ऋृषि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने पर संघ ब्रिगेड का जश्न ‘बेतुका’ है

इंग्लैंड के 57वें प्रधानमंत्री बतौर ‘टोरी’ (इंग्लैंड का एक राजनीतिक दल) के निर्वाचन पर भारत में मचाया जा रहा हर्षोल्लास काफी अजीबोगरीब है. बेशक, संघ ब्रिगेड विजयी मुद्रा में घूम रहा है. जिन ‘भक्तों’ के लिए 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आजादी हासिल हुई है, उनके लिये यह एक महान पल है. उन लोगों की निगाह में सदियों का उपनिवेशवाद अब एक एकल उदाहरण से पलटा जा रहा है जिसमें भारतीय मूल का एक व्यक्ति उस पूर्व की औपनिवेशिक शक्ति का प्रधानमंत्री बन रहा है!

नफरत को नकारें! भय का प्रतिरोध करें! आजादी का दावा जतायें!

वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) पर भारत लगातार नीचे खिसकता जा रहा है. 2020 में सर्वेक्षण किए गए 107 देशों के बीच भारत का स्थान 94 था; 2021 में 116 देशों के बीच सात पायदान नीचे गिरकर उसका स्थान 101 हो गया; और 2022 के नवीनतम सूचकांक में 121 देशों के बीच फिर छह स्थान नीचे खिसक कर भारत 107 वें पायदान पर चला गया. युद्ध जर्जर अफगानिस्तान को छोड़कर, हमारे तमाम पड़ोसी मुल्क भी इस सूचकांक में भारत से काफी ऊपर हैं. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी के अर्थ में भारत से अभी भी थोड़ा आगे रहनेवाले चीन का स्थान इस सूचकांक में शीर्षतम 1 से 17वें दायरे में मौजूद रहता रहा है.

दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने से क्यों डरा हुआ है संघ ब्रिगेड!

वर्ष 1956 के अक्टूबर माह की 14वीं तारीख थी. बाबा साहब अंबेदकर ने उस दिन लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था. नागपुर शहर में अवस्थित वह जगह तब से दीक्षाभूमि के नाम से मशहूर हो गई. 18 दिसंबर 2001 को तब के राष्ट्र्रपति केआर नारायणन ने उसी जगह स्तूप का शिलान्यास किया. नागपुर की वह जगह आज व्यापक जनमानस में एक धरोहर की पहचान बना चुकी है. उस दिन अशोक विजयादशमी थी. ऐसा विश्वास है कि इस दिन सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध में तबाही से विचलित होकर हिंसा त्यागने और बौद्ध धर्म अपनाने की शपथ ली थी. अशोक विजयादशमी उसी की वार्षिकी का दिन है.

राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करें और सांप्रदायिक फासीवादी योजना को ध्वस्त करें

2024 के आम चुनाव में अब दो वर्ष से भी कम समय रह गया है और अर्थतंत्र तेजी से ढलान पर सरक रहा है. ऐसी स्थिति में मोदी शासन हताशोन्मत्त ढंग से अपनी परीक्षित व विश्वसनीय सांप्रदायिक रणनीति पर अमल कर रहा है, ताकि लोगों का ध्यान सामान्य भारतीयों के सबसे ज्वलंत मुद्दों – आसमान छूती कीमतों, विलुप्त होते रोजगार और घटती आमदनी – से भटका दिया जा सके.

ईरान की संघर्षरत महिलाएं ये जंग जरूर जीतें!

कथित ‘ड्रेस कोड’ से गुस्ताखी के लिए ईरान की मॉरल पुलिस के हाथों हुई महसा अमिनी की मौत ने ईरान में एक खालिस बगाबत को जन्म दे दिया है. दमनकारी मजहबी हुकूमत और जिंदगी की ज्यादा खराब होते हालात के खिलाफ ईरान की महिलाओं और मेहनतकश लोगों के बीच उभरती नाराजगी अब पूरे ईरान में विरोध प्रदर्शनों में फूट पड़ी है. हुकूमत द्वारा पहले ही पचास से अधिक लोगों के मारे जाने की घोषणा और कठोर दमन के बाबजूद भी बगावत का फैलना जारी है.

