वर्ष - 28
अंक - 26
15-06-2019

असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) की प्रक्रिया में ऐसे अनेक उदाहरण मिले हैं जिनमें लोगों को उन व्यक्तियों के खिलाफ ‘आपत्ति आवेदन’ देने के लिए बाध्य किया जा रहा है जिनके नाम एनआरसी में दर्ज पाए जा रहे हैं.

सीजेपी (मुख्य न्यायिक अभियोजक) के पास असम के कोकराझाड़ जिले से कुछ लेागों ने शिकायतें भेजी हैं, जो दावा कर रहे हैं कि ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) के कुछ सदस्यों ने ऐसे दस ‘आपत्ति आवेदनों’ पर उनसे जबरन दस्तखत करवाए हैं.

जिला नागरिक पंजीकरण रजिस्ट्रार को संबोधित इन शिकायती चिट्ठियों में ऐसे तमाम लोगों की एआरएन संख्या दर्ज है जिनके खिलाफ उन शिकायतकर्ताओं को आपत्ति आवेदनों पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया है. इन सभी शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि जिन सच्चे निर्दोष नागरिकों के खिलाफ उनसे दस्तखत लिए गए हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए.

शिकायतकर्ताओं ने अपनी चिट्ठियों में आपत्तियों को वापस ले लिया है और इसके बजाए एबीएसयू के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है, जिसने उन्हें झूठी आपत्तियों पर दस्तखत करने को मजबूर किया है. एबीएसयू सदस्यों द्वारा उत्पीड़न की ये घटनाएं दिसंबर 2018 में हुई थीं µ यानी, आपत्ति दर्ज कराने की अंतिम तिथि के ठीक पहले.

इसी बीच, असम के बदनाम हाजती शिविरों में बंद लोगों को बड़ी राहत देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जिन लोगों को तीन वर्ष तक इन हाजतों में कैद रखा गया है, उन्हें कुछ शर्तों के साथ रिहा कर दिया जाए. असम के हाजती शिविरों के खस्ता हालात पर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान यह निर्देश जारी किया गया है. न्यायालय इस बात पर भी सहमत है कि घोषित विदेशियों के निर्वासन के मामले में कूटनीतिक स्तर पर हुई प्रगति बताने और असम में विदेशियों के लिए अतिरिक्त ट्रिब्यूनल गठित करने की सूचना देने के लिए राज्य को अतिरिक्त समय दिया जाए. राज्य को यह भी कहा गया है कि वह गुवाहाटी उच्च न्यायालय के साथ सलाह-मशविरा कर विदेशियों के लिए ट्रिब्यूनल-गठन से संबंधित एक विस्तृत योजना बनाए जिसमें इन ट्रिब्यूनलों के सदस्यों व कर्मियों की नियुक्ति का भी विवरण रहे.

यह वही याचिका है जो सबसे पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता  हर्ष मंदर ने दायर की थी. लेकिन जब हर्ष मंदर ने यह कहा कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने ‘विदेशियों’ के बारे में अपनी पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणियों की रोशनी में खुद को इस मुकदमे से अलग कर लिया है, तो सर्वोच्च न्यायालय ने मंदर का नाम याचिकाकर्ता के बतौर हटा दिया और उनके बजाए सर्वोच्च न्यायालय विधिक सेवा को मुख्य याचिकाकर्ता बना दिया.

याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से इन बातों का आग्रह किया गया है:

  • - भारत के संविधान की धारा 21 और आप्रवासी कैदियों के साथ बर्ताव के बारे में अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक असम में हाजती केंद्रों में रखे गए लोगों के प्रति उचित, मानवीय और कानून सम्मत बर्ताव की गारंटी की जाए.
  • - घोषित विदेशियों के लिए यह सुनिश्चित किया जाए कि अंतिम उपाय के बतौर ही उन्हें सीमित अवधि के लिए और रिहाई की स्पष्ट संभावना के साथ हाजत में बंद किया जाए ऋ उनपर कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए और यह उपाय इस मूल्यांकन के बाद ही अपनाया जाए कि इससे कमतर प्रतिबंधात्मक या उत्पीड़नकारी कदमों से काम नहीं चल सकता है.
  • - यह सुनिश्चित किया जाए कि जिन लोगों को अंतिम उपाय के बतौर और सीमित अवधि के लिए हाजती बंदी बनाया जाता है, उन्हें इस अवधि में भी किसी भी स्थिति में उनके परिवारों से अलग न किया जाए
  • - आप्रवासी बंदियों के मानकों के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानून के मद्देनजर विदेशियों की सीमित अवधि के लिए हाजती बंदी के तमाम मामलों में उन्हें जेल में डालने से पूरी तरह निषेध किया जाए.
  • - उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में विदेशियों के लिए ट्रिब्यूनलों के आदेशों को चुनौती देने हेतु ऐसे हाजती बंदियों को मुफ्रत कानूनी सहायता और उचित अवसर प्रदान करने का विकल्प सुनिश्चित किया जाए
  • - जिन लोगों का विदेशी होना निर्धारित किया गया है और जिन्हें निष्कासन के पूर्व बंदी बनाया गया है, उनके साथ शरणार्थी-जैसा बर्ताव करने के लिए आदेश निर्गत किया जाए
  • - यह सुनिश्चित किया जाए कि जो हाजती बंदी राज्य के साथ इस बात पर सहमत हैं कि वे विदेशी हैं, उनके बारे में स्पष्ट नीतियां बनाई जाएं, ताकि निर्वासन से संबंधित उनके आवेदनों पर कार्रवाई को तेज किया जा सके.
  • - ऐसा आदेश जारी किया जाए कि जिन लोगों को विदेशी घोषित किया गया है ऋ लेकिन जिन्हें उनका मूल देश अपना नागरिक मानने को तैयार नहीं है, उन्हें राज्यविहीन व्यक्ति घोषित किया जाए और उन्हें शरणार्थियों को मिलने वाले दीर्घावधि के वीसा व अन्य संरक्षण मुहैया कराए जाएं.
  • - यह सुनिश्चित किया जाए कि जिन लोगों को विदेशी माना जा रहा है उनके सभी बच्चों के लिए भारतीय किशोर न्याय कानून लागू हो ऋ और चाहे वे बंदी बच्चे हों अथवा बंदी माता-पिता के बच्चे हों µ उन सभी के साथ ऐसे बच्चों जैसा बर्ताव किया जाए जिन्हें देखभाल और संरक्षण की जरूरत है.