वर्ष - 32
अंक - 18
29-04-2023

31 मार्च को बिहारशरीफ में सांप्रदायिक उन्माद-उत्पात की घटना ने सबको चौंकाया. अगले ही दिन भाकपा-माले की एक उच्चस्तरीय जांच टीम वहां के दौरे पर थी. टीम में माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, फुलवारी विधायक गोपाल रविदास, कुमार परवेज, नालंदा जिला सचिव सुरेन्द्र राम, स्थानीय पार्टी नेता पाल बिहारी लाल, नसीर साहब सहित कुछ स्थानीय पार्टी नेता-कार्यकर्ता शामिल थे. बिहारशरीफ पहुंचने वाली यह पहली टीम थी. 9 अप्रैल को मामले की गहन जांच-पड़ताल के लिए एक बार फिर ऐपवा व भाकपा-माले की टीम बिहारशरीफ पहुंची. इस टीम में ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, राज्य सचिव शशि यादव, विधायक गोपाल रविदास, आफ्ऱशा जबीं, अनिता सिन्हा, आरिप़फा और जूही निशां शामिल थे. टीम को धारा 144 का हवाला देकर प्रशासन ने प्रभावित इलाकों का दौरा ही नहीं करने दिया. बाद में स्थानीय लोगों की मदद से जांच टीम के दो सदस्यों कुमार परवेज और मनमोहन कुमार ने लोगों से बातचीत और छापेमार तरीके से प्रभावित इलाकों का दौरा करके मामले के संभव हो सके पहलुओं की जांच की.

पीड़ितों के बीच सबसे पहले पहुंची भाकपा-माले

एक अप्रैल को बिहारशरीफ रवाना होने के पहले जांच टीम ने इसकी सूचना फोन से एसपी अशोक कुमार मिश्रा को दी. एसपी ने कहा कि जांच टीम दो-चार दिन बाद आए, तो अच्छा रहेगा. अभी आने की जरूरत नहीं. लेकिन एसपी की बात अनसुनी करके जांच टीम बिहारशरीफ पहुंच गई. जैसे ही टीम बिहारशरीफ के गगन दीवान (जहां से घटना की शुरूआत हुई थी) पहुंची; कमिश्नर, डीएम व एसपी के नेतृत्व में प्रशासन की गाड़ियां वहां से गुजरीं. उनके जाने के बाद टीम ने अपना काम शुरू किया.

आधिकारिक तौर पर कर्फ्यू की घोषणा नहीं थी, लेकिन माहौल लगभग वैसा ही था. इंटरनेट सेवा बंद थी. सड़कों पर पुलिस की गश्त थी. इक्का-दुक्का लोग ही सड़क पर दिख रहे थे, जिन्हें पुलिस बेवजह परेशान कर रही थी. हम सब गगन दीवान (बिहारशरीफ) पहुंच चुके थे. चारो तरफ सन्नाटा पसरा था. जूते-चप्पल बिखरे पड़े थे. गगन दीवान स्थित मस्जिद की ओर बढ़े. मुअजि़्ज़न (मस्जिद में अज़ान देने वाला) से मुलाकात हुई. उनसे पहले मस्जिद के एक कमरे में फेरी लगाने वाले कुछ बाहरी मजदूर भी मिले. सब के सब बेहद भयभीत थे. हमने उन्हें आश्वासन दिया कि हम पुलिस के नहीं, भाकपा-माले के लोग हैं. उन्होंने हमें मस्जिद के ऊपर जाने का रास्ता बताया. मस्जिद के मुअजि़्ज़न 31 मार्च की घटना के बारे में बताने लगे. कहा कि जब रामनवमी का जुलूस निकल रहा था, डीजे की आवाज बहुत ऊंची और कानफाड़ू थी. हम सबने प्रशासन से जाकर इसकी शिकायत की. डीजे रूका नहीं, उलटे भगदड़ मच गई और पत्थरबाजी शुरू हो गई. दंगाई मस्जिद के अहाते तक पहुंच गए थे. बातचीत के क्रम में पता चला कि देर रात पीछे के मुस्लिम मुहल्ले में पुलिस की रेड पड़ी है. कुछ लोग गिरफ्तार किए गए हैं. हम उधर चल दिए. घर के बाहर महिलाएं-बच्चे और कुछ बुजुर्ग बैठे थे. सबके चेहरे पर उदासी थी. देर रात पुलिस ने कई नौजवानों को उठा लिया था. सब के सब गरीब परिवार के हैं और मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन चलाते हैं. महिलाओं ने भाकपा-माले विधायक दल के नेता महबूब आलम और फुलवारी शरीफ के विधायक गोपाल रविदास को घेर लिया और 31 मार्च की रात घटित पुलिस दमन की बर्बर घटना रो-रोकर सुनाने लगीं. उनके बीच पहुंचने वाली यह पहली टीम थी.

31 मार्च की शाम 5 बजे से शुरू हुआ तांडव कई घंटे चलता रहा. जबतक तांडव चलता रहा, पुलिस गायब ही रही. तांडव थमने के बाद पुलिस ने कहर बरपाना शुरू किया. निर्दोष मुस्लिम युवकों की ही गिरफ्तारियां शुरू हुईं. उप्रदव की शुरूआत एक मामूली सवाल से हुआ, लेकिन इसके पीछे एक जबरदस्त सुनियोजित साजिश रची गई थी. एक महीने से इसकी तैयारी किसी न किसी रूप में चल रही थी. आज से कुछ साल पहले रामनवमी एक सामान्य त्योहार सा था. वह आता और चला जाता था. पता भी नहीं चलता था, लेकिन अब उसके आयोजनों की बाढ़ सी आ गई है. आक्रामकता काफी बढ़ गई है. बड़ी-बड़ी शोभायात्राएं निकाली जाती हैं. हाथों में तलवार लिए लोग सड़क पर निकलते हैं. मकसद सिर्फ एक होता है - मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल बनाना. राजधानी पटना से लेकर हर कहीं इस बार ऐसा ही नजारा दिखा. जाहिर है कि ऐसे नकारात्मक बदलाव अपने आप नहीं हुए. बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा ने बेहद चालाकी से रामनवमी को एक आक्रामक और उन्माद फैलाने वाले त्योहार में बदल दिया है, जिसमें दलित-पिछड़ी जाति के युवाओं और महिलाओं को व्यापक पैमाने पर बेहद सोच-समझकर शामिल करवाया जाता है. इसके जरिए एक दंगाई दिमाग बनाने का संगठित अभियान चलाया जा रहा है. इस बार उनके निशाने पर बिहारशरीफ और सासाराम था.

रात के तीन बजे मुस्लिम मुहल्ले में पुलिस दमन

गगन दीवान के ठीक पीछे जब लोग सेहरी करने जा रहे थे, पुलिस ने गरीब मुसलमानों के मुहल्ले में रात के अंधेरे में दमन अभियान चलाया. सेहरी के बाद उन्हें रोजा रखना था. 31 मार्च की रात लगभग तीन बजे पुलिस आ धमकी. महिलाओं ने 13 से 20 साल तक के उम्र के 11 मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी से हमें अवगत कराया. मुहल्ले में उस वक्त दहशत का माहौल था. उनके घरों में बुरी तरह से तोड़-फोड़ हुई थी. खाना पलटा हुआ था. बच्चे तब से भूखे ही थे.

रेहाना खातून बताने लगीं- आधी रात के बाद पुलिस हमारे घरों का दरवाजा पीटने लगी. डर से हमने दरवाजा नहीं खोला. तब पुलिस सीढ़ी के जरिए हमारे छप्पर पर चढ़ गई और घर में घुस गई. उस वक्त घर में जो भी नौजवान थे, उन्हें पकड़कर लेती गई. दरवाजों पर पुलिस के जूतों के निशान उस वक्त भी मौजूद थे. उनके परिवार के चार युवकों मुस्तकिम, मो. साहिद, सन्नी और वीरू को पुलिस उठा ले गई. ये लोग रिक्शा चलाकर और छोटी-मोटी मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं. नाम पूछ-पूछ कर सबको उठाया गया. जिसने भी अपना नाम बताया उसपर एफआइआर दर्ज कर दिया गया. कहने लगीं - हमारे बाल-बच्चे सेहरी तक भी नहीं कर सके.

