– का. दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा(माले)    

का. विनोद मिश्र ने अपने आखिरी लेख में कहा था कि इतिहास के बड़े सवालों पर फैसले चाहरदीवारी के अंदर, बंद कमरे में नहीं हुआ करते, बल्कि खुली सड़क पर जनता के आंदोलन के जरिए होते हैं. पिछले साल हमने देखा कि सीएए, एनआरसी व एनपीआर की साजिश के खिलाफ देश में एक नया माॅडल ‘शाहीनबाग’ उभरकर सामने आया और देखते-देखते हमने पूरे देश में सैंकड़ों शाहीनबागों को बनते देखा. आज किसान उभार का दौर है और शाहीनबाग की ही तर्ज पर पूरे देश में किसानों के शाहीनबाग बनने लगे हैं. हम काॅ. विनोद मिश्र की उन बातों को सच होते देख रहे हैं.

कल तक भाजपा के लोग कहते थे कि बाॅर्डर पर सेना लड़ रही है, लेकिन अभी इसका मतलब बदल गया है. अभी बाॅर्डर का मतलब दिल्ली का बाॅर्डर हो गया है. दिल्ली के सभी बाॅर्डरों को किसानों ने चारों तरफ से घेर लिया है.

हमने 1857 के बारे में पढ़ा है, जब अंग्रेजों के राज को सबसे पहली व बड़ी चुनौती किसान व किसान के बेटों वर्दीधारी किसानों ने दी थी. बंगाल, बिहार, यूपी होते हुए उन्होंने दिल्ली को घेर लिया था और वहां से आजादी का ऐलान किया था. आज वैसा ही एक दौर फिर से आया है. देश के किसान दिल्ली बाॅर्डरों पर लगातार जमे  हैं. लगातार जत्थे पहुंच रहे हैं. पंजाब के लोग इसे आजादी की लड़ाई कह रहे हैं. बाॅर्डर पर आए किसानों का सम्मान बढ़ गया है. पंजाब में उनके परिवारों को स्वतंत्रता सेनानी के बतौर देखा जा रहा है. यह किसानों के स्वाभिमान व आजादी की लड़ाई है.

देश के किसान क्या मांग रहे थे? मंदसौर गोलीबांड के बाद से ही किसान दो मांगें कर रहे हैं – कर्जा माफ करो और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार लागत से डेढ़ गुना दाम पर (न्यूनतम समर्थन मूल्य पर) फसल की खरीद की गारंटी करो. लोकसभा चुनाव में इसे ही सबसे बड़ा मुद्दा बनना था, लेकिन बीच में पुलवामा कांड हो गया और भाजपाई फिर से सत्ता में आ गए. सता में आने के बाद उन्होंने किसानों पर हमला कर दिया. किसानों को बैंक से कर्जा नहीं मिलता. लेकिन, पूजपीतियों को अरबों-खरबों का लोन मिल जाता है. पूंजीपतियों का लोन पर तो कब्जा था ही, अब पूरे बैंक पर कब्जे का प्रावधान कर दिया गया है. आज उन्हीं पूंजीपतियों के हाथों खेती को नीलाम किया जा रहा है.

कुछ लोग कहते थे कि मोदी भ्रष्टाचार क्यों करेंगे? उनका परिवार तो है नहीं. अब पूरा देश समझने लगा है कि दरअसल अंबानी-अडानी का परिवार को चलाना ही इनका काम है. पंजाब के किसानों को यह बात सबसे पहले समझ में आ गई. जाहिर सी बात है कि खेती का सबसे ज्यादा विकास पंजाब में हुआ है. इसलिए वहां के लोग ही इसे सबसे बेहतर तरीके से समझेंगे. पंजाब के लोगों ने समझ लिया कि भाजपा व मोदी को केवल अंबानी-अडानी से ही लेना-देना है. वहां के लोगों ने रिलायंस के पेट्रोल पंपों को घेरना शुरू किया और अब पूरे देश में उनके पुतले जलने लगे हैं. भाजपा ने किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए कहा कि ये नकली किसान हैं. यदि पंजाब के किसान नकली हैं तो क्या असली किसान अंबानी-अडानी हैं? भाजपा किसानों के मुद्दों को भटकाना चाहती है. पंजाब के लोगों ने कहा कि पंजाब में एग्रीकल्चर ही कल्चर है. इसीलिए आज हरे इंकलाब की धरती पर हुए हमले के खिलाफ पूरा पंजाब खड़ा हो गया है.

आंदोलनों को बदनाम करना भाजपा की सुनियोजित साजिश रही है. यह कम्युनिस्ट पार्टी का काम है कि भाजपा के दुष्प्रचार का भंडाफोड़ करे. सीएए विरोधी आंदोलन के वक्त हमने कहा था कि नागरिकता का सवाल मुस्लिमों का सवाल नहीं, बल्कि संविधान का मामला है. हमारे वोट से चुनकर आई सरकार हमीं से नागरिकता साबित करने को कहती है. यदि सरकार जनता को चुनने लग जाए तो इससे बड़ी तानाशाही कोई और नहीं हो सकती. इसलिए सीएए के खिलाफ चल रहे आंदोलन को गरीबों का आंदोलन बनना चाहिए. हमने कोरोना काल की शुरूआत के ठीक पहले एनपीआर के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने के सवाल पर विधानसभा मार्च किया और उसमें गरीबों की बड़ी भागीदारी को हमने सच साबित कर दिखाया था. आज वही चुनौतियां एक बार फिर हमारे समाने हैं.

यह किसान आंदोलन महज पंजाब-हरियाणा का नहीं, बल्कि पूरे देश का है. इसे साबित करने व समझाने का काम हमारा है. सवाल केवल एमएसपी का नहीं है. यदि देश में अनाज के कारोबार से सरकार कदम पीछे खींच ले, एफसीआई बंद हो जाए, तो फिर सबकुछ खत्म हो जाएगा. इसलिए यह आंदोलन जितना ज्यादा किसानों है, उतना ही ज्यादा गरीबों का है. यह अंबानी-अडानी के खिलाफ आंदोलन है. यदि नौजवान सुरक्षित व सम्मानजनक रोजगार चाहते हैं, तो अंबानी-अडानी राज से देश को बचाना होगा. आज भी सबसे ज्यादा रोजगार खेती में ही मिलता है. कोरोना काल में हमारी अर्थव्यवस्था लगातार नीचे गई. सिर्फ खेती बची थी जिसमें 3 प्रतिशत पाॅजिटिव रिपोर्ट आई थी. आज उसे भी बेचा जा रहा है. इसलिए इस लड़ाई में नौजवानों की बड़ी भूमिका बनती है.

नीतीश कुमार कहते हैं कि हमने तो बिहार में बहुत पहले ही मंडी व्यवस्था खत्म कर दी. यदि यही रास्ता सही था तो बिहार में खेती बहुत आगे बढ़ गई होती. लेकिन बिहार में किसान सबसे निचले पायदान पर हैं. इसका कारण यह है कि किसानों की फसलों की बिक्री की जो गारंटी होनी चाहिए, वह सरकार नहीं कर रही है. इसलिए भी जरूरी है. हमें 29 दिसंबर को राजभवन मार्च की जमकर तैयारी करें और बिहार के किसानों को पंजाब के किसानों के पक्ष में खड़ा करें.

नीतीश जी ने भूमि सुधार व शिक्षा आयोग की सिपफारिशों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया, अमीरदास आयोग को भंग कर दिया, बाथे-बथानी-मियांपुर के हत्यारों को बरी करवाया. पहले बिहार को शराब में डुबोया और अब शराबबंदी कानून के नाम पर गरीबों को जेल में डाल दिया. चुनाव में घिरने के बाद 10 लाख रोजागर के बरक्स 19 लाख रोजगार की घोषणा की. 19 लाख रोजगार के लिए 19 दिन काफी हैं. इसलिए छात्र-युवा साथियों को रोजगार उपलब्ध कराने की मांग पर चौतरफा संघर्ष छेड़ देना चाहिए.

जहां भाकपा(माले) व लाल झंडे की ताकत होगी वहीं भाजपा के खिलाफ लड़ाई हो पाएगी. क्योंकि यह कुछ जुमलों के खिलाफ लड़ाई नहीं है. भाजपा के पीछे आरएसएस की सुनियोजित परियोजना है. जिस दौर में हिंदुस्तान में भगत सिंह, अंबेडकर, गांधी, सुभाष बोस लड़ रहे थे, उस समय आरएसएस को देश के इतिहास से नहीं बल्कि हिटलर व मुसोलिनी से प्रेरणा मिल रही थी. भाजपा के डीएनए में फासीवाद है और फासीवाद का मतलब है मानवता का निषेध. पहले इन लोगों ने दलितों का दमन किया और अब मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने पर तुले हैं. उनको आंतरिक दुश्मन के रूप में चिन्हित कर करते हैं.

