अफगानिस्तान की अवाम के साथ खड़े हों!

वर्ष - 28
29-08-2021

 

अफगानिस्तान से अमरीकी फौजों के जाने के बाद अमरीका समर्थित अशरफ गनी की सरकार ढह गयी है और तालिबान ने सत्ता पर दखल कर लिया है। वास्तव में अमरीकी मध्यस्थता से हुए सत्ता में बदलाव के इस पूरे घटनाक्रम ने अफगानिस्तान के हालात में नाटकीय तब्दीली पैदा कर दी है। तालिबान, अफगानिस्तान की अवाम के विभिन्न तबक़ों पर हमला कर रहे हैं और लोग बड़ी संख्या में किसी तरह अपने मुल्क से भागने की फिराक में हैं। लोगों से ठुंसे सामान ढोने वाले जहाज और जहाजों के दरवाजे से लटकते यात्रियों के दृश्य, भरी हुई बसों और रेलों के दृश्य जैसे लग रहे हैं, जिनमें एक डॉक्टर और एक फुटबाल खिलाड़ी उड़ते हवाई जहाज से टपक कर दर्दनाक मौत हो गई। इन यात्रियों को पता है कि जहाज छूटने का मतलब हौलनाक मौत है। यह सारा मंजर अफगानिस्तान में हो रहे अराजक, अनिश्चित और डरावने संक्रमण का है। तालिबान ने अपना रुख साफ कर दिया है: वे अवाम की जिंदगी पर पूरा नियंत्रण करना चाहते हैं, महिला अधिकारों को खत्म कर देना चाहते हैं, वे महिलाओं, धार्मिक व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को आतंकित करना चाहते हैं। वे तो अफगानिस्तान में चुनाव करवाने से भी इनकार कर रहे हैं।

अफगानिस्तान में चल रही मौजूदा गड़बड़ अमरीका की उपजाई हुई है। अमरीका तर्क दे रहा है कि वह अफगानिस्तान की हमेशा देखभाल नहीं कर सकता और अब वह यहाँ से इसलिए वापस जा रहा है ताकि अफगानिस्तान अपना मुस्तकबिल खुद तय कर सके। यह सीधा-सपाट झूठ है। अमरीका का पहले का दावा भी इतना ही झूठ था कि वे अफगानिस्तान में अमन और जम्हूरियत बहाल करने के लिए आए थे। याद रखिए कि अफगानिस्तान पर अमरीकी कब्जे के चलते उस मुल्क को कितना कुछ झेलना पड़ा और इसके साथ ही यह भी याद रखिए कि अमेरिका ने वापस जाने का फैसला तालिबान से बातचीत के बाद ही लिया। इस समझौते का बहुत कुछ पिछले दरवाजे से सम्भव हुआ पर इसका सार्वजनिक रूप अमरीका-तालिबान समझौता 2020 के रूप में हमारे सामने है। यह समझौता अमरीका की छल-कपट-पाखंड नीति का पर्दाफ़ाश करता है।

दोहा शहर में 29 फरवरी 2020 को हुए इस समझौते का शीर्षक देखिए: "अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए अफगानिस्तान के इस्लामिक शासन, जिसे अमरीका राज्य के रूप में मान्यता नहीं देता और जिन्हें तालिबान कहा जाता है, और अमरीका के बीच में समझौता"। इस समझौते और बातचीत में अमरीका समर्थित अफगानिस्तान की सरकार व वहाँ अमरीका के अन्य सहयोगियों को शामिल नहीं किया गया था। इस समझौते में अमरीकी सैनिकों की वापसी और तालिबान कैदियों को छोड़े जाने की प्रक्रिया पर बातचीत हुई थी। इसी से पता चलता है कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के तत्काल बाद तालिबान सत्ता दखल करने के लिए कैसे तैयार बैठे थे। इस लिए अफगानिस्तान की मौजूदा हालत को ऐसे अमरीका-तालिबान समझौते के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अमरीकियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए तालिबान को अपना विश्वस्त उत्तराधिकारी चुना है।

इस समझौते के मुताबिक़ तालिबान ने सिर्फ इतना 'वादा' किया है कि वह अफगान जमीन को अमरीका व उसके सहयोगियों के खिलाफ किसी आतंकी गतिविधियों के लिए नहीं इस्तेमाल होने देगा। मतलब यह कि अमरीका के लिए आतंकवाद-विरोधी लड़ाई का अर्थ सिर्फ अपने और अपने सहयोगियों की सुरक्षा भर है। 1996 से 2001 तक चला तालिबान शासन घरेलू आतंक तथा महिलाओं, धार्मिक व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर क्रूर हमलों के दौर के साथ ही क्रमबद्ध तरीके से मानवाधिकार व जम्हूरियत के उल्लंघन का भी भयावह दौर रहा है। मानवाधिकार और जम्हूरियत जैसे मूल्यों को कमजोर बनाने वाले अमरीका और उसके सहयोगी आदतन इन मूल्यों को 'पश्चिमी मानक' बताते ही रहते हैं। इन देशों के अफगानिस्तान पर सैन्य कब्जे के मिशन का नाम 'स्थायी शांति ऑपरेशन' — आॅपरेशन एण्ड्योरिंग फ्रीडम — था। पर तालिबान के साथ हुए अमरीका के समझौते में ये तथाकथित पश्चिमी मानक सिरे से गायब हैं।

अफगानिस्तान के मौजूदा हाल के लिए मोदी सरकार भी जवाबदेह है। पिछले सालों में हमें बताया गया कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत बड़ी भूमिका निभा रहा है, वहाँ शांति और स्थायित्व बहाल करने की भारत की कोशिशों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान हासिल हो रही है। अब मोदी सरकार अफगानिस्तान के हालात पर मुँह भींचे बैठी है। सरकार ने अपना काबुल दूतावास तक बंद कर दिया है। भाजपा नेताओं को प्रतिरोध की आवाजों को भेजने की एक और जगह मिल गयी है: 'अफगानिस्तान चले जाओ!' दूसरी तरफ योदी आदित्यनाथ, जिनकी यूपी की सरकार महिलाओं, बच्चों, मुसलमानों, दलितों और सामान्य नागरिकों पर जुल्म ढाने के मामले में बदतरीन और कुख्यात है, भी विधानसभा में घड़ियाली आँसू बहाते हुए अफगान महिलाओं और बच्चों की फिक्र में दुबले हुए जा रहे हैं और तालिबान को कोडवर्ड की तरह इस्तेमाल करते हुए भारतीय मुसलमानों के खिलाफ जहरीला नफरती अभियान चला रहे हैं।  

क्या तालिबान से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह पिछली बार से अलग तरीके से सत्ता चलाएगा? अफगानिस्तान में हम आज जो देख रहे हैं उससे यह तो नहीं कहा जा सकता कि तालिबान सुधर गये हैं, या अब वे उतने खतरनाक नहीं हैं. अफगान महिलाओं, बच्चों और कामगारों के चेहरों पर छपे डर और निराशा के आइने में हम अफगानिस्तान के भविष्य पर मंडराते अनिश्चित और भयावह मुस्तकबिल की झलक देख सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को कम से कम इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनाव के पहले तक एक अंतरिम समावेशी व्यवस्था बनायी जाय, जिसमें गैर-तालिबान ताकतों को भी उचित जगह मिले और फिर जल्दी से जल्दी संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में चुनाव करवाए जाएँ ताकि अफगान अवाम अपना भविष्य तय कर सके। अमरीका, तालिबान का शुरुआत के दिनों में समर्थक रहा है, और आज के दिन भी वह तालिबान के कंधे पर ही हाथ रखे हुए है, ऐसे राजनीतिक हालात अफगानिस्तान की अन्य राजनैतिक शक्तियों और समुदायों के प्रतिकूल हैं। फिर भी हम तालिबानी आतंक और निरंकुशता के खिलाफ अफगानिस्तान में उठती प्रतिरोध की आवाजें सुन पा रहे हैं। अफगानिस्तान के लोगों, खासकर वहाँ की महिलाओं तथा धार्मिक व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को अपने मुल्क में हर व्यक्ति के लिए सुरक्षा, सम्मान और अधिकार की गारंटी करने वाली न्यायपूर्ण शांति के अभियान के लिए दुनिया भर के आजादी-पसंद लोगों का समर्थन और एकजुटता चाहिए।  

अफगानिस्तान की अवाम के समर्थन में भारत में हम तुरंत क्या कर सकते हैं? अव्वल तो पढ़ने या काम पर आए अफगान नागरिकों को उनके मुल्क लौटने को बाध्य न किया जाय, उनका वीजा तब तक के लिए बढ़ा दिया जाय जब तक अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता बहाल नहीं हो जाती। अफगान विद्यार्थियों की फेलोशिप के समय को बढ़ाना होगा, उनके पढ़ाई-वीजा को कार्य-वीजा में बदलना होगा जिससे वे यहाँ नौकरी पा सकें, और उनके खर्च के लिहाज से उन्हें कुछ नियमित आर्थिक मदद करनी होगी। भारत में शरण की तलाश में आने वाले अफगान नागरिकों को बगैर किसी भेदभाव के शरण दी जानी चाहिए। इन हालात ने एकबार फिर साफ कर दिया कि नागरिकता संशोधन कानून कितना विसंगत और विभाजक है, जिसके तहत भारत की नागरिकता के लिए अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम आवेदनों को वरीयता दी जा रही है और ऐसा ही भेदभाव वीजा-आवेदनों के साथ भी हो रहा है। सोशल मीडिया पर तालिबान की सत्ता-वापसी पर खुशी ज़ाहिर करने वाले लोगों को असम में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए जाने की मीडिया रपटें भी सामने आयी हैं। भारत में रहने वाले किसी भारतीय या अफगानी को अफगानिस्तान की राजनैतिक हालात पर राय व्यक्त करने के लिए दंडित करना हमारे मुल्क के भीतर न्याय और मानवाधिकार का हनन है- विडम्बना यह है कि यह सब तालिबान की अराजकता और मानवाधिकार हनन के विरोध के नाम पर किया जा रहा है।

चूँकि यूपी और अन्य कई राज्यों के विधानसभा चुनाव सर पर हैं, इसलिए भाजपा-संघ गिरोह अफगानिस्तान संकट का इस्तेमाल के सहारे मुस्लिम-विरोधी घृणा और हिंसा-अभियान भड़काने की कोशिश में लगा हुआ है। हमने अभी देखा कि विभाजन की विभीषिका को याद करने के बहाने सरकार ने मुल्क की आजादी की 74वीं वर्षगाँठ को विभाजन के जख्म हरे करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसी तरह 'हिंदू और भारत खतरे में है' की अपनी कहानी को और पुख्ता बानाने के लिए वे अफगान संकट का इस्तेमाल करना चाहते हैं। आजादी और भारतीय महिलाओं के अधिकारों के प्रति संघ गिरोह का रवैय्या तालिबान जैसा ही प्रतिगामी है, एवं दानवी कानूनों और न्यायेतर आतंक के मेल से शासन चलाने का उनका तरीका कोई कम निरंकुश नहीं हैं। महिलाओं, बच्चों और मानवाधिकारों के लिए सम्मान के कारण संघ गिरोह, तालिबान का विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि वे इस मौके का इस्तेमाल करके मुस्लिम समुदाय के प्रति और घृणा फैलाना चाहते हैं। अफगानी अवाम के शांति, न्याय और जम्हूरियत की बहाली के अभियान का समर्थन करते हुए हमें अफगानिस्तान की ऐसी हालत के लिए जिम्मेदार अमरीका व भारत सहित उसके सहयोगी देशों को बेनकाब करना होगा और अफगान महिलाओं-बच्चों के नाम पर घड़ियाली आँसू बहा कर मुसलमान-विरोधी घृणा भड़काने के हर प्रयास का डटकर जवाब देना होगा।

(Liberation, Sep. 2021 Editorial)