वर्ष - 29
अंक - 2
05-01-2020

समूचे भारत में लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रतिवाद कर रहे हैं, जिसे भाजपा सरकार ने दिसम्बर 2019 में संसद से पास करा लिया है.

लोगों ने इस बात को पहचान लिया है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) साम्प्रदायिक और गैर-संवैधानिक है, और सीएए के साथ अखिल भारतीय राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को जोड़ देने से मुसलमान नागरिकों को घुसपैठिया करार देने तथा गैर-मुस्लिम नागरिकों को “शरणार्थी” में बदल देने का खतरा सामने खड़ा हो जाता है.

कई जगहों पर इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी गई है, सड़क और रेल आवागमन को प्रतिबंधित कर दिया गया है, समूचे भारत में धारा 144 लागू कर दी गई है, छात्रों एवं अन्य प्रतिवादकारियों को बर्बरतापूर्वक पीटा जा रहा है, उन पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, उनकी आंखें फोड़ी जा रही हैं, अपंग बनाया जा रहा है और यहां तक कि उनकी हत्या भी की जा रही है.

सीएए और अखिल भारतीय एनआरसी के खिलाफ जनता के आंदोलन का उद्देश्य है भारत के संविधान की रक्षा करना, लोकतंत्र और एकता की रक्षा करना.

अब, समूचे भारत में और दुनिया भर में हो रहे प्रतिवादों के दबाव में मोदी-शाह सरकार सीएए का बचाव करने की बेताबी भरी कोशिश में सीएए और एनआरसी के बारे में झूठ बोल रही है, और प्रतिवादों के बारे में भी झूठ बोल रही है.

सरकार आपसे झूठ बोल रही है.
अधिकांश मीडिया आपके सामने झूठ परोस रहा है.
आपको सच्चाई जानने का हक है.
सरकार के झूठों का भंडाफोड़ करने के लिये, और सच्चाइयों को जानने के लिये इस लेख को पढ़ते जाइये.

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) क्या है?

इस नागरिकता संशोधन कानून के जरिये नागरिकता कानून, 1955 में बदलाव किया गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर मुसलमान (यानी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) आप्रवासियों को, जो 31 दिसम्बर 2014 से पहले भारत में आ चुके हैं, एक अधिक शीघ्र रास्ते से 12 वर्ष के बजाय 6 वर्ष में ही भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी जायेगी.

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अभी भारत में ऐसे आप्रवासियों की तादाद कितनी है? अभी उनका दर्जा क्या है?

वर्ष 2016 में नागरिकता संशोधन विधेयक पर संसदीय समिति द्वारा की जा रही एक सुनवाई में इंटैलिजेन्स ब्यूरो (आईबी) द्वारा पेश किये गये एक वक्तव्य के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से दिसम्बर 2014 से पहले भारत आ चुके गैर-मुस्लिम आप्रवासियों की संख्या 31,313 थी.

वर्ष 2011 में कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने 29 नवम्बर 2011 को एक पत्र के जरिये एक मानक कार्यविधि (स्टैंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर या सीओपी) की अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत कोई भी शरणार्थी दीर्घकालीन वीजा (लांग टर्म वीजा या एलटीवी) के लिये आवेदन कर सकता था. जिन लोगों को एलटीवी मिल जाये तो वे पैन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेन्स को हासिल कर सकते हैं और सम्पत्ति की खरीद भी कर सकते हैं.

वर्ष 2011 से लेकर 2014 तक यूपीए सरकार ने पड़ोसी देशों से आये 14,726 आप्रवासी लोगों को एलटीवी प्रदान किया (जिनमें अधिकांशतः हिंदू हैं). वर्ष 2011 से लेकर 2018 तक कोई 30,000 लोगों को दीर्घकालीन वीजा (एलटीवी) मिला. (देखें ‘पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों को ज्यादा अधिकार प्रदान करने की खातिर भारत ने दीर्घकालीन वीजा रखने वालों के लिये नियम शिथिल कर दिये’, इंडिया टुडे, 17 जुलाई, 2018)

इसलिये – संक्षेप में कहा जाये तो – सीएए से प्रस्तावित लाभ उठाने वाले अधिकांश लोग तो अभी भी भारत में टिके रहने के लिये दीर्घकालीन वीजा (एलटीवी) हासिल कर सकते हैं और वे इसी बीच ऐसा कर भी चुके हैं तथा पैन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेन्स भी पा चुके हैं और अपने परिवारों के लिये मकान भी खरीद चुके हैं.

क्या नागरिकता कानून 1955 के तहत, पड़ोसी देशों से आये आप्रवासियों को भारतीय नागरिकता मिल सकती थी?

हां, जरूर. नागरिकता कानून 1955 के तहत किसी भी श्रेणी का कोई भी विदेशी, देशीकरण (नेचुरलाइजेशन) के माध्यम से (नागरिकता कानून के अनुच्छेद 6 के अनुसार) अथवा रजिस्ट्रेशन के जरिये (नागरिकता कानून का अनुच्छेद 5) भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन कर सकता थी और उसे हासिल भी कर सकता था.

तो फिर, अगर आप्रवासी/शरणार्थी अभी भी दीर्घकालीन वीजा के जरिये सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं और नागरिकता पाने के लिये आवेदन कर सकते हैं, तब सरकार सीएए को लागू करने पर इतना क्यों अड़ी हुई है?

