औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के खिलाफ अनेक क्रांतिकारी देशभक्तों ने अपनी जान की कुर्बानी दी है. लेकिन उनमें से कई जिन्होंने अपने नेतृत्व में अत्याचारी अंग्रेजों, उनके मुखबिरों, जमींदारों, साहूकारों और सूदखोर-महाजनों के अंतहीन शोषण के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया था, बहुत दिनों तक गुमनाम रहे और कुछ तो आज भी गुमनाम हैं. जीतराम बेदिया उनमें से ही एक हैं.

जन्म, जन्मस्थान व परिवार

जीतराम बेदिया का जन्म 30 दिसंबर 1802 को रांची जिला के ओरमांझी प्रखंड अंतर्गत गगारी गांव के अत्यंत गरीब आदिवासी समुदाय में हुआ था. इनके पिता का नाम जगतनाथ बेदिया, माता का नाम महेश्वरी देवी व पत्नी का नाम गायत्री देवी था. गगारी गांव पहाड़ की तराइयों में बसा हुआ है. वे युवा काल से ही सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे. उनके क्रियाकलाप से आदिवासी समाज सहित सभी समुदायों के लोग काफी प्रसन्न रहा करते थे.

चुट्टुपालु घाटी क्षेत्र रांची-पिठौरिया से लेकर रामगढ़-झारीबाग तक फैला हुआ है. गगारी पहाड़ और चुटूपालू घाटी क्षेत्र घने जंगलों से भी भरा-पूरा है, इसकी प्राकृतिक छटा अत्यंत ही रमणीय है. रंग-बिरंगे पशु-पक्षियों के कलरव से पूरा वातावरण गूंजता रहता है. जीतराम बेदिया इस लुभावने दृश्य को देखकर आनंद से झूम उठते थे. उनके पिता ने गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी व सूअर पाल रखे थे. रोजाना जब वे जंगल में जानवरों को चराने ले जाते, जीतराम बेदिया भी उनके साथ लग जाते.

युवावस्था: व्यक्तित्व का विकास

पिता का शरीर अब धीरे-धीरे थकने लगा था. जीतराम बेदिया जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे, उनकी जिम्मेवारी भी बढ़ रही थी. पिता के निधन के बाद घर की सारी जिम्मेवारी जीतराम के कंधों पर ही आ गयी. वे अपने पालतू पशुओं को जंगल में चराने जाया करते. शुरू में चरवाही करने में जीतराम बेदिया को काफी दिक्कत हुई. सभी जानवर अलग-अलग होकर जंगल में चरते थे. सभी को एक साथ जुटाने में काफी परेशानी होती थी. जीतराम बेदिया ने एक तरकीब सोची और पशुओं के गले में लकड़ी की ठरकी व घंटी बांध दी ताकि उनकी आवाज सुनकर उनको खोजने में सहूलियत हो. साथ ही, उन्होंने जंगल में मिलने वाले बांस को काटकर बांसुरी बनायी. गोधूलि बेला में जब घर वापसी होती वे पहाड़ से गांव तक बांसूरी बजाते हुए आते थे. गगारी पहाड़ में गायों, बैलों व बकरियों को चराने के दौरान ही समाजसेवा, देश सेवा और दीन-दुखियों की सेवा करने की भावना मजबूत हुई. न्याय-अन्याय को लेकर कई तरह के विचार उनके मन में पनप रहे थे. वे बचपन से ही साहसी एवं कुशाग्र बुद्धि के थे. तीरंदाजी सीखने के लिए उन्होंने खुद ही तीर-धनुष बनाया, गुलेल से भी अचूक निशाना साधना सीख लिया और केन्द और बढ़र के पेड़ के नीचे से पके फलों को बेधने का प्रयास करते रहते थे. जंगल में ही वे तीरंदाजी और गुलेल चलाने में काफी निपुण हो गए थे. तीर-धनुष, गुलेल व बांसूरी हमेशा अपने पास रखा करते थे. बचपन के इस कौशल ने कालान्तर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह की आग में घी का काम किया.

वे जंगल में मिलने वाली प्राकृतिक जड़ी बूटियों से छोटी-बड़ी बीमारियों का इलाज भी किया करते थे. बच्चे, वृद्ध, युवक व युवतियां इनकी दवा से अक्सर ठीक हो जाते. इनकी प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के सेवन से काफी फायदा होता था. इस वजह से धीरे-धीरे जीतराम बेतिया की प्रसिद्धि में बढ़ोतरी होने लगी. दूर-दूर से लोग उनके पास आने लगेइस तरह से सबके साथ एक भाईचारा व एकता की भावना पैदा हुई. लोगों द्वारा बताए गए बहुत सारे कष्टों को सुनकर जीतराम बेतिया का मन उद्वेलित हो उठता था.

जीतराम बेदिया प्रकृति के पुजारी थे. वह सिंगबोंगा देवता (सूर्य), वनजारी देवता (मारांगबुरु), गांवा-देवती, जसपुरिया, गगारी गोसाई, सरना की पूजा करते थे. उन्हें बांसूरी के अलावा ढोल, मांदर व नगाड़ा बजाने में भी महारत हासिल थी. करमा-जितिया, सोहराय और सरहुल के दिन उनके मांदर की थाप सुनकर महिला, पुरुष, बच्चे व बच्चियां – सभी लोग अखरा पहुंचते और सामूहिक झूमर नाच में शामिल होकर भरपूर आनंद उठाते थे. प्राकृतिक धर्म व कला-संस्कृति के प्रति उनका रुझान देखते ही बनता था.

नेतृत्व की क्षमता

दिनों दिन उनमें लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता भी बढ़ने लगी. लागों की सेवा करने और उनको एकजुट करने की अद्भुत क्षमता को देखकर आस-पास के गांव-क्षेत्र के लोग चर्चा करने लगे कि जीतराम बेदिया सत्यवादी और आंदोलनकारी हैं.

जीतराम बेदिया के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में पारिवारिक माहौल का बहुत ही गहरा असर था. पिता स्वयं भी देशभक्त थे और हमेशा देश की सेवा करने के बारे में सोचते रहते थे. वे महसूस करते थे कि देश अंग्रेजों की गिरफ्त में है और उनके अन्याय-अत्याचार से छोटानागपुर क्षेत्र के लोग काफी प्रताड़ित हो रहे हैं. अंग्रेजी हुकूमत देश भर में राज कर रही है और अपने लोगों को उसके शोषण से बचाने के लिए अंग्रेजों को देश से खदेड़ना जरूरी है. ये बातें वे जीतराम बेदिया को भी बताते थे. पिता की कही सारी गंभीर बातें जीतराम बेदिया के जेहन में धीरे-धीरे घर कर रही थीं. बचपन में ही उन्होंने अपने पिता व पुरखों से अंग्रेजों के विरुद्ध हुए पलामू के चेरो विद्रोह, सिंहभूम के हो विद्रोह व तमाड़ विद्रोह की कहानियां सुन रखी थी. जब वे आदिवासियों पर अंग्रेजों के जुल्म की बातें सुनते तो उनका चेहरा तमतमाने लगता और मुठ्ठियां तन जातीं. मन में यह विचार आता कि अंग्रेजों को तीर से बींधकर अपने क्षेत्र से मार भगाया जाए.

अंग्रेजी हूकूमत के अत्याचार

उस समय तक अंग्रेजी हुकूमत की गिद्ध नजर रांची, रामगढ़ व हजारीबाग के पहाड़ी छुट्टुपालु घाटी क्षेत्र के जल, जंगल, जमीन और पहाड़-पर्वत पर पड़ चुकी थी. वे इस क्षेत्र में निवास करने वाले समुदायों के भोलेपन का लाभ उठाने और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अपने शासन के लिए धन जुटाने की योजना बना रहे थे. तत्कालीन ब्रिटिश शासन ग्रामीणों पर विभिन्न प्रकार से दबाव डालकर राजस्व (कर) संग्रह करने पर जोर देने लगा. स्वतंत्र और स्वाधीन रहने वाले आदिवासियों एवं अन्य समुदायों के खिलाफ जमींदारों व सूदखोर-महाजनों ने जो परिस्थिति पैदा कर दी थी वह अंग्रेजी राज को स्थापित करने में काफी मददगार साबित हुई. लेकिन इन्हीं परिस्थितयों में विद्रोह की भावना भी पैदा हुई. रामगढ़, पिठौरिया, ओरमांझी और समस्त छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजी शासन का प्रभाव बढ़ने लगा था. अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण से क्षेत्र तबाह हो रहा था. यह देखकर जीतराम के अंदर विद्रोह करने व विद्रोह का नेतृत्व करने की इच्छा प्रबल हो उठी. युवा जीतराम बेदिया की सांगठनिक नेतृत्व क्षमता देखकर लोगों का विश्वास था कि वे ही अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह में उनकी अगुवाई कर सकते हैं. लेकिन जीतराम जानते थे कि यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती है.

विद्रोह के नायक

उसी समय ब्रिटिश शासन के विरुद्ध खटंगा गांव के राजा टिकैत उमराव सिंह और उनके दीवान खुदिया गांव के शेख भिखारी ने विद्रोह कर दिया. उनके द्वारा किए जा रहे संघर्ष की प्रेरणा से गगारी गांव के वीर योद्धा जीतराम बेदिया भी उनसे जुड़ गए. विद्रोह के दौरान तीनों में गहरी एकता बन गई और उन्होंने अपने-अपने इलाके में इसका नेतृत्व संभाल लिया. यह किसी घटना विशेष के विरुद्ध किया जाने वाला तात्कालिक व छिटपुट संघर्ष मात्रा नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ सशक्त विद्रोह था. इस इलाके की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी भीषण बदलाव के दौर से गुजर रही थी. इस स्थिति का फायदा शोषक जमींदारों व सूदखोरों ने खूब उठाया. जिस जल, जंगल, जमीन को पुरखों ने अपने खून-पसीने से आबाद व संरक्षित रखा था, चुटूपालू घाटी क्षेत्र की जनता उससे महरुम होने लगी थी. शोषण करने के विभिन्न हथकंडो को अपनाकर तब तक फायदा उठाते रहे जब तक कि चुटूपालू घाटी क्षेत्र की जनता ने उनके विरुद्ध हथियार नहीं उठा लिये. वे योद्धा तीर-धनुष और तलवार संचालन में पारंगत थे. पूरे क्षेत्र में जनता के बीच इन तीन वीर विद्रोहियों के नाम की चर्चा आग की तरह फैल गई.

टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया ने आसपास के आदिवासियों व मूलवासियों को एकजुट करना शुरू किया. उन्होंने लोगों को बताया कि जल, जंगल, जमीन और सभी प्राकृतिक संसाधन हमारे हैं. जमींदारों से मिलकर अंग्रेज इनको हथियाना चाहते हैं. लोगों को इनकी बातों का मर्म समझ में आ गया. अंग्रेजी राज एवं उनके समर्थकों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल पफूंक दिया गया. सबको यह भी बताया गया कि अंग्रेजों के पास गोला-बारूद, बन्दूकें और तोपें हैं. तीर-धनुष और तलवार से उनका मुकाबला करने के साथ हमें छिपकर आक्रमण करने की नीति अपनानी होगी. अंग्रेजों के पास इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान अधूरा है. ऐसी स्थिति में जंगल की झाड़ियों में छुपकर उन पर अचानक हमला बोल दिया जाए तो वे मैदान छोड़कर भाग खड़े होंगे. सभी लोगों को ये विचार बहुत पसंद आये और सबने एक स्वर में उन लोगों का समर्थन किया.

सन 1855-56 में संथाल विद्रोह चल ही रहा था कि 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ देश में सिपाही विद्रोह हुआ. उस समय ओरमांझी, रांची व रामगढ़ क्षेत्र में विद्रोह की कमान टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया के हाथों में थी. वे विद्रोह की रणनीति बनाने के लिए जगह-जगह गुपचुप तरीके से बैठकें करने लगे. लोगों को जैसे ही यह समाचार मिला कि तीनों योद्धाओं ने विद्रोह की कमान संभाल रखी है, वे दोगुने उत्साह से विद्रोहियों की टोली में शामिल होने लगे. इस तरह विद्रोहियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी. जीतराम बेदिया ने अपने लड़ाकू साथियों को तीर-धनुष, तलवार, ढेलबांस, ढ़ेला, गुलेल, कुल्हाड़ी, कुल्हाड़ू, बलम, बरछी, दरौंती, हंसुआ और पत्थर जमा कर रखने को कहा. आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजों की बंदूकों का सामना इन्हीं पारंपरिक हथियारों के माध्यम से करने की ठानी और सभी साथियों से जीतने के लिए हौंसला बुलंद रखने को कहा.