70 वर्षीय मेहरू निशां ने हमें अपना घर दिखलाया. शौचालय के टीन के बने दरवाजे को तलवार से काट दिया गया था. एस्बेटस की छतों को जगह-जगह नुकसान पहुंचाया गया था. चूल्हे पर चढे़ खाने को उलट-पलट दिया गया. घर में आग लगाई गई. लड़कियों के साथ बदतमीजी की कोशिशें की गईं. बगल में ढीलन ट्रांसपोर्ट, जिसमें लाखों का सामान था, उसे आग के हवाले कर दिया गया. इसे उनका बेटा भाड़ा पर चलाता था. पूरा ट्रक जलकर राख हो गया. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई गई. मतलब यह कि उन्माद फैलाने की पूरी सुनियोजित तैयारी थी. बगल में ही एक ऑटो रिक्शा व बाइक को भी आग के हवाले कर दिया गया. हमला इतना तीखा व अचानक था कि लोग घर छोड़कर भाग खड़े हुए.

एक माह से चल रही थी तैयारी

31 मार्च 2023 को घटित सांप्रदायिक उन्माद के प्रत्यक्षदर्शी अनिल पटेल ने घटना को सिलसिलेवार सुनाया. श्रम कल्याण मैदान से रामनवमी की शोभायात्रा निकलने वाली थी. हाॅस्पीटल मोड़, भराव पर, लहेरी थाना, गगन दीवान, सोगरा काॅलेज होते हुए इस जुलूस का रूट मनीराम के अखाड़े तक तय किया गया था. लहेरी थाना के दक्षिण-पश्चिम कोने पर लगभग सौ मीटर की दूरी पर मदरसा अज़ीज़िया और मुरारपुर का मस्जिद है. यहां पर मुस्लिम आबादी विरल है लेकिन उसके बाद काफी सघन है. गगन दीवान के पास एक बड़ा कब्रिस्तान तथा एक बड़ी मस्जिद है. यही इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ. इसके बाद सोगरा काॅलेज आता है और फिर बड़ी दरगाह का इलाका. रामनवमी के जुलूस के रूट को समझ लेना बेहद जरूरी है. क्योंकि लहेरी थाना लगभग बीच में है और यदि प्रशासन सक्रिय होता तो इतनी बड़ी हिंसा होती ही नहीं.

वे बताते हैं कि 31 मार्च को तलवार, गड़ांसा, भाला, लाठी लेकर रामनवमी शोभायात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. मुंह पर गमछा बांधे मोटरसाइकिल सवार का जत्था एक किलोमीटर के दायरे तक मुस्लिम विरोधी नारे के साथ लगातार सड़क को रौंदता रहा, जिसके कारण दहशत की स्थिति पैदा हो गई थी. जो नारे लग रहे थे, बेहद आपत्तिजनक तथा भड़काऊ किस्म के थे. पहले से ही आभास हो रहा था कि आज जरूर कुछ होने वाला है. दूसरी ओर, उद्योग भवन में जिलाधिकारी के नेतृत्व में शांति समिति की बैठक हो रही थी. एक तरफ बैठक हो रही थी और दूसरी ओर श्रम कल्याण मैदान में हजारों लोग जुट चुके थे. ताज्जुब होता है कि प्रशासन कौन सी बैठक कर रहा था? इतने बड़े जुलूस को पास करवाने का कोई खाका ही उसके पास नहीं था. प्रशासन ने दो बजे से जुलूस निकालने का परमिशन दिया था.

बहरहाल, इसी परिस्थति में रामनवमी शोभायात्रा का मुख्य जुलूस निकला. लगभग साढ़े पांच बजे गगन दीवान के पास गड़बड़ियों की खबर मिली. आगे बढ़ा तो देखा कि डिजीटल दुनिया पर पत्थर चल रहा है और उसका शटर तोड़ा जा रहा है. एशिया होटल के मालिक ने सहयोग मांगा. उनपर ईंटें चल रही थीं. वहां पर 600-700 की संख्या थी. जुलूस बिखर चुका था और चारो तरफ तोड़-फोड़ हो रहा था. मोटरसाइकिलों पर भगवा झंडे बंधे हुए थे. लोग सामान लूटकर ले जा रहे थे. एक मोटरसाइकिल पर 80 ईंच वाला टीवी लेकर उन्मादी भागे जा रहे थे. पुलिस कही नहीं थी. दुकानें लूटने के चार घंटे बाद पुलिस पहुंची. मुहल्ले की बदनामी न हो इसलिए हमलोगों ने प्रतिकार किया. 80 प्रतिशत लोग बाहर के थे. सामान लूटकर अधिकांश बड़ी पहाड़ी की ओर गए. पूरे शहर में होर्डिंग लगवाए गए थे, बड़े-बड़े झंडे लहराए गए और अयोध्या बनाएंगे के नारे लगाए जा रहे थे. 30 मार्च को धनेश्वर घाट के मंदिर में 51 फीट का झंडा फहराया गया. इसमें भाजपा विधायक डाॅ. सुनील सिंह शामिल हुए थे.

वे आगे बताते हैं कि इसकी तैयारी एक माह से चल रही थी. एक माह पहले की वे एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि बजरंग दल वालों ने सड़क को गैरकानूनी तरीके से जाम करके एक बड़ा कार्यक्रम किया. पुलिस ने उसका विरोध किया, लेकिन बाद में डीएम व एसपी के दबाव में थानाप्रभारी को बजरंग दल वालों से माफी मांगनी पड़ी. इस कारण उनका मनोबल काफी बढ़ा हुआ था.

आम तौर पर माना जा रहा है कि मदरसा अज़ीज़िया में सबसे बाद में आग लगाई गई, लेकिन एडवोकेट सरफ़राज़ बताते हैं कि मदरसा अज़ीज़िया और मुरारपुर मस्जिद को पहले ही निशाना बनाया गया. सच चाहे जो हो, इतना तय है कि लहेरी थाना को, जो मदरसा अज़ीज़िया के काफी नजदीक है, मदरसा जलाए जाने की खबर काफी देर से मिली. इससे थाने की मिलीभगत का संदेह होता है. आखिर थाना कर क्या रहा था? एक दिन पहले बजरंग दल वालों ने माइक से प्रचार करवाया था कि सभी लोग अपने-अपने घर पर भगवा झंडा बांधे. इससे संभवतः दुकानें चिन्हित हो गई थीं और उन्मादियों को दुकानें लूटने में सहूलियतें हुईं. करीब 31 छोटे-बड़े प्रतिष्ठानों पर हमले हुए और उन्हें जलाया गया. 7 अप्रैल को चोरा बगीचा में एक बार फिर दुकानों पर हमले की खबरें मिली. 31 में तीन दुकानें हिन्दू समुदाय की भी हैं.

खुद को बचा लिया, मदरसा जल कर राख हो गया

जांच टीम ने एक अप्रैल को ऐतहासिक मदरसा अज़ीज़िया और सोगरा काॅलेज का भी दौरा किया. मुस्लिम समुदाय की दुकानों को लूटने और उनमें आग लगाने की घटनाओं को तो अंजाम दिया ही गया, 113 साल पुराने अज़ीज़िया मदरसे को खासकर निशाना बनाया गया. उसे पूरी तरह आग के हवाले कर दिया गया. रमजान का महीना होने के कारण वह बंद था. 31 मार्च की रात में आग लगाई गई थी, लेकिन एक अप्रैल की देर शाम तक मदरसे से धुआं निकल ही रहा था. इसका मतलब है कि जानकारी हो जाने के बाद भी प्रशासन की ओर से मदरसे को बचाने की कोई कोशिश नहीं की गई.

