– दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा(माले)

23 जनवरी 2021 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती थी. जब हम इस ऐतिहासिक अवसर को मना रहे हैं, तो यही समय है कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन के इस महान नायक की मूल दृष्टि और विरासत पर हम पुनः निगाह डालें.

केंद्र की मोदी सरकार ने नेताजी के जन्मदिन को ‘पराक्रम दिवस’ का नाम दिया है. जैसे गांधी को ‘स्वच्छता’ तक सीमित कर दिया गया है, वैसे ही बोस की पहचान पराक्रम तक सीमित करने की कोशिश है. दूसरे शब्दों में गांधी एक ऐसे संत बना दिये गए हैं, जो स्वच्छता का प्रवचन करते हैं, तो बोस को संघ-भाजपा प्रतिष्ठान के मूर्तिगृह में सैन्य प्रतीक के तौर पर प्रस्थापित करने की कोशिश की जा रही है. यह भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय जागरण के इन महान नायकों को हथियाने की कुटिल चाल है और साथ ही, यह लोगों को इस बात से भी अंजान रखने की कोशिश है कि आज सत्ता के शिखर से संघ-भाजपा जिस सांप्रदायिक राजनीति का कहर बरपा रही है, उस सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ ये नायक आजीवन संघर्ष करते रहे.

निश्चय ही, आजाद हिन्द फौज वाला दौर बोस के राजनीतिक जीवन का बेहद घटनापूर्ण और निर्णायक दौर था, पर वे उससे पहले ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में शुमार हो चुके थे, जिन्हें कांग्रेस के भीतर वाम पक्ष के नेता के रूप में पहचाना जाता था और जो दो बार पार्टी के अध्यक्ष चुने गए. 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने भारतीय योजना समिति बनाई और जवाहर लाल नेहरू को उसका अध्यक्ष नियुक्त किया. बाद में गांधी के साथ मतभेद उभरने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और स्वतंत्र समाजवादी पार्टी के रूप में फाॅरवर्ड ब्लाॅक का गठन किया, जिसके जरिये उन्होंने भारतीय आजादी के लिए समझौताविहीन संघर्ष का आह्वान किया और धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण सामने रखा.

अपने संपूर्ण राजनीतिक लेखन और भाषणों में सुभाष चंद्र बोस ने भारत की साझा संस्कृति को बुलंद किया, मुगल काल को भारतीय इतिहास के स्वर्णिम काल के रूप में चिन्हित किया और उस काल को भारत में सांस्कृतिक संश्लेषण और सभ्यता के बहुरंगीपन के उस उभार का श्रेय दिया, जिसे आधुनिक भारत ने अपनाया. वे किसानों और मजदूरों के मूलभूत अधिकारों और गरिमा के लिए चलाये जाने वाले संघर्षों के जबरदस्त पैरोकार थे और उन्हें भारतीय उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय जागरण का महत्वपूर्ण स्तंभ मानते थे. साथ ही, वे सांप्रदायिक राजनीति की विभाझनकारी क्षमता से भी पूरी तरह वाकिफ थे. जिस समय हिंदू महासभा अविभाजित बंगाल में अपना जाल फैलाने की कोशिश कर रही थी, बोस ने धर्म और राजनीति की मिलावट किए जाने की तीखी मुखालफत की और राजनीति के क्षेत्र में सांप्रदायिकता के प्रसारकों को पूरी तरह से खारिज करने और खदेड़ देने का आह्वान किया.