इस विद्रोह की ज्वाला को दबाने के लिए अंग्रेज शासकों ने मेजर मेक्डोनाल्ड के नेतृत्व में मद्रासी फौज को भेजा था. मद्रासी फौज रामगढ़ में कैंप लगाकर तैनात हो गई.

रण कौशल व रणनति

जिस मार्ग से मद्रासी फौज के मेजर मेक्डोनाल्ड के गुजरने की संभावना होती थी, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया उसके किनारे जंगल की झाड़ियों में अपने जांबाज समर्थकों के साथ छिपकर बैठ जाते. कुछ चुनिंदा साथी मार्ग पर उनकी टोह ले रहे होते और बाकी अपने तीर-धनुष व हथियार लेकर अंग्रेजी सेना के आने की प्रतीक्षा करते. जैसे ही मद्रासी फौज दिखाई देती वे किसी जंगली पशु-पक्षी की आवाज निकालकर सबको आने का संकेत कर देते. धनुष की प्रत्यंचाएं चुपचाप तन जातीं और मद्रासी फौज जब तीर की मार के दायरे में आ जाती ती तीरों की बौछार शुरू हो जाती और मद्रासी फौज भयभीत होकर भाग खड़ी होती. इस गुरिल्ला युद्ध में ग्रामीणों की भी जो पारंपरिक हथियारों से लैस होते थे, भागीदारी होती थी. इस प्रकार टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया के प्रतिरोध के कारण अंग्रेज दमनात्मक कार्रवाई करने में विफल होने लगे. तीनों योद्धा अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बन गये. आदिवासियों का विद्रोह निरंतर हो रहा था. क्षेत्र के हजारों विद्रोहयों ने इसमें अपने प्राणों की आहुति भी दी.

मेजर मेक्डोनाल्ड ने इन तीनों योद्धाओं को हर हाल में पकड़कर जनता के बीच फांसी पर लटकाने की योजना बनाई. अंततः 6 जनवरी, 1958 को टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को गिरफ्तार करने में अंग्रेज शासक सफल हो गए. दोनों योद्धाओं को बिना मुकदमा चलाए और बिना गवाही और दलील सुने 8 जनवरी, 1858 को चुटूपालू घाटी में एक बरगद के पेड़ में लटका कर फांसी दे दी गयी.

immortal fighter of India's first freedom struggle

टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को फांसी पर लटका देने की खबर मिलते ही जनता का आक्रोश फूट पड़ा. आदिवासी, हिंदू और मुस्लिम सहित सभी समुदाय के लोग हजारोंझार की संख्या में एक जनसैलाब बनकर उन्हें देखने के लिए चुटूपालू घाटी में उमड़ पड़े. जीतराम बेदिया अब भी अंग्रेजों के चंगुल से बाहर थे. अब नेतृत्व की सारी जिम्मेवारी उनके ही कंधों पर आ गयी थी. उसी समय उन्होंने हाथों में तलवार और तीर-धनुष लहराकर मेजर मेक्डोनाल्ड की मद्रासी फौज और अंग्रेजों को ललकारते हुए यहां से मार भगाने का आह्वान किया. इस आह्वान से क्षुब्ध ब्रिटिश सरकार अब किसी भी कीमत पर जीतराम बेदिया को मारने की योजना तैयार कर रही थी. जीतराम बेदिया की छापामार युद्ध कला, सांगठनिक क्षमता और वक्तृता से लोग काफी प्रभावित थे. यही कारण रहा कि इस इलाके की जनता जीतराम बेदिया के साथ हमेशा मुस्तैदी से खड़ी रही. जीतराम बेदिया दिन को पहाड़ की गुफाओं में रहने लगे और रात को गांव में लोगों को संगठित करने का काम करने लगे. महोदीगढ़ से गगारी तक के पहाड़ों में उनके छुपने के ठिकाने थे.