मुरारपुर मस्जिद के इमाम मो. सियाउद्दीन बहुत दुखी होकर कहते हैं - ‘ हमने खुद को तो बचा लिया लेकिन मदरसे को नहीं बचा पाए. 4700 इस्लामिक कल्चर, धर्म और संस्कृति व हस्तलिखित पांडुलिपियां अब राख के ढेर में बदल गई हैं. सारे कागजात जला दिए गए. मदरसा में आग लगाए जाने के लगभग 2 घंटे बाद पुलिस पहुंची, तबतक आग काबू से बाहर हो चुकी थी. सबकुछ हमारी आंखों के सामने खत्म हो गया.’ उनकी निगाहें जले हुए मदरसे को देर तक निहारती रहीं.

इमाम आगे कहते हैं - मैं 31 मार्च की घटना का प्रत्यक्षदर्शी हूं. रामनवमी का जुलूस मदरसा व मस्जिद के बगल से ही गुजर रहा था. ये दोनों इमारतें गगन दीवान से कुछ ही दूरी पर हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि मदरसे को जानबूझकर टारगेट किया गया.

प्राचार्य शमीम इमाम कासिमी ने बताते हैं - 10 टीचर और 2 नन टीचिंग स्टाफ काम कर रहे हैं जिन्हें बिहार सरकार से सैलरी मिलती है. 5 स्टाफ को सोगरा वक्फ स्टेट सैलरी देती है. 18 कमरों और 3 एकड़ में फैले हुए इस मदरसे में 500 छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान के कारण इसे देश-विदेश में ख्याति प्राप्त है और इसे संयुक्त राष्ट्र संघ से भी अनुदान मिला करता है. एक भी किताब बचाई नहीं जा सकी. हमारे पास उसकी स्कैन काॅपी भी नहीं है. यह न केवल नालंदा बल्कि पूरे बिहार के लिए बड़ा नुकसान है.

investigation team
लूटने व जलाने का दिखा सुनियोजित पैटर्न

दुकानों को लूटने व जलाने की पद्धति बेहद सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करती है. सभी दुकानें बंद थीं. पहले बिजली का कनेक्शन काटा गया, सीसीटीवी कैमरे को फोड़ दिया गया, जेनरेटर जलाए गए और फिर ताला काटकर दुकानों में आग लगाई गई. हमलावरों को यह पता था कि डीवीडी कहां है. ताला को बहुत प्रोफेशनल तरीके से काटा गया. मतलब वे पहले से ताला काटने का औजार लेकर आए थे. एशिया होटल राजद का अघोषित कार्यालय है. उसी प्रकार सिटी पैलेस जदयू के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के नेता का है. इन्हें खासकर निशाना बनाया गया.

एक महीने से चल रहे इस अभियान में करोड़ों का खर्च किया गया. हिलसा, इसलामपुर, सरमेरा, अस्थावां, शेखपुरा, पटना से भी लोग शामिल हुए. इसकी जांच हो तो सब पता चल जाएगा. चार हजार तलवार के साथ जुलूस निकला. सबका साइज व डिजाइन एक सा था. जिला प्रशासन उसके सप्लायर को एक मिनट में पकड़ सकती है. इसके पूर्व जब भी जुलूस निकलता था, उसके लिए प्रशासन लहेरी से सोगरा काॅलेज तक भारी पुलिस बंदोबस्ती करता था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था. जिला प्रशासन की भूमिका संदिग्ध है. दंगाइयों को दंगा करने का मौका दिया गया. गगन दीवान के पास महज 2-4 महिला पुलिसकर्मी थे.

मुहल्लेवासी उतरे बचाव में

डिजीटल दुनिया को पूरी तरह से लूूटने से बचा लिया गया. इसमें वार्ड पार्षद उमेश जी और सत्यप्रकाश की भूमिका सराहनीय रही. उन्होंने उप्रदवियों को रोका. उनके प्रयास से आसपास के 10-15 लोग और जुटे. उनलोगों ने सामान वापस करवाया, अन्यथा लूट की घटना और भी बड़ी होती. मुरारपुर मस्जिद और उसके अंदर इमाम व उनके परिजनों को बचाने में भी स्थानीय लोगों ने पहलकदमी दिखलाई. हालांकि उन्मादियों ने मस्जिद पर भगवा झंडा लहरा दिया था. मस्जिद के अहाते में टेलरिंग, गोदाम और अन्य छोटी-छोटी दुकानों को पूरी तरह जला दिया गया. एडवोकेट सरफ़राज़ पर हमले किए गए. उन्हें भी स्थानीय लोगों ने बचाया. उस जगह पर सिर्फ उनका ही घर है. उन्हें बचाने के लिए चार-पांच लोग जान पर खेल गए. उन्होंने कहा कि हम सैकड़ों बरस से साथ रह रहे हैं, इसलिए कोई आंच नहीं आने देंगेे. यदि लोकल लोग विरोध में नहीं उतरते तो इमाम साहब की हत्या कर दी जाती. इतनी बड़ी घटना के बाद भी मुहल्ले के लोग शांति से रह रहे हैं. उनमें कोई आपसी वैमनस्य नहीं था.

उकसावे के बावजूद मुस्लिम समुदाय ने दिखाया धैर्य 

घटना के एक दूसरे चश्मदीद एडवोकेट सरफ़राज़ हमें बताते हैं कि प्रशासन की भूमिका ठीक नहीं रही. एशिया होटल के मालिक तारिक भाई को पुलिस ने एफआईआर के लिए तीन दिन तक दौड़ाया. पहले लिया, उसे फाड़ दिया और फिर लिया. वे बताते हैं कि शोभायात्रा के आगे-आगे डीएम-एसपी और बीडीओ थे. बवाल जब बढ़ा तो प्रशासन सिरे से पंगु बन गया और उसने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. हालांकि प्रशासन ने उस वक्त गोली न चलाने का फैसला लेकर अच्छा ही किया वरना बहुत लोग मारे जाते. सीओ का दावा है कि चौदह राउंड हवाई फायरिंग की गई.

