वर्ष - 32
अंक - 18
29-04-2023

विगत 26 अप्रैल 2023 को झारखंड की राजधानी रांची स्थित डाॅ. कामिल बुल्के हाॅल, मनरेसा हाउस में ‘मौजूदा समय में बढ़ता सांप्रदायिक-काॅरपोरेट फासीवाद और लोकतांत्रिक प्रतिरोध’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित हुई. ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआइपीएफ) द्वारा आयोजित  इस परिचर्चा में भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने मुख्य वक्ता के बतौर शिरकत करते हुए कहा कि देश में मजबूत लोकतंत्र के लिए आजादी आंदोलन से भी बड़ी लड़ाई लड़नी होगी. भारत में साझी संस्कृति एवं सभ्यता की लंबी ऐतिहासिक विरासत है. देश में बढ़ते सांप्रदायिक काॅरपोरेट फासीवादी हमले के बावजूद अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है.

उन्होंने कहा कि तीखे उन्मादी व नफरती भाषा का इस्तेमाल कर देश में तनावपूर्ण एवं हिंसक माहौल बनाया जा रहा है और तमाम धार्मिक आयोजनों का इस्तेमाल राजनैतिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है. इसे ब्रिटिश हुकूमत ने सिखाया था. सांप्रदायिक और काॅरपोरेट ताकतें एक दूसरे के लिए हैं. देश में विपक्षी की एकता व सामाजिक एकता का मोर्चा बनाकर यह प्रयास हो रहा है कि 2024 में बीजेपी की वापसी न हो.

वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. रवि भूषण (राष्ट्रीय अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच) ने कहा कि काॅरपोरेट और सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों का आलिंगन और गहरा हो गया है. हम सभी एक भयावह और अंधकार के दौर से गुजर रहे हैं. इस अंधेरे में भी जो चिराग जल रहे हैं, उन्हें मशाल का रूप देना होगा. देश में आगामी लोकसभा चुनाव में मौजूदा सत्ता के खिलाफ तमाम विपक्षी ताकतों को एकजुट होकर वन-टू-वन फाइट करना जरूरी है. तभी मौजूदा फासीवादी सत्ता को हटाया जा सकता है.

एआइपीएफ की राष्ट्रीय अभियान समिति के सदस्य विधायक विनोद सिंह ने कहा कि देश में अभी काॅरपोरेट लूट का माॅडल चल रहा है. जिन राज्यों में ग़र बीजेपी दलों की सरकार है, वहां भी यही माॅडल चलाने की कोशिश है. जल-जंगल-जमीन की लूट के लिए सांप्रदायिक विभाजन का माहौल बनाया जाता है. रोजी-रोजगार एवं खनिज व अन्य संसाधनों की लूट के लिए दमन और मानवाधिकार का हनन किया जाता है.

फिल्ममेकर मेघनाथ ने कहा कि फिल्म के आधार पर सांप्रदायिक-फासीवादी निजाम के खिलाफ जन जागरूकता के लिए डाॅक्यूमेंट्री फिल्मों का उपयोग करना चाहिए.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद कुमार ने कहा कि देश में एक अघोषित फासीवाद चल रहा है जो कुछ अर्थों में ज्यादा खतरनाक है. प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताकतों को एकजुट होकर ऐसी सत्ता को हटाना जरूरी है. इनके अलावा एस. अली, दामोदर तुरी, सयैद गुलफाम अशरफी, वाल्टर कंलडुलना ने भी अपने विचार रखे.

परिचर्चा की अध्यक्षता वरिष्ठ आदिवासी चिंतक वाल्टर कंलडुलना एवं साहित्यिक सैयद गुलफाम अशरफी ने की. मंच संचालन व विषय प्रवेश एआइपीएफ के नदीम खान और जेवियर कुजूर ने किया.

इस मौके पर जसम झारखंड के अध्यक्ष व कवि शंभू बादल, ऐपवा नेत्री नंदिता भट्टाचार्य, मो. अकरम, इम्तियाज सोनू, अब्दुल जब्बार, गुलजार अंसारी, मो. बब्बर, अभिजीत मल्लिक, अंशुमान कुमार, अनंत कुमार, अधिवक्ता राजदीप चंद्रवंशी, अधिवक्ता जयंत पांडेय,सिद्धेश्वर पासवान,  शाहनवाज खातून, राॅबर्ट मिंज, मीनू सिंह, शकील अहमद, नसीम खान, नौशाद आलम, मनोज भक्त, जनार्दन प्रसाद, मोहन दत्ता, शुवेन्दु सेन, भुवनेश्वर केवट समेत कई अन्य आंदोलनकारी, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे.

– नदीम खान व जेवियर कुजूर

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