वर्ष - 32
अंक - 18
29-04-2023

इस बार दंगा बहुत बड़ा था 
खूब हुई थी 
खून की बारिश 
अगले साल अच्छी होगी
फसल 
मतदान की.

वर्षों पूर्व क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने दूरदृष्टि के साथ उक्त पंक्तियां लिखी थीं. रामनवमी के मौके पर बिहार में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर तोड़-फोड़, लूटपाट, आगजनी और हिंसा की सुनियोजित घटनाओं ने गोरख की उक्त पंक्तियों के अर्थ और घटना को अंजाम देने वालों की निर्लज्ज्ता को पूरी बेबाकी से प्रकट किया. ऐसे तो पूरे बिहार में सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की साजिशें रची गईं, लेकिन बिहारशरीफ और सासाराम सर्वाधिक प्रभावित हुए. रामनवमी को संघ-भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने फासीवादी हिंसक अभियान का राजनीतिक हथियार बना डाला है जो दिन-प्रतिदिन और भी हिंसक बनता जा रहा है. यह बेहद चिंताजनक है. धार्मिक उत्सवों में हथियारों का बढ़ता इस्तेमाल भारत में सांप्रदायिक फासीवादी उन्माद और आक्रामकता की एक मुख्य विशेषता है.

बिहारशरीफ में  मुस्लिम समुदाय की न केवल दुकानें लूटी और जलाई गईं, बल्कि ऐतिहासिक अज़ीज़िया मदरसा और पुस्तकालय को जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया गया. सोगरा काॅलेज को भी क्षतिग्रस्त किया गया. अज़ीज़िया मदरसे की स्थापना अब तक गुमनामी के अंधेरे में रहती आई है. राज्य की संभवतः पहली मुस्लिम महिला शिक्षाविद बीबी सोगरा द्वारा अपने पति मौलवी अब्दुल अज़ीज़ की याद में इसकी स्थापना की गई थी. मौलवी अब्दुल अज़ीज़ औपनिवेशिक सरकार की नौकरी छोड़कर 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे. सावित्री बाई फुलेे और फातिमा शेख की तरह बीबी सोगरा भी महिला शिक्षा के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं.

113 साल की सुनहरी तारीख़ लिए मदरसा अज़ीज़िया को जलाकर नष्ट कर दिया गया गया. तकरीबन 4700 धर्मग्रंथ और पुस्तकें जलकर नष्ट हो गईं. यह वह मदरसा है जहां कुरान, हदीस, फिकह के साथ-साथ मांतिक, फलसफा, तिब और साथ ही हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, गणित, भूगोल आदि की भी पढ़ाई होती है. बस्तानिया से फाजिल तक की डिग्री दी जाती है. पटना के शमसुल होदा की तरह आदर्श माने जाने वाले इस मदरसे को कुछ घंटों में नष्ट कर दिया गया.

प्रसंगवश यह बताना जरूरी है कि प्राचीन काल में भारत में शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में एक सर्वथा गलत लेकिन बेहद प्रचलित मान्यता रही है कि इस्लामिक आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया था. इतिहास के स्रोत इसकी गवाही नहीं देते. मुस्लिम आक्रमण की यह पूरी कहानी मिन्हाज-उस-सिराज के ‘तबकात-ए-नासिरी’ के आधार पर आधे-अधूरे ढंग से बुनी गई है. हकीकत यह है कि बख्तियार खिलजी बिहारशरीफ से नालंदा कभी गया ही नहीं, बल्कि वह झारखंड की पहाड़ियों से होते हुए बंगाल के नदिया चला गया. तिब्बती लोककथाओं से इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि नालंदा में ब्राह्मणों और बौद्धों के बीच चल रही लंबी दुश्मनी के परिणामस्वरूप नालंदा महाविहार को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया था. ऐतिहासिक स्रोत यह बताते हैं कि इस महाविहार का विध्वंस बख्तियार के आक्रमण के करीब सौ साल पहले हो चुका था. इससे पहले, मगध के पहले ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग द्वारा नालंदा के बौद्ध विहारों पर हमले के स्पष्ट प्रमाण इतिहास में उपलब्ध हैं. मदरसे पर हमले को सांप्रदायिक गिरोह ने नालंदा महाविहार के बदले के रूप में प्रचारित किया और हिन्दूवादी उन्माद फैलाने की कोशिश की.

बहरहाल, इतिहास का प्रसंग चाहे जो हो मदरसा पर हमला धर्मनिरपेक्ष भारत की बुनियाद पर हमला है. यह केवल एक मदरसे पर नहीं बल्कि देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, अल्पसंख्यकों की पहचान और शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र पर सचेत भगवा हमला है. यह इस बात की भी पुष्टि है कि फासीवादी गिरोह सबसे पहले शिक्षा के केंद्र को ही निशाना बनाता है और उसके इतिहास को मिटाने की कोशिश करता है. केंद्र की मोदी सरकार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा देती है, लेकिन उसकी विध्वंसक विचारधारा शैक्षणिक केंद्रों को सबसे पहले अपने  हमले का निशाना बनाती है.

उन्माद-उत्पात की इन घटनाओं में भाजपा मुस्लिम समुदाय के खिलाफ दलित-अतिपिछड़े-पिछड़े समुदाय के बेरोज़गार युवकों को सचेत रूप से आगे करके हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ देने का प्रयास कर रही है. उसके हिंदू राष्ट्र के प्रोजेक्ट में सदियों से इस देश में कायम गंगा-जमुनी तहज़ीब सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए उसका हमला राजनैतिक-सामाजिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक सभी स्तरों पर है.

