वर्ष - 28
अंक - 37
31-08-2019

उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन (संबद्ध-ऐक्टू) ने विगत 9 अगस्त से 26 अगस्त तक ‘संगठित रहो-प्रतिरोध करो’ अभियान चलाया. 9 अगस्त को सभी जिला मुख्यालयों व प्रमुख केन्द्रों पर उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजने के साथ यह अभियान शुरू हुआ. अभियान के समापन पर 26 अगस्त को जिला मुख्यालयों पर धरना, प्रदर्शन व रैली निकालने की घोषणा की गई थी. इस घोषणा का पालन करते हुए 26 अगस्त को विभिन्न जिला मुख्यालायों में उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन के बैनर तले आशाकर्मियों ने जोरदार कार्यक्रम आयोजित किए.

हल्द्वानी में महिला चिकित्सालय के सामने से उपजिलाधिकारी कार्यालय तक रैली निकाली गई. रैली को मुख्य रूप से उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष कमला कुंजवाल व प्रदेश महामंत्री, डा. कैलाश पाण्डेय ने संबोधित किया. प्रदर्शन रैली में सरोज रावत, रीना बाला, रिंकी जोशी, प्रीति रावत, भगवती बिष्ट, शांति शर्मा, उमा दरमवाल, बीना उपाध्याय, मीना मटियानी, मनीषा आर्य, ममता आर्य, हंसी बेलवाल, गीता थापा आदि बड़ी संख्या में आशा वर्कर्स मौजूद रहीं.

saldeyरुद्रपुर में गांधी पार्क में धरना दिया गया व कलेक्टरेट तक जुलूस निकालकर जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम विभिन्न मांगों को लेकर ज्ञापन सौंपा गया. वहां गांधी पार्क में हुई सभा को संबोधित करते हुए एक्टू के प्रदेश अध्यक्ष का. निशान सिंह ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार का मजदूर विरोधी रवैया स्पष्ट हो चुका है. जिस तरह से रेलवे, रक्षा, बीमा, बैंक में तेजी से निजीकरण हो रहा है, यह साफ हो गया है कि यह सरकार पूरी तरह से मजदूर विरोधी और पूंजीपतियों की सरकार है. इस सरकार की नीतियों के तहत भाजपा की प्रदेश सरकार भी स्वास्थ्य के निजीकरण की ओर तेजी से बढ़ रही है. आयुष्मान योजना के पक्ष में बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाली भाजपा सरकार की आयुष्मान योजना फेल हो चुकी है. इस योजना के तहत नाम मात्र लोगों को इलाज मिल पा रहा है. सरकारी अस्पताल, अस्पताल भवन, चिकित्सा उपकरण, स्थाई कर्मियों की व्यवस्था करवाने के बजाय आयुष्मान योजना के तहत सारा पैसा कारपोरेट बीमा कंपनियों को दे दिया गया है.

सभा को संबोधित करते हुए उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष रीता कश्यप ने आंध्र प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी आशा कर्मियों को दस हजार रुपए मासिक मानदेय देने का मांग की. यूनियन की जिला अध्यक्ष ममता पानू ने कहा कि आशा वर्कर्स को सरकार कोई मानदेय तो देती नहीं पर उन पर तरह-तरह के फरमान जारी किए जाते रहे हैं. जिला चिकित्सा अधिकारी ने आदेश दिया है कि गर्भवती महिलाओं का प्रसव सरकारी अस्पताल में न कराने पर आशाओं को दंडित किया जाएगा. दूसरी तरफ बदहाल सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था न होने पर गर्भवती महिला के परिजन आशाओं से लड़ाई करते हैं. सरकारी अधिकारी और जनता के बीच आशा वर्कर्स ही पिसती हैं.

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भाकपा(माले) के जिला सचिव आनंद नेगी भी आशाओं के समर्थन में आए. कार्यक्रम में उत्तराखंड वर्कर्स यूनियन की जिला सचिव कुलविंदर कौर व प्रखंड अध्यक्ष मधुबाला, चित्रा चौहान, मीरा पाल, अखिल भारतीय किसान महासभा के राजेंद्र शाह, भाकपा(माले) के ललित मटियाली व विजय शर्मा भी शामिल हुए. प्रदर्शन में मंजू चौहान, कला राणा, मनोज देवी, प्रेमलता, रूपिंदर कौर, माया देवी, गीता सैनी रेखा, रूपा, मंजू, सुधा शर्मा, चित्रा चौहान, स्नेह लता, प्रेमलता आदि सहित सैकड़ों आशा कार्यकर्ता मौजूद थीं.

पिथौरागढ़ में जिलाध्यक्ष इंद्रा देउपा, डीडीहाट में पिंकी, लोहाघाट में चम्पावत जिलाध्यक्ष सरस्वती पुनेठा, रानीखेत-ताडीखेत में मीना आर्य व कमला जोशी, नैनीताल में दुर्गा टम्टा व भगवती बोरा, टनकपुर में लीला ठाकुर, द्वाराहाट में ललिता मठपाल, सल्ट में देवकी, भिक्यासैन में हेमलता व सरस्वती मेहता, स्याल्दे में धना कत्यूरा, अल्मोड़ा में पूजा बगडवाल, धारी-ओखलकांडा में देवकी भट्ट व मुन्नी बिष्ट, बेतालघाट में विमला उप्रेती के नेतृत्व में आशाओं ने प्रदर्शन किया. इन कार्यक्रमों की सपफलता से राज्य की आशा कर्मियों में नया उत्साह पैदा हुआ है.