डाॅ. सरफ़राज़ का घर गगन दीवान के पास ही बसे मुस्लिम मुहल्ले में है. 31 मार्च को उस मुहल्ले में एक मौत हो गई थी, इसलिए उनलोगों को गगन दीवान जाना ही था. वरना सब लोगों ने निर्णय किया था कि घर के अंदर ही रहेंगे. उस दिन जुम्मा था. वे कहते हैं कि आज कल रामनवमी में ऐसी दहशत होती है कि हमलोग घर पर रहना चाहते हैं. जनाज़ा निकालने की बात एक बजेे के बाद तय हुई. उस वक्त शोभायात्रा निकली नहीं थी, लेकिन जब हम गगन दीवान वाले रोड में पहुंचे तो वहां लोगों की भारी भीड़ थी. हमलोगों को आभास हो रहा था कि इतनी बड़ी भीड़ है, कहीं कोई अप्रिय घटना न हो जाए. इसलिए एहतियातन जनाज़ा लेकर हमलोग गगन दीवान के सबसे आगे की छोर पर चले गए. हम देख रहे थे कि बजरंग बली के लोग लगातार तलवार व झंडा लेकर आ जा रहे हैं और जय श्री राम का भारी शोर कर रहे हैं. आभास हुआ कि आज की स्थिति ठीक नहीं है. सारी दुकानें बंद थीं. अधिकांश लोग घर के अंदर थे. कुछ महिला पुलिसकर्मी बैठी हुई थीं. बीडीओ साहब थे. एक दो पुलिसकर्मी और दिखलाई दे रहे थे. कितना अजीब है, मजमा आने वाला है और पुलिस का ऐसा रवैया, यह सब हमें हतप्रभ करने वाला था. अचानक पौने छह बजे एकदम हंगामा हुआ. पत्थरबाजी होने लगी. हमलोग अपने मुहल्ले के लड़कों को रोक रहे थे कि रोड पर न जाएं. हमारे मुहल्ले के कुछ लोग सड़क पर ही फंस गए थे. मुफहिद इसलाम अंजुमन नामक एक संगठन है, जो लोगों के बीच सेवा का काम करता है. प्रशासन द्वारा बनाई गई पीस कमिटी में उसके लोग शामिल थे. उपद्रवियों ने उन सब पर भी हमला कर दिया. उनलोगों की जबरदस्त पिटाई हुई. पता चला कि गगन दीवान के पास रोड के उस पार मंदिर के पास पहुचंते-पहुंचते हंगामा हुआ. सारा जुलूस लगभग निकल गया था लेकिन जुलूस का अंतिम हिस्सा आक्रामक हो गया. यह जत्था पहड़पुरा और अयोध्यानगर का था. (विदित हो कि उपद्रव में यहीं के लोग मूल रूप से शामिल थे. बजरंग दल के जिलाध्यक्ष कुंदन कुमार का घर अयोध्यानगर में ही है). सबके सब शराब के नशे में थे. जहां से जुलूस निकला था, वहीं से सबने शराब पी रखी थी. मुंह पर भगवा गमछा बांध उप्रदव मचा रहे थे. ऐसा हाल हुआ कि एक - एक दुकान को चिन्हित करके जलाया गया. सिटी पैलेस में आग लगा दी गई.

कुछ देर बाद वे लहेरी थाना पहुंचे. थाना क्या कर रहा है! देखा कि 20 पुलिसकर्मी लाठी डंडा लिए हुए हैं लेकिन वे रोड पर जाने की पोजीशन में नहीं थे. डर व आतंक का माहौल था. पुलिस कहां थी, पता नहीं. डीएसपी को काॅल किया. ‘असर’ का वक्त हो रहा था. मुरारपुर मस्जिद के अंदर तोड़-फोड़ हुई थी और उसके अंदर की दुकानों को जला दिया गया था. मस्जिद में रहने वाले लोग हाते में छिप गए. इमाम साहब को स्थानीय लोगों ने बचाया. दमकल को फोन किया. कोई रिस्पांस नहीं आ रहा था. मजमा और खराब हो रहा था. उसके बाद मदरसा को जलाया गया.

मुरारपुर मुुहल्ले में एक ही घर मुसलमान है. उनका भी नाम सरफ़राज़ है. उनके घर में पीछे से आग लगाने की कोशिश की गई. मुहल्लों के लोगों ने अच्छी भूमिका निभाई. लगभग 8 बजे प्रशासन पहुंचा तब मस्जिद से सबको निकाला गया. तारिक साहब के छोटे भाई को सिटी पैलेस से स्थानीय लोगों ने निकाला.

यह सर पर नहीं, दिल पर चोट है

तकरीबन 60 वर्षीय अकबर आज़ाद जिला प्रशासन द्वारा बनाई गई शांति समिति के सदस्य थे. गगन दीवान के पास ही उन्होंने अपने संगठन अंजुमन मुफहिद इसलाम की ओर से शोभायात्रा में शामिल लोगों के लिए पानी की व्यवस्था कर रखी थी. कई लोग उनके साथ थे, लेकिन जब अचानक भगदड़ मची तो उप्रदवियों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा. वे कहते हैं - जुलूस में लोग तलवार के साथ चल रहे थे, हंगामा मचा रहे थे. वे सबको शांत कराने का प्रयास कर रहे थे. उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उपद्रवियों का कहर उनपर ही बरपेगा. अचानक ढेले चलने लगे और अकबर आज़ाद पर हमला कर दिया गया. वे कहते हैं कि यदि हमारी तरफ के मुहल्ले के लोग भी सक्रिय हो जाते तो बड़ा कांड हो जाता.

9 अप्रैल को जब उनसे मिलने जांच टीम पहुंची वे अपने एक छोटे से कमरे में कराह रहे थे. सिर पर चोट के गहरे निशान थे. सिर के अलावा पीठ, पेट, हाथ, जांघ हर जगह चोट से काले निशान पड़े थे. कहने लगे - सड़क पर पड़ा कराहता रहा. लोगों ने मरा हुआ समझ लिया. बाद में, कुछ लोग घर उठाकर लेते आए. एंबुलेंस नहीं मिला. स्थानीय स्तर पर ही कुछ-कुछ इलाज हुआ. अगले दिन 8 बजे जाकर इलाज करा पाया. कहते हैं कि एफआईआर करने गया तो हमसे कहा गया कि फर्द बयानी होगी. बिहार थाना में जाकर ही बयान देना होगा. वहां गए थे. फर्द बयान दिया, लेकिन उसपर मेरा दस्तखत नहीं है. बयानी भी कई रोज बाद हुआ. क्या लिखा उन्हें मालूम नहीं. सीओ के आफिस में यह फर्द बयानी हुई. बात करते-करते वे बेहद रूआसां से हो गये - यह क्या हो गया है मुल्क में. यह मेेरे सर पर नहीं दिल पर चोट है.

उनका काउंटर, 12 कुर्सी, लोहे की बेंच, एजेंटी के कागजात, झोपड़ी सबकुछ तहस-नहस कर दिया गया. वे उप्रदवियों को पहचानते हैं. ज्यादातर लोग पहड़पुरा के हैं. विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुए हैं. तलवार लेकर उतरे थे. महिला पुलिसकर्मी तो भागकर हमारे मुहल्ले में छुप गई. हमले में शकील, शौकत, मुजाहित हसन आदि बुरी तरह घायल हो गए.

बातचीत चल ही रही थी कि शांति समिति की बैठक से खान साहब अकबर जी को देखने आ पहुंचे. 9 अप्रैल को भी जिला प्रशासन ने शांति समिति की बैठक बुलाई थी. हमने उनसे सवाल किया कि शांति समिति की बैठक में आप लोगों ने जुमा के दिन शोभायात्रा पर आपत्ति नहीं की थी? खान साहब कहने लगे -सब किया था. बात यही हुई थी कि जुम्मे की नमाज के बाद ही शोभायात्रा निकलेगी. विहिप के पुराने सदस्य मान भी गए थे कि 2 बजे के बाद निकाला जाएगा. उसके पहले कुछ नहीं होगा. जुलूस निकला भी 2 बजे के बाद, लेकिन गमछा बांधे भगवाधारियों के कई जत्थे लगातार मोटरसाइकिल से हाॅस्पीटल मोड़ से सोगरा काॅलेज तक उत्तेजक कार्रवाइयां करते रहे और प्रशासन ने उनपर कोई कार्रवाई नहीं की. कहा कि 31 मार्च की शांति समिति की बैठक में बजरंग दल के जिलाध्यक्ष कुंदन कुमार भी थे. कुंदन ने बैठक में कहा था कि भीड़ बहुत अधिक होगी. उसने 127 गांवों को निमंत्रण देने की बात कही थी. एक लाख की भीड़ की चर्चा की. एक तरह से वह प्रशासन को चैलेंज कर रहा था, फिर भी प्रशासन ने उस स्तर की तैयारी में तत्परता नहीं दिखलाई.

