वर्ष - 32
अंक - 12
23-03-2023

त्रिपुरा में किसी तरह सत्ता बचा लेने के बाद मोदी सरकार ने अब सड़क की ताकत, प्रचार और राज्य सत्ता की मिलीजुली शक्तियों के सहारे विपक्ष के खिलाफ चौतरफा आक्रमण छेड़ दिया है, और यह इस फासिस्ट शासन का प्रतीक-चिन्ह बन गया है. त्रिपुरा में सापेक्षिक रूप से शांतिपूर्ण चुनावों के बाद संघ ब्रिगेड ने उस राज्य में अब आतंक, बदले की कार्रवाई और हिंसा की नई मुहिम छेड़ दी है और वह विपक्षी पार्टियों, उनके मतदाताओं और यहां तक कि वामपंथी व कांग्रेसी सांसदों व विधायकों के जांच दल को भी अपना निशाना बना रहा है जो उस आतंक-प्रभावित राज्य में दौरा करने गया था. इसी के साथ ‘टिपरा मोथा’, जो चुनाव के बाद राज्य विधानसभा में सर्वप्रमुख गैर-भाजपा पार्टी के बतौर उभरा है, की विपक्षी धार को कुंद कर देने की खातिर मोदी सरकार इस पार्टी की मांगों का ‘संवैधानिक समाधान’ खोजने के लिए प्रकटतः एक वार्ताकार नियुक्त करने पर सहमत हो गई है.

मेघालय में भाजपा वहां की नेशनल पीपुल्स पार्टी की अगुवाई में राज्य सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार बताते हुए उससे अलग रहकर चुनाव लड़ी थी, हालाकि इससे पहले सरकार में भाजपा उसकी साझेदार रही थी. अब चुनाव खत्म हो जाने के बाद सिर्फ दो सीट जीत सकने वाली भाजपा उसी एनपीपी की सरकार में शामिल हो गई है. हमलोग हेमंत विश्व शर्मा पर भाजपा द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को नहीं भूले हैं, जब वे तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में दूसरे प्रमुख व्यक्ति थे. लेकिन जब हेमंत विश्व शर्मा को भाजपा में शामिल कर लिया गया, तब मीडिया द्वारा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के उन आरोपों के बारे में पूछे जाने पर अमित शाह ने सवाल का जवाब देने से इन्कार कर दिया और प्रेस को साफ कहा कि ऐसे सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए! आज हेमंत विश्व शर्मा न केवल असम में भाजपाई मुख्य मंत्री और भाजपा-नीत नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक अलायंस के अध्यक्ष हैं, बल्कि वे उत्तर-पूर्व में संघ ब्रिगेड के फासिस्ट आक्रमण की प्रमुख शक्ति भी हैं.

भाजपा में शामिल होना भ्रष्टाचार और विभिन्न अन्य अपराधों के आरोपी प्रत्येक नेता के लिए सबसे फलदायी बीमा योजना बन गया है. वस्तुतः कई भाजपा नेता खुलेआम शेखी बघारते हैं कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी की जांच से वे बच जा सकते हैं. कर्नाटक में एक शक्तिशाली भाजपा विधायक के बेटे के ऑफिस पर छापा मारने के लिए लोकायुक्त कर्मियों को काफी दबाव डालना पड़ा था, और उस छापे में 6 करोड़ रुपये नगद बरामद किए गए. मध्य प्रदेश में लोकायुक्त को निष्क्रिय बना दिया गया है, क्योंकि पर्याप्त साक्ष्य देने वाली जांचों के बावजूद सरकार लोकायुक्त को आरोप गठित करने की अनुमति नहीं देती है. इस प्रकार जहां भाजपा भ्रष्टों के लिए सबसे सुरक्षित शरणस्थली बन गई है, वहीं मोदी सरकार ईडी व सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों के जरिये विपक्ष को दबोचने में लगी हुई है जो इस शासन द्वारा अपने राजनीतिक एजेंडा को लागू करने के लिए पूरी तरह लैस कर दी गई हैं. लगभग तमाम विपक्षी पार्टियां, खासकर सत्तासीन विपक्षी पार्टियां मोदी सरकार की इस खुल्लमखुल्ला प्रतिशोध व दंडात्मक मुहिम का निशाना बनती जा रही हैं.

