वर्ष - 29
अंक - 18
18-04-2020

मुस्लिम समुदाय के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा के संत्रास से छुटकारा मिले, इसके पहले ही केन्द्र सरकार द्वारा बिना किसी योजना के अचानक घोषित किये गये लाॅकडाउन से दिल्ली में रहने वाली गरीब कामगार आबादी के बीच भय और तकलीफ का माहौल पैदा हो गया. अरविंद केजरीवाल की सरकार लाॅकडाउन के चलते उत्पन्न समस्याओं के सामने बुरी तरह विफल साबित हो गई है. उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री की दिल्ली सरकार जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने में नाकामयाब रही है. भोजन वितरण केन्द्र काफी कम हैं और कामगारों के इलाके से काफी दूर हैं. वहां काफी कम भोजन मिलता है और जो मिलता है वह घटिया स्तर का होता है. ऐसे केन्द्रों के सामने लम्बी कतारें लगी होती हैं, जिसकी वजह से वृद्धों, बच्चों और विकलांगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. केन्द्रीय गृहमंत्री के नियंत्रण वाली कुख्यात दिल्ली पुलिस भोजन की तलाश में निकले गरीब कामगारों पर लाठियां-गालियां बरसाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाती है.

मुख्यमंत्री प्रवासी मजदूरों को अक्सरहा आश्वासन देते दिखते हैं; लेकिन सच यह है कि अनेक मजदूरों को काम से निकाल दिया गया है, उन्हें पुलिस के द्वारा परेशान किया जाता है और उएन्हें वेतन, राशन और गुजारे के पैसे नहीं दिये जा रहे हैं. मुख्यमंत्री, उप राज्यपाल और श्रम मंत्री ने ट्रेड यूनियनों के साथ वार्ता करने से इन्कार कर दिया है, जिससे उन्हें मजदूरों के बीच राहत कार्य चलाने में सहूलियत हो सकती थी. ऐक्टू द्वारा प्रेषित चिट्ठियों पर दिल्ली सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित जगह पर आधार कार्ड की मदद से ‘पंजीकरण’ की प्रणाली पूरी तरह फेल हो गई और केजरीवाल के लम्बे-चैड़े वादे खोखले साबित हो गये. अस्थायी राशन कार्ड पाने के लिये जरूरी हो गया है कि मजदूरों के पास इंटरनेट की सुविधा, स्मार्टफोन, आधार कार्ड और कंप्यूटर/स्मार्टफोन को उपयोग में लाने की पर्याप्त क्षमता हो. पंजीकरण के लिये निर्धारित केन्द्र तकनीकी कारणों से बंद हो गये हैं, जिसके बारे में दिल्ली सरकार को कई बार सूचित भी किया गया है. दिल्ली सरकार को चाहिये कि वह राशन देने के तमाम कृत्रिम मानदंडों को वापस लेकर सभी को राशन मुहैया कराने का इंतजाम करे. पांच हजार रुपये की राशि उन्हीं निर्माण मजदूरों को दी जा रही है जिनके नाम ‘दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड’ के खाते में दर्ज हैं. इसके अंतर्गत लाभुकों की कुल संख्या दिल्ली के कुल श्रमिकों का महज एक या दो प्रतिशत है. हालात तब और बिगड़ गये जब दिल्ली और केन्द्र सरकार द्वारा ‘मरकज मुद्दे’ को गलत तरीके से निपटाये जाने की वजह से राजधानी के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिक तनाव फैल गया. मुस्लिम समुदाय से आने के चलते फलों व सब्जियों जैसी जरूरी चीजों के खुदरा विक्रेताओं को हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है.

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ऐक्टू ने केन्द्र व राज्य सरकार से मजदूरों और गरीबों की समस्याओं का फौरन समाधान करने, जल्द से जल्द ‘प्रवासी मजदूर ऐक्शन योजना’ बनाने, जनता के लिये एफसीआई के सभी गोदाम खोलने, नियोजकों को मजदूरों की छंटनी करने और उनके वेतन में कटौती करने से रोकने, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के किसी भी प्रयास पर कड़ी कार्रवाई करने और भूखी जनता पर बल प्रयोग की घटनाओं को फौरन रोकने तथा गुजरात, महाराष्ट्र व अन्यत्र मजदूरों पर लादे गये तमाम मुकदमे वापस लेने की मांग की है.

– अभिषेक