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9 अप्रैल की बैठक में कई लोग मौजूद थे. सांसद, पूर्व विधायक, मेयर आदि, लेकिन वर्तमान विधायक डाॅ. सुनील सिंह कभी भी शांति समिति की बैठक में नहीं आए. सबको 500-500 रु., शाल, शराब, पेट्रोल आदि बांटे गए. कहा कि मास्टर माइंड पर कार्रवाई नहीं हो रही है. कुंदन की गिरफ्तारी के बाद उसके समर्थक खुला चैलेंज कर रहे हैं. वे बिहार को यूपी बना देने का आह्वान कर रहे हैं. वे कहते हैं कि यह दंगा नहीं था. हम सबने दंगे भी देखे हैं. यह तो कुछ मुठ्ठी भर लोगों की साजिश थी जिसे प्रशासन ने होने दिया. आम हिंदू दंगाई नहीं हैं. लहेरी थाना यदि थोड़ी भी सक्रियता दिखलाता तो कुछ होता ही नहीं. प्रशासन अपनी गलती स्वीकार करे.

एक अप्रैल की शाम – उपद्रव की फिर से हुई साजिश

31 मार्च की रात बिहारशरीफ के लिए आतंक की रात रही. रात में पुलिस ने छापेमारी की, जिसके कारण दहशत और बढ़ा. यह छापेमारी मूलतः गगन दीवान के पीछे के गरीब मुस्लिम मुहल्लों में की गई थी और कई युवकों को उठा लिया गया था. 1 अप्रैल की सुबह से शहर में धारा 144 लागू कर दी गई. दिन शांत रहा. प्रशासन ने कड़ाई बरती, लेकिन शाम होते-होते एक बार फिर से गड़बड़ी की खबरें आने लगीं. शहर में बडे़ पैमाने पर उप्रदव को फैलाने की साजिश कामयाब नहीं होते देख बजरंग दल वालों ने शहर के बाहरी इलाकों को निशाना बनाया. व्हाट्सएप के जरिए तरह-तरह की अफवाह फैलाई गई. कई हिंदुओं के मारे जाने की झूठी खबरें प्रचारित की गईं ताकि आग लगी रहे. शाम सात बजे तक पहड़पुरा, मनीराम अखाड़ा, खासगंज, बड़ी दरगाह आदि जगहों से गोली चलने की खबरें आने लगीं.

जांच टीम मनीराम अखाड़ा पहुंची. वहां पर हमें किशोर साव, रामप्रीत केवट और शशिभूषण सिंह का साथ मिला. यह शहर का दक्षिणी छोर है. अतिपिछड़ी जाति के गरीबों का मुहल्ला है. एक अप्रैल को यहां पर गोली चली थी. मुहल्ले पर पुलिस ने दबिश बढ़ा रखी है. इस मुहल्ले से पुलिस ने अनुज कुमार, उम्र -35 वर्ष, पिता - रामप्रवेश महतो को गिरफ्तार किया है. उसकी मां हमलोगों से मिलीं. हमने घटना की विस्तार से जानकारी लेनी चाही. वे बताने लगीं - हम गरीब पर कहर बरप रहा है. मेरा बेटा तो जुलूस देखने गया था, लेकिन अब घर-घर पुलिस पहुंच रही है. हमलोग कोई खराब काम करते हैं क्या? बाल-बच्चा सब भूखे मर रहा है. घर में वही कमाने वाला था. घर अब कैसे चलेगा.

यह सही है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और कुछेक ट्रेंड लोगों को छोड़कर बाकि नौजवान जुलूस देखने भर गए थे और फिर वे सब उन्माद की चपेट में आ गए.

मनीराम अखाड़ा के पश्चिमी तरफ मुस्लिम मुहल्ला है. उसके बाद बड़ी दरगाह, छोटी दरगाह और फिर पहड़पुरा का मुहल्ला. अखाड़ा के पास के लोग बताने लगे कि एक अप्रैल की शाम में हल्ला हुआ कि बड़ी संख्या में मुसलमान लोग अखाड़ा पर चढ़ रहा है. यह पूछने पर कि क्या किसी ने अखाड़ा पर मुसलमानों को चढ़ते देखा, इसका वे कोई जवाब नहीं दे पाए. जाहिर सी बात है कि यह पूरा झूठ और अफवाह था. अफवाह के कारण ही सहीऋ लोग जुटने लगे और मनीराम अखाड़ा की सुरक्षा कर रही पुलिसकर्मियों पर गोली चला दी. अपनी सुरक्षा में पुलिस ने तब आंसू गैस के गोले छोड़े. बजरंग दल वालों ने यह प्रचारित करना शुरू किया कि प्रशासन भी मुसलमानों की समर्थक हो गई है. वह हिंदुओं पर ही गोली चला रही है.

उस मुहल्ले में रामप्रवेश राउत का बेटा मनीष, सोराबी पर के शैलेन्द्र आदि लोगों को चोटें लगी हैं. कुछ नौजवान मिले. उनसे जब बातचीत शुरू हुई, तो बड़े आराम से कहने लगे कि हां हम सब नारा लगा रहे थे. मिंया मुर्दाबाद, मियां लोग पाकिस्तान जाओ और जो भी मन में आता वे हम बकते जा रहे थे. श्रवण कुमार पंडित बतलाते हैं कि सबकी गाड़ी में पेट्रोल भरवाया गया. गमछी, जूता, तलवार बांटा गया. ये लोग यही सब करते रहते हैं. इससे पहले रामनवमी के जुलूस पर घर-घर पर पुलिस का पहरा होता था. पता नहीं इस साल क्यों नहीं था? जब बवाल हुआ पुलिस गाड़ी वाड़ी छोड़कर भागी.

पहड़पुरा में एक मौत

बड़ी दरगाह के उत्तर पश्चिम में मुस्लिम मुहल्ला है और दक्षिण में कुशवाहा, रमानी, तांती आदि जाति समूह का पहड़पुरा मुहल्ला. पहड़पुरा के और दक्षिण में अयोध्यानगर है. पूरी साजिश का सरगना कुंदन यहीं रहता है. यह पूरा मुहल्ला बजरंग दल, आरएसएस का केंद्र है. सांप्रदायिक साजिश का पूरा का पूरा ताना-बाना यहीं से बुना गया. एक अप्रैल की शाम में इस इलाके में गोली चली थी और उसमें विकास कुमार, उम्र - 26 वर्ष की मौत हो गई. उसके भाई ने जो एफआईआर दर्ज किया है उसमें यह कहा गया है कि विकास कुमार बाजार करके घर लौट रहे थे. उस वक्त शाम के सात बज रहे थे. जैसे ही उस्ताद दरगाह के पीछे पहुंचे, वहां हलचल हुई और उस्ताद दरगाह से गोली चली. गोली लगने से घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई. गोली असामाजिक उपद्रवियों द्वारा चलाई गई. दरगाह से गोली चलने की बात को पूरा जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित करवाया गया. स्थानीय भूषण सिंह हमें दूसरी बात बताते हैं. वे कहते हैं कि दरगाह पर हमला करने की पूर्व योजना थी. बड़ी संख्या में पहड़पुरा के लोग पेट्रोल बम से हमला करने गए थे. उसी बीच गोली चली. दरगाह में मुश्किल से 8-10 मुस्लिम लड़के होंगे. पहड़पुरा के लोग रंगबाज हैं. पहले दरगाह में आग लगाने की कोशिश हुई. उसके बाद मामला बिगड़ गया. गोली किधर से चली हम नहीं कह सकते, लेकिन यह सच है कि गोली से विकास कुमार की मौत हुई है. बहरहाल, दरगाह के आसपास के मुस्लिम मुहल्ले में आतंक का माहौल है और पूरा मुहल्ला फिलहाल खाली है.

जांच टीम पहड़पुरा पहुंची. आम लोग अपने कामकाज में लौटने का प्रयास करते दिखे. उस समय तक 3 बजे तक ही दुकानें खुली रह सकती थीं. बाजार भाव गिरा हुआ था. जांच टीम पहड़पुरा में प्रवेश करते ही एक डाॅक्टर के क्लिनिक पर पहुंची. बैठ कर बात कर ही रहे थे कि वहां सोहैल आलम पहुंच गए. वे लंबे समय से न केवल उनके मरीज हैं, बल्कि बहुत पुराने मित्र भी हैं. उनसे बातचीत शुरू हो गई. कहने लगे - हम सबमें बात-व्यवहार है, प्रेम-भाव है, लेकिन इधर पर्व-त्योहारों में हमेशा टेंशन हो जाता है. सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि हम सबको अफवाहों से सावधान रहना चाहिए. प्रशासन को इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी चाहिए.

उसके बाद मृतक विकास कुमार के घर पहुंचे. पहुंचते ही बजरंग दल के समर्थकों ने हमें घेर लिया और कहना शुरू किया - नीतीश सरकार मुसलमानों की सरकार हो गई है. बिहार में भी योगी राज चाहिए. हमलोग मुसलमानों का सब पर्व त्योहार झेलते हैं, वे हमारा एक भी नहीं झेल सकते क्या? हम चुपचाप सुनते रहे और बिना कोई जवाब दिए वहां से विदा हुए.

पटेल काॅलेज के पूर्व स्थित मजार पर हमला

एक अप्रैल की ही शाम पटेल काॅलेज के पूर्व में स्थित मजार पर हमला करके उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया. यह हजरत मखदुम सैयद कुतुबउद्दीन शाह का मजार है, जहां हिंदू मुस्लिम दोेनों समुदाय के लोग आते हैं. लोहे का गेट तोड़ दिया गया. कुरानशरीफ जलाया गया. पंखे खोल लिए गए. एल्युमिनियम के बर्तन को उठा ले भागे.

कटरा रहा शांत

हमारी जांच टीम पहड़पुरा के बाद कटरा पहुंची और वहां हमने इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष 88 वर्षीय इकबाल ज़फ़र से मुलाकात की. उन्होंने खुदा का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उनका मुहल्ला - कटरा पूरी तरह सुरक्षित रहा. वे 1981 के दंगे की याद करने लगे. यादव व मुस्लिम बहुल इस इलाके में उस वक्त सबसे ज्यादा खून खराबा हुआ था. यदि उप्रदव इस इलाके में फैलता तो कयामत ही था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. बनौलिया, पतुआना आदि यादव बहुल गांव हैं. ये सब के सब शांत रहे. कहने लगे इस उप्रदव से बाजार बहुत प्रभावित हुआ है. रमजान का महीना है. हम सब अपने सामान तो नन मुस्लिम के यहां से ही खरीदते हैं. लगभग 80 प्रतिशत. बहुत दिक्कत हो रही है. कहते हैं कि सेकुलर दिमाग को नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है. ठीक है कि उप्रदव बड़ा नहीं हुआ लेकिन कोशिश हो कि आगे ऐसा न हो.

बजरंग दल के पूर्व अध्यक्ष विक्की डोम ने सुनाई कहानी

समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े डोम जाति से आने वाले विक्की डोम, जो अभी बिहारशरीफ नगर निगम में सफाईकर्मी का काम करते हैं, उन्होंने मामले को और खोला. वे कुछ बरस पहले तक बजरंग दल के नगर अध्यक्ष थे, लेकिन जब जगह-जगह बजरंग दल-आरएसएस द्वारा बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी जाने लगीं, तो उन्होंने बजरंग दल से इस्तीफा दे दिया. आजकल वे भाकपा-माले के नजदीक हैं. उन्होंने हमें बताया कि नगर निगम वाले मुस्लिम मुहल्लों में जाने से हमें रोक रहे हैं. कह रहे हैं कि मामला शांत होने पर जाइएगा, जबकि हमलोगों को हर दिन फोन आता है. वे कहते हैं - जितनी भी दुकानें जली थीं, सबके कचड़े को अब साफ किया जा रहा है. यह सबूत मिटाने की भी कोशिश हो सकती है. आगे कहते हैं - हम तो बजरंग दल में रहे हुए हैं. हमको उनके भीतर की सारी खबरें मिल जाती हैं. यह सब भाजपा का 2024 का प्लान है. हिंदू मुसलमान को लड़ाने का. इसमें हंड्रेड परसेंट प्रशासन की गलती है. यदि प्रशासन चाहता तो बिहारशरीफ में बजरंग दल वाले इतने भी मजबूत नहीं कि वे दंगा करवा सकें.

प्रशासन की भूमिका पर सवाल

सबसे अहम सवाल यह कि जब सबको इसका बखूबी अंदेशा था कि रामनवमी के जुलूस की आड़ में सांप्रदायिक उन्माद भड़काए जा सकते हैं, तो फिर प्रशासन ने जुलूस निकालने के लिए अगले दो दिनों तक का परमिशन कैसे दिया और फिर उसने सुरक्षा की उस स्तर की तैयारी क्यों नहीं की? रामनवमी 30 मार्च को था. उस दिन स्थानीय विधायक डाॅ. सुनील सिंह के नेतृत्व में बड़ा जुलूस निकला और धनेश्वर घाट पर 51 फीट का झंडा फहराया गया. 31 मार्च को जुमा होने के बावजूद शोभायात्रा को परमिशन दिया गया. वह भी तलवारों व हथियारों से लैस होकर. शांति कमिटी में बजरंग दल के जिलाध्यक्ष के ब्योरे के बाद भी प्रशासन ने सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की. विगत सालों में ऐसा होता रहा है. इसलिए शुरू से ही वहां का प्रशासन और खासकर एसपी सवालों के घेरे में रहे हैं.

गगनदीवान: सभी कैमरे पहले ही खोल लिए गए थे

दैनिक भाष्कर अखबार के 11 अप्रैल 2023 के संस्करण में एक बड़ी खबर छपी है जो रामनवमी हिंसा में प्रशासन की संलिप्तता की ओर इशारा करती है. अखबार के सामने वार्ड संख्या 39 के पूर्व वार्ड पार्षद जमील अख्तर ने खुलासा किया कि उपद्रव के कुछ दिन पहले गगनदीवान में लगा स्मार्ट सिटी का कैमरा गायब कर दिया गया. इस मामले को शांति समिति की बैठक में भी उठाया गया था लेकिन अधिकारियों ने इसका कोई जवाब नहीं दिया. अखबार में प्रकाशन के बाद स्मार्ट सिटी के सीओ विनोद कुमार ने बताया कि 26 फरवरी को कैमरा हटाया गया था. इसकी सूचना पुलिस-प्रशासन को थी. जमील अख्तर आगे कहते हैं कि गगन दीवान कब्रिस्तान की घेरेबंदी की मांग भी लंबे समय से होती रही है लेकिन प्रशासन ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया. बड़ी बात यह है कि कैमरा हटाने की जानकारी होने के बाद भी प्रशासन ने अतिसंवेदनशील माने जाने वाले गगनदीवान के रास्ते जुलूस निकालने का परिमशन कैसे दे दिया? यह सवाल सबके मन में कौंध रहा है.

दो समुदायों के बीच टकराव का गलत नरेटिव

जिला प्रशासन ने शुरू में दो समुदायों के बीच टकराव के एक गलत आधार पर इस मामले को डील करना शुरू किया. जब सबकुछ जल कर राख हो गया, तब कहीं जाकर प्रशासन सक्रिय हुआ. जांच टीम के समक्ष जिलाधिकारी ने स्वीकार किया कि प्रशासन से चूक हुई है, लेकिन वे यह कहना भी नहीं भूले कि उन्माद की कार्रवाइयां दोनों तरफ से हुई हैं. उन्होंने हिंदू समुदाय की भी कुछ दुकानों के क्षतिग्रस्त किए जाने के उदाहरण दिए. तथ्यगत यह सही है लेकिन घटनाक्रम की पूरी क्रोनोलाॅजी को यह कमजोर करने वाला तर्क है. जिस तरह से मुस्लिम समुदाय पर संगठित हमला हुआ, उसे दो समुदायों के बीच का टकराव भला कैसे कहा जा सकता है?