2024 चुनावों के पहले मोदी शासन खास तौर पर बिहार में हुए राजनीतिक पुनर्संयोजन से काफी घबरा उठी है. 2015 में जब भाजपा को नीतीश कुमार के जद-यू के समर्थन के बगैर ही विधान सभा चुनाव लड़ना पड़ा था तो उसकी सीटों की संख्या गिरकर 53 हो गई थी. मोदी शासन ने तब राजद नेतृत्व के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप उभार कर राजद-जद(यू) गठबंधन को किसी तरह से तोड़ दिया, और पुनएर्कीकृत भाजपा-जद(यूद)-लोजपा संश्रय ने बिहार में 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम पूरी तरह हथिया लिए. अब जद(यू) 2022 में फिर से राजद-वामपंथ-कांग्रेस महागठबंधन में लौट आया है, तो भाजपा बिहार के इस गठबंधन को तोड़ने के लिए रात-दिन एक कर दे रही है. उसकी ति-तरफा रणनीति सरकार को अस्थिर करने, महागठबंधन को बदनाम करने, और पार्टियों को तोड़ने तथा नया संश्रय कायम करने के जरिये भाजपा-पक्षीय राजनीतिक पुनर्संयोजन बनाने की दिशा में काम कर रही है. लालू प्रसाद यादव के पूरे परिवार को निशाना बनाने के लिए पुराने मुकदमें खोले जा रहे हैं. यहां तक कि पटना में झूठा विडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर वायरल किया गया जिसमें झूठे दृश्य दिखलाये गए कि बिहारी मजदूरों को तमिलनाडु में पीटा गया और उनकी हत्या की गई, जबकि बिहार के शासक संश्रय के साथ तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी का दोस्ताना रिश्ता है.

सरकार ईडी की इन छापेमारियों के जरिये भ्रष्टाचार-विरोधी जंग का लगभग वहीं दृश्य पैदा करना चाहती है, जैसा कि उसने नवंबर 2018 में नोटबंदी के समय पैदा किया था जिसे काले धन के खिलाफ युद्ध के बतौर उछाला गया था. इन छापेमारियों का जमकर प्रचार किया जाता है, और जबकि ईडी आम तौर पर ऐसी छापेमारी के नतीजे के बारे में कोई सटीक बयान जारी नहीं करता है, लेकिन मीडिया अज्ञात ‘स्रोतों’ का हवाला देकर जब्त की गई परिसंपत्तियों के बारे में अप्रमाणित दावों के साथ भ्रष्टाचार का बोध उत्पन्न करता रहता है. संसद में खुद सरकार की अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार, 31 मार्च 2022 तक ईडी द्वारा लिए गए काले धन के 5422 मामलों में से सिर्फ 992 मामलों में चार्जशीट दायर किए जा सके और केवल 23 अभियुक्तों को सजा दी जा सकी थी. स्पष्ट है कि ईडी की अधिकांश कवायदों का मकसद मीडिया में प्रचार करना, डराना-धमकाना और राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करना तथा आलोचना की आवाज को खामोश करना ही होता है. यहां यह भी गौर करना जरूरी है कि अधिकांश संस्थाओं और एजेंसियों की तरह ईडी भी हथपकड़ू नौकरशाहों के द्वारा संचालित हो रहा है. सरकार ने 2021 में कानून में संशोधन करके ईडी और सीबीआई प्रमुखों के कार्यकाल को 2 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया, और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए ईडी के मौजूदा प्रमुख संजय मिश्रा को रेकॉर्ड तीसरा सेवा विस्तार दे दिया.

अब मोदी सरकार के प्रतिशोधात्मक व दमनात्मक शासन को महज अघोषित आपात्काल कहना ही काफी नहीं होगा. यह बेलगाम आपात्काल है, और अगर भारत के लोग तथा विपक्ष इस पर अंकुश नहीं लगाएंगे तो हमें तानाशाही हुकूमत के खुले प्रदर्शन की ओर धकेल दिया जाएगा. 1970 के दशक में भारत के पास सामर्थ्य था कि वह आपात्काल से छुटकारा पा सके और आगे बढ़ सके. 2020 के दशक में भारत को निश्चित तौर पर फिर से वही लोकतांत्रिक जनप्रिय इच्छाशक्ति पैदा करनी होगी, ताकि संसदीय लोकतंत्र के इस बढ़ते फासिस्ट विध्वंस को रोका जा सके.