दूसरे विश्व युद्ध की शुरूआत के साथ बोस ने सोचा कि आजादी के लिए निर्णायक जोर लगाने का वक्त हो चुका है. एक तरफ के अति पर भारतीय कम्युनिस्टों की बहुसंख्या थी जो जर्मनी, इटली और जापान के फासिस्ट गठबंधन को हराने के अंतरराष्ट्रीय आह्वान को पूरा करने के फेर में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय संदर्भ की ही उपेक्षा कर बैठे; तो दूसरी तरफ के अति पर बोस थे जिन्होंने भारत के अंग्रेज शासकों की सैन्य बेदखली के लिए रोम-बर्लिन-टोक्यो धुरी से हाथ मिला लिया. इसके चलते भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की वामपंथी धारा में बहुत भ्रम व विभाजन का दौर आया और संभवतः उपनिवेशवादी छल तथा सांप्रदायिक टकराव / बंटवारे के लिए मैदान खुला छूट गया, जिसने अंततः उन परिस्थितियों को तैयार किया जिनके बीच अंग्रेजी राज से भारत को बंटवारे के साथ आजादी हासिल हुई.

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आजाद हिंद फौज प्रयोग और अभियान को भारतीय इतिहास के मात्र ऐसे त्रासद काल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जिसका अंत पराजय और रहस्यमय तौर पर हुआ. उसमें गौरवशाली तत्व और क्षण थे. निर्वासित सरकार का गठन, ‘आरजी हुकूमत-ए-हिंद’ या स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार, भारतीय युद्धबंदियों और दक्षिण पूर्व एशिया के प्रवासियों को लेकर भारतीय राष्ट्रीय सेना (इंडियन नेशनल आर्मी, आइएनए) का निर्माण – जिसमें गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद, झांसी की रानी और सुभाष के नाम पर ब्रिगेडें थीं – इन सब ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नए स्तर की दृढ़ता और परिपक्वता का संकेत दिया.

जिस तरह से आजाद हिंद फौज के प्रयोग ने 1857 की समृद्ध विरासत से प्रेरणा ग्रहण करते हुए ‘इत्तेहाद, एतमाद और कुर्बानी’ (एकता, विश्वास और त्याग) के ध्येय वाक्य के साथ सिखों को भी अपने साथ शामिल किया, जो कि 1857 के संग्राम का हिस्सा नहीं थे, और झांसी की रानी के नाम पर कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (सहगल) की अगुवाई में महिलाओं की रेजिमेंट का गठन किया, इस सब में संयुक्त भारत की भावना और दृष्टि शामिल थी और भारत के साझा अतीत और वर्तमान की स्पष्ट मान्यता भी इसमें निहित थी. आजाद हिंद फौज अभियान की सैन्य पराजय के बाद आईएनए बंदियों की रिहाई की पुकार पूरे देश में गुंजायमान हुई और बंबई में नेवी (नौ-सेना) विद्रोह के साथ, इसने द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद भारत से अंग्रेजी राज की विदाई के लिए एक निर्णायक पूर्वपीठिका तैयार कर दी.

‘दिल्ली चलो’ नेता जी का अंतिम युद्ध घोष था. 1857 में भारतीय स्वतंत्रता सेनानी – जिनमें सैनिक (यानी, वर्दीधारी किसान), आम किसान व नागरिक शामिल थे – दिल्ली पहुंच गए थे; पर वे ज्यादा देर इस पर काबिज नहीं रह सकेनेताजी ने रंगून में बहादुर शाह जफर को श्रद्धांजलि देते हुए इस सूत्र को पकड़ा. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्म के 125वें साल में भारत जब उनका स्मरण कर रहा है और भारतीय गणतंत्र की स्थापना की 72वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है, भारत के संघर्षशील किसान दिल्ली के बाॅर्डरों पर खड़े हो कर अदानी-अंबानी के कंपनी राज से आजादी और मोदी सरकार के तीन विनाशकारी कृषि कानूनों की पूर्ण वापसी की मांग कर रहे हैं. यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भारत की स्वतंत्रता आंदोलन की जीवंत विरासत है, और यह वर्तमान काॅरपोरेट हमले व सांप्रदायिक फासीवादी आक्रमण का उसी तरह मुकाबला करेगा, जैसे समझौताविहीन तरीके से बोस आजादी के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक राज के खिलाफ लड़े थे.