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का एकमात्रा उल्लेखनीय चारित्रिक पहलू यह है कि इसमें धर्म के आधार पर शरणार्थियों के बीच भेदभाव किया गया है, और इसमें गैर-मुस्लिम शरणार्थियों/आप्रवासियों को 12 वर्ष की अवधि के बजाय 6 वर्ष में ही देशीकरण (नेचुरलाइजेशन) के बरास्ते नागरिकता और मतदाता का दर्जा हासिल करने का एक शाॅर्ट रास्ता प्रदान किया गया है.

सीएए को लाने की तैयारी के दौरान मोदी-शाह सरकार ने दीर्घकालीन वीजा (एलटीवी) के नियमों में भी संशोधन करके सितम्बर 2015 में गजट ऑफ इंडिया की अधिसूचना जारी करके एलटीवी हासिल करने के लिये योग्यता-सम्पन्न लोगों की एक नई श्रेणी का सृजन कर दिया. इन परिवर्तित नियमों के अनुसार, “बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों के लोग – जैसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई – जो भारत में 31 दिसम्बर 2014 को या उससे पहले आ चुके हैं,” चाहे उनके पास कोई वैध दस्तावेज हों या न हों, अथवा ऐसे दस्तावेज हों जिनकी वैधता समाप्त हो चुकी हो, उनको दीर्घकालीन वीजा (एलटीवी) प्रदान कर दिया जायेगा. दूसरे शब्दों में, मोदी-शाह सरकार ने एलटीवी के नियमों को तोड़-मरोड़कर उसे नागरिकता संशोधन विधेयक, जिसका उन्होंने मसविदा बनाया था, के साथ संगतिपूर्ण बनाने के लिये संशोधित कर दिया. (गृह मंत्रालय का दस्तावेज)

यहां लक्ष्य करें कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिम शरणार्थी/आप्रवासी, जो भारत में 2014 से पहले आ गये हैं, उनके पास पैन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेन्स है और सम्पत्ति खरीदने का अधिकार हासिल है. सीएए उनको एक “अतिरिक्त” चीज दे रहा है, वह है वोट करने का अधिकार, जिसके लिये वे भारत में 12 वर्ष की अवधि तक रहने के बजाय अब 6 वर्ष रहने के बाद ही योग्य बन जायेंगे. मगर उसी सीएए के तहत म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या मुसलमानों, श्रीलंका से आने वाले तमिल शरणार्थियों, अथवा पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आने वाले अहमदिया और हजारा समुदाय के शरणार्थियों तथा बांग्लादेश से तस्लीमा नसरीन जैसे अन्य शरणार्थियों/आप्रवासियों के लिये नागरिकता और मतदान का अधिकार पाने का कोई शीघ्र रास्ता (फास्ट ट्रैक रूट) नहीं है.

इसलिये, सीएए की एकमात्र भिन्न चारित्रिक विशिष्टता उसका साम्प्रदायिक चरित्र है.

भाजपा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आये गैर-मुसलमानों को नागरिकता और मतदान का अधिकार प्रदान करने की प्रक्रिया को इतना शीघ्र क्यों पूरा कर लेना चाहती है, जबकि रोहिंग्या, तमिल, अहमदिया, हजारा और राजनीतिक जुल्म के शिकार मुसलमान शरणार्थियों को वही मौका देने से इन्कार कर रही है?

भाजपा सीएए को लागू करने पर तीन कारणों से जोर दे रही है.

(1) क्योंकि भाजपा इस खास तबके के लोगों, खासकर बांग्लादेश से आये हिंदुओं को असम और पश्चिम बंगाल में अपने वोट बैंक के बतौर देखती है. असम के वित्तमंत्री और प्रमुख भाजपा नेता हिमांत बिश्वशर्मा ने एक असम-आधारित टीवी चैनल जी-प्लस को दिये गये एक साक्षात्कार में इसकी व्याख्या करते हुए बताया था कि “नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये हमें असम में अगले 10 वर्षों के लिये 17 सीटों पर जीत पक्की हो जायेगी. अगर आप 10,000 बंगाली हिंदू वोटों को निकाल दें तो ऐसी सीटें यूएमएफ (युनाइटेड माइनाॅरिटी फ्रंट) या यूडीएफ (युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) को मिल जायेंगी. हम कई सीटों को हार जाने के कगार पर हैं. अगर हम तुरंत नागरिकता संशोधन विधेयक नहीं लाते हैं तो ये 17 सीटें तुरंत चली जायेंगी. वे लोग जो 31 दिसम्बर 2014 से पहले असम में आ गये थे, वे तो यहां रह ही रहे हैं, आप उनको शारीरिक रूप से बलप्रयोग कर नहीं निकाल सकते. आप उनको क्या छूट दे रहे हैं? आप उनको वोट देने का अधिकार दे रहे हैं. उनको यह छूट देकर आप फिलहाल के लिये उन 17 सीटों को अपने पास ही रख पा रहे हैं.”

(2) भाजपा और आरएसएस के लिये इससे भी ज्यादा महत्व की बात यह है कि सीएए धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकता प्रदान करके भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को क्षतिग्रस्त करता है. सीएए से पहले जो नागरिकता कानून थे उनके तहत कोई भी शरणार्थी या आप्रवासी नागरिकता के लिये आवेदन कर सकता था और भारत सरकार हर अलग-अलग व्यक्ति के आवेदन के मूल्यांकन के आधार पर उसकी प्रार्थना को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती थी. यह पहली बार है कि सीएए भारतीय नागरिकता को धर्म के साथ जोड़ रहा है और इसीलिये भारतीय संविधान में एक ऐसा छेद कर दे रहा है ताकि उसकी धर्मनिरपेक्षता उस छिद्र से बाहर निकल जाये.

(3) इसका तीसरा कारण यह है कि एनआरसी और सीएए की मिला देने पर उस सम्मिलित प्रक्रिया से मोदी-शाह सरकार मुसलमानों से उनकी नागरिकता का अधिकार छीन लेना चाहती है. पश्चिम बंगाल में अप्रैल और मई 2019 में अमित शाह ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान रैलियों में दिये भाषण में इस बात को स्पष्ट कर दिया था. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के कलिम्पोंग में आयोजित एक रैली में अमित शाह ने कहा था, “हमने हमारे घोषणापत्र में वादा किया है कि दोबारा नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद देश भर के अंदर एनआरसी बनाया जायेगा. और एक-एक घुसपैठिये को चुन-चुन कर निकालने का काम यह भाजपा सरकार करेगी. और जितने भी हिंदू, बौद्ध शरणार्थी आये हैं, उन सभी को ढूंढ-ढूंढ कर भारत की नागरिकता देने का काम भाजपा की सरकार करने वाली है.” (इंडियन एक्सप्रेस, 12 अप्रैल, 2019)

पश्चिम बंगाल के ही उत्तर दीनाजपुर जिले के रायगंज में आयोजित एक अन्य रैली में शाह ने कहा था, “अवैध आप्रवासी दीमक की तरह हैं और हम पश्चिम बंगाल में एक-एक बांग्लादेशी घुसपैठिये को खोज निकालेंगे और उन्हें निकाल बाहर करेंगे. हम सारे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन शरणार्थियों को नागरिकता दे देंगे.” (इंडियन एक्सप्रेस, 12 अप्रैल 2019)

पश्चिम बंगाल में बनगांव में हुई एक अन्य रैली में शाह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सीएए का मतलब ऐसे गैर-मुसलमानों के लिये “सुरक्षा कवच” बनाना है, जो अखिल भारतीय एनआरसी की सूची से बाहर रह जायेंगे: “पहले हम नागरिकता संशोधन कानून पारित करेंगे और इस बात की गारंटी करेंगे कि पड़ोसी राष्ट्रों से आये सारे शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता मिल जाये. उसके बाद एनआरसी बनाई जायेगी और हम प्रत्येक घुसपैठिये को चिन्हित करेंगे और उन्हें अपनी मातृभूमि से निकाल बाहर करेंगे.”

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क्या हमें शरणार्थियों की मदद नहीं करनी चाहिये? मैंने सुना है कि पाकिस्तान में गैर-मुसलमानों की आबादी 23 प्रतिशत से गिरकर मात्र 3 प्रतिशत रह गई है – यकीनन हमें ऐसे लोगों की मदद करनी चाहिये?

संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पर हुई बहस के दौरान अमित शाह ने दावा किया था कि पाकिस्तान में विधर्मियों का सफाया अभियान चलाये जाने के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी 1947 में 23 प्रतिशत से गिरकर 2011 में केवल 3.77 प्रतिशत रह गई थी. यह बिल्कुल झूठ है. उन्होंने हिंदी में कहा था, “1947 में पाकिस्तान के अंदर अल्पसंख्यकों की आबादी 23 प्रतिशत थी, और 2011 में वो घटटकर 3.7 प्रतिशत हो गई. बांग्लादेश में 1947 में अल्पसंख्यकों की आबादी 22 प्रतिशत थी और 2011 में वो कम होकर 7.8 प्रतिशत रह गई. कहां गये ये लोग? या तो उनका धर्म-परिवर्तन हुआ, या फिर भगा दिये गये, या भारत आ गये.”

वास्तविकता की जांच करने से पता चला है कि:

“1. पाकिस्तान की कुल आबादी में गैर-मुसलमानों की आबादी कभी भी 23 प्रतिशत नहीं रही.

“2. यहां तक कि अविभक्त पाकिस्तान (यानी बांग्लादेश के निर्माण से पहले) में भी गैर-मुस्लिम आबादी का हिस्सा कभी 15 प्रतिशत के आंकड़े को पार नहीं कर पाया (वह 1951 में सर्वाधिक यानी 14.2 प्रतिशत थी).

“3. अगर आज के पाकिस्तान (यानी तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान) की बात की जाये तो 1951 में उस हिस्से की आबादी में गैर मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का केवल 3.44 प्रतिशत थी.

“4. जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम आबादी का आंकड़ा कई दशकों तक 3.5 प्रतिशत के इर्द-गिर्द ही रहा है.” (‘नहीं, पाकिस्तान की गैर-मुस्लिम आबादी की तादाद कभी 23 प्रतिशत से घटकर 3.7 प्र्रतिशत पर आई नहीं, जैसा कि भाजपा दावा कर रही है’, इंडिया टुडे, 12 दिसम्बर 2019)

क्या भारत को शरणार्थियों की मदद करनी चाहिये? यकीनन, अवश्य मदद करनी चाहिये. मगर हमें धर्म के आधार पर शरणार्थियों के बीच भेद नहीं करना चाहिये.

