‘चारु मजुमदार भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के समूचे इतिहास में पहले और एकमात्र कम्युनिस्ट नेता थे, जिन्होंने भारतीय क्रांति की सजीव तस्वीर पेश की थी, और इस महानायक के पीछे जैसे जादू के जोर से खींची चल पड़ी थी दसियों हजार नौजवान कम्युनिस्टों की एक समूची पीढ़ी, जिस पीढ़ी ने स्वेच्छा से - रवीन्द्रनाथ की भाषा में - ‘जीवन आर मृत्यु के पायेर भृत्य बनिये’ - शहादत कबूल की थी। ठीक जिस तरह भगत सिंह की लाश को अंग्रेजों ने रातोंरात जला दिया था, उसी तरह चारु मजुमदार के शव को भी कड़े पुलिस पहरे में रातोंरात भस्मीभूत कर दिया गया. उनके हजारों-हजार प्रशंसक उनकी मृत देह पर दो बूंद आंसू और श्रद्धा के दो सुमन भी न चढ़ा सके.’

- का. विनोद मिश्र

(शहादत के पच्चीस वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित ‘भारतीय क्रांति के महानायक कामरेड चारु मजूमदार’ पुस्तिका की भूमिका)