म्यांमार सेना द्वारा किये जनसंहार के विरोध में भारत को बोलना होगा

वर्ष - 30
अंक - 16
12-04-2021

 

म्यांमार के सैनिक शासकों द्वारा एक तखतपलट के जरिये चुनी हुई नागरिक सरकार का तख्तपलट करने के बाद, अब सेना ने म्यांमार की जनता, जो तख्तपलट के प्रतिवाद में सड़कों पर उतर पड़ी है, के खिलाफ बर्बर दमन अभियान चला रखा है. म्यांमार की सेना ने गोलियां चलाकर 500 से अधिक नागरिक प्रतिवादकारियों को मौत के घाट उतार दिया है.

भाकपा(माले) इस तख्तपलट के खिलाफ प्रतिवाद करने वाली जनता के साथ एकजुटता जाहिर करती है. हम म्यांमार के नागरिक के बतौर स्वीकृत प्रतिवादकारियों और म्यांमार की नागरिकता से वंचित रोहिंग्या अल्पसंख्यकों के बीच एकजुटता कायम करने के प्रयासों का खास तौर पर अभिनंदन करते हैं.

यह शर्मनाक बात है कि जब म्यांमार के सैनिक शासक जनता का संहार कर रहे हैं, तब भारत सरकार ने 27 मार्च को होने वाली म्यांमार सेना दिवस की सैन्य परेड में शामिल होने के लिये अपने मिलिटरी अटाशे (सैन्य सहकारी) को भेज दिया. हमने यह भी गौर किया है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का घनिष्ठ पिठ्ठू अडानी ग्रुप म्यांमार सेना के स्वामित्व वाली एक कम्पनी के साथ कारोबारी सौदे करने में गहराई से लिप्त है, और अडानी पोर्ट के प्रमुख ने 2019 में म्यांमार सेना के शीर्षस्थ जनरल के साथ मुलाकात की थी. अब यह निष्कर्ष निकालने से बचना मुश्किल है कि मोदी सरकार अडानी के हितों को लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों से बढ़कर वरीयता देती है. हम मांग करते हैं कि भारत सरकार सैनिक तख्तपलट तथा जनसंहार के खिलाफ दृढ़ स्थिति अख्तियार करे.

हम मणिपुर राज्य की सरकार द्वारा जारी किये गये उस सरकुलर (जिसे बाद में वापस ले लिया गया) की भी निंदा करते हैं, जिसमें म्यांमार से भाग रहे शरणार्थियों को भोजन एवं आश्रय देने से इनकार कर दिया गया है, और साथ ही हम भारत सरकार द्वारा रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार भेजे जाने के प्रयासों की भी निंदा करते हैं, क्योंकि इन रोहिंग्या को म्यांमार की सैनिक सरकार के हाथों प्रायः निश्चित रूप से मारे जाने का खतरा है. रोहिंग्या शरणार्थियों को जबर्दस्ती एक ऐसे देश में भेजना, जहां उन्हें नागरिक के बतौर स्वीकार ही नहीं किया जाता और जहां उनके जनसंहार का खतरा है, अंतर्राष्ट्रीय कानून (दमन का खतरा झेल रहे शरणार्थियों को जबर्दस्ती भेजे जाने के खिलाफ अधिकार) का उल्लंघन है. हम भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस मामले की सुनवाई के समय की गई उस टिप्पणी की भी निंदा करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा है, “डर इस बात का है कि जब उन्हें म्यांमार भेज दिया जायेगा तो उनका हत्याकांड हो सकता है. मगर हम उसे रोक नहीं सकते.”

हम मांग करते हैं कि भारत अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानूनों का पालन करे और रोहिंग्या शरणार्थियों समेत म्यांमार सेना द्वारा जनसंहार से बचने के लिये भाग रहे शरणार्थियों को सुरक्षित आश्रय मुहैया कराने की अपनी बाध्यता को निभाए.