सौ वर्ष की आयु पार कर चुके नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के नेता का. मुजीबुर रहमान का निधन 29 दिसंबर 2019 को नक्सलबाड़ी स्थित अपने आवास पर हो गया. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के दौरान उन्हें उनके जन्म-स्थान ढाका में कुछ महीनों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था. उन्होंने 1939 में कुछ समय के लिए दार्जिलिंग की यात्रा की थी. देश विभाजन के पूर्व वे सिलिगुड़ी चले आए थे, और वहां उन्होंने सरकारी साॅ मिल में जाॅब असिस्टेंट के बतौर काम करना शुरू किया. यहीं वे का. केशव सरकार व अनिल साहा जैसे कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के संपर्क में आए और वर्कमेन्स यूनियन के सदस्य बन गए.

1940-दशक के उत्तरार्ध में ईस्ट पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ाव के चलते वे दाजिर्लिंग जिले में नवगठित भाकपा के एक संस्थापक-सदस्य बने. 1955 में उन्हें नक्सलबाड़ी प्रखंड के मणिराम इलाके में भूमिहीन व गरीब किसानों को संगठित करने की जिम्मेदारी दी गई. वहां उन्होंने का. चुन्नीलाल गोआला, पंचानन सरकार, जोगेन मुखर्जी आदि के साथ काम किया.

1967 में, जब बटाईदार बिगुल किशन ने कुख्यात जोतदार बुद्धिमान तिर्की के लठैत के खिलाफ विद्रोह किया तो बिगुल को बुरी तरह पीटा गया. लेकिन स्थानीय थाना ने बुद्धिमान के खिलाफ एफआइआर लेने से इन्कार कर दिया, क्योंकि वह तत्कालीन कांग्रेसी नेता ईश्वर तिर्की का भाई था. अगले दिन, का. मुजीबुर ने बड़ी तादाद में किसानों की अगुवाई की और बंदूक की धमकी के बावजूद तिर्की के घर का घेराव कर दिया. तराई किसान सभा के नेतृत्व में बिगुल किशन ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की और पहली बार उस जोतदार के खिलाफ कानूनी लड़ाई में जीत मिली. इस जीत ने सचमुच किसान सभा के नेतृत्व में गरीब किसानों के बीच भारी उफर्जा और शक्ति पैदा कर दी. 24 मई 1967 को, जिस दिन नक्सलबाड़ी के झोड़ूजोत में क्रूर पुलिस सब-इंसपेक्टर सोनम वांगडी जनता के गुस्से का शिकार बना, कामरेड मुजीबुर ने मणिराम में पुलिस अत्याचार के खिलाफ साहस के साथ एक बड़ी रैली संगठित की.

ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी आन्दोलन की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर नक्सलबाड़ी-खोरीबाड़ी-फांसीदेवा में 3-दिवसीय जन जागरण यात्रा के आरंभ में 19 नवंबर 2016 को कामरेड खोकन मजुमदार, खुदन मल्लिक, दुलालचंद, शांति मुंडा, नेमू सिंह, खेमू सिंह, सिरिल उरांव जैसे नक्सलबाड़ी आन्दोलन के वरिष्ठ नेताओं ने का. मुजीबुर रहमान को सम्मानित किया. वे अपनी अंतिम सांस तक कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार और जन समुदाय में अत्यंत लोकप्रिय बने रहे.

कामरेड मुजीबुर रहमान, जिंदाबाद!