वर्ष - 29
अंक - 39
19-09-2020

पुर्नवास के बिना कोई बेदखली नहीं की घोषणा के साथ भाकपा(माले) ने 48 हजार झुग्गियों को तोड़े जाने के हालिया निर्णय के खिलाफ 14 सितंबर 2020 से 48 घंटे की भूख हड़ताल शुरु की जिसमें भाकपा(माले) राज्य सचिव रवि राय के साथ शकुंतला देवी, सीता देवी, रामेश्वरी देवी, लरजरी देवी और सीता देवी (वजीरपुर झुग्गी निवासी पांच महिलाएं)  भी शामिल हुईं.

अंतिम दिन 16 सितम्बर को किसान महासभा के वरिष्ठ नेता प्रेम सिंह गहलावत एवं भाकपा(माले) केंद्रीय कमिटी सदस्य सुचेता डे ने भूख हड़ताल खत्म करवाया. वहां आयोजित प्रेस कांप्रेफंस को संबोधित करते हुए भाकपा(माले) का. रवि राय ने कहा ‘भूख हड़ताल का मकसद दिल्ली और केंद्र सरकार दोनों को यह संदेश भेजना था कि झुग्गी निवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे चाहे स्थिति जितनी ही चुनौतीपूर्ण हो जाये. हम अपनी चेतावनी भूख हड़ताल समाप्त करते हुए झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों के अधिकारों के लिए मांगों का चार्टर जारी कर रहे हैं. हम इस चार्टर के साथ दिल्ली की उन सभी मलिन बस्तियों में प्रचार करेंगे जो तोड़े जाने के खतरे का सामना कर रही हैं.’

उन्होंने कहा ‘हमने देखा है कि झुग्गीवासियों के आंदोलन के दबाव के कारण दिल्ली सरकार यह कहने को मजबूर हुई है कि वह पुनर्वास को सुनिश्चित करेगी. लेकिन, रेल मंत्रालय और मोदी सरकार का विश्वासघात आज सबके सामने है. केंद्र सरकार को साफ-साफ कहना होगा कि तब तक किसी की झुग्गी को नहीं टूटेगी जब तक सबके पुनर्वास की गारंटी नहीं हो जाती. हमें उम्मीद है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में सभी झुग्गीवासियों को उनके रिहायश के 5 किमी के अंदर बसाने का आश्वासन केवल कोरी बयानबाजी नहीं होगा बल्कि इसको गम्भीरता से लागू किया जाएगा. साथ ही, हम मांग करते हैं कि नया सर्वे कर पुनर्वास का काम किया जाये ताकि कोई भी झुग्गीवासी पुनर्वास से वंचित न रह जाये. झुग्गी तोड़ने का आदेश खारिज होने और झुग्गीवासियों के अधिकार सुनिश्चित होने तक हमारा आन्दोलन जारी रहेगा.’

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान मांगों का चार्टर भी जारी किया गया. भाकपा माले झुग्गी तोड़े जाने के सवाल पर दिल्ली के मानसरोवर पार्क स्थित झुग्गी में भी 15 सितम्बर को कामरेड सुचेता के नेतृत्व में मीटिंग व प्रतिवाद आयोजित किया. भाकपा(माले) इसी प्रकार दिल्ली के विभिन्न इलाकों में झुग्गी वासियों के बीच प्रचार अभियान चला कर इस आन्दोलन को और संगठित कर कोर्ट के फैसले को वापस लिए जाने तक आन्दोलन तेज करेगी.

– प्रसेनजीत कुमार   

 

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दिल्ली के श्रमिक वर्गों के आश्रय का अधिकार और आजीविका सुनिश्चित करने के लिए मांगों का घोषणा पत्र

जबसे सुप्रीम कोर्ट ने एक अमानवीय आदेश पारित किया जिसमें 48,000 घरों को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था तब से रेलवे पटरियों के किनारे झुग्गियों में रहने वाले, काम करने वाले गरीब, छात्र, युवा और नागरिक, आदि इस फरमान का विरोध कर रहे हैं. कई कानूनी विद्वानों और वकीलों ने बताया है कि यह आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ और मनमाना है. सर्वाेच्च न्यायालय ने इस बात को ध्यान में नहीं रखा कि उसने खुद कहा है कि आश्रय का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और उचित पुनर्वास के बिना कोई तोड़फोड़ नहीं हो सकता. आदेश ने मनमाने ढंग से यह भी निर्देश दिया कि कोई अन्य अदालत इस आदेश पर रोक नहीं लगा सकती. न्यायालय ने अपना आदेश पारित करने से पहले झुग्गीवासियों की सुनवाई भी नहीं की. रेल मंत्रालय ने सुनवाई के दौरान प्रदूषण का दोष झुग्गियों में काम करने वाले गरीबों पर लगाया. आदेश पारित होने के बाद भी मोदी सरकार ने एक भी शब्द नहीं बोला, भले ही इस आदेश ने इस महामारी में झुग्गीवासियों के लिए दुःस्वप्न और हताशा की स्थिति बना दी हो.

दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में झुग्गिवासियों के विरोध में बाहर आने के बाद ही आदेश के विरोध में दिल्ली सरकार ने अपनी स्थिति को स्पष्ट किया. लेकिन, मलिन बस्तियों (नांगलोई, सुल्तानपुरी जैसे इलाकों) में रेलवे ट्रैक के किनारे के झुग्गियों को तोड़ना शुरू हो चुका है. जबकि, आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है . रेल मंत्रालय ने केवल यह कहा कि जब तक सरकार अपनी तैयारी पूरी नहीं कर लेती (4 सप्ताह तक) कोई विध्वंस नहीं होगा. सरकार अभी झुग्गियों को तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और ना ही झुग्गी में रहने वालों के पुनर्वास की अभी कोई खास तैयारी है. यह छलावा के सिवा कुछ भी नहीं है. हमारी मांग है:

1. उचित पुनर्वास के बिना कोई विस्थापन नहीं. आश्रय का अधिकार भारत के प्रत्येक नागरिक का एक मौलिक अधिकार है. मेहनतकश स्लम वासी शहर को चलाते हैं. ऐसे में उनके अधिकारों और गरिमा किसी भी कीमत पर संरक्षित होनी चाहिए.
2. वर्तमान निवास स्थान के 5 किलोमीटर के भीतर कोई भी पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए. यह 2015 की ‘डीयूएसआईबी पाॅलिसी’ में बहुत स्पष्ट रूप से कहा भी गया है. यह उन लोगों की आजीविका की रक्षा करेगा जो मलिन बस्तियों में रहते हैं. जैसा कि सुझाव दिया गया है उन्हें दूर स्थानों पर पुनर्वासित करना उनके लिए आर्थिक लूट साबित होगा क्योंकि उनकी आय के स्रोत वर्तमान आर्थिक स्थिति के कारण बहुत कम हैं. केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों को इस नीति का पालन करना चाहिए.
3. उन परिवारों की सही संख्या का पता लगाने के लिए एक ताजा सर्वेक्षण किया जाना चाहिए जो रेल के पटरियों आसपास रह रहे हैं. यदि पुनर्वास पुराने सर्वेक्षण के आधार पर होता है तो कई झुग्गी-झोपड़ी के निवासी बेघर हो जाएंगे.
4. दिल्ली सरकार और मोदी सरकार को भारत के मुख्य न्यायाधीश को झुग्गीवासियों को इस मामले में पक्ष बनाने के लिए कहना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के 31 अगस्त के आदेश को संशोधित करने की अपील करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उचित पुनर्वास के बिना कोई विध्वंस नहीं होगा. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इस आदेश को मिसाल के रूप में उद्धृत किया जा सकता है और भविष्य में बिना पुनर्वास के विध्वंस का आदेश दिया जा सकता है.
5. भारत सरकार और रेल मंत्रालय को सार्वजनिक रूप से घोषणा करनी चाहिए कि वे किसी भी झुग्गी को नहीं गिराएंगे जब तक कि सभी झुग्गियों में रहने वालों को 5 किलोमीटर के भीतर बसाया नहीं जाता.
6. दिल्ली सरकार को उस प्रतिबद्धता के साथ खड़ा होना चाहिए जिसने यह निर्णय लिया है कि कोई भी निष्कासन नहीं होगा. उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 2015 के डीयूएसआईबी नीति के अनुसार सभी झुग्गीवासियों को फिर से बसाया जाएगा.

 

हम कहीं नहीं जाएंगे

वजीरपुर झुग्गी निवासी शकुंतला देवी ने कहा, ‘मैंने पिछले 28 वर्षों के अपने प्रवास के दौरान झुग्गियों को हटाए जाने के लिए कई प्रयास देखे हैं. मैं पूछना चाहती हूं कि हमें अब तक उचित पुनर्वास और जमीन का अधिकार क्यों नहीं दिया गया? केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को हमारी वर्तमान झुग्गी के पास उचित पुनर्वास की जिम्मेदारी लेनी होगी.’

वजीरपुर झुग्गी निवासी सीमा देवी (65 वर्ष) पिछले 40 साल से इसी झुग्गी में रहती हैं और एक छोटी सी दुकान चला कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं. वो कहती हैं ‘इस अवस्था में मेरा कोई और देखने वाला नहीं है, मैं और कहां जा कर रहूंगी. सरकार रहने की व्यवस्था कर दे तो मैं खुद अपने हाथ से ही झुग्गी हटा दूंगी.’

बिहार के बक्सर जिले के गणेश पासवान (55 वर्ष) भी 30 साल पहले मजदूरी करने के लिए गांव से दिल्ली आ गए. ठेला चला कर किसी तरह अपना जीवन चला रहे हैं और इसी झुग्गी में रहते हैं. उन्होंने बताया कि ‘मेरा न ही पैतृक गांव में रहने का घर है और न ही दिल्ली में कहीं रहने का स्थायी ठिकाना. दैनिक मजदूरी इतनी कम होती है कि किराए का मकान लेना भी संभव नहीं है. कोरोना महामारी के बीच हमें कोई जगह भी नहीं देगा. सरकार हमें रहने की जगह दे दे तो हम चले जाएंगे. इस तंगहाल स्थिती में हम शौक से नहीं, मजबूरन रहते हैं.’

वजीरपुर निवासी तेतरी देवी (70 वर्ष) का कहना है कि ‘मोदी जी हमलोगों को बोले थे कि जहां झुग्गी है वहीं मकान देंगे. हमलोगों ने उनको वोट भी इसी कारण से दिया था. लेकिन आज सरकार हमारे लिए कुछ नहीं कर रही है. हम कहीं नहीं जाएंगे. हमारा जीवन यहीं बीता है, हम यहीं रहेंगे.’