कुछ खास जगहों पर अपने आधार के बाहरी किसानों को सचेत ढंग से बुलाया गया और किसान विरोधी तीनों कानून पर बातचीत की गई. अपनी तरफ से यह बताया गया कि तीनों कृषि कानून न सिर्फ किसान विरोधी, मजदूर विरोधी बल्कि राष्ट्र व संविधान विरोधी हैं. यह भी बताया गया कि मोदी सरकार द्वारा कैसे लागातार दिल्ली बोर्डर पर चलने वाले किसान आंदोलन को बदनाम करने, राष्ट्र विरोधी बताने और दमन के जरिए समाप्त करने की कोशिश की जा रही है और तमाम सरकारी दमन व कुप्रचार के बावजूद यह किसान आंदोलन ऐतिहासिक और राष्ट्रव्यापी बनता जा रहा है. आजाद भारत के इतिहास में ऐसा किसान आंदोलन पहले कभी नहीं हुआ था. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान महापंचायत में जिस तरह हजारों लोगों की गोलबंदी हो रही है, लिंग, जाति और धर्म से ऊपर उठकर एकता बन रही है, वह भाजपा की विध्वंसक राजनीति के अंत का संकेत है. लेकिन उन विकसित राज्यों के किसानों में जिस तरह की एकता और आक्रोश इस कानून के खिलाफ दीख रहा है उस तरह की एकता और आक्रोश (गोलबंदी) यहां के किसानों में क्यों नहीं दीख रही है? जबकि इस कानून के लागू होने के बाद इसका पहला शिकार बिहार जैसे पिछड़े राज्यों के किसान और मजदूर हीं होंगे. क्या वे भी यह तो नहीं समझते कि ये सिर्फ पंजाब और हरियाणा के धनी फार्मरों का आंदोलन है? या वे इतना भर ही समझते हैं कि बिहार के किसानों को दिल्ली बोर्डर पर चलने वाले किसान आंदोलन के समर्थन में कुछ विरोध प्रदर्शन करना है. वे यह क्यों नहीं समझत किये हमारी अपनी लड़ाई है?

कुछ लोगों ने सवाल किया कि आखिर इसका विकल्प क्या होना चाहिए? लेकिन यह समझाने के बाद कि जब सरकार कह रही है कि हम किसानों के फायदे के लिए यह कानून लाये हैं और किसान कह रहे हैं कि हमें आपका ये गिफ्ट नहीं चाहिए तब तो बिना हिला-हवाली के सरकार को यह कानून वापस ले लेना चाहिए. असल में सरकार यह कानून किसानों के फायदे के लिए नहीं, बल्कि अडानी अंबानी के हाथों में देश की कृषि को सौंपने के लिए लायी है. कुछ लोगों ने सवाल किया कि आखिर यहां की राजनीतिक पार्टियां और नेता इस पर क्यों नहीं खुल कर सामने आ रहे हैं? कुछ लोगों ने कहा कि किसानों के बीच सघन प्रचार अभियान चलाया जाना चाहिए.

अंत में, किसानों से कहा गया कि हमें वर्ग के आधार पर सोचना होगा कि हम किसान हैं और दिल्ली बोर्डर पर जो किसान आंदोलन चल रहा है उसमें महिला, पुरुष और छात्र-नौजवानों के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं. ठंड और बीमारी से 250 से ज्यादा किसान शहीद हो चुके हैं. फिर भी वे आंदोलन में डटे हुए हैं. क्या वे सिर्फ अपने लिए आंदोलन चला रहे हैं? हमें समझना होगा कि वो हमारे ही भाई-बहन हैं जो हमारे देश हित में अपनी जान गंवा रहे हैं और हम मूकदर्शक बने नहीं रह सकते. इस कानून से बड़े-बड़े किसानों की आर्थिक सामाजिक स्थिति पर असर पड़ने में समय लगेगा लेकिन बिहार के करोड़ों गरीबों का राशन तो सबसे पहले समाप्त हो जायेगा. सरकाारी खरीद बंद हो जाने के बाद कारपोरेटों के गोदाम से पैकेट वाला अनाज राशनकार्ड पर नहीं मिलेगा. बिहार में जो 80 प्रतिशत बटाईदार किसान आज संकटग्रस्त कृषि उत्पादन से जुड़े हुए हैं कांट्रैक्ट फार्मिंग कानून के वजह से उनकी खेती छूट जायेगी. इसीलिए, पंजाब हरियाणा के किसानों की तरह इस कानून के खिलाफ संगठित होकर विरोध प्रदर्शन किया जाये. नेता और पार्टी की मजबूरी बन जायेगी हमारे आंदोलन में शामिल होने की. 11 मार्च को किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्मदिन है. वो भारत के पहले किसान आंदोलन के नेता थे और जिन्होंने सरकार और जमींदार को पीछे हटाने के लिए मजदूर-किसानों की एकता को मजबूत करने का आह्वान किया था. जब देश में जबरदस्त सरकार और कारपोरेट विरोधी आंदोलन चल रहा है हमें स्वामी सहजानंद सरस्वती के जन्म दिवस परपर जिला मुख्यालय पर किसान मार्च के जरिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को जोरदार ढंग से उठाना चाहिए. सभी लोगों ने स्वीकारा कि यही वक्त है जब हमें भी जोरदार तरीके से अपनी आवाज को बुलंद करना होगा. कृषि को कारपोरेटों के चंगुल से बचाना हर किसान-मजदूर का पहला फर्ज बन गया है. भाजपा को जड़-मूल से उखाड़ पॅेंकने का यही सही वक्त और रास्ता है.

निष्कर्ष के बतौर, यदि सही ढंग से किसानों के बीच इस बात को ले जाया जाये कि कैसे यह कानून सबसे ज्यादा बिहार के गरीबों और बटाईदारों को भूखमरी के कगार पर डाल देगा कि हमें पंजाब हरियाणा के किसान आंदोलन के समर्थन में नहीं बल्कि अपने हक के लिए लड़ना है तो सभी लोग समझ जा रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा जगहों पर छोटी छोटी बैठकों के जरिए किसानों के बीच सघन जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए.

– जवाहर लाल सिंह, भोजपुर.