दो चुनावों की कहानीः फासीवादी दमन रोकने के लिए फ्रांस की जनता को बधाई!

अप्रैल और मई 2024 में भारत के सामने एक चुनौती थी और पूरी दुनिया इस पर नजर रखे हुए थी. 4 जून को जब भाजपा का रथ 240 पर रूका तो पूरी दुनिया में लोकतंत्र समर्थकों ने राहत की सांस ली. हालांकि, जैसे ही भारत ने फासीवादी ताकतों को आंशिक रूप से पीछे धकेल दिया, यूरोपीय संसद के चुनावों में पूरे महाद्वीप में जेनोफोबिक अति दक्षिणपंथी पार्टियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गयी. जर्मनी में एएफडी, फ्रांस में आरएन, सत्तारूढ़ ब्रदर्स ऑफ इटली और यूरोप भर में अन्य अति दक्षिणपंथी पार्टियों ने जून की शुरूआत में यूरोपीय चुनावों में महत्वपूर्ण जीत हासिल की.

मोदी आपदा का अंत करने के लिए हर जुमले को खारिज करें ! हर तिकड़म को नाकाम करें और हर वोट को अहमियत दें !

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले कई अहम राजनीतिक घटनाक्रम उभर कर आए हैं.  सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड की बिक्री और भुगतान के डेटा मुहैया कराने के लिए भारतीय स्टेट बैंक के ज्यादा समय मांगने की अर्जी को खारिज कर दिया है. ज्यादा वक्त की मांग लोकसभा चुनाव के पहले डेटा का खुलासा न करने की मोदी सरकार और एसबीआई की मंशा और उनकी हताश कोशिशें नाकाम हो चुकी है. अब भारत निर्वाचन आयोग से यह उम्मीद की जाती है कि वह इस जानकारी को सार्वजनिक करे.

चुनावी बाॅन्ड घोटाले का खुलासा कर असली मोदी परिवार के कारपोरेट सहयोगियों का पर्दाफाश करो !

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बाॅन्ड योजना को असंवैधानिक करार देते हुए इसे जारी करने वाले भारतीय स्टेट बैंक से कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रवर्तन निदेशालय मामले के लंबित रहने के दौरान जारी किए और भुनाए बाॅन्ड के बारे में पूरी जानकारी को उजागर करे. सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआइ को चुनावी बांड के दानकर्ताओं और प्राप्तकर्ताओं  के नाम और भुनाई गयी राशि के पूरे विवरण का खुलासा 6 मार्च तक देने का समय मुकर्रर किया था, जबकि चुनाव आयोग को 13 मार्च तक इस जानकारी को सार्वजनिक करना था.

चुनावी बॉन्ड घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट फैसले के मद्देनजर

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आखिरकार मोदी सरकार की चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है- हकीकत में यह योजना हाल के सालों में सबसे बेशर्म घोटालों में से एक रही है- यह देखना सुखद है कि सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार एक फैसला सुनाया जो आज के भारत में खासकर लोकतंत्र में कॉरपोरेट सत्ता के खिलाफ असमान लड़ाई में जनता के अधिकारों की हिमायत कर दिलासा देने वाला है.