वर्ष - 28
अंक - 26
15-06-2019

भारतीय मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान (आइआइएमएस) की कर्नाटक इकाई ने 21 अप्रैल को मैसूर में डा. अंबेडकर की रचनाओं पर अध्ययन शिविर संगठित किया. इसका मकसद था कामरेडों को डा. अंबेडकर के लेख पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना तथा वर्ग संघर्ष व जाति उन्मूलन के संघर्ष को आगे बढ़ाना. अध्ययन शिविर में पार्टी कामरेडों के अलावा आइआइएमएस, पीयूसीएल और ‘फ्राइडे फोरम’  के सदस्यों ने भी हिस्सा लिया.

भाकपा (माले) के पोलित ब्यूरो सदस्य का. वी शंकर ने अध्ययन शिविर का उद्घाटन किया. कामरेड शंकर ने विस्तार से बताया कि कम्युनिस्टों को क्यों डा. अम्बेडकर की रचनाएं पढ़नी चाहिए. उन्होंने कहा कि मार्क्स का अनुयायी होने के नाते हमें तमाम प्रगतिशील विचारों की शिनाख्त करनी चाहिए और साझे मुद्दों को तलाशना चाहिए. ऐपवा की राष्ट्रीय अध्यक्ष का. रति राव ने अपनी उद्घाटन टिप्पणी में बताया कि अपने समकालीन अन्य अनेक नेताओं के विपरीत डा. अम्बेडकर ने ‘मनुस्मृति’ के अपने आलोचनात्मक विश्लेषण के जरिए जाति और पितृसत्ता के सवालों पर कैसी भिन्न भूमिका अदा की थी.

पार्टी के केंद्रीय कमेटी सदस्य और कर्नाटक राज्य सचिव का. क्लिफ्टन ने “जाति उन्मूलन” पुस्तक को प्रस्तुत किया. आइआइएमएस की राज्य संयोजक तथा पार्टी की राज्य कमेटी सदस्य डा. लक्ष्मीनारायण ने “गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के साथ क्या किया” पुस्तक को पेश किया. राज्य कमेटी सदस्य का. मणि ने “बुद्ध या कार्ल मार्क्स” की प्रस्तुति की, तथा का. मैत्रोयी ने “राज्य और अल्पसंख्यक” पर अपने विचार रखे.

“जाति उन्मूलन” प्रस्तुत करते हुए का. क्लिफ्टन ने कहा कि आज जब सांप्रदायिक और जातीय राजनीति केंद्र-स्थल में चली आई है और विवेक तथा तर्क-वितर्क को कोई जगह नहीं मिल रही है तो इस पुस्तक को पढ़ना ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. उन्होंने इस पुस्तक के चंद मूलभूत बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

“जाति उन्मूलन” एक परिचर्चा लेख था जिसे पेश नहीं किया जा सका, क्योंकि इसके आयोजक “जात पात तोड़क मंडल” अंबेडकर द्वारा दिए जाने वाले इस भाषण से बिलकुल सहमत नहीं थे, जो उन्हें पहले ही भेज दिया गया था. उन्होंने महसूस किया कि यह लेख सिर्फ ब्राह्मणवाद पर केंद्र करने के बजाए वेदों और अन्य धार्मिक रचनाओं के तर्कों व नैतिक मानदंडों पर चोट करता है. इसीलिए अंबेडकर ने आम लोगों के पढ़ने के लिए इस लेख को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया.

इसकी शुरुआत में सामाजिक सुधार के बारे में अंबेडकर की समझदारी सूत्रबद्ध है. वे कहते हैं कि सामाजिक सुधार की आलोचना की दो धाराएं हैं - राजनीतिक सुधारवादियों की और समाजवादियों की.

राजनीतिक सुधारवादियों की आलोचना पर बहस करते हुए उन्होंने यह तर्क पेश किया कि क्या राजनीतिक सुधार के पहले सामाजिक सुधार लाया जाना चाहिए. यहां वे 1885 में गठित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इसकी सामाजिक शाखा ‘सोशल कांन्फ्रेंस’ (1887 में गठित) की ओर जाते हैं तथा यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सोशल कांन्फ्रेंस’ टिक नहीं सका, क्योंकि यह संपूर्ण हिंदू समाज के पुनर्गठन और पुनर्निमाण के बजाए पूरी तरह परिवार के अंदर सुधारों तक सीमित रह गया. इतिहास का अवलोकन करते हुए अंबेडकर ने निष्कर्ष निकाला कि राजनीतिक शांति के पहले हमेशा ही सामाजिक व धार्मिक क्रांतियां घटित होती हैं.