जिलाधिकारी ने हमें यह भी बताया कि एक अप्रैल की दोपहर तक दोनों समुदाय से तकरीबन 27 लोगों को गिरफ्रतार किया गया है. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर. इसमें मुस्लिम युवकों की ही गिरफ्तारी अधिक हुई, जो समुदाय पीड़ित हुआ उसे ही दंडित किया गया. बिहार थाना में पुलिस की ओर से दर्ज पहली प्राथमिकी में कहा गया कि शोभायात्रा के गगन दीवान के पास पहुंचने पर पूर्व से एकत्रित मुस्लिम समुदाय की ओर से कुछ असमाजिक तत्वों ने अभद्र टिप्पणी की और गलत इशारे किए. इसके कारण शोभायात्रा का नेतृत्व कर रहे कुंदन कुमार, धीरज कुमार, प्रकाश महतो आदि भड़क गए और थोड़ी ही देर में पत्थरबाजी होने लगी. भगदड़ सुफीनगर थवई होते हुए टाउन हाॅल नीमगंज, बीबीगंज की तरफ होने लगा. अजीब बात यह है कि पुलिस की पहली प्राथमिकी में मदरसा अज़ीज़िया या सोगरा काॅलेज की कोई चर्चा तक नहीं है. सीसीटीवी फुटेज कैमरे के आधार पर मो. जाहिद, मो. सदाब, गुलफाम, फिरोज, राजा, साहब, मो. गुड्डु, मो. आरिफ, मो. मुस्ताक, मो. इयाज, मो. अफजल, मो. अरमान, मो. तन्नु, मो. चिक्कु, मो. बदरू, मो. शाहरूख, मो. जाकिर, मो. मटकु पानवाला, मो. मुस्तफा मियां, मनोरंज यादव, धर्मवीर यादव, जगदीश यादव, संजय पासवान, मुन्ना, मुन्ना मास्टर, संटु कुमार, राकेश कुमार, फकीरा यादव आदि सहित कई लोगों की शिनाख्त की गई और गिरफ्तारी हुई.

दबाव के बाद प्रशासन का रूख बदला

एक अप्रैल तक प्रशासन का पूरा रूख मुसलमानों के खिलाफ दिखता है. ऊपर से दबिश के बाद उनलोगों ने मामले की सही से जांच शुरू की और असली उपद्रवियों को पकड़ने की शुरूआत हुई. 9 अप्रैल तक बजरंग दल के कुंदन कुमार सहित 150 लोगों पर एफआईआर दर्ज किया गया और गिरफ्तार किया गया. इन मामलों में प्रशासन ने अभी तक अपनी ओर से 16 एफआईआर दर्ज किए हैं. व्हाट्सएप से फैलाए गए अफवाहों की भी जांच चल रही है. कुंदन की गिरफ्तारी के लिए प्रशासन ने कुर्की जब्ती का भी आदेश निकाला था.

सोशल मीडिया को अफवाह फैलाने का बनाया जरिया

हाल ही में बिहार ने मनीष कश्यप प्रकरण को देखा कि किस प्रकार पटना में बैठकर तमिलनाडु में प्रवासी मजदूरों पर हमले का फर्जी वीडियो बनाया गया और वैमनस्य पैदा करने की कोशिशें की गईं. बिहारशरीफ मामले में भी सोशल मीडिया के जरिए संगठित तरीके से अफवाहों को फैलाया गया. हिंसा भड़काने के मामले में आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) की विशेष टीम की जांच जारी है, जिमसें पांच लोगों को रिमांड पर लेकर पूछताछ किया गया. रिमांड पर लिए गए लोगों के नाम मनीष कुमार, तुषार कुमार तांती, धर्मेन्द्र महतो, भूपेन्द्र सिंह राणा उर्फ चंदन सिंह और निरंजन सिंह है.

जांच से पता चला है कि रामनवमी के दौरान हिंसा भड़काने के लिए सोशल मीडिया और इंटरनेट के अन्य प्लेटफाॅर्म का बखूबी इस्तेमाल किया गया. इसके लिए फेसबुक के अलावा व्हाट्सएप पर कई तरह के फर्जी एकाउंट बनाए गए तथा लोगों के बीच उत्तेजित करने वाली सूचनाओं को प्रचारित-प्रसाारित करवाया गया. 15 अप्रैल तक पुलिस की हुई जांच के मुताबिक 456 सदस्यों वाला एक व्हाट्सएप ग्रुप बिहारशरीफ रामनवमी हिंसा से संबंधित पाया गया है, जिसके जरिए हिंसा भड़काने के लिए आपत्तिजनक संदेश व फोटो भेजे गए थे. इसमें कुल मिलाकर 15 लोग ही सक्रिय थे, बाकि ग्रुप के निष्क्रिय सदस्य थे. ईओयू का कहना है कि यह एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करता है. साजिश के मास्टरमाइंड तक पहुंचना जरूरी है.

मदरसा अज़ीज़िया द्वारा दायर एफआईआर

एफआईआर के अनुसार 31.03.23 को लगभग 6 बजे असामाजिक तत्वों व दंगाइयों द्वारा अचानक मदरसा अज़ीज़िया के मुख्य द्वार को तोड़कर प्रवेश करनेे की कोशिश की गई, जिसे गार्ड मोहन बहादुर ने रोकने की कोशिश की. परंतु दंगाइयों की संख्या अधिक एवं हरवे हथियार से लैस होने के कारण वे रोक पाने में असफल रहे. अंततः मदरसा अज़ीज़िया के मुख्य द्वार, ताला, जंजीर को तोड़कर तथा गार्ड के साथ मारपीट करके मदरसा परिसर में दंगाई प्रवेश कर गए. मदरसे के हाॅल में लकड़ी के 18 आलमीरे थे, उन आलमीरों में अतिआवश्यक व महत्वपूर्ण पुस्तकें थीं, जिन्हें जलाकर पूरी तरह से राख में तब्दील कर दिया गया. इसके अतिरिक्त 8 लकड़ी के अन्य आलमीरों में मदरसा के स्थापना काल से लेकर अब तक के संबद्धता और गैर सरकारी कागजात यथा संबद्धता निबंधन तथा जरूरी दस्तावेज के साथ-साथ सन 1910 से लेकर 2022 तक का छात्र एवं छात्राओं से संबंधित निबंधन, अंकपत्र, प्रमाण पत्र के अतिरिक्त टीचिंग व नन टीचिंग स्टाफ के नियुक्ति पत्र से लेकर सेवा पुस्तिका आग के हवाले कर दिया गया. इसी हाॅल से लगे प्राचार्य का कक्ष है, जिसमें कंप्यूटर, प्रिंटर, एसी, सीसीटीवी कैमरा और उसका सेटअप बाॅक्स, लेखा एवं बैंक से संबंधित सभी कागजात नष्ट कर दिए गए. साथ ही साथ इस कक्ष की दस प्लासिटक की कुर्सियों, दस लकड़ी की कुर्सियों, एक चौकी और एक लोहे की आलमारी, कारपेट सहित सभी चीजें जलकर राख हो गईं. इस मदरसे के पूर्वी भाग में स्थित क्लासरूम जो छात्रावास के रूप में इस्तेमाल किया जाता था जिसमें सिंगल बेड की तेरह चौंकियां व पांच पंखे थे, उसे जलाकर नष्ट कर दिया गया. तकरीबन एक करोड़ की संपत्ति नष्ट कर दी गई. हालांकि पुस्तकों का हुआ नुकसान तो अपूरणीय क्षति है. यह मदरसा सोगरा वक्फ बोर्ड स्टेट द्वारा सन 1896 से संचालित है तथा 1930 में मदरसा एजुकेशन बोर्ड, बिहार सरकार सरकार से निंबधित है. यहां कक्षा प्रथम से लेकर फाजिल (स्नातकोत्तर) तक की पढ़ाई होती है तथा समय-समय पर अंतराष्ट्रीय, राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा यहां के शैक्षणिक वातावरण की प्रशंसा की जाती रही है. यह एफआईआर मदरसा के प्रभारी प्राचार्य मो. शाकिर की ओर से की गई है.