मोदी-अडानी की जुगलबंदी: सत्ता और धन का अभूतपूर्व केंद्रीकरण

16 सितंबर को नरेंद्र मोदी की 72 वीं सालगिरह से एक दिन पहले उनके सबसे नजदीकी पूंजीपति दोस्त गौतम अडानी थोड़े समय के लिए फोर्ब्स की रियल टाइम बिलियनेयर्स सूची के अनुसार दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति बन गए थे, जो फिर  तीसरे स्थान पर पीछे आ गए.

‘हम, भारत के लोग’ का एक ही मिशन – अपनी आजादी, लोकतंत्र, संविधान की रक्षा करें!

आजादी की 75वीं सालगिरह के एक सप्ताह पहले, भारत 9 अगस्त 2022 के दिन ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है. मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन से ‘भारत छोड़ो’ आह्वान जारी करने के फौरन बाद कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन उस आह्वान ने भारत के अनेक हिस्सों में लोकप्रिय जन-उभार पैदा कर दिया और चार समानांतर सरकारों – यूपी में बलिया, बंगाल में टमलुक, ओडिशा में तालचर और महाराष्ट्र में सतारा – को भी जन्म दिया.

चारु मजुमदार और भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की गौरवशाली विरासत

कोलकाता के लालबाजार पुलिस लाॅकअप में कामरेड चारु मजुमदार की मृत्यु के बाद पचास वर्ष बीत चुके हैं. उस समय, भारतीय राज्य ने राहत की बड़ी सांस जरूर ली होगी – यह सोचते हुए कि उनकी मौत से नक्सलबाड़ी के बाद पूरे भारत में फैल जाने वाली क्रांतिकारी लहर का अंत हो जाएगा. लेकिन पांच दशक के बाद, जब मोदी हुकूमत विरोध की हर आवाज को दबा देने का प्रयास कर रही है, तब उसे इस विरोध को दंडित करने के लिए ‘अरबन नक्सल’ शब्द को गढ़ना पड़ा है. स्पष्ट है कि नक्सलबाड़ी और चारु मजुमदार का हौवा उनकी मृत्यु के पांच दशक बाद भी भारतीय शासकों का पीछा नहीं छोड़ रहा है.

भारत के लिए श्रीलंका से सबक: बढ़ती कीमतों को रोको, रोजगार दो, सांप्रदायिक साजिशें बंद करो!

भारत का दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका भयानक आर्थिक संकट से कराह रहा है. इस द्वीपीय राष्ट्र पर कर्ज के भारी बोझ ने उसे अभूतपूर्व अस्तव्यस्तता में धकेल दिया है जिसके दो प्रमुख लक्षण हैं: आसमान छूती कीमतें और बुनियादी जरूरत की सामग्रियों की घोर किल्लत. श्रीलंका की जनता विद्रोह में उतर पड़ी है. वे राजपक्षे भाइयों के शासन को खत्म करना चाहते हैं, जो एक दशक से भी ज्यादा अरसे से राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के बतौर श्रीलंका की सत्ता पर काबिज हैं.

पश्चिम बंगाल में पुलिस मनमानी और राजनीतिक आतंक के खतरनाक संकेत

कोलकाता के आलिया विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता तथा कोलकाता में सीएए प्रतिवादों और कई अन्य एकजुटता मुहिमों के जाने-पहचाने कार्यकर्ता अनीस खान को आधी रात में हावड़ा जिला में आमटा स्थित उसके अपने तिमंजिले मकान की छत से नीचे धकेलकर की गई खौफनाक हत्या ने वाजिबन पश्चिम बंगाल में व्यापक जनाक्रोश को जन्म दिया है. उसके पिता के अनुसार, 18 फरवरी को लगभग आधी रात में पुलिस वर्दीधारी एक गिरोह उनके घर में घुस आया और उसमें से एक ने उन्हें बंदूक की नोंक पर रोके रखा, जबकि बाकी लोग उफपर चले गए और उन्होंने अनीस को छत से नीचे धकेल दिया.