वर्ष - 29
अंक - 12
14-03-2020

उत्तर प्रदेश राज्य इकाई ने रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शोएब की विगत 7 मार्च, शनिवार को लखनऊ स्थित उनके आवास से की गई गिरफ्तारी की निंदा की है. इसके साथ ही, पार्टी ने सीएए-एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ गत 19 दिसंबर 2019 के राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद में भाग लेने के कारण सदफ जफर, एसआर दारापुरी, मो. शोएब, दीपक कबीर जैसे लखनऊ के प्रतिष्ठित सामाजिक-सांस्कृतिक व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की अपराधियों की तरह राजधानी के चौराहे पर पफोटो लगवा कर वसूली की नोटिसें चिपकाने की उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई की भी निंदा करते हुए इसे असंवैधानिक कहा है.

पार्टी ने सरकार की इस कार्रवाई को उकसानेवली और संविधान सम्मत आंदोलन को अपराध करार देने वाली बताते हुए कहा कि यह न तो कानूनन सही है, न ही संवैधानिक. यह इन आंदोलनकारियों को बदनाम करने और उन्हें मानसिक पीड़ा पहुंचाने का षड्यंत्र है, जिससे इनका जीवन संकट में पड़ सकता है. यह असहमति का गला दबाने और बदला लेने जैसी कार्रवाई है, जिसकी इजाजत लोकतंत्र में कतई नहीं दी जा सकती. इससे मौजूदा सरकार की मानसिकता और नागरिक अधिकारों के प्रति दुर्भावना का भी पता चलता है. पार्टी ने रिहाई मंच अध्यक्ष को बिना शर्त रिहा करने, चैराहों पर लगाई गई आंदोलनकारियों की फोटो समेत नोटिसों को फौरन हटाने, वसूली आदेश रद्द करने और विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करने की मांग की.

मोहम्मद शोएब उन लोगों में भी शामिल हैं जिनकी तस्वीरें लखनऊ के चौराहों पर चस्पां की गयी हैं. ऐसा माना जा रहा है कि योगी सरकार उन सामाजिक कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न कर शांत कर देना चाहती है जो अभी तक नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में सबसे आगे थे.

भाकपा(माले) ने सीएए-विरोधी प्रतिवादकारियों के खिलाफ लखनऊ में होर्डिंग लगाये जाने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेने और उत्तर प्रदेश सरकार को ये होर्डिंग हटाने का निर्देश देने का स्वागत करते हुए कहा है कि यह फैसला संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के रक्षक के बतौर न्यायालय से जनता की अपेक्षाओं के अनुकूल है. योगी सरकार द्वारा लंबे समय तक धारा 144 लगाये रखना और धरना-प्रतिवादों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलना भी सत्ता का दुरुपयोग है, न्यायपालिका को इस पर गौर करना चाहिए और सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनः स्थापित करने के लिए कदम उठाना चाहिए.