पाकिस्तान और अफगानिस्तान, दोनों मुस्लिम बहुल देशों में अहमदिया और हजारा समुदाय के लोग उत्पीड़न के शिकार हैं, यद्यपि हम उन्हें “मुस्लिम” ही समझते हैं. म्यांमार के रोहिंग्या, चीन के उइगुर मुसलमान, श्रीलंका के तमिल, ये सभी हमारे पड़ोसी देशों में उत्पीड़ित समुदाय ही हैं.

मगर जब देश-विभाजन हुआ था, तो क्या मुसलमानों ने एक अलग राष्ट्र, पाकिस्तान को नहीं चुना था? तब कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया. अगर पाकिस्तान एक मुस्लिम राष्ट्र है तो क्या भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं बनना चाहिये? क्या मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं चले जाना चाहिये?

अमित शाह ने सीएए के बचाव में संसद में ठीक यही बात कही थी. मगर यह झूठी बात है. द्विराष्ट्र सिद्धांत (यह सिद्धांत कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, जो कभी एक साथ अस्तित्व में नहीं रह सकते) को सबसे पहले हिंदू महासभा के सावरकर ने, 1923 के अपने घोषणापत्र, हिंदुत्व में प्रस्तावित किया था –  मुस्लिम लीग के जिन्ना द्वारा लाये गये प्रस्ताव के 26 वर्ष पहले.

बाद में, 1937 में हुए हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में, जिन्ना द्वारा द्विराष्ट्र सिद्धांत प्रस्तावित किये जाने के तीन साल पहले, सावरकर ने कहा था:

“भारत में दो परस्पर विरोधी राष्ट्र एक साथ रह रहे हैं. कई बचकाने राजनीतिज्ञ यह मानकर गंभीर गलती कर रहे हैं कि भारत अब घुलमिलकर एक समांगी राष्ट्र में बदल चुका है, या फिर महज ऐसा करने की आकांक्षा से उसे जोड़कर समांग बनाया जा सकता है. ऐसे लोग सदिच्छा रखने वाले मगर नासमझ दोस्त हैं जो अपने सपनों को ही सच्चाई मान लेते हैं... भारत को आज एक एकीकृत और समांगी राष्ट्र नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके विपरीत यहां भारत में मुख्य तौर पर दो राष्ट्र रहते हैं – हिंदू और मुसलमान.”

वी.डी. सावरकर, समग्र सावरकर वांग्मय: हिंदू राष्ट्र दर्शन, खंड 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदू महासभा, पूना, 1963, पृ. 296 कांग्रेस ने द्विराष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया, हालांकि वे पाकिस्तान के गठन के प्रस्ताव पर राजी हो गये थे. इस तरह भारत एक धर्मनिरपेक्ष संविधान को अपनाकर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन गया जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों आदि को भी वही दर्जा मिला जो हिंदुओं को मिला. आज जो मुसलमान भारत में रहते हैं वे अपनी पसंद के अनुसार पाकिस्तान नहीं गये, और उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि के बतौर अपना लिया.

आरएसएस ने कभी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन उसने देश-विभाजन के दौरान हुई बड़े पैमाने की साम्प्रदायिक हिंसा में पूरी ताकत लगाकर हिस्सा लिया.

हिंदू महासभा के नारायण भास्कर खरे को 18 अप्रैल 1947 में अलवर रजवाड़े का प्रधानमंत्री बनाया गया था और साथ ही उसको भरतपुर राज्य का सलाहकार भी नियुक्त किया गया था. उसके नेतृत्व में मेव मुसलमानों का बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ था – मेव एक विशिष्ट मुस्लिम राजपूत समुदाय है जो ढेर सारी हिंदू एवं राजपूत प्रथाओं का पालन करते हैं.

एक इतिहासकार ने नोट किया है: “जुलाई 1947 में अलवर में रजवाड़ों के लिये हिंदू महासभा का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था. जल्द ही खरे ने अलवर में स्माल आर्म्स (पिस्तौल, हल्की मशीनगन आदि) बनाने की एक फैक्टरी खड़ी की और फिर ऐसी ही एक फैक्टरी उदयपुर में भी बनाई.

“18 जून 1947 को भारी तादाद में मेव समुदाय के लोग भरतपुर से भागकर अलवर आये और अलवर से विभिन्न तहसीलों में फैल गये. इतिहासकार शैल मायाराम ने अलवर की राजकीय सेना के एक कैप्टन को सफाया (सामुदायिक हत्या को यही नाम दिया गया था) और शुद्धि (यानी बलपूर्वक धर्मांतरण) के बारे में यह कहते हुए सुना था:

“मैं हिज हाइनेस तेज सिंह का एडीसी (सहायक सैन्य अधिकारी) था. हम लोग आरएसएस के साथ थे. समूचे राज्य से मुसलमानों का सफाया कर देने का आदेश था. मुझे स्पेशल ड्यूटी के तहत तिजारा भेजा गया था.... मैं आगे बढ़ा और मैंने अपनी सेना को एक पहाड़ी पर तैनात कर दिया.” नीचे घाटी में 10,000 की संख्या में मेव थे. “हमने हर व्यक्ति की हत्या कर दी. किसी को भी नहीं छोड़ा”.