आदिवासियों के पथ-प्रदर्शक

जनता की ताकत को संगठित करने के लिए वे गांव-गांव में घुमते. लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को मानने से इनकार करने और इनकी उनके खिलाफ अंतिम दम तक लड़ने का लोगों का आह्वान करते. गगारी गांव के बरगद या अन्य पेड़ों के नीचे वे सभा बुलाया करते जिसमें हजारों लोग इकट्ठाा होते. उन्होंने अपने संदेश में लोगों से साफ-साफ कहते कि हमें अपने जल, जंगल, जमीन, पहाड़-पर्वत, स्थानीय बोली-भाषा व संस्कृति की हिफाजत करनी है, नशापान से दूर रहना है और अंधविश्वास से मुक्त होकर आदिवासी समाज को एकजुट करने और आगे बढ़ाने का संकल्प लेना है. सभाओं में वे यह घोषणा भी किया करते, ‘हम अपना गांव-अपना क्षेत्र में अपना राज चलाएंगे,’ अंग्रेजों का शासन नहीं चलने देंगे. जीतराम बेदिया के क्रांतिकारी विद्रोह में हजारोंझार की संख्या में लोगों ने भाग लिया और जीतराम बेदिया के आह्वान ‘ब्रिटिश सरकार को मार भगाओ और अपने क्षेत्र में अपना राज चलाओ.’ का गर्मजोशी से स्वागत किया. जीतराम बंदिया ने सभी भाई-बहनों से कहा, ‘विद्रोह करने से घबराना नहीं है, क्योंकि आजादी की लड़ाई कुर्बानी मांगती है. बलिदान देने से इस देश की मिट्टी और जनता की ताकत और मजबूत होगी.’

इस दौरान जीतराम बेदिया और उनके लड़ाकू साथियों ने कई बार अंग्रेज सिपाहियों पर छापामार हमला किया और उनको घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. मेक्डोनाल्ड के मद्रासी फौज को मालूम हो गया था कि जीतराम बेदिया फिर से ग्रामीणों को एकजुट कर रहा है. मैक्डोनाल्ड ने मद्रासी फौज को आदेश दिया कि जीतराम बेदिया को जिंदा या मुर्दा तुरंत गिरफ्तार करो, नहीं तो ब्रिटिश शासन चलाना मुश्किल हो जायेगा. चुटूपालू घाटी में टिकैत उमरांव सिंह एवं शेख भिखारी को फांसी देने के बाद जीतराम बेदिया को पकड़ कर फांसी देने, जिंदा जला देने या मिट्टी में जिंदा दफन कर देने की योजना मेजर मेक्डोनाल्ड के द्वारा बनायी गयी. उनके हर एक पल की गतिविधि पर नजर रखी जाने लगी. अंग्रेज सैनिकों ने पता कर लिया कि जीतराम घोड़ा पर चलता है, वह बहुत ही ताकतवर है और बहुसंख्यक जनता उनके साथ है. तीर-धनुष, तलवार, फरसा आदि उसके हथियार हैं. वह बड़कागांव के महोदी पहाड़ और ओरमांझी के गगारी पहाड़ की पगडंडियों से आना-जाना करता है. मद्रासी फौज ने जीतराम बेदिया को ढूंढ निकालने में रात-दिन एक कर दिया. हमेशा घोड़ा पर सवार रहने वाले जीतराम बेदिया को पकड़ पाना आसान काम नहीं था. जीतराम बेदिया जब घोड़ा पर सवार होकर सैकड़ों लोगों के साथ चलते थे तो ब्रिटिश सैनिकों के होश उड़ जाते थे.

शहादत और उसके बाद

आखिरकार, 23 अप्रैल, 1858 को अचानक गगारी और खटंगा गांव के बीच बंसैरगढ़ा स्थल पर मेजर मेक्डोनाल्ड और उसकी मद्रासी फौज ने जीतराम बेदिया व उनके लड़ाकू साथियों को पूरी तरह से घेर लिया. आत्मसमर्पण करने के आदेश को जमतराम ने साफ ठुकरा दिया. विद्रोहियों और मेक्डोनाल्ड के सैन्यबलों के बीच घमासान युद्ध हुआ. अंग्रेजों की ओर से अंधाधुंध गोलियां चलीं और अनेक जांबाज विद्रोही मौत के शिकार हुए. जीतराम बेदिया के लड़ाकू दस्ते के द्वारा तीरों की बौछार में मद्रासी फौज के कई सैनिक मारे गये. गोली-बारूद के सामने तीर-धनुष और तलवार का अधिक समय तक टिक पाना मुश्किल हो रहा था, फिर भी जीतराम बेदिया बिना रुके दनादन तीर-धनुष और तलवार चलाते रहे. अंततः मेक्डोनाल्ड के आदेश पर मद्रासी फौज ने खटंगा और गगारी गांव के बीच जीतराम बेदिया व उनके घोड़ा को गोली मारकर गिरा दिया और दोनों को बंसैर गढ़ा में डाल दिया. तभी से बंसैरगढ़ा स्थल को जीतराम बेदिया के घोड़े की स्मृति में घोड़ागढ़ा के नाम से जाना जाता है. शहीद जीतराम बेदिया की तलवार, फरसा और मुगदर का डंडा आज भी उनके वंशजों के पास मौजूद है.

उनकी शहादत के बाद अंग्रेजों का मनोबल बढ़ गया. तुरत ही पिठौरिया, ओरमांझी व रामगढ़ सहित कई गांवों में विद्रोहियों पर हमला करने के लिए मेजर मेक्डोनाल्ड की अगुवाई में एक सैन्य टुकड़ी भेजी गई. लेकिन, विद्रोह की तीव्रता व ताकत इतनी अधिक थी कि इसका दमन करने के लिए अंग्रेजों को अपनी दूसरी छावनियों से भी सैन्यबल, घोड़े तथा हथियार मंगवाने पड़े. इस अप्रत्याशित हमले में विद्रोहियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. वीर जीतराम की शहादत से अंग्रेजी शासन को बहुत फायदा हुआ. दर्जनों मुंडा, बेदिया, मानकी और महतो आबादी वाले गांवों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था व आंदोलन की धार आततायी अंग्रेजों के दमन व अत्याचार से धीरे-धीरे मंद पड़ने लगी.

उपसंहार

इस विद्रोह के कई प्रत्यक्ष व स्थानीय कारण थे. विद्रोह की जड़े झारखंड की जनता के मान-सम्मान व अस्मिता-पहचान पर चोट; जल, जंगल, जमीन, पहाड़-पर्वत पर हमलेच परंपरागत कृषि ढांचे के विनाश और सामाजिक-आर्थिक ढांचे में दरार पड़ने में निहित थी. आदिवासियों और मूलवासियों से बढ़ी हुई लगान की दरों पर जबरन मालगुजारी वसूली जाती थी. महाजनों द्वारा भी भारी सूद लिया जाता था. अधिकारी व कर्मचारी आदिवासियों से गुनाहगारी कर, सलामी कर, अफीम कर और डाक खर्च भी बेरहमी से वसूलते थे. भोले-भाले आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को अंग्रेजो द्वारा काफी नुकसान पहुंचाया गया था. छोटी-छोटी बातों पर अर्थदण्ड और शारीरिक दण्ड दिये जाते थे. अंग्रेजों की तत्कालीन न्यायिक व्यवस्था आदिवासियों को न्याय दिलाने में पूर्ण रुप से असफल रही थी. सरकारी नोटिस पर जब भोले-भाले आदिवासी कचहरी पहुंचते तो पता चलता कि उन्हें उनके जल, जंगल, जमीन से बेदखल कर विद्रोही घोषित कर दिया गया है.

इस शोषण और दमन से बचने के लिए आदिवासी खासकर बेदिया आदिवासी परिवार समेत जंगलों की तरफ भागने लगे. उरांव, मुंडा, महली, गंझू व करमाली आदिवासी भी उनके साथ भागे. बेदिया आदिवासियों पर अंग्रेजों ने इतना अत्याचार किया कि भय के कारण उन्हें जंगलों व पहाड़ों की तरफ भागना पड़ा. आज भी उनके गांव जंगल-पहाड़ की तराईयों में ही अवस्थित हैं.

वीर शहीद जीतराम बेदिया ने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त पाने के लिए अपने क्षेत्र के आदिवासियों समेत छोटानागपुर क्षेत्र के अन्य सभी समुदायों को भी प्रेरित व एकजुट किया और स्वतंत्रता आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया. तत्काल भले ही विद्रोह का दमन कर दिया गया हो लेकिन उनकी वीरता और शहादत का दूरगामी प्रभाव पड़ा. उनकी शहादत के बाद भी छोटानागपुर क्षेत्र में विद्रोह की ज्वाला धधकती रही.

जीतराम बेदिया ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद कर शासन की नींव हिला दी थी. यह झारखंड के लिए सचमुच गौरवपूर्ण है. उनकी शहादत अविस्मरणीय रहेगी और आम जन को हमेशा देश की संप्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने की प्रेरणा देती रहेगी.

– देवकीनंदन बेदिया, सुरेंद्र कुमार बेदिया

Martyr Jeetram Bedia


शहीद जीतराम बेदिया: गुमनाम शहीद के खोज की अंतर्कथा

झारखंड अलग राज्य बनने के बाद पहली बार राज्य की सत्ता में आई भाजपा सरकार द्वारा 15 नवंबर 2000 को अल्पसंख्यक एवं उपेक्षित बेदिया जनजाति को आदिवासियों की सूची से बाहर करने एवं बेदिया जनजाति के निवास क्षेत्र (झारखंड के मध्य पठार) के जल, जमीन, जंगल, पहाड़ और खनिज को छीनने की कोशिश की गई. इसके खिलाफ बेदिया समुदाय के सामाजिक संगठन ने राजधानी रांची में 2 मई से 31मई 2012 के बीच चले विधनसभा सत्र के दौरान बिरसा चौक पर (विधानसभा के समक्ष) विशाल धरना-प्रदर्शन आयोजित किया था. यह धरना 16 दिनों तक चलता रहा.
भुरकुंडा के देवरिया में भाकपा(माले) के नेतृत्व में जिंदल की कंपनी के खिलाफ आंदोलन चल रहा था. 8 जून 2012 को देवरिया मैदान में जिंदल के खिलाफ एक सभा आयोजित होनी थी जिसके मुख्य वक्ता भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य थे. रांची में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में और फिर सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पूरे राज्य में भूमि एवं खनिज की लूट मची है. सरकार बेदिया समुदाय को सीएनटी के दायरे से बाहर कर रही है और जिंदल की कंपनी सीएनटी एवं एसपीटी एक्ट का उल्लंघन कर भुरकुंडा क्षेत्र में उनकी जमीन छीन रही है. सीएनटी पर गोलमोल बातें करनेवाली सरकार कंपनी का सहयोग कर रही है.
इसी दौरान भाकपा(माले) के वरिष्ठ नेता व झारखंड राज्य के प्रभारी का. डीपी बक्शी की मौजूदगी में बेदिया जनजाति के आदिवासियों के बीच से आने वाले अगुआ कार्यकर्ताओं की एक बैठक 21अप्रैल 2012 को रामगढ़ स्थित तुलसी स्मृति धर्मशाला में बुलाई गई थी. बैठक में इस मुद्दे पर पहल लेते हुए झारखंड के मध्य पठार में बेदिया जनजाति के लोगों एवं आदिवासियों के बीच पार्टी के कामकाज के विस्तार की योजना बनाई गई, एक जनसंपर्क यात्रा की टीम गठित की गई और जनगोलबंदी का अभियान शुरू किया गया.