जहां तक समाजवादियों का ताल्लुक है तो अंबेडकर ने आलोचना की कि उनका रुख आर्थिक सुधार पर केंद्रित रहता है. वे यह नहीं समझ पाए कि धर्म, सामाजिक हैसियत और संपत्ति सत्ता व प्राधिकार के स्रोत हैं, और अलग-अलग चरणों में ये अलग-अलग तत्व प्रधानता ग्रहण करते हैं. खास तौर पर उन्होंने जाति को समझने में समाजवादियों की विफलता को सामने लाया और यह सवाल पेश किया कि क्या सामाजिक सुधार के बगैर आर्थिक सुधार संपन्न किया जा सकता है, और जवाब दिया कि ऐसा नहीं किया जा सकता है.

इसके बाद अंबेडकर ने जाति के बचाव पर विचार करते हुए ‘श्रम विभाजन’ के बतौर इसकी अवधारणा को चूल चटाते हुए कहा कि श्रेणीबद्ध समाज के कठोर बंधनों में जकड़ा यह ‘श्रमिकों का विभाजन’ है.

अंबेडकर ने चंद निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि जाति एक सामाजिक प्रणाली है जो हिंदुओं के विकृत तबके की उद्दंडता और स्वार्थपरता का ठोस रूप है और, यह कि हिंदू समाज एक मिथ्या अवधारणा है और हिंदू चेतना नाम की कोई चीज नहीं है. वे कहते हैं कि यह कोई ‘समाज’ नहीं है, बल्कि यह महज जातियों का विन्यास है जिसमें निम्न जातियों को अपना सांस्कृतिक स्तर ऊंचा उठाने से सचेतन ढंग से रोका जाता है.

इसके बाद अंबेडकर जाति से रहित आदर्श समाज की संभावित अवधारणा पर विचार करते हैं और ‘आर्य समाजियों’ जैसे कुछ सुधारवादियों के दृष्टिकोण को खारिज करते हैं जो जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि ‘गुण’ के आधार पर विभाजन का विचार फैलाते हैं और कहते हैं कि यह जहरीली प्रणाली है जो मूलतः गुलामी ही है.  इसके बजाए वे तर्क करते हैं कि इस समाज को स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के आधार पर खड़ा किया जाना चाहिए.

अपने निष्कर्षात्मक अंश में अंबेडकर हिंदू समाज व्यवस्था में सुधार लाने तथा जातियों का खात्मा करने के संभावित उपायों की चर्चा करते हैं. यहां वे तर्क देते हैं कि उप-जातियों का उन्मूलन एक गलत उपाय है, अंतरजातीय भोजन अपर्याप्त उपाय है, जबकि अंतरजातीय विवाह इसका वास्तविक उपाय है.

इसके बाद अंबेडकर इस पर विचार करते हैं कि लोग क्यों जातिवादी आचरण करते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं कि हिंदू लोग जाति का अनुसरण इसलिए नहीं करते हैं कि वे ‘बुरे’ हैं, बल्कि वे शस्त्रों को मानकर ऐसा करते हैं, क्योंकि वे लोग गहरे रूप से धार्मिक हैं (वे पुराण, शास्त्र और वेदों को मानते हैं) इसीलिए उन्हें शास्त्रों से मुक्त कराना होगा. इस प्रकार, असली उपाय यह है कि शास्त्रों की मान्यता को ध्वस्त किया जाए और “शास्त्रों से आजादी” मिले.

बहसों के दौरान यह गौर किया गया कि अंबेडकर की इस पुस्तक के प्रति गांधी का रुख आलोचनात्मक था. यह भी सामने आया कि जाति सिर्फ सोच की खास अवस्था नहीं है, बल्कि जाति के सामाजिक व भौतिक बुनियाद को गहराई से समझना होगा. यह भी बताया गया कि हमें संसदीय राजनीति में जाति की भूमिका पर लोहिया के विचारों को भी पढ़ने की जरूरत है. यह बात भी उभर कर सामने आई कि हमारे कामरेडों को मनुस्मृति पढ़ना चाहिए और जनता के बीच इसके बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए ताकि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की पहचान करने और इसका प्रतिरोध करने का माहौल बन सके.

दूसरी पुस्तक “गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के साथ क्या किया” को पेश करते हुए का. लक्ष्मी नारायण ने कहा कि अंबेडकर अपने जीवन काल के बनिस्पत आज ज्यादा लोकप्रिय हैं. इस किताब के साथ-साथ जोड़कर का. लक्ष्मी ने अंबेडकर की एक अन्य रचना “क्रांति और प्रतिक्रांति” को भी पेश किया. एक क्रांतिकारी दर्शन के बतौर बौद्ध विचार ने दुनिया को हिला दिया और इसे फ्रांसीसी क्रांति, अमेरिकी स्वतंत्रता तथा रूसी क्रांति जैसी युगांतरकारी क्रांतियों की श्रेणी में रखा जा सकता है. बौद्ध दर्शन सब के लिए मोक्ष का वादा करता था और सभी मानवों के बीच समानता की बात करता था. बौद्ध दर्शन के प्रति क्रांति के बतौर ब्राह्मणवादी ताकतों ने मनुस्मृति को आगे बढ़ाया, जिसमें एक सामाजिक कानून के बतौर सूत्रबद्ध है कि किस जाति को क्या काम करना है. कामरेड लक्ष्मी ने संक्षेप में अंबेडकर के लेख “रानाडे-गांधी-जिन्ना” पर भी चर्चा की. उन्होंने यह व्याख्यायित किया कि कैसे अंबेडकर तमाम आधुनिक सभ्यता के खिलाफ गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ की आलोचना करते थे.

“गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के साथ क्या किया” पुस्तक पर बोलते हुए का. लक्ष्मी ने बताया कि अंबेडकर के लिए संवैधानिक नैतिकता केंद्रीय महत्व रखती थी. अपनी पुस्तक में अंबेडकर ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ की चर्चा करते हैं जो शूद्रों तथा अछूतों और संपत्ति के उनके अधिकारों को निरस्त करता था. यही गठजोड़ महिलाओं की अधीनता और दमन के लिए भी जिम्मेदार था. अंबेडकर के अनुसार, गांधी जातीय प्रणाली को उचित ठहराते थे और वे आधुनिक शिक्षा तथा औद्योगीकरण के विरोधी थे. अंबेडकर कठोर श्रम के बाद अवकाश का पक्षपोषण करते थे, लेकिन गांधी इससे सहमत नहीं थे. गांधी अछूतों को ‘हरिजन’ कहते थे और वे चाहते थे कि वे लोग अपना परंपरागत काम जारी रखें और ‘हरिजनों’ के बतौर ही मर जाएं. अपनी इसी स्थिति तथा ‘पूरा समझौता’ के जरिए भावनात्मक ‘बलैकमेल’ के साथ गांधी ने दलितों का बड़ा नुकसान किया.

तीसरी पुस्तक “बुद्ध या कार्ल मार्क्स” को पेश करते हुए कामरेड मणि ने बताया कि अंबेडकर ने अन्य धर्मों के बजाए बुद्ध धर्म को ही क्यूं अपनाया तथा मार्क्सवाद के बारे में उनका क्या परिप्रेक्ष्य था. अंबेडकर ने यह कहते हुए कि जाति व्यवस्था की जड़ें हिंदू धर्म में निहित हैं, 13 अक्टूबर 1935 को हिंदू धर्म छोड़ दिया. वे ऐसे धर्म की खोज में थे जिसमें दलितों को समान हैसियत और बर्ताव हासिल हो सके, और उन्हें बुद्ध धर्म में यह बात दिखी. बड़े पैमाने पर धर्म-परिवर्तन के साथ, अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को बुद्ध धर्म अपना लिया. लेकिन, बुद्ध धर्म के बाद मार्क्सवाद ही अंबेडकर की दूसरी सर्वोत्तम पसंद थी. इस पुस्तक में अंबेडकर इस पर चिंतन करते हैं कि ‘बुद्ध किसी मार्क्सवादी को क्या शिक्षा दे सकता है’, जबकि बुद्ध (ई.पू. 563) और मार्क्स (1818 ई.) के बीच 2581 वर्षों की खाई है.

चौथी पुस्तक “राज्य और अल्पसंख्यक” पेश करते हुए कामरेड मैत्रेयी ने बताया कि अंबेडकर ने अल्पसंख्यकों की कौन सी नवीन परिभाषा दी है. अंबेडकर के मुताबिक, बहुसंख्यक/ अल्पसंख्यक सकल को धर्म की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. अल्पसंख्यक तबके वे हैं जिनके साथ बहुसंख्यक तबका समाज में भेदभाव करता है. इसीलिए, दलितों को अल्पसंख्यक समझा जाना चाहिए, क्योंकि हिंदुओं के बीच बहुसंख्यक तबकों के द्वारा उनके साथ भेदभाव करता जाता है. अंबेडकर सलाह देते हैं कि अल्पसंख्यकों के परिप्रेक्ष्य से राज्य को अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक होना चाहिए. राज्य को चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों समेत तमाम लोगों के लिए मौलिक अधिकार और उनके निजी अधिकार सुनिश्चित करे, जिसमें धर्म चुनने की आजादी और बोलने की स्वतंत्रता भी शामिल रहे.

अंबेडकर जीवन, स्वतंत्रता और सुख की तलाश सुनिश्चित करने में राज्य की भूमिका की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि राज्य को यह गारंटी करनी चाहिए कि जनता अभाव और भय से खुद को मुक्त कर सके. अंबेडकर बीमा और कृषि क्षेत्रों के राष्ट्रीयकरण की भी बात इस पुस्तक में करते हैं.

इस अध्ययन शिविर की सफलता के मद्देनजर यह फैसला लिया गया कि कर्नाटक में पार्टी के कामकाज वाले तमाम इलाकों में ऐसे शिविर आयोजित किए जाएं.