उसके बाद, एक के बाद एक गांव में शुद्धि दस्ते के साथ सेना ने मेव लोगों को मजबूर किया कि अगर वे जिन्दा रहना चाहते हैं तो उन्हें सूअर के मांस का एक टुकड़ा खाना होगा और इस्लाम से धर्मांतरण करना होगा.” अंतिम लड़ाई नौगांवां में हुई जो “मेव लोगों का एक बड़ा गढ़ था. हमने उन सबकी काट-काटकर हत्या कर दी.” जो मेव भागे वे जगह-जगह पर मार डाले गये: हमें समूचे रक्तपात क्षेत्र को साफ करने के काम में दो महीने, जुलाई और अगस्त, से ज्यादा समय लग गया.”

खरे ने उल्लास से बताया कि “इसका ही नतीजा है कि आज समूचे अलवर राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा है... इस तरीके से राज्य में मेव समस्या, जो कई शताब्दियों से अलवर राज्य को परेशानी में डाले हुए थी, उसे कम से कम अभी के लिये तो हल कर लिया गया है.”

यह वही भाषा है जिसमें हिटलर ने यहूदियों के कत्लेआम को “अंतिम समाधान” बताया था.

जब नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के मौखिक इतिहास विभाग के लिये खरे का इंटरव्यू लिया गया तो खरे ने खुशी जाहिर करते हुए बताया कि आरएसएस के नेता बीएस मुंजे को इस खूनखराबे से बड़ी प्रसन्नता हुई थी:

“लेकिन मैंने अलवर में मुसलमानों के साथ जो सलूक किया था उससे मुंजे को बेहद खुशी हुई थी ... उन्होंने मुझे नासिक बुलाया और वहां गले से लगा लिया. ... और किसी भी बात से कहीं ज्यादा, मैंने अलवर में जो कुछ किया था और जिस तरीके से वहां मुसलमानों की रीढ़ तोड़ दी थी, उसने डा. मुंजे को अत्यधिक प्रसन्न कर दिया.”

गांधी मेवात गये थे और वहां जाकर उन्होंने मेव समुदाय के 1,00,000 लोगों को वापस अलवर और भरतपुर लौटने के लिये राजी करा लिया था. तथापि जनगणना के रिकार्ड दिखाते हैं कि कैसे मुस्लिम आबादी, जो 1941 में अलवर में 26.2 प्रतिशत और भरतपुर में 19.2 प्रतिशत थी, इस खूनखराबे, धर्मांतरण और पलायन के बाद घटकर दोनों राज्यों में महज 6 प्रतिशत बची रह गई थी. “उनकी जमीन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा उनसे छीन लिया गया था.” (देखें, ‘अलवर में हिंदुत्व के लम्बे इतिहास का साया आज तक दिखाई देता है’, कन्नन श्रीनिवासन, द वायर, 29 जनवरी 2018. इस लेख में इतिहासकार शैल मायाराम  की रचनाओं से व्यापक तौर पर उद्धरण लिये गये हैं)

आज आरएसएस और भाजपा एक बार फिर से खूनखराबे भरा विभाजन तथा और बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा को अंजाम देना चाहते हैं. ब्रिटिश राज की ही तरह, जिसका आरएसएस और हिंदू महासभा ने कभी विरोध नहीं किया, भाजपा आज हमें बांटकर हमारे ऊपर शासन करना चाहती है.

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एनआरसी क्या है?

प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह, दोनों ने बार-बार दावा किया है कि एनआरसी “अवैध आप्रवासियों” को चिन्हित करने और उन्हें देश से बाहर निकालने का एक औजार है. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद ही अप्रैल 2019 में टाइम्स नाउ को दिए गए साक्षात्कार में यही बात कही थी (यू-ट्यूब). अमित शाह ने तो निस्संदेह तौर पर इस बात को कई मौकों पर कहा है, जिनमें से कुछेक को हमने ऊपर उद्धृत भी किया है.

प्रतिवादों का सामना करने के बाद, अब भाजपा कह रही है कि “सीएए नागरिकों पर कोई असर नहीं डालेगा.” यहां मसला यह है कि: अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर हर भारतीय की नागरिकता को संदेह के घेरे में डाल देगा. एनआरसी के अनुसार “नागरिक” कौन है? कौन “अवैध आप्रवासी” है? सरकार ने अभी तक इन सवालों के लिये कोई मानदंड नहीं निर्धारित किया है. लेकिन चूंकि असम में एनआरसी को पूरा कर लिया गया है, वह हमें अखिल भारतीय एनआरसी कैसा होगा इसके बारे में एक संकेत जरूर दे सकता है.

असम में एनआरसी का अनुभव क्या रहा?

असम के एनआरसी के अनुसार, केवल उन्हीं लोगों को नागरिक के बतौर स्वीकार किया जायेगा जो निम्नलिखित बातों को साबित करने योग्य दस्तावेज दिखा सकेंगे:

1. कि उनके पूर्वज 1971 से पहले भारत में प्रवेश कर चुके थे,
2. कि वे उन्हीं पूर्वजों के वंशज हैं.

स्वाभाविक तौर पर, इन चीजों को साबित करने के लिये दस्तावेज दिखाना, खासकर गरीबों और दलितों, ट्रांसजेंडर लोगों, दलितों, आदिवासियों, प्रवासी मजदूरों, और कमजोर समुदायों के लोगों के लिये बहुत भारी मुश्किल का काम था.

इसके परिणामस्वरूप असम में 19 लाख से भी ज्यादा लोग असम एनआरसी की सूची से बाहर कर दिये गये हैं. ये 19 लाख लोग “अवैध आप्रवासी” नहीं हैं – वे ऐसे भारतीय हैं जिनके पास खुद को अपने पूर्वजों से सम्पर्कित साबित करने लायक दस्तावेज नहीं हैं. इसी कारण असम के एनआरसी का परिणाम हुआ है विशाल मानवीय संकट और त्रासदी. इसके अलावा, असम एनआरसी की सूची से कोई भी संतुष्ट नहीं हुआ है – सबसे ज्यादा असंतुष्ट तो भाजपा हुई है. यह दुखदायी प्रक्रिया, जिसमें इतने ज्यादा लोगों को कष्ट झेलना पड़ा, “दूध से पानी को अलग करने” में नाकाम साबित हुई है, इस बात को स्पष्ट करने में कि कौन भारतीय है और कौन “अवैध आप्रवासी” है, या इस समस्या को समाप्त करने में व्यर्थ हुई है. जब असम एनआरसी का अनुभव इस किस्म की तबाही में हुआ है, जबकि यह पूरी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में हुई है, तो फिर इसे समूचे भारत में चलाने का क्या औचित्य है?

अखिल भारतीय एनआरसी के लिये कट-ऑफ डेट (निर्धारित समापन तिथि) क्या होगी?

असम समझौते द्वारा तय किये गये विशेष प्रावधान के चलते असम के लिये कट-ऑफ डेट 24 मार्च 1971 निर्धारित की गई थी, जिसके अनुसार 1971 से पहले, यानी जो लोग उपरोक्त तारीख को बांग्लादेश के सृजन से पहले भारत आ चुके हैं उन्हें भारतीय नागरिक मान लिया जायेगा. समूचे देश के लिये इसके अनुरूप तिथि 19 जुलाई 1948 है.

तो क्या अखिल भारतीय एनआरसी के लिये कट-ऑफ डेट 19 जुलाई 1948 तय की जायेगी?

यह अभी स्पष्ट नहीं है. मोदी-शाह सरकार सही-सही तारीख और विस्तारित प्रक्रिया के बारे में गोलमोल बातें कर रही है.

मगर हम जानते हैं कि एनआरसी की अंतिम सूची को खारिज करते समय केन्द्र सरकार और असम के भाजपा नेतृत्व ने यह जरूर कहा था कि अखिल भारतीय एनआरसी की कवायद का मतलब होगा कि असम में भी नये सिरे से एनआरसी कराया जायेगा; कि “एक राष्ट्र, एक कट-ऑफ डेट” अवश्य ही होना चाहिये; और यह अखिल भारतीय कट-ऑफ डेट या तो 1971, या 1971 से पहले का कोई वर्ष जैसे 1966, 1961 या 1951 होगी.

एक न्यूज रिपोर्ट में कहा गया है कि “केन्द्रीय गृह मंत्रालय के स्रोतों ने कहा है कि असम एनआरसी के लिये कट-ऑफ डेट को 1971 – जो वर्तमान एनआरसी के लिये निर्धारित कट ऑफ डेट है – से पहले कर दिया जा सकता है. ‘एक देश में दो अलग अलग प्रणालियां (मेकेनिज्म) नहीं चल सकतीं. अगर अखिल भारतीय स्तर पर एनआरसी होता है तो असम के लिये भी वही प्रक्रिया लागू होगी’ – ऐसा एक सरकारी अधिकारी ने कहा है.” (‘क्या असम के लिये कट-ऑफ डेट 1971 ही बनी रहेगी? अखिल भारतीय एनआरसी शुरू करने से पहले केन्द्र सरकार उस वर्ष को पीछे बढ़ाने के बारे में सोच रही है’, सीएनएन न्यूज18, 21 नवम्बर 2019)

एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि असम की भाजपा सरकार चाहती है कि केन्द्र सरकार31 अगस्त 2019 को प्रकाशित राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को खारिज कर दे और नये सिरे से रजिस्टर बनाने के लिये “बाकी भारत के लिये प्रयोजनीय कट-ऑफ डेट (1971 के बजाय 1951) को ही असम में भी लागू करे.” (‘असम के अंतिम एनआरसी ने पलटवार किया’, द टेलीग्राफ, 21 नवम्बर 2019)

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लेकिन क्या केन्द्र सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है कि अखिल भारतीय एनआरसी के लिये उस किस्म के दस्तावेजों की जरूरत नहीं होगी जिनकी जरूरत असम के एनआरसी में पड़ी थी?

समूचे भारत में भारी पैमाने पर प्रतिवाद होने के बाद केन्द्र सरकार ने सीएए और एनआरसी के बारे में बिना किसी हस्ताक्षर के एक स्पष्टीकरण जारी किया है जो प्रश्नोत्तर के रूप में है (भारत के प्रेस सूचना ब्यूरो की वेबसाइट पर).

इस स्पष्टीकरण में सरकार ने दावा किया है कि एनआरसी में “माता-पिता द्वारा या उनके बारे में कोई दस्तावेज जमा करने की कत्तई कोई अनिवार्यता नहीं है” और केवल अपने जन्म का सबूत ही पर्याप्त होगा. मगर उसके साथ यह जोड़कर उन्होंने इससे बचने का एक रास्ता खोल रखा है कि “स्वीकारणीय दस्तावेजों के बारे में कोई फैसला लिया जाना अभी बाकी है!”

सरकार द्वारा दिये गये “स्पष्टीकरण” में साफ झूठ बोला जा रहा है. वास्तविक तथ्यों की जांच करके एक पत्रकार ने उल्लेख किया है कि “वर्तमान में भारतीय कानून जन्म के आधार पर नागरिकता से कहीं ज्यादा रक्त-सम्बंध पर आधारित है. अगर कोई व्यक्ति 3 दिसम्बर 2004 के बाद भारत में पैदा हुआ है तो उसे भारत की नागरिकता केवल तभी मिलेगी अगर उसके माता-पिता दोनों भारतीय हों अथवा उनमें से एक भारतीय हो और दूसरा अवैध आप्रवासी न हो. 1 जुलाई 1987 से लेकर 3 दिसम्बर 2004 के बीच की अवधि में पैदा होने वालों के लिये मानदंड यह है कि उनके माता-पिता दोनों में से एक भारतीय हो. केवल 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में पैदा होने वाले लोग भारतीय होंगे चाहे उनके माता-पिता की नागरिकता कुछ भी हो. इस प्रकार 1 जुलाई 1987 के बाद पैदा होने वाले लोगों को अपने माता-पिता दोनों अथवा उनमें से एक की नागरिकता को कानूनी तौर पर साबित करना होगा. परिणामस्वरूप, सरकार द्वारा दिये गये स्पष्टीकरण का कोई मायने-मतलब नहीं है. वास्तव में, असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में लोगों को अपने दस्तावेजों के जरिये अपने पिता और दादा के साथ सम्बंध को साबित करना पड़ा था.” (‘क्या एनआरसी केवल मुसलमानों को निशाना बनायेगा? सरकार द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण सीधे अमित शाह की बातों का खंडन करता है’, शोएब दानियाल, स्क्राॅल, 21 दिसम्बर 2019)

इसके अलावा, अब जो राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का पफाॅर्म भेजा जा रहा है उसमें एक अतिरिक्त काॅलम माता-पिता की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान का भी है. यह खास तौर पर इसीलिये किया जा रहा है ताकि एनपीआर के आधार पर ‘संदिग्ध नागरिकों’ को चिन्हित किया जा सके और एनआरसी के तहत उनसे इसे साबित करने के लिये दस्तावेज पेश करने को कहा जा सके. (इसके बारे में विस्तार से फिर बताया जाएगा).

क्या वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार जैसे दस्तावेज एनआरसी के लिये पर्याप्त होंगे?

सरकार के “स्पष्टीकरण” में दावा किया गया है कि स्वीकारणीय दस्तावेजों की सूची में “सम्भावित रूप से वोटर कार्ड, पासपोर्ट, आधार, लाइसेन्स, बीमा के कागजात, जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल लीविंग सार्टिफिकेट, जमीन अथवा आवास से सम्बंधित दस्तावेज अथवा सरकार द्वारा जारी किये गये ऐसे ही अन्य दस्तावेजों को शामिल किया जायेगा.”

मगर अमित शाह ने 17 दिसम्बर 2019 को एक न्यूज चैनल को दिये गये साक्षात्कार में कहा है कि “वोटर कार्ड एवं अन्य सरकारी दस्तावेज नागरिकता को तय नहीं करते, आधार कार्ड तो नागरिकता को कत्तई नहीं तय करते.” (यू-ट्यूब पर) इसलिये यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सरकार दोहरी जबान में बोल रही है.

किसी भी स्थिति में, अगर वोटर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेन्स आदि पर्याप्त सबूत हैं, तो फिर उन्हें सरकार के पास भला क्यों जमा करना होगा, अगर खुद सरकार ने ही उन दस्तावेजों को जारी किया है?

दूसरे शब्दों में “एनआरसी” की कवायद ही क्यों की जाये, अगर उसका मकसद लोगों को हैरान-परेशान करना नहीं है?

अतः, जब भाजपा कहती है कि वह “घुसपैठियों” को बाहर निकाल फेंकेगी, तो उनका मतलब ऐसे किसी भी भारतीय से है जिनके पास चंद खास दस्तावेज नहीं हैं? क्या उनका मतलब है मैं और मेरा बच्चा?

हां. भारत में काफी गरीबों के पास ऐसे दस्तावेज नहीं हैं कि वे खुद को “गरीबी रेखा के नीचे” (बीपीएल) साबित कर सकें – जिसके परिणामस्वरूप उन्हें राशन कार्ड से वंचित कर दिया जाता है. कई गरीब लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप राशन और पेन्शन नहीं मिले के कारण उनकी मौत तक हो गई है.

अब, सरकार गरीबों को धमका रही है कि तुमसे भारत में रहने का अधिकार भी छीन लेंगे.

असम में, एनआरसी की कवायद में 19 लाख से ज्यादा लोगों को एनआरसी की अंतिम सूची से इसलिये नहीं बाहर कर दिया गया कि वे “अवैध आप्रवासी” थे, बल्कि इसलिये कि वे गरीब थे और उनके पास दस्तावेज नहीं थे. कई मामलों में पत्नियों को सूची से बाहर कर दिया गया जबकि पतियों को एनआरसी में शामिल कर लिया गया, अथवा किसी बच्चे को सूची से बाहर कर दिया गया जबकि उसके माता-पिता के नाम सूची में शामिल हैं. जिन लोगों का नाम एनआरसी से बाहर है उनका भविष्य अनिश्चित है. इस सूची से बाहर लोगों में बड़ी तादाद में हिंदू, मुसलमान, आदिवासी, महिलाएं, और अन्य राज्यों से आये आप्रवासी मजदूर शामिल हैं.

अगर आपका नाम एनआरसी सूची में नहीं है तो क्या आपको डिटेंशन कैम्पों में कैद किया जा सकता है?

हां. असम में अगर आपको किसी फाॅरेनर्स ट्राइब्यूनल द्वारा “संदिग्ध मतदाता” घोषित किया गया तो आपको अनिश्चित काल के लिये किसी डिटेंशन सेन्टर में कैद रखा जा सकता है, जहां हालात किसी जेल से भी बहुत बदतर हैं.

असम में जिन 19 लाख से ज्यादा लोगों को एनआरसी से बाहर कर दिया गया है उनका भाग्य भी वही होने वाला है, अगर वे फाॅरेनर्स ट्राइब्यूनल को यह नहीं समझा पाते कि वे अवैध आप्रवासी नहीं हैं.

एनआरसी से सीएए किस तरह सम्बंधित है?

जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं कि सीएए गैर-मुस्लिम आप्रवासियों से मुसलमानों को अलग करने की साजिश से बनाया गया कानून है; और उसका मकसद मुसमानों को “घुसपैठिया” करार देना तथा गैर-मुस्लिमों को “शरणार्थी” बनाना है जो भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन कर सकते हैं.

जैसा कि अमित शाह अपने भाषणों में बार-बार कह चुके हैं, नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य एक चलनी जैसा है जिसके माध्यम से एनआरसी की सूची में मुसलमानों को गैर-मुसलमानों से अलग कर बाहर करना है.

अगर आप मुसलमान हैं और इस बात को साबित करने लायक दस्तावेज नहीं जुटा सकते कि आप एनआरसी सूची में शामिल किये जायें, तो आपको हमेशा के लिये वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जायेगा और किसी डिटेंशन सेन्टर में कैद कर दिया जायेगा, जहां हालात जेल से भी बदतर होंगे.

अगर आप गैर-मुस्लिम हैं और ऐसे दस्तावेज नहीं पेश कर सकते जिनसे साबित हो सके कि आपको एनआरसी सूची में शामिल किया जा सके, तब भी आपको डिटेंशन सेन्टर में डाला जा सकता है और आप अपना वोट देने का अधिकार गंवा सकते हैं. मगर मोदी-शाह सरकार आपसे कह रही है कि अगर आप गैर-मुस्लिम हो तो सीएए आपको खुद को पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से आये “शरणार्थी” होने का दावा करने तथा भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन करने का मौका देगा, जो आपको छह वर्षों के बाद दी जा सकती है और नहीं भी दी जा सकती.

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मगर, यदि मैं बिहार या तमिलनाडु या कर्नाटक से आया मजदूर हूं तो मैं कैसे साबित कर सकता हूं कि मैं पाकिस्तान से आया शरणार्थी हूं? इसके अलावा, भला मुझसे, जबकि मैं एक भारतीय हूं, ऐसा दावा करने के लिये कहा ही क्यों जायेगा?

मगर, एनआरसी की सूची से बाहर रह गये गैर-मुस्लिमों के लिये यह तथाकथित “रक्षा-कवच” या “जीवन रेखा” साफ झूठ है.

भला कोई बिहारी प्रवासी मजदूर, छत्तीसगढ़ या गुजरात या राजस्थान की कोई आदिवासी महिला, या तमिलनाडु या कर्नाटक या आंध्र प्रदेश में कोई किसान कैसे साबित करेंगे कि वे बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आये उत्पीड़ित शरणार्थी हैं?

और, यह भारत सरकार के लिये बेइज्जती की बात होगी कि वह भारतीयों से कहे कि या तो वे खुद को भारतीय साबित करें, अन्यथा दावा करें कि वे बांग्लादेश या पाकिस्तान या पिफर अफगानिस्तान से आये शरणार्थी हैं!

यह स्पष्ट है कि एनआरसी के साथ सीएए को जोड़कर एक भयंकर मुस्लिम-विरोधी एजेंडा बनाया गया है. मगर यदि किसी के पड़ोसी के घर में आग लगी हो तो उसका अपना घर भी तो अनिवार्य रूप से जल जायेगा. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गैर-मुस्लिमों के लिये सीएए के तथाकथित “रक्षाकवच” में भी हजारों छेद हैं.

एनआरसी के साथ सीएए का जोड़ हम सबको असुरक्षित बना रहा है – और उसे रोने का एकमात्र तरीका है अपने आपकी तथा हमारे संविधान की रक्षा करने के लिये समस्त समुदायों और धार्मिक पहचानों के बीच मजबूत एकता कायम करना. हम एकताबद्ध होंगे तो जीतेंगे, अगर आपस में बंट जायेंगे तो हारेंगे!

(अगले अंक में जारी)