देवकीनंदन बेदिया व लाली बेदिया आदि भाकपा(माले) नेताओं के नेतृत्व में 27 से 30 अप्रैल 2012 के बीच 4 दिनों तक पांच प्रखंड क्षेत्रों – ओरमांझी, अनगड़ा, सिल्ली, गोला तथा रामगढ़ में यह अभियान चला. इस दौरान जनसंपर्क के साथ ही सामाजिक सर्वेक्षण भी किया गया. इसी क्रम में 28 मार्च 2012 को जब यह टीम ओरमांझी प्रखंड के गगारी गांव पहुंची. बातचीत के क्रम में वहां के एक ग्रामीण धनराज बेदिया ने बताया कि उनके गांव में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. उनका नाम शहीद जीतराम बेदिया है. वे आज भी गुमनाम हैं. उनके परपोते अभी भी जीवित हैं हालांकि उनकी उम्र 84 वर्ष हो चुकी है. ये बात सुनकर नेताओं के मन में भी जिज्ञासा पैदा हुई और अचरज भी हुआ कि आखिर उनका नाम अब तक उजागर क्यों नहीं हुआ? तत्क्षण ग्रामीणों को जुटाया गया और गांव के चबूतरे पर बैठ कर धर्मनाथ बेदिया की जुबान से शहीद जीतराम बेदिया के संघर्षमय जीवन वृतांत को सुना गया. धर्मनाथ बेदिया ने बताया कि ओरमांझी (रांची) के पहाड़ी क्षेत्रों में टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ भीषण लड़ाई लड़ी गई. अंग्रेजों से लड़ते हुए ही तीनों वीर शहीद हुए. पहले टिकैत उमराव सिंह एवं शेख भिखारी अंग्रेजों के हाथों लगे और उन दोनों को चुटूपालू घाटी में बरगद के एक पेड़ पर फांसी देकर लटका दिया गया ताकि पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल पैदा हो जाये. इसके बावजूद भी विद्रोह व संघर्ष जारी रहा. उन दोनों को फांसी देने के एक वर्ष बाद जीतराम बेदिया भी खटंगा व गगारी गांव के बीच अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए. उन्हें और उनके घोड़े, दोनों को गोलियों संछलनी कर दिया गया और दोनों के शव अत्यंत गहरे बंसैर गड्ढा स्थल में डाल दिये गए. तब से ही वह बंसैर गड्ढा नामक स्थान ‘घोडागढ़ा’ के नाम से प्रचलित एवं स्थापित है.
अचरज की बात यह है कि टिकैत उमराव सिंह व शेख भिखारी का नाम तो इतिहास में आया, लेकिन शहीद जीतराम बेदिया का नहीं आया? इस सवाल के जवाब में शहीद जीतराम बेदिया के वंशजों ने बताया कि उन लोगों को अंग्रेजों के द्वारा जान से मार डालने और फांसी देने का भय दिखाया गया था. इसलिए वे इस विद्रोह की बातों को जुबान पर नहीं लाते थे. यहां तक कि आजादी मिलने के बाद भी इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाये. इतिहासकारों से भी इस मामले में चूक हुई.
शहीद जीतराम बेदिया मूलतः आदिवासी योद्धा थे. वे गगारी एवं अन्य पहाड़ियों में रहते हुए ही संघर्ष करते थे. उनके गांव वालों की जीविका का संसाधन भी जल-जंगल-जमीन था और इस पर मंडराते खतरे को देखकर उन्होंने इसे बचाने के साथ-साथ देश की आजादी के लिए संघर्ष छेड़ा था. अंग्रेज शासक देश की आजादी के लिए ध्ध्क रही संघर्ष की इस ज्वाला को दबाने की लगातार कोशिश करते रहे. उनके वंशजों ने यह भी बताया कि शहीद जीतराम बेदिया द्वारा लड़ाई के दौरान उपयोग में लाए गए अस्त्र-शस्त्र, तीर-धनुष, तलवार, फरसा, कांटेदार गेंद व डंडा और घोड़े की पीठ पर कसा जाने वाला जीन (गद्दा) हाल के दिनों तक बचा रहा. लेकिन अंततः में उन्होंने उसे जला दिया. तलवार, फरसा व कांटेदार गुंबज का डंडा आज भी उनकी निशानी के बतौर मौजूद है.
उसी दिन भाकपा(माले) नेताओं व ग्रामीणों ने स्वतंत्रता सेनानी शहीद जीतराम बेदिया का नाम देशभक्त शहीदों की सूची में लाने की पूरी कोशिश करने और समाज व राष्ट्र के सामने उजागर करने का संकल्प लिया. पहली बार वहीं पर शहीद जीतराम बेदिया के सम्मान में एक मिनट की मौन श्रद्धांजलि दी गई. भाकपा(माले) की खोज और शोध का ही नतीजा है कि बेदिया सामाजिक संगठन की ओर से हर साल 30 दिसंबर को उनकी जयंती मनाई जाती है व 23 अप्रैल को उनका शहादत दिवस मनाया जाता है.