आशा नेताओं ने कहा

कमला कुंजवाल (उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की प्रदेश अध्यक्ष)

‘‘लंबे समय से न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष कर रही आशाओं को मासिक वेतन के नाम पर एक रुपया भी नहीं मिल रहा है. आशाओं की नियुक्ति मातृ-शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए की गई थी. सरकारी रिपोर्ट्स इस बात के गवाह हैं कि आशाएं अपने काम में सफल रही हैं. इसका इनाम उनपर काम का बोझ लादकर दिया गया है, लेकिन मासिक वेतन देने के नाम पर मोदी सरकार को सांप सूंघ जाता है. उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का बजट कम करके मोदी सरकार ने आशाओं के लिए और संकट पैदा कर दिया है और जनस्वास्थ्य की अवधारणा को पूरी तरह खंडित कर दिया है.’’

कैलाश पाण्डेय (आशा यूनियन के प्रदेश महामंत्री)

‘‘आशाओं ने अब तक जो भी हासिल किया है वह संघर्ष के बल पर हासिल किया है। आगे भी संगठन की मजबूती और संघर्ष का जज्बा ही नयी जीत दिलायेगा. जैसे आंध्र प्रदेश की आशाओं ने लड़कर वहाँ की राज्य सरकार को दस हजार रुपए मासिक मानदेय देने को बाध्य किया है वैसे ही संघर्ष की उत्तराखंड में भी जरूरत है. महिला सशक्तिकरण पर अरबों रुपए विज्ञापन के नाम पर खर्च करने वाली सरकारों का महिला श्रम का इस तरह का शोषण बेहद शर्मनाक है.

‘‘9 अगस्त से 26 अगस्त तक ‘संगठित रहो-प्रतिरोध करो’ अभियान चला जिसकी शुरूआत 9 अगस्त को राज्य के मुख्यमंत्री को पूरे प्रदेश के जिला व प्रखंड मुख्यालयों से ज्ञापन प्रेषित कर किया गया था. सरकार द्वारा इसका कोई भी संज्ञान नहीं लिया गया जो कि काफी अफसोसजनक है. अभियान के समापन के अवसर पर हम एक बार फिर से सभी जिला व प्रखंड मुख्यालयों पर प्रदर्शन के साथ अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को भेज रहे हैं. यदि इसके पश्चात भी मांगें न मानी गई या न्यायसंगत समाधान नहीं किया गया तो आन्दोलन को तेज़ करते हुए अगले चरण में ले जाया जायेगा.’’

 

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आशा का मांग पत्र

‘संगठित रहो, प्रतिरोध करो’ अभियान के समापन पर प्रदर्शन के पश्चात उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को नौ सूत्राी मांगपत्र भेजकर मांग की गई कि –

  1. आंध्र प्रदेश की सरकार की भांति उत्तराखंड सरकार भी दस हजार रूपये प्रतिमाह राज्य मद से आशाओं को देने की घोषणा करे.
  2. आशाओं को दी जाने वाली वार्षिक प्रोत्साहन राशि को पूर्व की भांति आशाओं को दिया जाय.
  3. आशाओं को रिटायरमेंट के बाद पेंशन का प्रावधान किया जाय तथा वर्तमान में रिटायर होने वाली आशाओं को न्यूनतम पांच लाख रु. धनराशि देने की व्यवस्था की जाय.
  4. मासिक मानदेय 2000 रूपये देने की घोषणा संबंधी राज्य सरकार के शासनादेश के अनुरूप पैसा आशाओं के खाते में तत्काल डाला जाय.
  5. आशाओं की विभिन्न मदों की बकाया राशि का तत्काल भुगतान किया जाय.
  6. सभी सरकारी अस्पतालों में महिला व बाल रोग विशेषज्ञ, सर्जन की नियुक्ति की जाय, जिससे मातृ-शिशु सुरक्षा सुनिश्चित हो सके तथा जनता को स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए प्राइवेट अस्पतालों में न भटकना पड़े. साथ ही सभी सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड व ब्लड टेस्ट की अनिवार्य व्यवस्था की जाय जिससे अल्ट्रासाउंड व ब्लड टेस्ट के लिए आम लोगों और गर्भवती महिलाओं को परेशानी का सामना न करना पड़े.
  7. अस्पतालों में आशा वर्कर्स के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाय, इसके लिए राज्य सरकार की ओर से आदेश जारी कर सभी अस्पतालों में भेजा जाय.
  8. सभी सरकारी अस्पतालों में आशा घरों का निर्माण किया जाय. जहाँ-जहाँ आशा घर बन गए हैं उन्हें रात बिरात गर्भवती महिलाओं को लेकर आने वाली आशाओं के विश्राम हेतु खोला जाय व आशा घरों की समुचित सफाई की व्यवस्था की जाय.
  9. सभी आशाओं की ट्रेनिंग स्वास्थ्य विभाग द्वारा ही करायी जाय तथा ट्रेनिंग के दौरान पहले 350 रुपये प्रतिदिन का भुगतान आशाओं को दिया जाता था, अब 150 रु. प्रतिदिन कर दिया गया है. इसको पुनः 350 रू. किया जाय.