ठीक, इसी जगह हमें बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की वह चेतावनी याद आती है जब उन्होंने कहा था कि यदि भविष्य में यह देश धर्म के नाम पर कभी हिन्दू राष्ट्र की बात करेगा तो यह हमारे लिए सबसे बड़ी विपत्ति साबित होगा और यह समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले लोगों के लिए बेहद खतरनाक होगा. भारत को हिंदू राष्ट्र बना देने का भाजपा का आह्वान, दरअसल सदियों से जारी उत्पीड़नकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बनाए रखना है. भाजपा मुस्लिम समुदाय को अधिकारहीन दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर देश में दलितों की एक नई श्रेणी पैदा करना चाह रही है. यह वही भाजपा है जो देश के संविधान का हर दिन उल्लंघन करती है, आम नागरिकों के अधिकारों पर हमले करती है और शिक्षा-रोजगार से लेकर दलितों-पिछड़ों के आरक्षण को खत्म करने की हर रोज नई साजिशें रचती है. यह वही भाजपा है जो भारत को अंबानी-अडानी का देश बना देना चाहती है. इसलिए आज न सिर्फ दलित और मुसलमानों को एकताबद्ध होकर भाजपा के खिलफ लड़ने की जरूरत है, बल्कि संविधान व लोकतंत्र की रक्षा के हिमायती और समाज में अमन-चैन व न्याय चाहने वाले तमाम नागरिकों को भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर उठ खड़ा होने की जरूरत है.

बिहारशरीफ में रामनवमी की आड़ में बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद, आरएसएस और भाजपा द्वारा सुनियोजित तरीके से हिंसा भड़काने और मदरसे को नष्ट कर देने की कार्रवाई ने पूरे देश को चिंतित किया है. फासीवाद के हमले के खिलाफ संघर्ष के जिस बिहार माॅडल से देश को उम्मीदें पैदा हो रही थीं, इससे थोड़ा धक्का जरूर लगा होगा. लेकिन यह भी सच है कि भाजपाइयों की यह साजिश बड़े स्तर पर कामयाब नहीं हो सकी, जैसा वे चाह रहे थे. बिहारशरीफ के लोग 1981 के सांप्रदायिक उन्माद को अब भी याद रखे हुए हैं और उसे महज याद कर सिहर उठते हैं. उस वक्त सांप्रदायिक उन्माद अपने चरम पर था. बिहारशरीफ के सभी मुहल्ले उस उन्माद की चपेट में आ गए थे और उसका विस्तार दूर-दराज के गांवों तक हो चला था. फासिस्ट संगठन लाख कोशिशों के बावजूद भी 1981 नहीं दुहरा सके. शहर के कुछ ही इलाके उन्माद की चपेट में आए. गांवों तक अपना विस्तार नहीं कर पाए. सामाजिक स्तर पर भी उन्हें वह समर्थन नहीं मिला जो 1981 में मिला था. यह राहत देने वाली बात है.

अगर हम इस वर्ष की रामनवमी हिंसा के पीछे भाजपा की चुनावी चाल को समझना चाहें, तो इसे अमित शाह के वक्तव्य से साफ-साफ समझा जा सकता है. यह महज संयोग नहीं हो सकता कि देश के गृह मंत्री अमित शाह की एक अप्रैल को सासाराम और 2 अप्रैल को बिहारशरीफ से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित नवादा में सभाएं पहले से आयोजित थीं. अमित शाह के वक्तव्यों से ऐसा लगता है कि बेहद सोच-समझकर उनके कार्यक्रमों की प्लानिंग बनाई गई थी. बहरहाल, सासाराम में तो उनकी सभा नहीं हो सकी लेकिन नवादा की सभा में बोलते हुए उन्होंने जोरदार चुनावी आह्नान किया: ‘2024 में हमें सभी 40 सीटें देकर मोदीजी को पुनः वापस लाइये और 2025 के विधानसभा चुनाव में हमें स्पष्ट बहुमत दीजिये, और हम तमाम दंगाइयों को उल्टा लटका कर सीधा कर  देंगे’! यह उनका कोडवर्ड है. उन्होंने गुजरात की ‘मुर्दा शांति’ की भी याद दिलाई, जहां 2002 में राज्य प्रायोजित जनसंहार के जरिए मुसलमानों को कुचल दिया गया था. रामनवमी की घटना और श्री अमित शाह के बयान से स्पष्ट है कि बिहार को अस्थिर करके वोटों के ध्रुवीकरण के लिए भाजपा किसी भी हद तक जा सकती है. बिहार की सत्ता से बेदखली के बाद वह पहले से ही बौखलायी हुई है.

बिहार ने इसके पहले शायद कभी भी इतनी स्पष्ट जनसंहारी धमकी और सांप्रदायिक हिंसा के आधार पर वोट मांगने का इतना सीधा आह्नान नहीं सुना था. बिहार ने 1990 में आडवानी के दंगा रथ को रोका था, 2002 के जनसंहार के बाद 2004 में बिहार ने केंद्र में भाजपा सरकार को हराने के लिए स्पष्ट वोट दिया था, अभी हाल में 2020 के विधानसभा चुनाव में दक्षिण बिहार ने भाकपा;मालेद्ध और इसके संश्रयकारी राजद के पक्ष में भारी मतदान किया था और सामंती-सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति को खारिज कर दिया था. बिहार को एक बार फिर इस सांप्रदायिकता-विरोधी विरासत की दावेदारी करते हुए सांप्रदायिक फासीवादी हमले की संघी-भाजपाई मुहिम को ठुकराना होगा. बिहार उन्माद-उत्पात, नफरत-विभाजन और शैक्षणिक केंद्रों को नष्ट करने की विध्वंसकारी राजनीति को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेगा.