समुचित इस्तेमाल पर आधारित चौतरफा औद्योगीकरण;

(घ) सांस्थानिक कर्जों और बाजार सुविधाओं की सहायता के जरिये छोटे और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन, हस्त शिल्प और देशी उत्पादों को बढ़ावा देना और उन्हें कोअॉपरेटिव में संगठित होने में मदद करना;

(च) विदेशी स्रोतों पर निर्भरता घटाते हुए और परमाणु ऊर्जा और बड़े बांधों जैसे खतरनाक विकल्पों से परहेज करते हुए तथा ऊर्जा उत्पादन के वैकल्पिक एवं नवीकरण योग्य उपायों को बढ़ावा देते हुए आत्मनिर्भर साधनों के जरिये देश में ऊर्जा की बढ़ती आवश्यकता की पूर्ति करना;

(छ) इजारेदार-बहुराष्ट्रीय-माफिया-जोतदार-कुलक गठजोड़ के हाथों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की बागडोर छीनकर राज्य और जनता के विभिन्न संगठनों के हाथों स्थानांतरित करना, देश-विदेश में जमा काले धन एनं अवैध सम्पदा की जब्ती;

(ज) आज जनता की क्रयशक्ति को बढ़ाने, कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर राजकीय करीद को सुनिश्चित करने और सभी को बुनियादी सामग्रियों और सेवाओं की आपूर्ति के जरिये मजबूत घरेलू बाजार का निर्माण;

(झ) नीति निर्माण व उत्पादन में मेहनतकश अवाम की प्रभावी भागीदारी को सुनिश्चित करना तथा उच्च कुशल श्रम के लिए समुचित घरेलू अवसरो के निर्माण एवं अपने देश में शोध और विकास (आर एण्ड डी) के प्रोत्साहन के जरिये प्रतिभा पलायन को रोकना;

(ट) आत्म-निर्भरता, जन-कल्याण, तथा उन्नत जीवन स्तर के साथ मेहनतकश जनता के गरिमापूर्ण जीवन की जरूरतों के अनुरूप मौजूदा प्राथमिकताओं को पुनर्व्यवस्थित करना एवं मौजूदा नीतियों की दिशा पुन:निर्धारित करना;

(ठ) श्रम के ठेकाकरण के उन्मूलन, गुप्त मतदान के साथ पूर्ण ट्रेड यूनियन अधिकारों की गारंटी, सामूहिक सौदेबाजी और हड़ताल के अधिकार की रक्षा, सभी मजदूरों के लिए जीवन यापन लायक मजदूरी तय करने तथा उसकी गारंटी और अक्षम व सेवानिवृत्त कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों की गारंटी, समान काम के लिए समाज वेतन की नीति को कड़ाई से लागू करने, बालश्रम के उन्मूलन तथा काम के घंटों को लगातार कम करने के जरिये मजदूर वर्ग की जीवन स्थिति में गुणात्मक सुधार.

4. समग्र सार्वजनिक सुविधाओं एवं जन-कल्याण को सुनिश्चित करना :

(क) सार्वजनिक सुविधाओं के निजीकरण व व्यवसायीकरण का खात्मा और सार्विक भोजन का अधिकार, सभी स्तरों पर नि:शुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का अधिकार, काम का अधिकार, नि:शुल्क और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार, पेयजल, आवास और साफ-सफाई, सार्वजनिक परिवहन तथा खेलकूद और मनोरंजन के साधनों जैसी बुनियादी सुविधाओं का अधिकार सुनिश्चित करना; बच्चों की सार्वजनिक देखभाल; बुजुर्गों, विकलांगो तथा विपदाग्रस्त लोगों की देखभाल; कारगर सामाजिक न्याय की गारंटी करने के लिये तमाम वंचित एवं सुविधाहीन तबकों को पर्याप्त प्रशिक्षण और अनसरों का प्रावधान.

(ख) महामारियों तथा संक्रामक बीमारियों की रोकथाम के उपाय तथा प्राकृतिक आपदाओं एवं जलवायु में परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों की रोकथाम तथा प्रबंधन के लिए कारगर कार्यक्रम तथा प्रणाली को लागू करने के जरिये पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय संतुलन का संरक्षण करना.

(ग) विस्थापन के जरिये 'विकास' रणनीति के चलते शरणार्थी बने लोगों के प्रभावी पुनर्वास व पुन:स्थापन को सुनिश्चित करना और मूलवासी लोगों एवं वनवासियों के परम्परागत जंगल पर तथा आजीविका सम्बंधी अधिकारों की गारंटी करना.

5. समूचे समाज का आधुनिक, जनवादी सांस्कृतिक रूपांतरण :

(क) पतनशील, सामंती व साम्राज्यवादी संस्कृति के स्थान पर जनवादी और प्रगतिशील सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश को बढ़ावा देना तथा हमारी जनता की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रोत्साहित करना और साथ ही तमाम आधुनिक सांस्कृतिक रूपों एवं विधाओं को प्रोन्नत करना.

(ख) भारतीय युवा वर्ग में निहित क्षमता को प्रस्फुटित होने का अवसर देने तथा अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिये खेलकूद के समुचित आधारभूत ढांचे और प्रशिक्षण की सुविधाओं का निर्माण.

(ग) महिलाओं के सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक और यौन-शेषण का उन्मूलन करना तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनकी समान हैसियत और अधिकारों की गारंटी करना, जाति आधारित उत्पीड़न तथा भेदभाव का खात्मा, मूल निवासियों तथा विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक प्रगति की दौड़ में पिछड़ गये समाज के तमाम कमजोर तबकों की मदद करना तथा उनकी समान हैसियत को सुनिश्चित करना.

6. साम्राज्यवाद-विरोधी प्रगतिशील विदेश नीति को बढ़ावा देना :

(क) साम्राज्यवादियों के साथ की गई तमाम असमान संधियों व करारों तथा भारतीय शासक वर्ग द्वारा पड़ोसी देशों पर लादी गई तमाम असमान संधियों को रद्द करना;

(ख) समाजवादी देशों तथा अन्य प्रगतिशील, साम्राज्यवाद-विरोधी सरकारों के साथ दृढ़ एकता विकसित करना और आम तौर पर विकासशील देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना, साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण एशियाई एकजुटता विकसित करने पर विशेष जोर देते हुए अपनी मुक्ति के लिए तथा साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण, चौधराहट व युद्ध – वह चाहे साम्राज्यवादी युद्ध हो अथवा साम्राज्यनवाद प्रेरित युद्ध – के खिलाफ संघर्षरत जन-समुदायों के साथ एकजुटता कायम करना.

(ग) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पांच उसूलों के आधार पर सभी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करना.

जनता की जनवादी क्रांति के इस कार्यक्रम के साथ पार्टी भारत में साम्यवाद लाने के महान क्रांतिकारी उद्देश्य की सेवा में अपने-आपको दिलोजान से न्योछावर करती है. इक्कीसवीं सदी के भारत की जनता समग्र और पूर्ण जनवाद तथा सच्चा सामाजिक, लौंगिक, पर्यावरणीय और आर्थिक न्याय अवश्य हासिल करेगी.