अन्य एफआईआर

बड़ी दुकानों के लूटने-जलाने के एफआईआर किए गए हैं. लेकिन जो छोटी दुकानें हैं उसके मालिकों को लहेरी थाना उनके आवेदनों पर केवल मुहर मारकर लौटा रही है. थाना का कहना है कि सभी क्षतिपूर्ति को एक साथ नत्थी कर दिया जाएगा. बहरहाल, उनपर एफआईआर नंबर नहीं दिया गया है.

9 अप्रैल को भी शहर में 144 लागू था. हमारी टीम को प्रभावित इलाकों का दौरा नहीं करने दिया गया, इसलिए संपत्तियों के हुए नुकसान का सही-सही मूल्यांकन हम नहीं कर सके. फिर भी, तकरीबन 33 बड़े-छोटे प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाया गया है. कुछ दुकानों की लिस्ट हमें प्राप्त हुई, जिन्हें भारी नुकसान पहुंचाया गया है.

कुछ जली हुई दुकानों का सर्वे

एजाज शाॅप खासगंज - जूते-चप्पल की दुकान थी, पहले लूटा और फिर आग लगा दिया गया. 25 लाख के नुकसान का अंदाजा. सबकुछ राख हो गया.

मो. नसीम चिकेन शाॅप: देशी मुर्गा की दुकान थी. सबकुछ लूटने के बाद जला दिया गया. तकरीबन डेढ़ लाख का नुकसान हुआ है. अभी दूसरे दुकान पर काम कर रहे हैं.

नरेश कुमार पेंट शाॅप:  दुकान को पूरी तरह लूट लिया गया, एक लाख 60 हजार का अनुमानतः नुकसान हुआ है.

अनवर हुसैन किराना दुकान: जेनरल स्टोर एंड किनारा की दुकान थी. यह दुकान लहेरी थाना से 10 कदम पश्चित साइड में यह दुकान है. भगदड़ मची और अचानक दुकान पर हमला कर दिया. दुकान उस वक्त बंद थी. पूरा राख हो गया. 31 मार्च को आग लगाई गई लेकिन 1 अप्रैल तक भी आग लगी रही. कम से कम 8 लाख का नुकसान का अंदाजा है. फ्रीज पूरी तरह जलकर राख हो गया.

सूखे फलों की दुकान में लूटः भरावं चौक स्थित सूखे फलों की नौशाद का फ्रुट शाॅप, नं-1  दुकान को पूरी तरह लूट लिया गया. तकरीबन 17-18 लाख रु. का नुकसान हुआ. मुरारपुर स्थित उनके गोडान में भी पहले लूट हुई और फिर आग लगा दी गई.गोडान के पास खड़े उनके बुलेट व पलसर को भी जला दिया गया. शाॅप नंबर 2 में भी आग लूटपाट हुई.

भरावं पर मो. शमशाद आलम के सूखे फलों की दुकान का लूटा गया. 8 लाख की संपत्ति का नुकसान हुआ. एशिया होटल के विपरीत स्थित और महीना भर पहले खुले बिरयानी प्लाया का चकनाचूर कर दिया गया. मो. हासिब की दुकान भी लूटी गई.

मुरारपुर मस्जिद के अंदर मोहिउद्दीन बैट्री दुकान,  शॅाप नं.-1; टेलर जिशान, शाॅप नं.-2, पेंटर की दुकान, शाॅप नं.-3; मो. नसीम खान का चिकेन दुकान, अशरफ जेनरल स्टोर और अनवर हुसैन की दुकान में भी पहले लूट हुई और फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया.

रमजान का महीना चल रहा है. इन तमाम लोगों का सबकुछ बर्बाद हो चुका है लेकिन 18 दिनों बाद भी किसी भी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली है.

जांच टीम के निष्कर्ष व सुझाव
  1. बिहारशरीफ में 31 मार्च को रामनवमी शोभायात्रा की आड़ में सांप्रदायिक उन्माद एक सुनियोजित साजिश का नतीजा है. यह साजिश लगभग एक महीने से की जा रही थी. इसके लिए मुख्य रूप से बजरंग दल व विश्व हिन्दू परिषद के आयोजक जिम्मेवार हैं. आयोजकों पर पुलिस कार्रवाई कर रही है, लेकिन मास्टर माइंड अब भी जांच से बाहर हैं.

  2. स्थानीय भाजपा विधायक डाॅ. सुनील सिंह की भूमिका संदिग्ध है. वे कभी भी शांति कमिटी की बैठक में नहीं गए. इसलिए उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए.

  3. जिला प्रशासन और खासकर एसपी की भूमिका सवालों के घेरे में है. यह सवाल सबके जेहन में है कि जुमा होने के बावजूद 31 मार्च को रामनवमी शोभायात्रा निकालने की इजाजत कैसे दी गई? यात्रा की इजाजत देने पर प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए? इसलिए जांच टीम वहां के डीएम, एसपी और लहेरी थाना प्रभारी पर कार्रवाई की मजबूती से मांग करती है. वर्तमान डीएम व एसपी के रहते हुए मामले की सही जांच नहीं हो सकती है.

  4. सबसे बड़ा नुकसान मदरसा अज़ीज़िया का हुआ है. वहां के छात्रा-छात्राओं को पढ़ाने की वैकल्पिक व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए और मदरसे, सोगरा काॅलेज और मस्जिद के पुनरूद्धार की जिम्मेवारी राज्य सरकार को लेनी चाहिए.

  5. साम्प्रदायिक हमले में लूट लिए गए तमाम दुकानदारों, मृतक, घायलों व पीड़ितों को 20-20 लाख रुपये का मुआवजा व पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए.

  6. धार्मिक त्योहारों में हरवे-हथियार के साथ जुलूस निकालने पर पूरी तरह से प्रतिबंध होना चाहिए. अफवाहों पर प्रशासन को विशेष ध्यान देना चाहिए.

  7. सांप्रदायिक हिंसा के जिम्मेवार बजरंग दल और उसके जैसे उप्रदवी संगठनों की शिनाख्त कर उनपर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.

  8. मुस्लिम मुहल्लों से जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए.

  9. आपत्तिजनक नारों व गानों के इस्तेमाल होने पर आयोजकों पर कार्रवाई हो.

  10. शांति समितियों को प्रभावी व कार्यकारी बनाया जाना चाहिए.

सासाराम में भी दिखा वही पैटर्न

भाकपा-माले विधायक अरूण सिंह, जिला सचिव नंदकिशोर पासवान, जिला कमिटी सदस्य रविशंकर राम, कैशर नेहाल आदि की एक टीम ने सासाराम का दौरा किया.

वहां गड़बड़ियां 30 मार्च से ही शुरू हो गई थीं. जुलूस के दौरान मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए जा रहे थे और मां-बहन की गालियां दी जा रही थीं. हाथों में तलवार लिए उपद्रवी उन्हें लगातार डरा-धमका रहे थे. 31 मार्च को लगभग 11 बजे चिकटोली मस्जिद पर हमला कर उसका ताला तोड़ दिया गया और मुस्लिम समुदाय के धर्मग्रंथों को फाड़ दिया गया. शाह जलाल पीर मुहल्ला में शाऊद कुरैशी की गाड़ी और उस्मान कुरैशी की कबाड़ की दुकान और शहजाद कुरैशी व शमशाद खातून के घर में आग लगा कर जला दिया गया. फुलन शाह मजार की चारदीवारी के ऊपर के मेहराब, मीनार एवं अंदर में लाइट व ग्रील को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया.