पिछले दो महीने से अधिक से दिल्ली की सीमाओं पर किसान प्रदर्शन कर हैं. विगत 3 फरवरी 2021 को दिल्ली के नागरिक समाज ने भी सड़क पर उतरकर उनके आंदोलन के प्रति अपना समर्थन में जताया. सैकड़ों छात्र, नौजवान, मजदूर और आम लोग किसान संघर्षों के समर्थन में निकाले गए इस नागरिक मार्च में शामिल हुए.

तीन किसान-विरोधी कानूनों के खिलाफ किसान संघर्षों पर मोदी सरकार दमन तेज कर रही है, इसीलिए दिल्ली के सैकड़ों नागरिक किसानों के समर्थन में मंडी हाउस के सामने सड़कों पर उतर पड़े. आइसा, ऐक्टू, ऐपवा, ‘अनहद’, एसएफआई, डीवाइएफआई, केवाइएस, सीवाइएसएस, पीडीएसयू, एनएसयूआई जैसे कई संगठनों ने संयुक्त रूप से “किसानों के साथ, दमन के खिलाफ” नारे के तहत नागरिक मार्च का आह्वान किया था. इसके साथ ही लेखक और सांस्कृतिक संगठन जसम, जलेस, प्रलेस, दलेस और प्रतिरोध का सिनेमा जैसे संगठन भी इस मार्च से जुड़े.

इस नागरिक मार्च को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने व्यापक रूप से दमन का इंतजाम किया था. इस शांतिपूर्ण नागरिक मार्च को रोकने के लिए पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों की बड़ी तैनाती, बैरिकेडों और वाटर कैनन वगैरह का इंतजाम किया गया था. जिस तरह से पुलिस ने इस पूरे इलाकों को एक छावनी में बदल दिया था और मंडी हाउस के आसपास के सभी रास्तों की किलेबंदी करके बन्द किया था. वह सब एकदम नया था. डराने-धमकाने की इन तमाम कार्रवाइयों के बावजूद दिल्ली के नागरिक बड़ी तादाद में इस मार्च में शामिल हुए. पुलिस ने नागरिक समाज के लोगों को मंडी हाउस से जंतर मंतर तक जाने की इजाजत नहीं दी और बलपूर्वक मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया. इसके बाद लोगों ने मंडी हाउस के बाराखंबा रोड पर ही अपना धरना शुरू कर दिया और मार्च एक धरना व प्रतिरोध सभा में बदल गया.

इस प्रतिवाद धरने को संबोधित करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने कहा, “दिल्ली की सीमाओं पर किसानों को खामोश करने के लिए जो कार्रवाइयां की जा रही हैं, उन्हें हम यहां भी देख सकते हैं. सरकार को किस बात का डर लग रहा है? किसानों की आवाज दबाने के लिए इतनी ताकत क्यों झोंकी जा रही है? वजह ये है कि किसानों ने मोदी सरकार से सबसे ज्यादा असुविधाजनक सवाल पूछ डाले हैं. वे कह रहे हैं कि मोदी सरकार की नीतियां चंद क्रोनी काॅरपोरेटों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं. और, निजी कंपनियों की मुनाफाखोरी की मंशा की हिफाजत करने के लिए किसानों की जमीन और आजीविका की कीमत पर कानून पारित किए गए हैं.”

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जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशे घोष ने कहा, “छात्र समुदाय जानता है कि कंपनी राज का क्या मतलब होता है. जिस सरकार ने किसान विरोधी कानून लाए हैं, वही सरकार सार्वजनिक वित्तपोषित विश्वविद्यालयों और काॅलेजों को निजी कंपनियों के हाथों बेच डालने के लिए नई शिक्षा नीति भी लेकर आई है. ये किसान देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, और हम छात्र उनके साथ खड़े हैं.”

भगत सिंह छात्र मोर्चा की तरफ से राजबीर कौर ने कहा, “मेरी बहन नौदीप कौर पिछले 20 दिनों से जेल में बंद है. किसानों के हक में प्रतिवाद करने के लिए पुलिस ने उसके साथ यौन दुराचार किया और उसे उठा ले गई. 120 किसान भी जेल में डाल दिए गए हैं. किसान आन्दोलन की आवाज को दबाकर सरकार क्या करना चाहती है? हम मांग करते हैं कि जेलों में बंद तमाम कार्यकर्ताओं को अविलंब रिहा किया जाए. हम यहां देश की रक्षा करने आए हैं, हम कोई अपराधी नहीं हैं.”

‘अनहद’ की शबनम हाशमी, आइसा के प्रसेनजित, ऐडवा की मैमोना मोल्ला के साथ-साथ कई अन्य वक्ताओं ने भी धरने को संबोधित किया. इस विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने तीन नए कृषि कानूनों की वापसी की मांग रखी और कहा कि सरकार आंदोलनकारियों को डराने और किसानो के पक्ष में लिखने और बोलने वाले पत्रकारों को जिस तरह से गिरफ्तार कर रही है, वह बिल्कुल गलत है. दिल्ली के नागरिक किसानों के संयुक्त मंच द्वारा दिए गए तमाम आह्वानों में शामिल होंगे. वे 6 फरवरी को देशव्यापी चक्का जाम को भी सफल बनाएंगे.

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नागरिकों ने कहा – ‘डरती है सरकार’

नागरिक मार्च में शामिल थियेटर आर्टिस्ट सविता ने कहा कि सरकार हर बार एक ही तरह की कहानी दोहराती है. इसबार भी किसान आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की गई लेकिन इस बार यह कहानी फेल हो गई है. हम यह बताने आए कि हम किसानों के साथ हैं.

वैज्ञानिक और कवि गौहर रजा ने कहा कि आज कवि, शिक्षक और छात्र मजदूर-किसानों के साथ अपनी एकजुटता जताने आए हैं. सरकार को प्रतिरोध से डर लगता है. वह अपने खिलाफ उठ रही हर आवाज को दबाना चाहती है.

स्वतंत्र पत्रकार दिलीप खान ने कहा कि पुलिस जिस तरह से अपना काम कर रहे पत्रकारों को रोक रही है, वह ठीक नहीं है. पुलिस ने मनदीप पर आरोप लगाया है कि वे पुलिस के काम मे बाधा पहुंचा रहे थे जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस उनके काम में बाधा पहुंचा रही थी. यह उनके स्वतंत्र रिपोर्टिंग के अधिकार पर हमला था.

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