ऐसा भी एक वक्त था जब हम बोलते थे  
एक जमाना भी था जब हम जोर से बोलते थे
ना इंसाफी के खिलाफ  बेइंसाफी के खिलाफ
हम एक ही आवाज में जोर-जोर से चिल्लाते थे
हंगामा मचा के उठाते थे सोये हुये लोगों को
मिलाते थे बिछड़े हुये बिगडे़ हुये दिलों को!
अरे अब क्या हो गया है हम कहां खो गये हैं
हर तरफ दर्द के अफसाने फैले हुये हैं
हर आंगन मे टूटे दिलों के टुकड़े नजर आ रहे हैं
हर इंसान के दिल में टूटा हुआ मन दिख रहा है
हर तरफ खेतों की हरियाली अब बेरंग हो गई है
दाने-दाने में किसान के आंसू नजर आते है!
हम अपनी रोटी खुद कमाते हैं कोई बात नहीं
लेकिन खाने की वक्त ये तो सोचना तो सही
इस रोटी की हर दाने पे उन्हीं का नाम लिखा है
जो अपनी मेहनत से मिट्टी को सोना बना देता  है
धूप  हो या छांव बारिश हो या बिजली  तूफान
इन खेतों में उगलता है इस मिट्टी की संतान !
आज इस  धरती का संतान कुछ मांग रहा है हुज़ूर
जरा सुन लीजिये, ये हर इंसान की आवाज जरूर
देश के हर खेत में ऐसा सन्नाटा छाया हुवा है जनाब
थोड़ा आंखें मिलाकर तो दे दीजिये उनको जवाब
हम सब तो इस मिट्टी के ही बने हुवे इंसान है
देश को श्मशान बनाना तो आपका मकसद नहीं है!

– दिवाकर, कर्नाटक