काॅ. वीएम ने अलग-अलग दौर में पार्टी का नेतृत्व किया. जौहर की शहादत के बाद भूमिगत पार्टी से जनांदोलन की पार्टी को आगे बढ़ाने का काम किया. इसके साथ ही साथ आडवाणी-वाजपेयी के जमाने में फासीवाद के हमले की आहट को सबसे पहले सुना. अंबेदकर ने कहा था कि यदि इस देश में कभी हिंदू राष्ट्र खड़ा हो जाए तो यह सबसे बड़ी त्रासदी होगी. 90 की शुरूआत में वीएम ने आरएसएस व भाजपा के फासीवाद की पूरी योजना को सबसे पहले समझा था. उसी दौर में पार्टी का सबसे तेज विकास हुआ, छात्र-युवा संगठन खड़े हुए, हमारी चुनावी जीतें हुईं. इसीलिए सरकारें रहने के बावजूद भाजपा से लड़ने का भाकपा व माकपा को उतना अनुभव नहीं है जितना हमें है. आज बंगाल में भाजपा वाले सरकार बना लेने का दावा कर रहे हैं, त्रिपुरा को भी हमने अप्रत्याशित रूप से ढहते देखा, लेकिन बिहार में माले को भाजपा के खिलाफ लड़ने का तजुर्बा है और लालू जी के दौर में राज्य दमन झेलकर आगे बढ़ने का भी तजुर्बा है. इसी तजुर्बे के कारण पार्टी में इतनी ताकत है. आगे बढ़ने के लिए हमें कभी आसान मौका नहीं मिला है. हम संघर्ष करते हुए ही आगे बढ़े हैं. जिस समय जनसंहार हो रहे थे, हमने लालू जी के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनको कटघरे में खड़ा किया, लेकिन जनसंहार करने वाली असली ताकतों को हमेशा नंबर एक निशाने पर रखा. हमारी मुख्य लड़ाई हिंदुस्तान में फासीवाद थोपने वाली ताकतों से है और हमने लगातार भाजपा व संघ के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम किया है.

आज देश एक बहुत कठिन दौर में है. यदि देश में मोदी सरकार कुछ समय और चल गई, तो क्या होगा? संसद की नई बिल्डिंग बन गई, लेकिन संसद का शीतकालीन सत्र रद्द कर दिया गया. अंबानी-अडानी के पक्ष में कानून बनाने के लिए कोरोना काल में सत्र बुला लिया गया और वहां बेहद अलोकतांत्रिक तरीके से कानून पास करवा दिए गए, जिसमें ध्वनि अधिक थी मत कम था. दिल्ली किसान आंदोलन के खिलाफ सेना को उतारने की कोशिश की गई. वर्दीधारी किसानों को अपने ही बाप-दादा के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की गई. लेकिन आज पंजाब में बड़े-बड़े लोग इस्तीफा दे रहे हैं. लोग पुरस्कार लेने से इंकार कर रहे हैं. अभी जब संसद सत्र बुलाकार किसानों के मुद्दों पर बातचीत करने की जरूरत थी, तो सत्र नहीं बुलाया जा रहा है. अब इस देश में इमारतें तो होंगी लेकिन संविधान व लोकतंत्र नहीं होगा.

इसलिए इस कठिन लड़ाई को लड़ने के लिए ताकत चाहिए. इस चुनाव ने हमें ताकत दी है. हमें कुल 14 लाख वोट मिले हैं. यह पार्टी को आगे बढ़ाने का एक बड़ा आधार है. यह न सिपर्फ हमारे आधार का वोट है, बल्कि परंपरागत रूप से भाजपा-जदयू को वोट करने वाली पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों ने भी बड़े पैमाने पर भाकपा(माले) को समर्थन दिया है. बेशक यह एक नए दौर की शुरूआत है. वह जनता के बड़े हिस्से से एक नए रिश्ते की शुरूआत है जिसे हमें आगे बढा़ना चाहिए. भगत सिंह, अंबेदकर, बिस्मिल, अशफाक की विरासत के असली अधिकारी आज के युवा हैं, उन्हें आंदोलन व संगठन से जोड़ना है. इंकलाबी नौजवान सभा को बड़े संगठन के रूप में खड़ा करना है. आइसा को गांव-गांव में ले जाना है. शिक्षा आंदोलन चलाना है. किसान महासभा को वास्तव में स्थापित करना है, महिला संगठन का विस्तार करना है. जनसंगठनों के विस्तार के साथ-साथ पार्टी के विकास की भी भरपूर संभावना है.

भाजपा सबकुछ हड़पने वाली पार्टी है. राजनीति में भी जिन लोगों के साथ गठबंधन बनाते हैं, उनको हड़प लेना चाहते हैं. हम देख रहे हैं कि जदयू को कहां से कहां पहुंचा दिया. 2010 में नीतीश जी के पास 115 सीटें थीं और इस बार नीतीश जी 43 सीट पर लुढ़क गए हैं. लोजपा के भी साथी महसूस कर रहे हैं कि कैसे लोजपा का इस्तेमाल कर लिया गया. ऐसी स्थिति पैदा हो रही है जहां राजनीतिक लड़ाई में एक तरफ     भाजपा तो दूसरी ओर लाल झंडा होगा. सीधा ध्रुवीकरण का समय आ रहा है. भाजपा से लोहा लेने लायक एक मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की जिम्मेदारी को स्वीकार करना है. यदि लाल झंडे की ताकत मजबूत होगी तो भाजपा की राजनीति इस देश में नहीं चलेगी. सत्ता व पैसे के बल पर शासन करने वाली भाजपा को विचार व संघर्ष के बल पर पीछे धकेलना होगा. वीएम का सपना था कि भाकपा(माले) एक बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी बने. कम्युनिस्टों में एकता की गुंजाइश तभी बनेगी. इस जिम्मेवारी को हम सबको मिलकर उठाना है.

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